Saturday, July 30, 2011

बीमा और निवेश अलग अलग हैं, समझिये..

कल पद्म जी ने फ़ेसबुक पर लिखा -

खुशखबरी...
बजाज एलाइंज मे एक यूलिप की योजना तीन साल पहले ली थी... तीस हज़ार जमा कर चुका हूँ और मेरा पैसा तीन साल बाद 27 हज़ार हो गया है... अब

    यूलिप लेने वाले अधिकतर लोगों के साथ यही कहानी होगी, क्यों सही कह रहा हूँ ना, क्योंकि यूलिप में पहले तीन वर्षों में मोर्टेलिटी चार्जेस ज्यादा होते हैं तो आपकी जमा की गई रकम कम जमा होती है, यकीन ना हो तो अपने पिछले तीन वर्षों के स्टेटमेंट पर नजरें दौड़ा लें, और बीमा अभिकर्ता को पहले तीन वर्षों में ज्यादा कमीशन मिलता है, इसीलिये आपने हमेशा बीमा अभिकर्ता को ये कहते सुना होगा कि केवल पहले तीन वर्षों तक ही पैसा भरिये फ़िर कोई नई स्कीम ले लेंगे।

    हम पद्म जी की यूलिप कि बात करते हैं, जैसा कि उन्होंने लिखा है कि पिछले तीन वर्षों में तीस हजार जमा कर चुके हैं परंतु अब पैसा २७ हजार हो गया है, अब तो कुछ किया नहीं जा सकता पर इस यूलिप से होने वाले रिटर्न की गणना कीजिये और देखिये कि इसमें आगे बने रहना क्या लाभदायक है ?

    १० हजार वार्षिक जमा करने के बाद भी बीमा कितना मिला होगा, ज्यादा से ज्यादा २ लाख रूपये का, इससे ज्यादा तो नहीं मिला होगा।

    हमेशा गांठ बांधकर रखें कि बीमा और निवेश दो अलग अलग चीजें हैं, इसलिये बीमा और निवेश को आपस में उलझने ना दें।

    अगर इसी दस हजार वार्षिक को इस तरह से निवेश किया जाता तो पैसा भी ३० हजार से ज्यादा होता और बीमित भी ज्यादा रकम से होते।

    अगले दस वर्षों के लिये अगर देखा जाये तो ५ लाख का टर्म बीमा अगले दस सालों के लिये लगभग २००० रूपये में मिल जाता जिसका कोई रिटर्न उन्हें नहीं मिलता, यह राशि हमने ३६ वर्ष मानकर गणना की है।

    और बाकी का 8000 रूपया अगर 700 रूपया महीने के हिसाब से जुलाई 2008 में HDFC Top 200 Growth में SIP से निवेश किया जाता तो इस जुलाई में यह SIP की रकम लगभग 36,153 रूपये हो गई होती।

निम्न तालिका देखें।

Date NAV (Rs.) Amount (Rs.) Units Accrued Value (Rs.)
01-07-2008 111.825 700 6.2598 700
01-08-2008 126.743 700 11.7828 1493.39
01-09-2008 129.16 700 17.2024 2221.86
01-10-2008 120.227 700 23.0247 2768.19
03-11-2008 95.928 700 30.3218 2908.71
01-12-2008 84.587 700 38.5973 3264.83
01-01-2009 94.479 700 46.0064 4346.64
02-02-2009 85.752 700 54.1695 4645.14
02-03-2009 82.213 700 62.684 5153.44
01-04-2009 93.541 700 70.1673 6563.52
04-05-2009 113.162 700 76.3531 8640.27
01-06-2009 140.372 700 81.3398 11417.8
01-07-2009 145.276 700 86.1582 12516.7
03-08-2009 158.221 700 90.5824 14332
01-09-2009 157.155 700 95.0366 14935.5
01-10-2009 171.852 700 99.1099 17032.2
03-11-2009 162.803 700 103.41 16835.4
01-12-2009 178.983 700 107.321 19208.6
04-01-2010 181.428 700 111.179 20171
01-02-2010 173.925 700 115.204 20036.8
02-03-2010 176.554 700 119.168 21039.7
01-04-2010 184.923 700 122.954 22737
03-05-2010 186.819 700 126.701 23670.1
01-06-2010 181.953 700 130.548 23753.6
01-07-2010 192.971 700 134.175 25891.9
02-08-2010 201.717 700 137.646 27765.4
01-09-2010 207.327 700 141.022 29237.6
01-10-2010 227.948 700 144.093 32845.6
01-11-2010 229.976 700 147.137 33837.9
01-12-2010 226.017 700 150.234 33955.4
03-01-2011 226.586 700 153.323 34740.8
01-02-2011 202.436 700 156.781 31738.1
01-03-2011 204.031 700 160.212 32688.2
01-04-2011 214.836 700 163.47 35119.2
02-05-2011 213.073 700 166.755 35531.1
01-06-2011 210.437 700 170.082 35791.5
01-07-2011 211.831 700 173.386 36728.6
28-07-2011 208.512   173.386 36153.1

Friday, July 29, 2011

देखो ऑटो में जवानी उछल रही है

    रोज रात्रि भोजन के पश्चात अपनी घरवाली के साथ एकाध घंटा घूम लेते हैं, जिससे बहुत सारी बातें भी हो जाती हैं, और पान खाना भी हो जाता है।

    वैसे तो यहाँ बैंगलोर में हमने जितने जवान लोग भारत के हरेक हिस्से से आये हुए देखे हैं, उतने शायद ही किसी और शहर में होंगे, क्योंकि बैंगलोर आई.टी. हब है। पर यहाँ लोगों को (जवान लोगों)  अपनी मर्यादा में ही देखा था, परंतु आज जब हम मैन आई.टी.पी.एल. (ITPM is a IT Park in Bangalore) रोड होते हुए घर की ओर जा रहे थे, तो अचानक एक ऑटो पर नजर पड़ गयी, उस ऑटो में एक जवान जोड़ा बैठा हुआ था और अचानक बात करते करते लड़की लड़के के सीने से चिपट गई। और हमारे मुंह से निकल गया “देखो ऑटो में जवानी उछल रही है”।

    बैंगलोर में यह हमारे लिये नया सा है, क्योंकि यहाँ का वातावरण उतना स्वच्छंद नहीं है जितना कि मुंबई का। मुंबई में तो दो जवान दिलों का मिलन कहीं भी हो जाता है, और ऑटो में तो ये समझ लीजिये कि बस यही होता है, अगर जवान जोड़ा है तो, वहाँ यह सब साधारण सा लगता था, परंतु जब यहाँ आये तो थोड़ा कसा हुआ वातावरण पाया, इसलिये आज थोड़ा ठीक नहीं लगा। इसका कारण यह भी हो सकता है कि कभी हमें यह मौका नहीं मिला।

    मुंबई में तो ऑटो वाले खुद ही कई बार चिल्लाकर ऐसी सवारियों को दूर कर देते हैं, परंतु जवान दिलों को कोई रोक सका है ?

Thursday, July 28, 2011

माइक्रोसॉफ़्ट के डॉस को ३० वर्ष हो गये.. (MS-DOS is 30 Years old today)

    आज एक मेल पढ़ रहा था तो उसमें एक लिंक थी - MS-DOS is 30 Years old today. हम तो डॉस वाले जमाने से ही कम्पयूटर सीखे हुए हैं, इसलिये इस खबर की ओर ध्यान आकर्षित हो गया।

    आज से तीस वर्ष पहले २७ जुलाई, १९८१ को माइक्रोसॉफ़्ट ने QDOS के राईट्स २५,००० डॉलर में सिएटल कम्प्यूटर प्रोडक्ट्स से खरीदे थे। नहीं तो QDOS को 86-DOS के नाम से जाना जाता था, सिएटल कम्प्यूटर प्रोडक्ट्स ने इसका अभिकल्पन इन्टेल के 8086 प्रोसेसर के लिये किया था।

    हमने MS-DOS के 5.0 वर्शन से सीखना शुरू किया था, फ़िर ६.२ वर्शन सीखा, जिसकी command.com 54,645 बाईट्स की होती थी, और अगर command.com फ़ाईल का साईज बदल गया तो इसका मतलब कि DOS की सीडी में वाईरस आ गया है। काली स्क्रीन का फ़ोटो देखकर पुराने लोगों को पुराने दिन याद आ जायेंगे।

 vpc.msdos62v dos62     

उस समय जितने भी सॉफ़्टवेयर सीखे थे बहुतों को तो वर्षों से उपयोग नहीं किया परंतु अगर आज भी मिल जाते हैं तो देखकर बहुत खुशी होती है, और उनके कमांड तो ढूँढ़ने भी नहीं पड़ते वो तो ऐसे याद हैं जैसे कि हमारी साँसों में घुल गये हैं।

    वर्डस्टॉर, लोटस १२३, डीबेस, फ़ॉक्स प्रो, अक्षर और भी बहुत सारे सॉफ़्टवेयर थे। खैर आज कम्प्यूटर चलाने के लिये कोई कमांड याद नहीं रखना पड़ता है, सब माऊस से मजे में हो जाता है। अगले तीस वर्षों में कम्प्यूटिंग का विकास देखने लायक होगा।

Wednesday, July 27, 2011

क्रोधित पक्षी याने के एंग्री बर्ड्स (Angry Birds..)

    कुछ दिनों पहले प्रशांत की एक बज्ज या फ़ेसबुक स्टेटस से एंग्री बर्ड्स नामक खेल का पता चला। हमने इसकी खोजबीन की गूगल महाराज पर तो देखा यह तो क्रोम ब्राऊजर में ऑनलाईन उपलब्ध है, और तो और अगर एक बार खेल शुरू कर लिया जाये तो नेट कनेक्शन बंद भी कर सकते हैं, तो कुछ लेवल ऑफ़लाईन खेल ही सकते हैं।

    खैर ब्लॉगर बांधव की सहायता से फ़ेसबुक के सहारे हमें एंग्री बर्ड्स को संस्थापित करने की लिंक मिल गई और हम खुश हो गये। मुझे याद है कि यह एंग्री बर्ड्स कुछ महीने पहले हमने नोकिया के N8 मोबाईल पर खेला था जब वह लांच हो रहा था।

एंग्री बर्ड्स

    एंग्री बर्ड्स खेल को खेलना किसी नशे से कम भी नहीं है, जब भी समय मिलता है तो हम पिल पड़ते हैं एंग्री बर्ड्स के साथ। यहाँ तक कि हमारे बेटॆ का तो सबसे प्रिय खेल यही है, इस चक्कर में महाराज की पढ़ाई लिखाई भी एक तरफ़ हो गई थी, तो हमने आखिरकार डेस्कटॉप से शार्टकट हटा दिया, प्रोग्राम फ़ाईल से भी प्रोग्राम हटा दिया, अब वे एंग्री बर्ड्स नहीं खोल पाते हैं, हाँ अगर उन्होंने पढ़ाई का कार्यक्रम पूरा कर लिया तो हम उन्हें खुद ही एंग्री बर्ड्स लगाकर दे देते हैं।

    एंग्री बर्ड्स मूलत: एक वीडियो गेम पहेली है, जो कि फ़िनलैंड की रोवियो मोबाईल ने विकसित की है। यह खेल सर्वप्रथम एप्पल के लिये दिसंबर २००९ में विमोचित किया गया था और इसकी खूब बिक्री हुई तो कंपनी ने अन्य टच स्क्रीन उपकरणों के लिये भी इस खेल को विकसित किया ।

    एंग्री बर्ड्स में मूलत: कुछ गुस्सा हुए पक्षी हैं जिन्हें गुलेल के द्वारा नियंत्रित कर सामने खड़े ढांचे को गिराकर उसमें बैठे हुए सूअरों को खत्म करना है। यह एक प्रकार से कूटनीतिक खेल है, जिसमें आपको पूरी योजना के साथ इन सूअरों को मारना होता है। यह खेल दिमाग को तो तेज करता ही है, परंतु इस खेल की लत भी लगाता है।

    इस खेल का छठा एपीसोड हाल ही में बाजार में उतारा गया है “ माईन एन्ड डाईन”, जिसमें १५ लेवल हैं।

आज एंग्री बर्ड्स खेल शायद मोबाईल में खेलने वाला सार्वाधिक लोकप्रिय खेल है।

एंग्रीबर्ड्स को क्रोम ब्राऊजर में खेलने की लिंक -

http://chrome.angrybirds.com/

तो देर किस बात की है, अब खेलिये एंग्री बर्ड्स और लत ना लग जाये तो कहना ।

Tuesday, July 26, 2011

वोल्वो में आज का सफ़र..

    आज फ़िर काम से थोड़ा दूर जाना पड़ा तो वोल्वो में लगभग एक घंटा जाने और एक घंटा आने का सफ़र करना पड़ा, वैसे तो सब ठीक रहा। परंतु हम ऐसे ही आज अपने सफ़र का अध्ययन कर रहे थे, तो सोचा कि क्यों ना डिजिटाईज कर लिया जाये। कितनी अच्छी बात हो अगर कोई ऐसा गेजेट आ जाये कि मन की बातों को अपने आप ही टाईप कर ले हाँ इसके लिये उसे मन से परमीशन और पासवर्ड दोनों ही लेने होंगे नहीं तो बहुत गड़बड़ हो सकती है और  तब तो बहुत ही, जब वह पोस्ट बन कर प्रकाशित हो जाये।

    जाते समय हम वोल्वो की आगे वाली सीट पर बैठे जिसमें कि चार सीट आमने सामने होती हैं, पहले से ही एक यात्री बैठी हुई थी हम भी उन्हीं के पास में बैठ लिये, फ़िर भी सामने की दो सीटें खाली थीं, उनमें से एक पर हमने अपना बैगपैक एक सीट पर रख दिया और अपने बैग में से इकॉनामिक टॉइम्स निकाल कर पढ़ने लगे, सामने वाली दो सीटें खाली ही थीं और अधिकतर हम उन पर बैठना पसंद नहीं करते क्योंकि वह वोल्वो  की दिशा के विपरीत होती है और कई बार उससे असहज महसूस होता है।

    थोड़ी देर बाद ही वह यात्री उतर गईं और हमने खिड़की के पास वाली सीट पर कब्जा कर लिया, फ़िर एक और यात्री आईं और वे हमारी पुरानी वाली सीट पर विराजमान हो गईं, उनके साथ ही एक परिवार चढ़ा जिसमें माता, पिता और उनकी लड़की थे, तो वे भी एक एक सीट संभाल कर बैठ लिये और पिता हमारी सामने वाली सीट पर बैठ गये, हमने अपना बैगपैक अपनी गोदी में रखा और अखबार को मोड़कर पढ़ने लगे, तो पीछे वाली साईड से वे सज्जन भी पढ़ने लगे, हम भी कनखियों से देख रहे थे, खैर यह तो सबके साथ होता है।

    थोड़ी देर में यह परिवार उतर गया तो हमने अपना बैगपैक सामने वाली सीट पर रख दिया, तब तक हम अखबार को निपटा चुके थे, और फ़िर एक किताब बैग में से निकाल ली, यह किताब भी शुरू किये बहुत दिन हो गये थे और मात्र छ: पन्ने ही पढ़ पाये थे, वहीं से आगे पढ़ने की कोशिश की तो लय नहीं बैठ रही थी, इसलिये वापिस से पहला पन्ना पलटा और पढ़ने लगे, दो ही पन्ने पढ़ पाये थे कि  तब तक वोल्वो किसी नई सड़क पर दाखिल हो चुकी थी, जो कि हमारे लिये नई थी, तो किताब बंद करके रास्ता देखने लगे और फ़िर धीरे से किताब को बैग में सरका दिया गया। हम अपने गंतव्य पर पहुंचने के लिये और आगे जाना था, गंतव्य पर बस खाली हो गई और हम पैदल ही चल दिये।

    अपना काम निपटाकर वापिस से बस में चढ़ लिये यह वोल्वो बस नहीं थी, साधारण बस थी क्योंकि उस रूट पर वोल्वो चलती ही नहीं है, पूरी बस भरी हुई थी और सबसे आखिरी वाली सीट मिली, परंतु बस बिल्कुल साफ़ थी, जो कि सरकारी बसों के लिये उदाहरण है। खैर अपने बस स्टॉप पर उतरे और वोल्वो में चढ़ लिये घर जाने के लिये, अबकि बार वोल्वो में पीछे की तरफ़ की सीट पर काबिज हुए और खिड़की के पास वाली पर बैठ लिये, साथ वाली पर बैगपैक रखा, ऊपर ए.सी. को बटन से ठीक किया और फ़िर सोचा कि चलो किताब पढ़ना शुरू किया जाये परंतु थकान इतनी हो चली थी कि पढ़ने की इच्छा नहीं थी और भूख भी लग रही थी।

    पीछे सीट पर एक लड़की बैठी हुई थी जो कि रास्ते में पड़ने वाले एक मॉल में किसी लड़के से मिलने जा रही थी, और बार बार फ़ोन करके या फ़ोन को रिसीव करके अपनी लोकेशन बता रही थी, अब बातचीत को विस्तारपूर्वक नहीं लिखता नहीं तो पोस्ट बहुत लंबी हो जायेगी।

    खैर थोड़ी देर बाद ही हमारी पास की सीट पर फ़िर एक सज्जन आ गये और हमने वापिस से बैग अपनी गोदी में रखा और मोबाईल में कान-कव्वा लगाकर कुछ जरूरी फ़ोन लगाने लगे, पर बैंगलोर में कुछ सड़कों पर मोबाईल के सिग्नल नहीं मिलते हैं, बार बार कनेक्शन एरर करके फ़ोन कट जाता था। सड़क पर ट्रॉफ़िक कम था इसलिये घर जल्दी पहुँच लिये।

अब वोल्वो के बारे में तभी लिखेंगे जब कुछ विशेष होगा।

Monday, July 25, 2011

हॉकर द्वारा पोंगली बनाकर अखबार फ़ेंकना और हमारा अखबार सुबह गायब होना ।

    अखबार तो बचपन से घर पर आते हुए देख रहे हैं, कभी पूरा अखबार प्रेस करा हुआ मिलता था, तो कभी अखबार को हॉकर पोंगली बनाकर उसे ऊपर रबड़ाबैंड लगाकर या सुतली से बांधकर घर में फ़ेंकता था।

    मुंबई में हम बड़ी बिल्डिंग में रहते थे और वहाँ पोंगली बनाकर फ़ेंकना हॉकर के लिये संभव नहीं था, इसलिये हॉकर सबसे पहले लिफ़्ट से सबसे ऊपरी माले पर जाता था और फ़िर वहाँ से फ़्लेटों में अखबार डालते हुए सीढियों से नीचे आता था। कई बार सामने वाले या अगल बगल वाले फ़्लेट का अखबार नहीं आने पर वे लोग चुपके से अखबार उठालेते तो फ़िर अखबार वाले को फ़ोन करना पड़ता, आज अखबार नहीं डाला तो वह वापिस आता और कहता कि अखबार तो डाला था फ़िर मिला कैसे नहीं, इसके बाद फ़्लेट का नंबर भी अखबार पर लिखा मिलता जिससे किसी दूसरे को वह अखबार अपना ना लगे। और सुबह जब अखबार रख कर जाता तो घर की घंटी भी बजा जाता जिससे हमें पता चल जाता कि अखबार आ चुका है।

    अब यहाँ बैंगलोर में पहले हमारा अखबार वाला हमारे फ़्लेट के दरवाजे के सामने प्रेस करा हुआ अखबार रख जाता था, परंतु कुछ दिनों से वह भी अखबार की पोंगली बनाकर फ़ेंकने लगा है। अब फ़िर वही गलतफ़हमी शुरू हुई, पड़ोसी के साथ, हम सुबह ६ बजने से पहले ही बिस्तर छोड़ देते हैं और कई बार पड़ोसी भी, जब तक प्रेस करा हुआ अखबार हमारे दरवाजे पर मिलता था कभी गायब नहीं हुआ परंतु जहाँ पोंगली बनाकर फ़ेंकना शुरू किया वहीं अखबार गायब होने लगा, हम अखबार वाले को फ़ोन करते भई किधर गया हमारा अखबार वो भी हतप्रभ, फ़िर उसी ने पता लगाकर बताया कि आपका अखबार आपका पड़ौसी उठा लेते हैं, उनसे कहिये कि उनका अखबार सुबह ७.३० के बाद आता है और उनका इकॉनामिक्स टाईम्स साथ में नहीं आता है। फ़िर एक दिन हमने खुद देखा और पड़ौसी से बात कर मामला सुलझा लिया, अब सुकून से रोज सुबह पोंगली में अखबार हमें ही मिलता है।

    पोंगली में अखबार फ़ेंकने के कुछ फ़ायदे भी हैं तो नुक्सान भी हैं, फ़ायदे तो केवल हॉकर के लिये है कि उसे हर मंजिल पर जाना नहीं पड़ता है। और फ़ायदा सभी के लिये है, रबड़ बैंड मिलती है, अलार्म नहीं लगाओ तब भी समय का पता चल जाता है।

    बहुत पहले एक फ़िल्म देखी थी जिसमें संजीव कपूर था या कोई और याद नहीं, वह बालकनी में आकर अंगड़ाईयाँ लेता है और हॉकर उसी समय पर पोंगली बना हुआ अखबार फ़ेंकता है, जो सीधा उसके मुँह में घुस जाता है।

अब हमारा अखबार हमारा इंतजार कर रहा है, हम अब अपने अखबार को पढ़ते हैं ।

Sunday, July 24, 2011

पोलिथीन याने कि प्लास्टिक की थैलियाँ हम कितनी उपयोग करते हैं ? और कपड़े के थैले कहाँ गये ?

    आजकल जिधर देखो उधर हर किसी के हाथ में पोलिथीन की थैलियाँ दिखती हैं, कपड़े और जूट के थैले तो हाथों से गायब ही हो गये हैं, अगर कहीं भूले भटके दिख भी गये तो बड़ा आश्चर्य होता है।

    मुझे बहुत अच्छे से याद है कि जब छोटा था तब हमारे घर में कम से कम पाँच छ: थैले हुआ करते थे, जिसमें सब्जी लाने का अलग और किराने लाने का अलग थैला होता था। कपड़े के थैले बाजार में तो मिलते नहीं थे तो मम्मीजी घर पर ही सिलाई मशीन पर सिलती थीं, अगर किसी काम के लिये कोई कपड़ा आया हो और उसमें से कोई कपड़ा बच गया तो उसका थैला सिल जाता था, और थैले भी अलग अलग अनुपात के होते थे, कम सब्जी वाले और ज्यादा सब्जी वाले, इसी तरह कम किराने वाले और ज्यादा किराने वाले।

    आज भी घर पर समान लाने के लिये पापाजी थैले का ही उपयोग करते हैं, प्लास्टिक की थैलियों को तरजीह नहीं देते हैं, परंतु बहुत सारी चीजें बदल गई हैं, पहले जब कपड़े के थैले उपयोग करते थे तो सब्जी को घर पर आकर छांटना पड़ता था और उसमें भी काफ़ी मजा आता था, फ़ली, भिंडी, मटर और मिर्ची तो आपस में गुत्थमगुत्था ही मिलती थीं, शिमला मिर्च, आलू, प्याज और टिंडे एक दूसरे में मिल जाते थे, उनको अलग अलग करना एक रोमांच ही होता था। पर धीरे धीरे प्लास्टिक की थैलियों ने जगह बनाई, अब जब दुकान पर सब्जी खरीदी तो बेचारी सारी सब्जियाँ अपने अपने थैलियों में सिमट कर रह गई हैं, कभी एक दूसरे से गुत्थमगुत्था हो ही नहीं पाती हैं, खैर उस जमाने में फ़्रिज नहीं हुआ करता था तो लगभग रोज ही ताजी सब्जी मिलती थी, परंतु आजकल फ़्रिज आने से इतनी खराब आदत हो चली है कि शनिवार या रविवार को पूरे सप्ताह की सब्जियाँ लाकर फ़्रिज भार लेते हैं, और फ़िर पूरे सप्ताह भर खाते रहते हैं। बस पत्तेदार सब्जियाँ अब भी तभी आती हैं जिस दिन खानी होती हैं।

    अब मॉल में जाते हैं, कोल्डस्टोरेज की निकली हुई ताजी सब्जियाँ लेकर आते हैं, हर सब्जी के लिये अलग छोटी छोटी प्लास्टिक की थैलियाँ मौजूद रहती हैं, आजकल तो सब्जियाँ रेडीमेट पोलिथीन मॆं पैक वजन के साथ दाम लिखी हुई भी मिलती हैं, बस ये थोड़ी महंगी होती हैं ३०-३५% तक। हमने एक बात तो देखी कि बाजार में सब्जियाँ महंगी हैं और मॉल में सब्जियाँ सस्ती हैं, और कई बाहर ठेला लगाने वाले तो इन मॉलों से ही सब्जी खरीदते हैं और ज्यादा दामों पर बाहर बेचते हैं।

    खैर हमने वापिस से कपड़े के थैले का उपयोग करना शुरू किया है, जिसमें दूध, ब्रेड वगैरह लेकर आते हैं, वैसे यह भी मजबूरी में है क्योंकि सरकार ने प्लास्टिक की थैलियों पर रोक लगाई हुई है, जब रोक लगी थी, तब लगभग सभी दुकानों से थैलियाँ गायब हो गई थीं, परंतु थैलियाँ ना होने के वजह से धंधे पर असर होने लगा तो अब रोक के बाबजूद प्लास्टिक की थैलियाँ दुकानदारों को रखना पड़ती हैं।

    पहले कचरे के डिब्बे के लिये अलग से पोलिथीन लानी पड़ती थी, परंतु अब माह भर में मॉल से इतनी खरीदारी हो जाती है कि अलग से कचरे के लिये पोलिथीन खरीदने की जरूरत ही नहीं पड़ती है। एक प्रकार से हम पोलिथीन का सदुपयोग भी कर रहे हैं। पर हाँ अब कपड़े के थैले पर जाना बहुत मुश्किल लगता है।

Saturday, July 23, 2011

शहीद चंद्रशेखर आजाद से मेरा तीन वर्षीय नाता

    आज शहीद चंद्रशेखर आजाद का जन्मदिन है, यह शहीद मेरे लिये बहुत ही स्तुत्य और महत्वपूर्ण है, क्योंकि मैंने इनकी जन्मभूमि भाबरा के जिला झाबुआ में महाविद्यालयीन शिक्षा ग्रहण की है, जिसका नाम शहीद चंद्रशेखर आजाद महाविद्यालय है। महाविद्यालय के मुख्य द्वार से प्रविष्ट करते ही, बायें हाथ पर शहीद चंद्रशेखर आजाद की संगमरमर से बनी मूर्ती है जिसमें आजाद अपने प्रसिद्ध पोज में हैं, अपने हाथ मूँछ पर फ़ेरते हुए, मूर्ती देखते ही बनती है, बलिष्ठ हाथ, तेजमय चेहरा।

    रोज सुबह महाविद्यालय जाते समय आजाद को देखकर मन में नया जोश भर आना आज भी वहाँ के विद्यार्थियों के लिये कोई नई बात नहीं है।

    आज आजाद का जन्मदिन है, परंतु हमें भान ही नहीं था जब फ़ेसबुक पर देखा तो आजाद और तिलक को याद करने वालों की लाईन लगी देखी, तो सोचा कि हम भी अपने ब्लॉग पर इस याद को उतार देते हैं।

    आज झाबुआ के लिये विशेष दिन भी है, आज भाबरा जो कि शहीद चंद्रशेखर आजाद की जन्मस्थली है, वहाँ से “भीली” रेडियो शुरु किया जा रहा है जो कि भीली लोग ही संचालित करेंगे। यह रेडियोनामा ब्लॉग से पता चली।

    भील जाति के लोग आज भी बहुत बहादुर और बलशाली होते हैं, ये बहुत ही सीधे सादे लोग होते हैं, परंतु आज कल की दुनिया की चालाकी का सामना करने के लिये यह भी बहुत चालाक हो चले हैं। ये लोग आज भी टायर सोल की चप्पलें पहनते हैं, शायद कई लोग तो इसके बारे में जानते भी न हों। टायर सोल मतलब कि बड़े वाहनों के टायर काटकाटकर चप्पलें बनायी जाती हैं और उसमें रबड़ की ही बद्दी लगा दी जाती है, आज से १० वर्ष पूर्व यह चप्पल लगभग २-३ रूपयों की मिलती थी, जबकि स्लीपर चप्पल उस समय लगभग २०-२५ रूपयों की मिलती थी।

आजाद के लिये सच्ची श्रद्धांजली होगी भीलों को हर क्षैत्र में प्रोत्साहन देना।

Thursday, July 21, 2011

आयकर रिटर्न की ईफ़ाईलिंग और नियोक्ता द्वारा कटा हुआ कर फ़ॉर्म 26A S से देखें। (E-filing of Income Tax Return and Check deducted Tax from employer in form 26A S)

    क्या आपने आयकर रिटर्न भर दिया है, अगर नहीं तो कैसे भरने वाले हैं, हमने इस बार से इलेक्ट्रॉनिक तरीके से भरना शुरू किया है और बहुत ही आसान लगा।

    आयकर की ईफ़ाईलिंग की वेबसाईट पर जाकर अपने पान नंबर से रजिस्टर करें, और अपनी निजी जानकारियाँ भरें। डाऊनलोड में जाकर संबंधित फ़ॉर्म डाऊनलोड कर लें, जैसे अगर आप केवल नौकरी करते हैं तो आपको आई.टी.आर. १ सहज भरना है, सहज की एक्सेल फ़ाईल डाऊनलोड करें, और जब एक्सेल में फ़ाईल खोलें तो मेक्रो को इनेबल करें नहीं तो एक्सेल फ़ाईल के पुश बटन काम नहीं करेंगे।

एक्सेल में अपनी सही जानकारी भरें जो कि फ़ॉर्म १६ में दी गई है, इसमें तीन टैब दिये हैं -

1. Income Details - इस शीट में फ़ॉर्म १६ के अनुसार आय की जानकारियाँ, नाम और   पता भरिये। Valideate  करिये और Next बटन पर क्लिक कीजिये।

2. TDS - इस शीट में नियोक्ता द्वारा काटे गये टैक्स की जानकारी, सैलेरी के अलावा अगर कहीं TDS कटा है और अग्रिम कर की जानकारी Transaction wise दें।

3. Taxes paid and verification - इस शीट पर अपने बैंक का खाता नंबर और माइकर कोड टंकित करें साथ ही यहाँ पर आपका टैक्स के बारे में पता चलता है कि टैक्स सही है या और जमा करना है या रिफ़ंड है। अगर यह नहीं आ रहा है तो पहली शीट Income Details पर जाकर Calculate Tax बटन पर क्ल्कि करें।

    अब तीसरी शीट पर दिये गये Generate बटन को दबायें तो यह आपकी एक्सेल फ़ाईल की .xml फ़ाईल बना देगा। जो कि Submit Return - Select Assessment Year में जाकर अपना वर्ष चुन लें, अपना फ़ॉर्म चुनें और अगर आपके पास डिजिटल सिग्नेचर है तो Yes करें नहीं तो No ही रहने दें। Next पर क्ल्कि करें, अब Choose file पर क्लिक करें और .xml फ़ाईल को चुनें। और अगर डिजिटल सिग्नेचर हैं तो इसके लिये जावा का संस्थापित होना आवश्यक है और अपनी .pfx फ़ाईल का पता दें। अब Upload बटन दबाकर फ़ाईल को Upload कर दें। जैसे ही फ़ाईल upload हो जायेगी, वैसे ही आपको फ़ॉर्म V की PDF लिंक मिल जायेगी, जिसे डाऊनलोड करके उसका प्रिंट निकालकर उसे आयकर बैंगलोर स्थित स्पेशल सैल के पते पर भेज दें। १२० दिनों के अंदर आपको फ़ॉर्म V आयकर विभाग को भेजना होता है जिसकी रसीद आयकर विभाग द्वारा आपके ईमेल पते पर भेज दी जायेगी। और इसका ऑनलाईन स्टेटस भी आयकर की साईट पर देख सकते हैं। अगर रसीद नहीं मिले तो फ़ॉर्म V वापिस से भेजें और ध्यान रखें कि फ़ॉर्म V केवल साधारण डाक या स्पीडपोस्ट से भेजें, रजिस्टर पोस्ट और कूरियर से डाक स्वीकार नहीं करते हैं। ज्यादा जानकारी के लिये आयकर विभाग की साईट पर देखें।

    अगर आपने डिजिटल सिग्नेचर भी अपलोड किये हैं तो फ़ॉर्म V भरकर भेजने की आवश्यकता नहीं है। सबसे सस्ता डिजिटल सिग्नेचर ईमुद्रा द्वारा दिया जाता है, मैंने भी सोचा था कि डिजिटल सिग्नेचर लूँ परंतु जब मात्र २० रूपये खर्च करने से काम चल जाता है तो उसके लिये ४०० रूपये का खर्चा क्यों किया जाये और डिजिटल सिग्नेचर का आयकर रिटर्न भरने के अलावा कहीं ओर व्यावहारिक उपयोग भी नहीं है।

    याद रखें पासवर्ड कभी भी कहीं भी नहीं लिखें, जैसे बैंक का पासवर्ड महत्वपूर्ण है वैसे ही आयकर की साईट का पासवर्ड महत्वपूर्ण है। कोई भी जानकारी अपलोड की जाती है, तो उसकी जिम्मेदारी केवल उस लॉगिन की ही है।

    अब आपको अपने नियोक्ता द्वारा जमा किये गये आयकर का विवरण देखना है तो आप पिछले वर्षों का भी विवरण यहाँ ऑनलाईन देख सकते हैं, फ़ॉर्म 26AS के द्वारा।

    My Account - View Tax Assessment ( Form 26A S), पूछी गई जानकारियों को भरें और View Form 26A S पर क्ल्कि करें। यह वेबसाईट एन.एस.डी.एल की साईट से कनेक्ट होकर सारी जानकारी आपको मुहैया करवा देता है।

    तो भूल जाईये ऑफ़लाईन आयकर रिटर्न भरना और भरिये ऑनलाईन रिटर्न, हाँ अगले वर्षों में अगर डिजिटल सिग्नेचर अगर सस्ता होता है या फ़िर उसका कहीं और भी व्यवहारिक उपयोग होता है तो डिजिटल सिग्नेचर भी ले लिया जायेगा।

Monday, July 18, 2011

क्या सरकार को हमसे किसी भी प्रकार का कर लेने का हक है ?

    यह एक बहुत बड़ा सवाल है, क्या सरकार को हमसे किसी भी प्रकार का कर लेने का हक है ? जब सरकार आम आदमी की रक्षा नहीं कर सकती, आम आदमी को मूलभूत सुविधाएँ नहीं प्रदान कर सकती तो सरकार हमसे कर कैसे ले सकती है ?

    जब हमें सड़क अच्छी नहीं मिल सकती, बस अच्छी नहीं मिल सकती और तो और सरकार चलाने वाले जनता के मुलाजिम हैं क्योंकि उनको तन्ख्वाह जनता के जमा किये गये कर से मिलती है, वे मुलाजिम ही जनता से आँखें लड़ाते हुए अपना रूतबा दिखाते हैं और जिस काम की तन्ख्वाह लेते हैं, उसका शुल्क भी जनता से भ्रष्टाचार के रूप में बटोरते हैं और बेचारी निरीह जनता इनके दमन चक्र में पिसी जा रही है, अगर कोई आवाज उठाता है तो सचान को जैसे मारा वैसे मारकर मुँह बंद करवा दिया जाता है या फ़िर बाबा रामदेव के ऊपर जैसा दमनकारी चक्र सरकार ने चलाया, चला दिया जाता है।

    सरकार अपनी ताकत केवल जनता पर दिखा सकती है, सरकार आतंकवाद, माओवाद और नक्सलियों से निपटने में असक्षम है और वहाँ केवल अपनी राजनीति की रोटियाँ सेकने में लगी है, क्या अगर सरकार सेना की टुकड़ी को नक्सली इलाके में भेज दे तो ये नक्सलवाद एक दिन में खत्म नहीं हो सकता ? या माओवाद खत्म नहीं हो सकता ? हमारे खूफ़िया विभाग समय पर सभी सुरक्षा विभागों को जानकारियाँ दे देते हैं, परंतु उन जानकारियों को फ़ाईलों में दबा दिया जाता है और ढुलमुल रवैया अपनाया जाता है। सुरक्षा विभाग आपस में ही एक दूसरे से बराबर संपर्क में नहीं रहते और समय पर इस प्रकार की जानकारियों का उपयोग नहीं कर पाते, ये लोग असक्षम नहीं है, बल्कि इसके पीछे राजनैतिक इच्छाशक्ति की कमी है।

    इतने सब के बाद भी सरकार को क्या हमसे किसी भी प्रकार का कर लेने का हक है ? सरकार हमसे हरेक चीज में तो कर ले रही है, फ़िर वह खाना, पहनना हो या ऐश करना, उस कर से भी पेट नहीं भरता तो तरह तरह के घोटाले भी सामने आते हैं ? और जनता के साथ धोखा किया जाता है ?

    हम किसी भी प्रकार का कर देने में कोई आपत्ति नहीं है, परंतु हमारे कर के रुपयों से क्या किया जा रहा है, वह तो हमें बताया जाये।

    मानते हैं कि सेना का शासन अच्छा नहीं होता, परंतु अब स्थिती इतनी खराब हो चुकी है कि अगर सेना का शासन लगा दिया जाये तो भी हमें अपने भारत को सुधारने में बहुत समय लगेगा, या फ़िर जनता को ही कानून अपने हाथ में लेकर अपने हिसाब से कानून का पालन करवाना पड़ेगा ?

Sunday, July 17, 2011

क्या आप २० रुपये में एक दिन का खाना खा सकते हैं ?

क्या आप २० रुपये में एक दिन का खाना खा सकते हैं ?

    यह प्रश्न बहुत ही व्यवहारिक है, क्योंकि सरकार ने गरीबी रेखा के लिये जो सीमा निर्धारित की है वह है २० रूपये प्रतिदिन, अगर कोई २० रूपये प्रतिदिन से ज्यादा कमाता है तो वह गरीबी रेखा में नहीं आता है।

    भारतीय प्रबंधन संस्थान, बैंगलोर के ७५ छात्रों ने समूहों में बँटकर गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों का जमीनी संघर्ष जाना। भारतीय प्रबंधन संस्थान के छात्रों के लिये २० रूपये कोई बहुत बड़ी चीज नहीं है, जब वे चले तो उन्होंने अपने पास केवल २० रूपये ही रखे और खाने की कोई भी सामग्री नहीं रखी।

    जब उन्होंने २० रूपयों में पूरा दिन गुजारा तो उन्हें पैसे की कीमत पता चली और उन्होंने देखा कि गरीबी रेखा के नीचे वाले कैसे जीवन यापन करते होंगे। २० रूपये से ज्यादा की तो एक दिन में नाश्ता या सिगरेट पीने वाले प्रबंधन संस्थान के छात्र सकते में थे, और इन लोगों के लिये मूलभूत सुविधाओं को कैसे जुटाया जाये ये सोचने पर मजबूर थे। मूलभुत सुविधाओं का न होने के लिये सरकार को ही दोषी नहीं माना जा सकत है।

    इस महँगाई के जमाने में उन्हें अगर सब्जी खाना हो तो पत्तेदार सब्जी थोड़ी बहुत आ सकती है, या फ़िर शाम को बची हुई गली सी सब्जी में से उन्हें सब्जी खरीदनी पड़ती है। चावल भी अगर १० रूपये किलो मिले तब जाकर उनके लिये खाना २० रूपये में एक दिन का पड़ेगा। परंतु चावल अगर देखें तो कम से कम २०-२२ रूपये है, वह भी लोकल सोना मसूरी मोटा चावल। अगर गेहूँ ही देखें तो कम से कम १६ रूपये किलो है और पिसवाने का ४ रुपये तो २० रूपये किलो तो आटा भी पड़ता है।

    अपने को तो सोचकर ही पसीने आते हैं, कि कैसे २० रूपये में दिन भर में खाना खाया जा सकता है जबकि १० रूपये की चाय या कॉफ़ी ही बाजार में मिलती है। नाश्ते में भी २० रूपये कम पड़ते हैं।

    वाकई २० रूपये में एक दिन निकालना बहुत मुश्किल है, और गरीबी रेखा के नीचे वालों को तो तब तक दिन निकालने हैं, जब तक कि वे इस गरीबी रेखा को पार नहीं कर लेते।

   भारतीय प्रबंधन संस्थान के छात्रों ने गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों का जीवन स्तर सुधारने और मूलभूत सुविधाएँ उपलब्ध करवाने के लिये संकल्प लिया।

Saturday, July 16, 2011

दो वयस्क फ़िल्में “देहली बेहली” और “मर्डर २”, हमारी अपनी समीक्षा (Two Adult Movies “Delhi Belly” and “Murder 2” My Review)

    पिछले दो दिनों में दो वयस्क फ़िल्में देख लीं, जो कि बहुत दिनों से देखने की सोच रहे थे और ऐसे महीनों निकल जाते हैं फ़िल्में देखे हुए।  पहली “देहली बेहली” और दूसरी “मर्डर २”। दोनों ही फ़िल्में अलग अलग कारणों से वयस्क दी गई होंगी। जहाँ “देहली बेहली” एक व्यस्क हास्य फ़िल्म है वहीं “मर्डर २” में  गरम दृश्य, थोड़ी बहुत गालियाँ और हिंसक दृश्य हैं ।

    अगर गरम दृश्यों की बात की जाये तो “देहली बेहली” में कुछ दृश्य ऐसे हैं जो कि लोगों को आपत्तिजनक लग सकते हैं मगर आजकल की पीढी इसे आपत्तिजनक नहीं मानती और इसे हास्यदृश्य ही मानेगी, तो यहाँ पीढ़ियों के अंतर की बात आ जाती है, और वहीं “मर्डर २” में गरम दृश्यों की जरूरत न होने पर भी ठूँसा गया है जो कि बोझिल से लगते हैं, परंतु उत्तेजना पैदा करने में कामयाब हुए हैं।

 मर्डर २        

    अगर गालियों की बात की जाये तो “मर्डर २” में शायद ३-४ गालियों से ज्यादा नहीं हैं, और वे भी बिल्कुल सही तरीके से उपयोग की गई हैं, कहीं भी ऐसा नहीं लगा कि गालियों को जबरदस्ती ठूँसा गया है या कम गालियों में काम चला लिया गया है। अब जब वयस्क फ़िल्म का सर्टिफ़िकेट लिया ही था तो कुछ गालियों का उपयोग तो कर ही सकते थे, और वह उन्होंने किया।

देहली बेहली के लिये मैंने फ़ेसबुक पर नोट लिखा था वही यहाँ चिपका रहा हूँ।

देहली बेहली

कल "डैली बैली" ए सर्टीफ़िकेट फ़िल्म देखी, तो लगा कि कई जगह जान बूझकर गाली कम दी गई है, जहाँ ज्यादा गालियाँ होनी चाहिये वहाँ केवल एक ही गाली से काम चला लिया गया है, अगर सही तरीके से गालियों का विज्ञान समझ लिया जाता तो यह संभव था, इसके लिये विशेष रूप से स्कूल और कॉलेज में जाकर समझा जा सकता है। या फ़िर वे लड़के जो होस्टल में रहते हैं, या अपने घर से अलग रहते हैं, उनका रहन सहन और गालियों का उपयोग बकायदा व्याकरण के तौर पर किया जाता है। वैसे आजकल हमारा गालियाँ देना काफ़ी कम हो गया है, परंतु हाँ अपने पुराने मित्रों के साथ आज भी बातें करते हैं तो बिना गालियों के बातें करना अच्छा नहीं लगता है, उसमें आत्मीयता लगती है। हालांकि किसी तीसरे सुनने वाले को यह गलत लग सकती है परंतु अगर व्याकरण का उपयोग नहीं किया जाये तो बात का मजा ही नहीं आता।

अब एक बात और है, जो सभ्य (मतलब कहने के लिये नहीं वाकई सभ्य, जिन लोगों ने अपने जीवन में कभी गालियाँ नहीं दीं) हैं, तो यह फ़िल्म वाकई उन लोगों के लिये नहीं है। यह हम जैसे सभ्यों (हम ऐसे सभ्य हैं, कि समय पड़ने पर इतनी गालियाँ दे सकते हैं और ऐसी ऐसी गालियाँ दे सकते हैं, कि अच्छे अच्छों के पसीने छूट जायें, पर देते नहीं हैं) के लिये है। खासकर युवावर्ग इसे बहुत पसंद करेगा।

    हिंसक दृश्यों की बात की जाये तो “मर्डर २” में हिंसक दृश्य अपना पूर्ण प्रभाव नहीं छोड़ पाये, वयस्क सर्टिफ़िकेट था तो हिंसक दृश्य को और बेहतर बनाया जा सकता था, हालांकि प्रशांत नारायन ने अपनी और से कोई कसर नहीं छोड़ी है, हिजड़ा बनने का दृश्य बहुत प्रभावी हैं और जो दृश्य पूर्व में आशुतोष राणा ने निभाये हैं, उनकी टक्कर के हैं। वैसे भी महेश भट्ट की फ़िल्म में अगर हिजड़ा ना हो तो उनकी फ़िल्म पूरी नहीं होती।

    “देहली बेहली” में हिंसक दृश्य प्रभावी बन पड़े हैं, जैसे कि अमूमन दृश्य में संवाद बनाये हैं, उससे वे दृश्य प्रभावी बन पड़े हैं, परंतु कुछ दृश्य हास्य पैदा करते हैं।

    कुल मिलाकर “देहली बेहली” बहुत अच्छी फ़िल्म लगी और “मर्डर २” ठीक ठाक, मतलब बहुत अच्छी नहीं। अच्छी बात यह है कि दोनों ही फ़िल्मों की पटकथा अच्छी कसी हुई है और अपने से दूर नहीं होने देती है।

अब जल्दी ही “चिल्लर पार्टी” देखने की इच्छा है।

Saturday, July 09, 2011

कारे कारे घनघोर बादल, तुम्हारा ये कारा कारा प्यार

    सुहानी शाम हो रही थी, बादल पूरे शहर पर घिर से आये थे, ऋत एकदम बदल गयी थी, घनघोर काले बादल ऐसे उमड़ पड़े थे जैसे कि तुम मुझपर अपना प्यार लेकर उमड़ पड़ती हो, और तुम्हारा प्यार भी घनघोर काले बादलों जैसा ही निश्चल और निष्कपट होता है, अपना प्यार की बारिश करती रहती हो जैसे ये कारे बादल तुम्हारे प्यार के सम्मोहन में ही बँधे हुए हैं, और तुमसे ही सीख लेकर बरसने निकल पड़ते हैं, पर देखो ना ये निगोड़े बादल अपनी काली छब में अपना प्यारा रूप लिये हवा से ही हिल जाते हैं, और हवा के साथ अठखेलियाँ खेलते हुए झमझम राग सुनाते हैं।

    उलाहना मत समझो, तुम्हारा ये कारा कारा प्यार कभी तुम्हें काला नहीं होने देता है, दिन ब दिन तुम पर निखार ही लाता रहा है, इन बादलों को तो बरसने के लिये सावन का इंतजार करना पड़ता है, और एक तुम हो कि तुम्हारा तो बारह महीने सावन चलता है, जब देखो तब तुम बादलों को कारा कर देती हो और बरस लेती हो।

    तुम्हें पता है जब बारिश की बूँदे, सड़क के गड्ढे में बने छोटे से पोखर में गिरती हैं, तो कोई आवाज नहीं होती किंतु अगर इसे ३-४ मंजिल ऊपर से देखो तो इसका सौदर्य देखते ही बनता है, यहाँ तक कि रेत पर भी बारिश की बूँदें गिरती हैं तो रेत अपनी थोड़ी सी जगह छोड़कर उन बूँदों को अपने ऊपर बरसने देती हैं, अपने अंदर ले लेती हैं, जैसे रेत को पता है कि बारिश की बूँद उसके पास आने वाली है और उसे आत्मसात करना है। यह प्रकृति का नैसर्गिक गुण है।

    सुबह उठो और अगर घनघोर बारिश का मौसम हो रहा हो, और पास के पेड़ पर कोयल अपनी मीठी बोली से कानों को राग दे रही हो तो ऐसा लगने लगता है कि ये सब प्यार के नये राग हैं जो इस प्रकृति से तुमको सीखने होंगे, वैसे भी प्यार की प्रकृति इतनी अलग अलग तरह की होती हैं, कि उसे समझना और व्यक्त करना बहुत ही कठिन है।

    जब भी प्यार करो तो कारे कारे बादल और कोयल की बोली को ध्यान रखो और अपना हदय द्रवित कर कारे होने की कोशिश करो। देखो फ़िर कारे कारे घनघोर बादल छाने लगे हैं ..

निजी कूरियर या डाक विभाग की स्पीड पोस्ट ? (Courier or Speed post from Post Office ?)

    अभी बहुत दिनों बाद कूरियर और स्पीडपोस्ट करने की जरूरत पड़ी, तो बदले हुए भाव देखकर होश उड़ गये, भाव इतने बड़े हुए हैं कि अच्छे अच्छों के होश उड़ जायें।

    Indiapost कूरियर सेवा शुरू हुए भारत में लगभग २ दशक हो चले हैं, परंतु कूरियर ने पिछले एक दशक से जो जोर पकड़ा है वह ऐतिहासिक है और कूरियर सेवाओं ने डाक विभाग को हाशिये पर ला खड़ा किया है। आज भारत में कुकुरमुत्तों की तरह जाने कितनी ही कूरियर सेवाएँ हैं, कूरियर सेवाएँ निजी हैं तो यह विश्वास करना लाजिमी है कि सेवाएँ अच्छी होंगी, परंतु यह सत्य नहीं है। कूरियर सेवा किसी हद तक जनता का विश्वास जीतने में कायम तो रहीं, परंतु जो लोग डाक विभाग की सेवाओं का उपयोग करते रहे उनको डिगा नहीं पायी।

    कूरियर सेवा की अपनी एक पहुँच होती है, वह ज्यादा से ज्यादा जिला स्तर तक या तहसील स्तर तक ही अपनी सेवाएँ प्रदान करते हैं, और भारतीय डाक विभाग की सेवाएँ पूरे विश्व में सबसे बड़ी हैं, भारतीय डाक विभाग की सेवाएँ छोटे से छोटे गाँव तक में मौजूद हैं।

Post Box     एक जगह स्पीड पोस्ट करना था तो मजबूरी में हमें पोस्ट ऑफ़िस जाना पड़ा तो पता चला कि शनिवार को १२.३० बजे ही पोस्ट ऑफ़िस बंद् हो जाता है, फ़िर सोमवार को घरवाली को भेजना पड़ा, तो पता चला कि लाईन लगी हुई थी, और लगभग सभी लोग टेलीफ़ोन का बिल जमा करने के लिये लाईन में लगे हुए थे, अब बताईये डाक जो कि डाकविभाग का मुख्य कार्य है उसे हाशिये पर डाक विभाग ने धकेल दिया है और टेलीफ़ोन बिल जमा कर रहा है। हाँ यह है कि टेलीफ़ोन विभाग से डाक विभाग को कमीशन मिलता है, तो क्या डाक विभाग अपने मुख्य कार्य को प्राथमिकता से करना छोड़ देगा। अब पोस्ट ऑफ़िस के लाल डिब्बे भी हर चौराहों पर नहीं दिखते हैं।

India post cargo     परंतु एक बात अच्छी लगी जो शायद सबको अच्छी लगे कि उतने ही वजन के कूरियर के और उतनी ही दूरी पर भेजने के कूरियर सेवा ने ५० रुपये लिये और जबकि स्पीडपोस्ट सेवा ने २५ रुपये लिये। दोनों ही सेवाओं में लगभग ४८ घंटों से ज्यादा का समय लगता है, परंतु अगर आप अपने कूरियर या स्पीडपोस्ट को ट्रेक करना चाहते हैं, तो यहाँ पर भी स्पीडपोस्ट की बेहतर ट्रेकिंग विश्वस्तर की है और कूरियर सेवाओं को इसमें भी मात करती है। यहाँ तक कि कई विश्वस्तर कूरियर कंपनियाँ भी इस तरह की जबरदस्त ट्रेकिंग का इस्तेमाल नहीं करती हैं।

    उसके बाद हमने सोचा कि आखिर क्यों डाक विभाग की सेवाओं से लोग भागने लगे हैं, तो पाया कि कूरियर सर्विसेस लगभग हर गली चौराहों के नुक्कड़ पर किसी न किसी दुकान में मिल जाती है, और लगभग पूरे समय आप कभी भी कूरियर कर सकते हैं, जबकि डाक विभाग का सरकारी समय निर्धारित है, और उस पर भी आपको लाईन में लगना पड़ता है तो आजकल समय किस के पास है, जो लाईन में लगे और डाक विभाग की सेवाओं का उपयोग करे।

    ६-७ वर्ष पहले उज्जैन में डाक विभाग ने कार्यालयों के लिये एक सेवा शुरू की थी, जिसके तहत शाम के समय डाकविभाग से कर्मचारी आता था और सारी डाक ले जाता था, अब पता नहीं कि वह सेवा उपलब्ध है या नहीं, परंतु उस समय लगभग हर बैंक और सरकारी कार्यालयों ने इसे तत्काल प्रभाव से उपयोग करना शुरू कर दिया था। अब शायद यह सेवा नहीं है, क्यूँकि अभी जब उज्जैन गये थे तो बैंकों में वापिस से कूरियर सेवाओं ने अपनी जड़ें जमा ली थीं, परंतु अन्य सरकारी कार्यालयों का पता नहीं है।

    कूरियर में एक अच्छी बात यह है कि आप फ़ोन कर दो वह आपके स्थान से ही आपकी डाक पिक अप कर लेगा और आप निश्चिंत हो जायेंगे, परंतु डाकविभाग के साथ ऐसा नहीं है, डाकविभाग को अपने तंत्र को प्रभावी रूप से इस्तेमाल करना होगा और उन्हें व्यावसायिक बुद्धि का परिचय देते हुए ठोस कदम उठाने होंगे। कुछ अच्छी सेवाएँ ग्राहकों के लिये देना होंगी, जिससे डाकविभाग के मजबूत तंत्र का फ़ायदा आम जनता को हो।

Thursday, July 07, 2011

ऑटो में १८० रूपयों का खून और साईकिल की बातें….

    आज सुबह से जो रूपयों का खून होना शुरू हुआ कि बस क्या बतायें ?

    खैर बैंगलोर नई जगह है और यह मुंबई जैसा सरल भी नहीं है, बैंगलोर गोल गोल है। मोबाईल पर भी गूगल मैप्स से मदद लेने की बहुत कोशिश करते हैं, परंतु असलियत में तो कुछ और ही निकलता है और कई बार गूगल मैप कोई और ही रास्ता बताता है।

    आज हमें सुबह पुलिस स्टेशन जाना था, पासपोर्ट के वेरिफ़िकेशन के चक्कर में तो, गूगल पुलिस स्टेशन कहीं और बता रहा था और पुलिस स्टेशन निकला ६ किमी. आगे इस चक्कर में ऑटो में हमारे १८० रूपये ठुक गये। जब सही पुलिस स्टेशन मिला तो पता चला कि यहाँ के लिये तो घर के पास से सीधी वोल्वो बस मिलती है।

    खैर हमारी जेब से निकलकर रूपये ऑटो वाले की जेब में जाना लिखा था तो लिखा था, हम क्या कर सकते थे। सोच रहे थे कि ऑटो वाला भी खुश हो रहा होगा कि रोज ऐसे ही १ - २ ढ़क्कन मिल जायें तो मजा ही आ जाये, और हो सकता है कि रोज फ़ँसते भी होंगे।

    जिस काम के लिये गये थे वह काम तो नहीं हुआ परंतु इतने रूपयों का खून हो गया वह जरूर अखर गया। ऐसा लग रहा था कि कोई बिना चाकू दिखाये हमें लूट रहा है और हम भी मजे में लुट रहे हैं।

    इसलिये अब सोच रहे हैं कि जल्दी से कम से कम दो पहिया वाहन तो ले ही लिया जाये, जिससे कम से कम ऐसे लुटने से तो बचेंगे और समय भी बचेगा।

    साईकिल भी दो पहिया है और बैंगलोर शहर में ५-६ किमी. में साईकिल के लिये विशेष ट्रेक बनाये गये हैं, परंतु अभी बैंगलोर के हर हिस्से में इस तरह के ट्रेक बनाना शायद मुश्किल ही है और अगर रोज २० किमी जाना और २० किमी आना हो तो साईकिल से आना जाना सोचने में ही बहुत मुश्किल लगता है। अगर २० किमी साईकिल चलाकर कार्यालय पहुँच भी गये तो कम से कम काम करने लायक तो नहीं रह जायेंगे।

    वैसे हमने हमारे पिताजी को रोज ३५-४० किमी साईकिल चलाते देखा है, और कई बार अगर कहीं आसपास गाँव में जाना है और जाने के लिये कोई साधन न होता था तो साईकिल से बस स्टैंड और फ़िर साईकिल बस के ऊपर और फ़िर उतर कर वापिस से साईकिल की सवारी, इसी तरह से लौटकर आते थे। सोचकर ही रोमांचित होते हैं, कि वे भी क्या दिन होंगे।

    साईकिल चलाने से स्वास्थ्य तो अच्छा रहता ही है और व्यायाम भी हो जाता है। हमारे पुराने कार्यालय में दो पहिया और चार पहिया वाहन की पार्किंग सशुल्क थी, परंतु साईकिल के लिये निशुल्क। हाँ कई जगह साईकिल परेशानी का सबब भी है, जैसे बड़े मॉल साईकिल की पार्किंग नहीं देते, ५ स्टार होटल साईकिल वालों को मुख्य दरवाजे से अंदर ही नहीं जाने देते हैं, और विनम्रता से मना कर देते हैं, साईकिल का अंदर ले जाना मना है।

    हमने भी साईकिल कॉलेज तक बहुत चलाई, और साईकिल से एक दिन में ५० किमी तक भी चले हैं, थक जाते तो ट्रेक्टर ट्राली को पकड़कर सफ़र तय कर लेते थे। बहुत सारी यादें हैं साईकिल की, बाकी कभी और ….

    खैर साईकिल चलाने से भले ही कितने फ़ायदे होते हों परंतु हम साईकिल लेने की तो कतई नहीं सोच रहे, दो पहिया वाहन सुजुकी एक्सेस १२५ बुक करवा रखी है, अब सोच रहे हैं कि खरीद ही लें।

Sunday, July 03, 2011

बहिन जी विज्ञापनों से खबरी चैनलों की बोलती बंद की ? या अपराध खत्म हो गये ?

    कुछ दिनों पहले IBN7 के दो पत्रकारों को बहिनजी के दो कानूनी रक्षकों ने अंदर कर दिया था और देख लेने की धमकी दी थी, जैसे ही मीडिया में मामला उछला वैसे ही आला अफ़सर सफ़ाई देने पहुँच गये कि यह उनका निजी मामला था, इसमें सरकार का कोई हाथ नहीं है।

    इसके पहले भी मीडिया के साथ इस तरह के मामले हो चुके हैं, परंतु उस समय मीडिया इतना संगठित नहीं था और यह भी कह सकते हैं कि व्यावसायिक मामलों के मद्देनजर कभी खुलकर नहीं बोल पाते थे। परंतु इस बार मीडिया ने हिम्मत करी और खुलकर सभी चैनलों ने इसका विरोध किया तो खुद बहिनजी और प्रधानमंत्रीजी को मीडिया से मुखतिब होने के लिये आना पड़ा। यह भी कह सकते हैं कि अब मीडिया परिपक्व हो चुका है और अब उसके पास व्यावसायिक विज्ञापनों की कमी नहीं है।

    जब से यह मामला हो गया है, उसके बाद उन दोनों कानूनी रक्षकों को सस्पेंड कर दिया गया परंतु अब उनका क्या हुआ उसकी कोई खबर नहीं है। शायद मामले को रफ़ा दफ़ा कर दिया गया होगा।

    अब लगभग हर खबरी चैनल पर बहिनजी के विज्ञापन की भरमार है, या तो बहिनजी की सरकार मजबूर है विज्ञापन देने के लिये, या फ़िर बहिनजी अपनी जनता की खून पसीने की कमाई को सम्मान नहीं देती हैं और इस तरह विज्ञापन में पैसा बहा रही हैं।

    अब उत्तरप्रदेश में हो रहे अपराधों का इन खबरी चैनलों ने प्रसारण कम कर दिया है, आखिर खबरी चैनलों को अच्छे खासे पैसों से बहिन जी ने खरीद जो लिया है, नहीं तो पहले यह हालत थी कि १-२ चैनलों पर ही विज्ञापन दिखते थे, और बहिन जी के प्रदेश के अपराधों का समाचार चल रहा है जिसमें उनके खुद के मंत्री तक लिप्त थे और ब्रेक में बहिन जी के प्रदेश के विका का विज्ञापन आता था।

    खैर अब यह तो खबरी चैनल ही बता सकते हैं कि अपराध खत्म हो गये या मिलने वाले बोनस से उनके कैमरों ने उधर देखना बंद कर दिया है।

Saturday, July 02, 2011

नौकरी है टैलेन्ट नहीं

    आज सीएनबीसी पर यह कार्यक्रम “नौकरी है टैलेन्ट नहीं” देख रहे थे। वाकई सोचने को मजबूर थे कि आज बाजार में नौकरी है परंतु सही स्किल के लोग उपलब्ध नहीं हैं, सबसे पहले मुझे लगता है इसके लिये विद्यालय और महाविद्यालय जिम्मेदार हैं, जहाँ से पढ़ लिखकर ये अनस्किल्ड लोग निकलते हैं।

    आज जग प्रतियोगी हो चला है। अगर इस प्रतियोगिता में आना भी है तो भी उसके लिये प्रतियोगी को कम से कम थोड़ा बहुत स्किल्ड होना चाहिये। जो कि पढ़ाई के वातावरण पर निर्भर करता है।

    आज इंडस्ट्री में ० से २ वर्ष तक के अनुभव वाले लोगों में स्किल की खासी कमी है, कंपनियों को भी अपने यहाँ काम करने वाले अनस्किल्ड वर्कर्स को प्रशिक्षण पर जोर देना होगा, और इसके लिये कंपनियों को बजट भी रखना होगा।

    अगर काम करने वाले स्किल्ड होंगे तो वे ज्यादा अच्छे से और ज्यादा बेहतर तरीके से अपना काम कर पायेंगे, जिससे कंपनी और कंपनी के उपभोक्ताओं को तो सीधे तौर पर फ़ायदा होगा ही और समाज को अप्रत्यक्ष रूप से फ़ायदा होगा।

    अच्छे स्किल्ड वर्कर होने से बेहतर कार्य कम लागत में पूर्ण हो पायेगा। इसके लिये आजकल कंपनियाँ आजकल अपने वर्कर्स को स्किल्ड बनाने के लिये विशेष कार्यक्रमों का आयोजन भी कर रही हैं और जिन कंपनियों के लिये आंतरिक रूप से यह संभव नहीं है, वे इस प्रोसेस को आऊटसोर्स कर रही हैं।

    खैर कंपनियाँ इस बात पर ध्यान दे रही हैं, यह सभी के लिये अच्छी है।

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