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Saturday, November 26, 2011

मल्टी ब्रांड रिटेल पर इतना घमासान क्यों ? (Why protestation against Multi Brand FDI ?)

सरकार ने ५१ फ़ीसदी तक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को मंजूरी दे दी, इस पर सरकार से विपक्ष और पक्ष के लोग बहुत नाराज हैं। क्या कारण है कि वे नाराज हैं -

१. खुदरा व्यापारियों को नुक्सान होगा ।

२. जो उनके यहाँ काम कर रहे हैं वे लोग बेरोजगार हो जायेंगे।

और भी बहुत से कारण हैं, परंतु उपरोक्त २ कारण ही मुख्य हैं।

जबकि सरकार ने साफ़ साफ़ कहा है कि ये खुदरा विदेशी दुकानें दस लाख से ज्यादा वाली आबादी में ही खुलेंगी।

अब अगर देखा जाये तो दस लाख से ज्यादा आबादी वाली जगहों पर आज बड़ी दुकानों जैसे हॉयपर सिटी, रिलायंस, बिग बाजार इत्यादि का कब्जा है । तो अभी भी तो वहाँ खुदरा व्यापारियों के लिये मुश्किल है। अगर मल्टी ब्रांड विदेशी खुदरा दुकानें आती हैं तो असली प्रतियोगिता तो बड़ी देशी खुदरा दुकानों और विदेशी खुदरा दुकानों के मध्य होगी। छोटे खुदरा व्यापारियों पर तो कोई असर नहीं पड़ने वाला है।

वालमार्ट विदेशी खुदरा दुकानें अभी बड़े देशी खुदरा दुकानों पर सभी सामान जरूर मिलता है, परंतु ये दुकानें अच्छी खासी कमाई कर रही हैं, और उपभोक्ताओं को कीमत मॆं कोई राहत नहीं है, उपभोक्ता को तो सामान छपी हुई कीमत पर ही मिलता है। जबकि ये देशी खुदरा दुकानें सामान सीधे कंपनियों से खरीदते हैं तो इनका डिस्ट्रीब्यूटर और डीलर इत्यादि मार्जिन भी बचता है, ट्रांसपोर्टेशन शुल्क में बचत होती है, कर में बचत होती है। जब ये देशी खुदरा दुकानें खुली थीं तब दावा किया गया था कि वस्तुएँ सीधे उपभोक्ता तक पहुंचेंगी और उपभोक्ता को कीमत में भारी फ़ायदा होगा, परंतु ऐसा कुछ नहीं हुआ। यही दावा अब विदेशी खुदरा दुकानें वालमार्ट, कैश एंड कैरी, केरफ़ोर इत्यादि कर रहे हैं। जब ये विदेशी खुदरा दुकानें आयेंगी तभी पता चलेगा कि उपभोक्ता को कितना फ़ायदा होता है।

बड़े देशी खुदरा दुकानों की बात की जाये तो मालवा (इंदौर, उज्जैन) में पाकीजा का एक तरफ़ा कब्जा है, जबकि वहाँ पर सभी बड़े देशी खुदरा दुकानदार मौजूद हैं। उसका मूल कारण है कि वे उपभोक्ता को सीधे कीमत में लाभ देते हैं, वे बात नहीं करते, उपभोक्ता को फ़ायदा देते हैं। उसका परिणाम यह हुआ कि अधिकतर लोग अब पाकीजा रिटेल से खरीदारी करने लगे हैं और वहाँ है असली समस्या छोटे खुदरा व्यापारियों की, तो अब वे भी उपभोक्ताओं को विभिन्न स्कीमों का प्रलोभन दे रहे हैं। वैसे वाकई बड़े खुदरा व्यापारियों को पाकीजा की उपभोक्ता नीतियों का अध्ययन करना चाहिये, जो उनके लिये बहुत फ़ायदेमंद साबित हो सकता है।

ये तो भविष्य में उपभोक्ता ही तय करेगा कि कौन खुदरा बाजार पर राज करेगा मल्टी ब्रांड विदेशी खुदरा दुकानें या देशी खुदरा दुकानें, यह तो तय है कि जो भी उपभोक्ता को ज्यादा फ़ायदा देगा वही बाजार में सिरमौर होगा।

9 टिप्पणियाँ:

  1. आप कह रहे हैं तो मान ले रहे हैं :-)

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  2. पता नहीं पर डर तो बना हुआ है।

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  3. खुदरा व्यापारी हारती लड़ाई लड़ रहे हैं। भविष्य उनके मॉडल का नहीं है।

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  4. @ प्रवीण पाण्डेय said...
    पता नहीं पर डर तो बना हुआ है।

    डर यूं ही नहीं बना.... आप देखना.. कई छोटे देशों की इकोनोमी चौपट ये वालमार्ट कर के आ चूका है.. मेरे पास इस समय रेफेरेंस नहीं है... बाकि सचेत रहना होगा आगामी ८-१० वर्षों तक.

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  5. विवेक भाई,

    सबसे पहले तो इतने जटिल मुद्दे को इतनी आसानी से समझाने के लिए आपको बधाई...

    आर्थिक मुद्दों पर अपना हाथ तंग ही है...लेकिन इतना ज़रूर जानता हूं कि जब प्रतिस्पर्धा होती है तो उपभोक्ताओं को ज़रूर फायदा मिलता है...ये हमने मोबाइल क्रांति में भी देखा...वाकई डर देशी बड़े खुदरा स्टोरों को ही होगा...अभी इन स्टोरों का एकछत्र राज होने की वजह से मनमानी चल रही है...एक उदाहरण देता हूं, बिग बाज़ार जैसे बड़े स्टोर पर अब पॉलीथीन के थैलों के भी पैसे चार्ज किए जाते हैं...अरे भई अगर पॉलीथीन पर्यावरण के लिए नुकसानदायक है तो उसका इस्तेमाल बिल्कुल बंद करो, ये कौन सा तरीका है कि ये तर्क देकर वहां भी कमाई का ज़रिया निकाल लिया...एक-दो सब-स्टैंडर्ड कंपनियों की वस्तुओं के दाम घटा कर बाकी सामान को भी चेप देना इन देशी खुदरा दुकानों को बड़ी अच्छी तरह आता है...विदेशी का विरोध तभी सही है जब छोटे दुकानदारों, रेहड़ी-ठेली वालों के साथ उपभोक्ताओं को भी फायदा होने जा रहा हो...अब अगर बड़े देशी स्टोर तिजोरियां भर रहे हैं तो फिर विदेशियों से उनकी प्रतिस्पर्धा कराने में हिचक क्यों...कम्पीटिशन बढ़े और कीमतें गिरें...कुछ तो भला हो अपना...

    जय हिंद...

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  7. अच्छा विश्लेषण किया है,,भय या भ्रम के कई कारण बन आये हैं.

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  8. 'पाकीजा' सचमुच में अनुकरणीय उदाहरण है। किन्‍तु 'वे' ऐसा नहीं करेंगे। 'वे' तो मुनाफा कमाने आ रहे हैं। न तो किसानों/उत्‍पादों को बेहतर भाव देंगे और न ही आपको/हमें कम कीमत पर सामान मिलेगा। हमें कोई भ्रम नहीं पालना चाहिए।

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  9. 'पाकीजा' सचमुच में अनुकरणीय उदाहरण है। किन्‍तु 'वे' ऐसा नहीं करेंगे। 'वे' तो मुनाफा कमाने आ रहे हैं। न तो किसानों/उत्‍पादों को बेहतर भाव देंगे और न ही आपको/हमें कम कीमत पर सामान मिलेगा। हमें कोई भ्रम नहीं पालना चाहिए।

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