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Saturday, October 30, 2010

प्यार में बहुत उपयोगी है ३ जी तकनीक (Use of 3G Technology in Love..)

यह पोस्ट 3G life blogger contest के लिये लिखी गई है, जो कि टाटा डोकोमो द्वारा आयोजित की गई है।
यह पोस्ट इंडीब्लॉगर प्रतियोगिता के लिये लिखी गई है, कृप्या अपनी वोटिंग करें । चटका लगायें।
इसके पहले की पोस्ट भी देखें  - [पति की मुसीबत ३ जी तकनीक से (Problems of Husband by 3 G Technology)] वोट जरुर दीजिये
    
    क्लास चल रही है, सामने प्रोफ़ेसर अंग्रेजी भाषा में अपना विषय इतिहास धड़ाधड़ पढ़ाये जा रहे हैं, राशि का पूरा ध्यान बोर्ड पर है और अकबर के बारे में पढ़ाया जा रहा, ध्यान लगाकर सुन रही है। साथ ही महत्वपूर्ण बिंदुओं को कॉपी पर नोट भी कर रही है, और संबंधित लाईनों को किताबों में चिन्हित भी कर रही है, तभी उसके मोबाईल में रोशनी आने लगती है और झुप्प से सामने एक बहुत ही जाना पहचाना नंबर और एक प्रिय नाम और फ़ोटो जो उसे बहुत ही पसंद है आने लगता है।
    
    कितनी बार मना किया है कि जब कॉलेज में हूँ तो फ़ोन न किया करे, पर एक ये हैं कि जब देखो फ़ोन खटखटा देते हैं, मोबाईल को स्टैंड पर लगाकर अपनी डेस्क पर सामने रख दिया और वीडियो कॉल पर एक्सेप्ट का बटन दबा दिया, अब सामने प्रिय दिखाई दे रहा था, और उधर प्रेमी की स्क्रीन पर राशि का चेहरा चमक रहा था। राशि ने मोबाईल म्यूट पर रखा था, कि कहीं कोई स्पीकर की आवाज क्लास में न आये।
    
    उधर प्रिय राशि को तरह तरह के इशारे करके डिस्टर्ब करने की कोशिश कर रहा था, राशि तरह तरह की मुख मुद्राएँ बनाकर तो कभी अंगूठा दिखाकर उसे चिढ़ा रही थी। पास में बैठी सीमा देखकर मुस्करा रही थी और राशि को बार बार कोहनी मार रही थी। सामने क्लॉस में अकबर जोधाबाई का लेक्चर चल रहा था और यहाँ क्लॉस में बैठी राशि और उससे दूर… बहुत दूर .. ऑफ़िस में बैठे प्रिय का नैन मटक्का चल रहा था।
    
    प्रिय है कि मानता ही नहीं, अब मैं यहाँ पढ़ाई पर ध्यान दूँ या प्रिय की तरफ़ ?, प्रिय का फ़ोन करने का समय निश्चित नहीं होता है, जब भी देखने की इच्छा हुई, वीडियो कॉल कर दिया। राशि गुस्सा होती तो कहता “अच्छा बाबा एक शब्द नहीं बोलूँगा, न ही चेहरे बनाकर तुमको डिस्टर्ब करूँगा, मैं तो तुमको केवल देखना चाहता हूँ, तुम इस समय मेरे पास नहीं हो सकतीं तो इतनी दूर से मैं देख तो सकता हूँ, आखिर टाटा डोकोमो की 3 G तकनीक का कुछ तो फ़ायदा मैं उठाऊँ”
    
    एक दो दिन ठीक रहता फ़िर वही तरह तरह के चेहरे बनाकर राशि को दिखाता तो राशि भी मुस्कराकर रह जाती, उधर क्लॉस में प्रोफ़ेसर को लगता कि राशि को विषय में ज्यादा ही रस आ रहा है।
    
    राशि और प्रिय Tata Docomo 3G तकनीक का अपने प्यार में भरपूर उपयोग कर रहे हैं। ये है 3 G life|

यह पोस्ट 3G life blogger contest के लिये लिखी गई है, जो कि टाटा डोकोमो द्वारा आयोजित की गई है।
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कुछ करना चाहता हूँ केवल अपने लिये … मेरी कविता .. विवेक रस्तोगी

मुक्ति चाहता हूँ

इन सांसारिक बंधनों से

इन बेड़ियों को

तोड़ना चाहता हूँ

रोज की घुटन से

निकलना चाहता हूँ

अब..

जीना चाहता हूँ

केवल अपने लिये

कुछ करना चाहता हूँ

केवल अपने लिये …

Friday, October 29, 2010

पति की मुसीबत ३ जी तकनीक से (Problems of Husband by 3 G Technology)

यह पोस्ट 3G life blogger contest के लिये लिखी गई है, जो कि टाटा डोकोमो द्वारा आयोजित की गई है।

फोन पर घंटी बज उठी, तो देखा घरवाली का वीडियो कॉल है, आस पास देखा और अपनी सिगरेट ऐशट्रे में रखकर दोस्तों को बोला कि बस अभी आया, जल्दी से अपने गिलास से आखिरीघूँट  ख़त्म किया और फिर मोबाइल साइलेंट करके चुपके से अपनी टेबल से उठा और वाश रूम की ओर गया, तब तक बहुत सारी घंटिया बज चुकी थी और कॉल मिस कॉल हो गया| कॉल तो अब उसे करना ही था नहीं तो घर पर जाकर सुताई हो जाती कि ऑफिस में इतने व्यस्त थे वह भी रात के ९ बजे, घर पहुँच कर लाखो सवाल दाग दिए जायेंगे इससे अच्छा है कि अभी कॉल कर लिया जाये|

वाशरूम में जाकर मोबाईल में हैन्ड्सफ़्री (कान कौवा) लगाया और उस मिस कॉल को ग्रीन बटन दबाकर घरवाली का नम्बर कालिंग आने लगा, उधर से बीबी का तमतमाया चेहरा देखकर हवा खराब होने लगी, बीबी बोली क्या चिल्लाई फोन क्यों नहीं उठाया तो ये गिरियाया मैं व्यस्त था इसलिए |

उधर से आवाज आई "ओह्ह अच्छा तो अब ये बताओ कि घर कितने बजे तक आओगे या ऑफिस में ही सोने का इरादा है"
बोले "कम कम दो घंटे का काम और पेंडिंग है, फिर आता हूँ .."
उधर से आवाज आई "ये कौन सी जगह पर हो अभी, पहले कभी इस जगह को देखा नहीं"
बोले "अरे बाबा तुमको तो बस सब जगह याद हो गयी है विडिओ कॉल से देख देखकर, ये दूसरी फ्लोर का वाशरूम है"
उधर से आवाज आई "तुम दुसरे फ्लोर पर क्या कर रहे हो, तुम्हारा ऑफिस तो ४ थे फ्लोर पर है"
बोले "अब क्या तुमको सारी स्टोरी अभी ही सुननी है, चलो अब मै कॉल बंद कर रहा हूँ और ऑफिस से जल्दी से काम ख़त्म होने के बाद आता हूँ |

उफ्फ ये थ्री जी तकनीक, पति के लिये तो बहुत ही खतरनाक साबित होती जा रही है, चैन से दोस्तों के साथ समय भी नहीं बिता सकते|

अकिंचन मन .. न चैट, न बज्ज, न ब्लॉगिंग … मेरी कविता .. विवेक रस्तोगी

अकिंचन मन

पता नहीं क्या चाहता है

कुछ कहना

कुछ सुनना

कुछ तो…

पर

कभी कभी मन की बातों को

समझ नहीं पाते हैं

न चैट, न बज्ज, न ब्लॉगिंग

किसी में मन नहीं लगता

कुछ ओर ही ….

चाहता है..

समझ नहीं आता ..

अकिंचन मन

क्या चाहता है..

(चित्र मेरे मित्र सुनिल कुबेर ने कैमरे में कैद किया)

Thursday, October 28, 2010

इंतजार तुम्हारे आने का … मेरी कविता … विवेक रस्तोगी

इंतजार

तुम्हारे आने का

तुम आओगे मुझे पक्का यकीं है

तुमने वादा जो किया है

अब कब आते हो

ये देखना है

तुम आने के पहले इस इंतजार में

कितना सताते हो

ये देखना है

तुम्हारी टोह में बैठे हैं

हर पल

तुम्हारा इंतजार लगा रहता है

बस इतना पक्का यकीं है

कि तुम आओगे

पर ये इंतजार

बहुत मुश्किल होता है।

Tuesday, October 26, 2010

मशीनी युग में भी मानसिक चेतना जरुरी (Consciousness in the machine age)

    आज के मशीनी युग में हम सभी लोग पूरी तरह से मशीनों पर निर्भर हो चुके हैं, सोचिये अगर बिजली ही न हो तो क्या ये मशीनें हमारा साथ देंगी। या फ़िर वह मशीन ही बंद हो गई हो जिस पर हम निर्भर हों।

    बात है कल कि सुबह ६.२५ की मेरी उड़ान थी चैन्नई के लिये, मैंने मोबाईल में दो अलार्म लगाये एक ३.५० का और एक ४.०० बजे, मेरी चेतन्ती भी थी कि मुझे जल्दी उठना है, इसलिये बारबार में उठकर समय देख रहा था, सुबह ३ बजे एक बार आँख खुली फ़िर सो गया कि अभी तो एक घंटा है। फ़िर अलार्म नहीं बजा पर मानसिक चेतना ने मुझे उठाया कि देखो समय क्या हुआ है, जिस मोबाईल में अलार्म लगाया था वह तो सुप्ताअवस्था में पढ़ा था याने कि बंद था, फ़िर दूसरे मोबाईल में समय देखा तो सुबह के ४.१३ हो रहे थे। हम फ़टाफ़ट उठे और तैयार हो गये पर फ़िर भी अपने निर्धारित समय से १० मिनिट देरी से सारे कार्यक्रम निपट गये, और बिल्कुल ऐन समय पर हवाईअड्डे भी पहुँच गये, सब ठीक हुआ।

    परंतु अगर मानसिक चेतना सजग नहीं करती तो ? सारे कार्यक्रम धरे के धरे रह जाते अगर मोबाईल मशीन के ऊपर पूरी तरह से निर्भर होते। वैसे भी अगर कोई कार्यक्रम पूर्वनिश्चित हो और दिमाग में हो तो शायद हमारे मानस में भी एक अलार्म अपने आप लग जाता है परंतु कई बार यह विफ़ल भी हो जाता है। विफ़ल शायद तभी होता होगा कि हमारा मानस पूरी तरह से सुप्तावस्था में चला जाता होगा और चेतना का अलार्म मानस में दस्तक नहीं दे पाता होगा।

Monday, October 25, 2010

कुछ नये चुटकले (Some new jokes)

टीचर : तुम क्लास में लेट क्यों आए, बाकी सारे तो पहले आ गए थे?
स्टूडेंट : सर झुंड में तो कुत्ते आते हैं, शेर तो हमेशा अकेला ही आता है..

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चिन्टू : वह कौन-सा मज़ाक है, जो विद्यार्थी पहले भी किया करते थे, आज भी करते हैं और क़यामत तक करते रहेंगे...?
मिन्टू : बहुत मस्ती हो गई, यौर... अब कल से सीरियस होकर पढ़ाई करेंगे

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Aalu was in LOVE wid Bhindi. when Aalu proposed Bhindi ( who was egoistic & very proud of her slim figure ) she rejected his proposal, u r such a fatty. AALU took it is as a challange & has so many girfriends,,,,, now Aalu- gobi ...Aalu-gosht Aalu qeema Aalu -gajar Aalu -matar Aalu - shimlamirch MORAL (nevre be egoistic in life otherwise u will be left alone like BHINDI

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अध्यापक (चिंटू से) : सांप के ऊपर कोई कविता सुनाओ

चिंटू : इन्सान इन्सान को डस रहा है और सांप बगल में बैठकर हंस रहा है

Sunday, October 24, 2010

आधुनिक शिक्षा की दौड़ में कहाँ हैं हमारे सांस्कृतिक मूल्य (Can we save our indian culture by this Education ?)

    क्या शिक्षा में सांस्कृतिक मूल्य नहीं होने चाहिये, शिक्षा केवल आधुनिक विषयों पर ही होना चाहिये जिससे रोजगार के अवसर पैदा हो सकें या फ़िर शिक्षा मानव में नैतिक मूल्य और सांस्कृतिक मूल्य की भी वाहक है।

कैथलिक विद्यालय में जाकर हमारे बच्चे क्या सीख रहे हैं -

यीशु मसीह देता खुशी

यीशु मसीह देता खुशी
करें महिमा उसकी
पैदा हुआ, बना इंसान
देखो भागा शैतान
देखो भागा भागा, देखो भागा भागा
देखो भागा भागा शैतान
देखो भागा भागा, देखो भागा भागा
देखो भागा भागा शैतान

नारे लगाओ, जय गीत गाओ
शैतान हुआ परेशान
ताली बजाओ, नाचो गाओ
देखो भागा शैतान
देखो भागा भागा...

गिरने वालों, चलो उठो
यीशु बुलाता तुम्हें
छोड़ दो डरना
अब काहे मरना
हुआ है ज़िन्दा यीशु मसीह
यीशु मसीह...

झुक जायेगा, आसमां एक दिन
यीशु राजा होगा बादलों पर
देखेगी दुनिया
शोहरत मसीह की
जुबां पे होगा ये गीत सभी के
यीशु मसीह..

    कल के चिट्ठे पर कुछ टिप्पणियों में कहा गया था कि धार्मिक संस्कार विद्यालय में देना गलत है, तो ये कॉन्वेन्ट विद्यालय क्या कर रहे हैं, केवल मेरा कहना इतना है कि क्या इन कैथलिक विद्यालयों के मुकाबले के विद्यालय हम अपने धर्म अपनी सांस्कृतिक भावनाओं के अनुरुप नहीं बना सकते हैं ? क्या हमारे बच्चों को यीशु का गुणगान करना और बाईबल के पद्यों को पढ़ना जरुरी है। पर क्या करें हम हिन्दूवादिता की बातें करते हैं तो हमारे कुछ लोग ही उन पर प्रश्न उठाते हैं, जबकि इसके विपरीत कैथलिक मिशन में देखें तो वहाँ ऐसा कुछ नहीं दिखाई देगा।

    यहाँ मैं कैथलिक विद्यालयों की बुराई नहीं कर रहा हूँ, मेरा मुद्दा केवल यह है कि जितने संगठित होकर कैथलिक विद्यालय चला रहे हैं, और समाज की गीली मिट्टी याने बच्चों में जिस तेजी से घुसपैठ कर रहे हैं, क्या हम अपने सांस्कृतिक मूल्यों के साथ इन कैथलिक विद्यालयों के साथ स्वस्थ्य प्रतियोगिता नहीं कर सकते।

Saturday, October 23, 2010

“हिन्दुत्व” पढ़ाने वाले भारतीय स्ंस्कृति के विद्यालयों की कमी क्यों है, हमारे भारत् में..?

    एक् बात् मन् में हमेशा से टीसती रही है कि हम् लोग् उन् परिवारों के बच्चों को देखकर् ईर्ष्या करते हैं जो कॉन्वेन्ट् विद्यालयों में पढ़े होते हैं, वहाँ पर् आंग्लभाषा अनिवार्य् है, उन् विद्यालयों में अगर् हिन्दी बोली जाती है तो वहाँ द्ंड् का प्रावधान् है। वे लोग् अपनी स्ंस्कृति की बातें बचपन् से बच्चों के मन् में बैठा देते हैं।

    पाश्चात्य् स्ंस्कृति से ओतप्रोत् ये विद्यालय् हमें हमारी भारतीय् स्ंस्कृति से दूर् ले जा रहे हैं, हमारे भारतीय् स्ंस्कृति के विद्यालयों में जहाँ तक् मैं जानता हूँ वह् हैं केवल् “सरस्वती शिशु म्ंदिर्, राष्ट्रीय् स्वय्ं सेवक् स्ंघ् द्वारा स्ंचालित्”, “गोपाल गार्डन, इस्कॉन् द्वारा स्ंचालित” ।

    और किसी हिन्दु संस्कृति विद्यालय के बारे में मैंने नहीं सुना है जो कि व्यापक स्तर पर हर जिले में हर जगह उपलब्ध हों। मेरी बहुत इच्छा थी कि बच्चे को कम से कम हमारी संस्कृति का ज्ञान होना चाहिये, आंग्लभाषा पर अधिकार हिन्दुत्व विद्यालयों में भी हो सकता है, इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है गोपाल गार्डन विद्यालय, वहाँ के बच्चों का हिन्दी, संस्कृत और आंग्लभाषा पर समान अधिकार होता है और उनके सामने कॉन्वेन्ट के बच्चे टिक भी नहीं पाते हैं।

    हमारे धर्म में लोग मंदिर में इतना धन खर्च करते हैं, उतना धन अगर शिक्षण संस्थानों में लगाया जाये और पास में एक छोटा सा मंदिर बनाया जाये तो बात ही कुछ ओर हो। राष्ट्रीय स्तर पर इस क्षैत्र में उग्र आंदोलन की जरुरत है। नहीं तो आने वाले समय में हम और हमारे बच्चे हमारी भारतीय संस्कृति भूलकर पश्चिम संस्कृति में घुलमिल जायेंगे।

    याद आती है मुझे माँ सरस्वती की प्रार्थना जो हम विद्यालय में गाते थे, पर आज के बच्चों को तो शायद ही इसके बारे में पता हो -

माँ सरस्वती या कुन्देन्दु- तुषारहार- धवला या शुभ्र- वस्त्रावृता
या वीणावरदण्डमन्डितकरा या श्वेतपद्मासना |
या ब्रह्माच्युत- शंकर- प्रभृतिभिर्देवैः सदा पूजिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ||

शुक्लांब्रह्मविचारसारपरमा- माद्यां जगद्व्यापिनीं
वीणापुस्तकधारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम् |
हस्ते स्पाटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थितां
वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम् ||

Thursday, October 21, 2010

अगर हमारे मास्साब को ७,८,१३ के पहाड़े और विज्ञान की मूल बातें न पता हों तो हमारे देश के बच्चों का भविष्य क्या होगा ..!

    खबर है थाणे महाराष्ट्र प्रदेश की (Thane civic teachers flunk surprise test) कि शिक्षा विभाग के सरकारी विद्यालयों में महकमे ने कुछ अध्यापकों से उनके विषय से संबंधित मूल प्रश्न पूछे, जैसे कि ७,८,१३ के पहाड़े और रसायन विज्ञान के मूल सूत्र जो कि वे लगभग पिछले १५-२० वर्षों से बच्चों को पढ़ाते रहे हैं।

    सरकारी महकमा भी सोच रहा होगा कि कैसे नकारा मास्टर लोग हैं हमारे यहाँ के जो नाम डुबाने में लगे हैं। बताईये उन बच्चों का क्या भविष्य होगा जो इन विद्यालयों में इन मास्साब लोगों से पिछले १५-२० वर्षों से पढ़ रहे हैं। चैन की दो वक्त की रोटी मिलने लगे तो क्या मानव को अपने कर्त्तव्य से इतिश्री कर लेना चाहिये।

    इससे अच्छा तो सरकार को विद्यालयों में शिक्षकों को निकालकर नये पढ़े लिखे बेरोजगार नौजवानों को भर्ती कर लेना चाहिये, कम से कम बच्चों के भविष्य पर प्रश्नचिह्न तो नहीं लगेगा। अगर ऐसे मास्साब लोग हमारे विद्यालय में होंगे तो हमें हमारी तरक्की से वर्षों पीछे ढकेलने से कोई नहीं रोक सकता। इसके लिये केवल वे मास्साब ही जिम्मेदार नहीं हैं, जिम्मेदार हैं प्रशासन से जुड़ा हर वह व्यक्ति जो कि बच्चों की शिक्षा के लिये सरकारी महकमे से जुड़े हैं।

   यह स्थिती केवल इसी जिले की नहीं होगी यह स्थिती देश के हर जिले की होगी, इसकी पूरी पड़ताल करनी चाहिये ।

आखिर क्या करना चाहिये ऐसे मास्साबों का ? और क्या होगा हमारे बच्चों का भविष्य ?

(ऊपर दिये गये लिंक पर क्लिक करके पूरा समाचार पढ़ा जा सकता है।)

Wednesday, October 20, 2010

पत्नी ने रिश्वतखोर पति का भंडाफ़ोड़ किया..काश हर घर में हो..कितना सही..चिंतन..? [Fiesty wife exposes bribe - taking hubby]

    जी हाँ यह सच है, कल के मुंबई मिरर में “Fiesty wife exposes bribe - taking hubby” इस घटना का ब्यौरा दिया गया है। पूरी  खबर लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं।

    वाकई अगर पत्नी पति की रिश्वतखोरी को रोके, भारत देश से भ्रष्टाचार खत्म करने का यह सबसे आसान तरीका लगता है। इस मुद्दे पर नारीवादी संगठनों को आगे आना चाहिये और नारियों को जागरुक करना चाहिये।

    जिस घटना को पढ़कर यह मैं लिख रहा हूँ उस घटना में पत्नी रिश्वत के पैसे से घर नहीं चलाना चाहती थी, और उसने पति को समझाया कि सीमित वेतन में अच्छे से जी सकते हैं, तो यह गलत काम क्यों करना। पत्नी ने पति को समझाया कि उसके पापा भी सरकारी नौकरी में थे और कभी भी रिश्वत के लालच में नहीं आये। पर पति की समझ में न आया, और उसकी रिश्वत की भूख बड़ती ही जा रही थी, एक दिन पति दो लाख रुपये लेकर आया तो पत्नी ने हंगामा कर दिया कि वह इस रिश्वत की रकम को घर में नहीं रहने देगी, और पति के न मानने पर रिश्वत एवं भ्रष्टाचार संबंधी कागज लेकर पुलिस को दे दिये।

    प्रश्न अब यह है कि क्या पत्नी ने ठीक किया ? भ्रष्टाचारी पति का भंडाफ़ोड़ करके या उसे यह सब चुपचाप सहन कर लेना चाहिये था और भ्रष्ट धन से भौतिक सुख सुविधाओं का मजा लूटना चाहिये था ?

Tuesday, October 19, 2010

बताईये इस फ़ोटो में क्या विशेष है (What is special in this foto)

बताईये इस फ़ोटो में क्या विशेष है -

vivek

क्लिक करके बड़ा करके भी देख सकते हैं ।

कुछ और नये चुटकले (Some more new jokes)

भीड़ में काफी देर से खड़ा अभिनेता ऑटोग्राफ देते-देते जब थक गया तो उसने एक लड़की की नोटबुक में गधे की फोटो बना कर लड़की की ओर बढ़ा दी।
लडकी (मुस्कुराकर)- मुझे आपका फोटो नहीं, ऑटोग्राफ चाहिए

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रमन की अपनी बीवी से जबर्दस्त लड़ाई हो गई। बीवी ने आव देखा न ताव... कसकर बेलन फेंककर मारा, जो रमन के सिर, हाथ से गुजरते हुए घुटने पर लगा और हड्डी चटक गई।
अस्पताल में प्लास्टर कराने के बाद जब उसे वार्ड में ले जाया गया, तो उसने देखा कि साथ वाले बेड पर जो मरीज लेटा है उसकी दोनों टाँगों पर प्लास्टर चढ़ा है। उसने पड़ोसी मरीज से धीरे से पूछा, 'भाईसाहब, आपकी क्या दो बीवियाँ है?'

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छुट्टी के दिन तीन बच्चे बातें कर रहे थे।
पहले बच्चे ने कहा : मेरे पापा सबसे तेज दौड़ते हैं। वह तीर चला कर दौड़ते हैं, तो तीर से पहले निशाने तक पहुंच जाते हैं।
दूसरे ने कहा : यह तो कुछ भी नहीं। मेरे पापा राइफल की गोली चलाते हैं और उससे पहले टारगेट तक पहुंच जाते हैं।
तीसरे ने कहा : अरे! तुम दोनों तो जानते ही नहीं कि स्पीड क्या होती है? मेरे पापा सरकारी कर्मचारी हैं। उनकी छुट्टी शाम 6 बजे होती है और वे 4 बजे ही घर पहुंच जाते हैं

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शरारती सार्थक को उसके तीन वकील दोस्तों के साथ पार्क में बैठकर जुआ खेलने के आरोप में गिरफ्तार कर अदालत में पेश किया गया...
मजिस्ट्रेट ने पहले वकील से बयान देने के लिए कहा, तो वह बोला, "माई लॉर्ड, मैं उस दिन यहां था ही नहीं... मैं लखनऊ जाने वाली ट्रेन में था... सबूत के तौर पर यह देखिए मेरा रेल टिकट..."
दूसरे वकील की बारी आने पर वह बोला, "उस दिन मैं घर पर बुखार में पड़ा था... सबूत के तौर पर यह देखिए, डॉक्टर का सर्टिफिकेट..."
तीसरे वकील का जवाब था, "मैं तो उस वक्त चर्च में बैठा भगवान से बातें कर रहा था... गवाह के तौर पर मैं चर्च के पादरी को साथ लाया हूं..."
अंततः मजिस्ट्रेट ने सार्थक से पूछा, "अब तुम्हें क्या कहना है... क्या तुम भी जुआ नहीं खेल रहे थे...?"
शरारती सार्थक ने कुटिल मुस्कुराहट के साथ तपाक से कहा, "किसके साथ...?

Monday, October 18, 2010

गोराई खाड़ी स्थित पैगोड़ा की यात्रा.. (Pagoda at Gorai Creek).

    बहुत दिनों से पैगोड़ा आने की तीव्रतम इच्छा थी, परंतु बहुधा कारकों से आ नहीं पा रहे थे, पर कल हमने आखिरकार पैगोड़ा यात्रा का मन बना ही लिया। पैगोड़ा बोद्ध धर्म संबंधित स्थान है, जहाँ विपश्यना यानि कि ध्यान की शिक्षा भी दी जाती है। यह पैगोड़ा एशिया महाद्वीप का सबसे बड़ा पैगोड़ा है।

    यह पैगोड़ा गोराई खाड़ी में स्थित है, और बोरिवली इसका नजदीकी रेल्वे स्टेशन है। बोरिवली से बेस्ट की बस (४६१, ३०९, २२६, २९४) से सीधे गोराई आगार पहुँच सकते हैं, और वहाँ से पाँच मिनिट चलने पर गोराई खाड़ी पहुँचा जा सकता है। बोरिवली रेल्वे स्टेशन से शेयरिंग ऑटो भी उपलब्ध हैं। गोराई खाड़ी पहुँचने के बाद वहाँ फ़ेरी का टिकट ३५ रुपये प्रति व्यक्ति है, जो कि आने जाने का है।

    और अगर सड़क मार्ग से जाना चाहते हैं तो मीरा - भईन्दर होकर एस्सेल वर्ल्ड आना होगा। जो कि थोड़ा लंबा रास्ता है। अब तो सुबह बोरिवली से एस्सेल वर्ल्ड की बेस्ट ने एक नई बस सेवा भी शुरु की है ७११ नंबर बस, जो कि सुबह ९ बजे बोरिवली स्टेशन से चलती है एस्सेल वर्ल्ड के लिये और फ़िर दिनभर वह गोराई बीच से पैगोड़ा के लिये चलती है, और शाम ७ बजे वापिस एस्सेल वर्ल्ड से बोरिवली स्टेशन आती है।

    पैगोड़ा, एस्सेल वर्ल्ड और वॉटर किंगडम तीनों आसपास हैं। हम फ़ेरी का टिकट लेने के बाद खाड़ी की ओर चल पड़े और वहाँ पर फ़ेरी की नाव चक्कर लगा रही थीं। बदबू भी आ रही थी, चारों ओर गंदगी का साम्राज्य था। पर पैगोड़ा जाने की उत्कंठा में सब भूगत रहे थे। पहली बार हमने देखा कि लोग अपनी मोटर साईकिल भी नाव में लेकर सवार हैं। नाव तक जाने में बहुत मजा आया, पहली बार हम खाड़ी के इस प्रकार के पुल पर चल रहे थे।

    इस फ़ैरी से पैगोड़ा के यात्री ही ज्यादा थे क्योंकि एस्सेल वर्ल्ड सुबह १० बजे से रात ८ बजे तक खुला रहता है, और दोपहर को जाने पर कोई पूरा नहीं घूम सकता है। पैगोड़ा पहुँचते पहुँचते मन अद्भुत तरीके शांत हो चुका था। शायद यह प्रकृति का चमत्कार है।

    पैगोड़ा में एक बड़ा हॉल बना हुआ है, जहाँ साधक विपश्यना करते हैं, मतलब साधना करते हैं ध्यान करते हैं। पर्यटकों के लिये अलग से कक्ष बनाया गया है जहाँ से वे हॉल के अंदर का दृश्य देख सकते हैं, जो कि काँच से बंद किया गया है, जिससे साधकों के ध्यान में खलल न पड़े। यहीं पर स्तंभ भी है, जैसा कि सारनाथ में है। यही पर भगवान बुद्ध की जीवनी पर एक चित्र प्रदर्शनी भी है, चित्रकार ने गजब के चित्र उकेरे हैं, क्या रंग संयोजन है।

    पैगोड़ा से बाहर निकलने के बाद हम पहुँच गये एस्सेल वर्ल्ड के प्रवेश द्वार पर, जहाँ कि टिकट खिड़की भी थी। वहाँ आकर्षित करने के लिये तरह तरह के पुतले थे जहाँ फ़ोटो खींचे।

और फ़िर वापिस फ़ैरी की ओर लौटते हुए, निकल पड़े घर की ओर..

फ़ैरी की ओर फ़ैरी की ओर दीवार पर विज्ञापन फ़ैरी के सहयात्री फ़ैरी से बाहर का एक दृश्य लौटती हुई फ़ैरी से पैगोड़ा का दृश्य

    बहुत ही अच्छा अनुभव रहा, और एक बात आज हमने बहुत दिनों बाद तादाद में केकड़े भी देखे जो कि गोराई खाड़ी में थे।

Sunday, October 17, 2010

भ्रष्टाचारी रुपी रावण कब हमारे भारत देश से विदा होगा, कब हम इस रावण को जलायेंगे …

पिछली पोस्ट आज भ्रष्टाचार की नदी में नहाकर आये हैं.. आप ने कभी डुबकी लगाई .. से आगे…

    रोज के ६० पंजीयन करवाये जाते हैं इस भूपंजीयन कार्यालय द्वारा और बताया गया कि हर पंजीयन पर लगभग १५०० रुपयों की रिश्वत होती है। और जो दलाल होता है उसकी कमाई रोज की १० हजार से १५ हजार तक होती है, भूपंजीयन (सहदुय्यम अधिकारी) की कुर्सी ५०-६० लाख रुपये में बिकती है क्योंकि हर माह यहाँ लाखों की कमाई होती है, यह १५०० रुपये की रिश्वत तो केवल मकान मालिक और किरायेदार के करारनामे पर है, अगर कोई नये फ़्लेट या पुराने फ़्लेट के लिये जा रहा है तो उसकी रिश्वत की राशि बहुत ज्यादा होती है।

    उस कार्यालय में जाकर इतनी घिन आ रही थी कि कहाँ हम इस भ्रष्टाचार की नदी में आकर सन गये हैं, और नहाकर तरबतर हो चुके हैं। अपने आप पर गुस्सा भी था कि इस भ्रष्टाचार को हम धता भी नहीं बता पा रहे थे, मजबूरी में भ्रष्टाचार का साथ दे रहे थे, पर इस भ्रष्टाचार के बिना हमारा काम बिल्कुल नहीं होता यह तो हमें हमारे दलाल ने पहले ही बता दिया था, “खुद जियो और दूसरे को भी जीने दो” याने कि “खुद खाओ और दूसरे को भी खाने दो”

    क्या सरकार हमारी अंधी है या जो भ्रष्टाचार निरोधक अमले बना रखे हैं वो केवल औपचारिकताएँ पूरी करने के लिये बनाये गये हैं। हमारी कोर्ट भी संज्ञान नहीं लेती हैं, क्या इतनी मिलीभगत है, क्या हमारा पूरा तंत्र ही भ्रष्टाचार में लिप्त है, कुछ दिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने एक भ्रष्टाचार के मामले को संज्ञान में लेते हुए कहा था कि सरकार को भ्रष्टाचार को कानूनन लागू कर देना चाहिये और किस काम का कितना पैसा खर्च होगा उसका भाव तय कर देना चाहिये। पर हमारे सरकारी कुंभकर्ण और रावण कभी नहीं जाग सकते।

    अब बताईये जिन लोगों को यहाँ जनता की सेवा के लिये बैठाया गया है वही लोग अपना काम करने की जनता से रिश्वत लेते हैं, और जनता भी दे देती है, क्या करे जनता भी, सब मिलीभगत है।

    भ्रष्टाचारी रुपी रावण कब हमारे भारत देश से विदा होगा, कब हम इस रावण को जलायेंगे, कब रावण को हर वर्ष जलाना छोड़ देंगे, इस रावण को जड़ से ही मिटा देंगे। कब….. बहुत बड़ा यक्ष प्रश्न है… पता नहीं हमारे भारतवासी कब हराम की कमाई छोड़ेंगे… जिस दिन यह संकल्प हर भारतवासी ने ले लिया उस दिन भारत में रामराज्य स्थापित हो जायेगा। दशहरे पर असत्य पर सत्य की विजय के साथ सभी को विजयादशमी की शुभकामनाएँ।

Saturday, October 16, 2010

आज भ्रष्टाचार की नदी में नहाकर आये हैं.. आप ने कभी डुबकी लगाई ..

आज हम सुबह अपने मकान के दलाल के साथ पंजीयक कार्यालय गये थे, जहाँ हमारे मकान मालिक भी थे, यहाँ मुंबई में ११ महीने का किराये का करारनामा होता है जो कि पंजीयन कार्यालय से पंजीकृत भी होना चाहिये। यह पूर्णतया: कानूनी कार्यवाही होती है।

जब हम पंजीयक कार्यालय पहुँचे तो वहाँ लिखा था तहसिलदार भूमापन बोरिवली कार्यालय, और भी ४-५ कुछ और नाम लिखे थे, जो कि हमें याद नहीं है, वहीं पास में झंडे को फ़हराने के लिये लोहे का पाईप भी लगा था, वह देखकर मन में आया कि मुंबई महानगरी में सरकारी कार्यालय में इतने सारे भ्रष्टाचारी लोगों के बीच में अपने तिरंगे को फ़हराने का क्या काम, इसलिये इस लोहे के डंडे को यहाँ होना ही नहीं चाहिये। मन में यह बात लिये हम पहले माले पर चल दिये।

जहाँ हमारे मकान के दलाल ने पहले से ही सब “सैटिंग” की हुई थी, हमारा १२ बजे का नंबर लिया हुआ था, हम पहुँचे १२.४५ बजे पर अगले ने फ़िर “सैटिंग” की फ़टाफ़ट और हमारी फ़ाईल नीचे से ऊपर करवाई और बस हम पंजीयन अधिकारी के कार्यालय में पहुँच गये। मुख्य कुर्सी पर एक महिला काबिज थी जो कि बहुत ही महंगी सी साड़ी पहनी हुई बैठी थीं, और चेहरा बिल्कुल रुखा कि कहीं कोई फ़ोकट में काम न करवा ले।

जहाँ बैठने के लिये दो कुर्सियाँ और एक स्टूल था, स्टूल पर पहले मकान मालिक को बैठाया गया और उनके कुछ हस्ताक्षर वगैरह लिये गये फ़िर “वैब कैम” से फ़ोटो खींचे गये और उल्टे हाथ का अंगूठे का स्कैनिंग किया गया। इसके बाद हमारा नंबर आया और यही सब हमारे साथ किया गया, इसी बीच पंजीयन कार्यालय के दलाल द्वारा एक हस्ताक्षर लिया गया। हमने अपने दलाल पर भरोसा करके उसपर हस्ताक्षर कर दिये (इसके अलावा और कोई चारा भी नहीं था)

फ़िर हम उस कक्ष के बाहर आये और वहाँ फ़िर वही दलाल कुछ कागज लाया और हमसे और मकान मालिक से हस्ताक्षर करवाये। हमने अपने अगले ११ महीने के चैक मकान मालिक को सुपुर्द किये और बस अगले ११ महीने के लिये हमारा पंजीयन हो गया, हम केवल १० मिनिट में स्वतंत्र हो गये।

कार्यालय में हमने दो चीजें पढ़ी थीं कि पंजीकरण के लिये नंबर ऑनलाईन किये जा सकते हैं, और ईस्टाम्प। हम हमारे मकान मालिक के साथ बात कर रहे थे कि अगर सभी चीज ऑनलाईन कर दी जाये तभी भ्रष्टाचार का खात्मा संभव है, नहीं तो हम और आप तो कुछ भी नहीं कर सकते इस भ्रष्ट तंत्र के खिलाफ़।

कार्यालय से बाहर निकलते ही हमने अपने दलाल से प्रश्न किया कि अगर बिना भ्रष्टाचार के पंजीयन करवाना हो तो कितना समय लग जाता है। हमारे दलाल का जबाब था कि “हो ही नहीं सकता।” वहीं पर एक अस्थायी पटिये पर बैठे हुए बंदे ने कहा कि अंकल जी बिल्कुल ठीक कह रहे हैं। वह भी शायद दलाल ही था। हमने कहा कि वहाँ तो लिखा है कि ऑनलाईन नंबर और ईस्टाम्प सरकार ने शुरु किया है। तो दोनों ठहाके मारकर हँसने लगे और बोले नंबर तो अगले एक महीने का शुरु के दो दिन में ही दर्ज हो जाते हैं, तो हम बोले फ़िर आपको कैसे ऐसे नंबर मिल जाता है, वे बोले पैसे में बहुत ताकत है, और वही ताकत यह सब करवाती है।

जारी…

Thursday, October 14, 2010

नवभारत टाईम्स में हिन्दी की हिंग्लिश… आज तो हद्द ही कर दी..

नवभारत टाईम्स ही क्या बहुत सारे हिन्दी समाचार पत्र अपने व्यवसाय और पाठकों के कंधे पर बंदूक रखते हुए जबरदस्त हिंग्लिश का उपयोग कर रहे हैं। पहले भी कई बार इस बारे में लिख चुका हूँ, हिंग्लिश और वर्तनियों की गल्तियाँ क्या हिन्दी अखबार में क्षम्य हैं।

मैं क्या कोई भी हिन्दी भाषी कभी क्षमा नहीं कर सकता। सभी को दुख ही होगा।

आज तो इस अखबार ने बिल्कुल ही हद्द कर दी, आज के अखबार के एक पन्ने पर “Money Management” में एक लेख छपा है, देखिये -

एनपीएस में निवेश के लिये दो विकल्प हैं। पहला एक्टिव व दूसरा ऑटो अप्रोच, जिसमें कि PFRDA द्वारा अप्रूव पेंशन फ़ंड में इन्वेस्ट किया जा सकता है। इस समय साथ पेंशन फ़ंद मैनेजमेंट कंपनियां जैसे LIC,SBI,ICICI,KOTAK,RELIANCE,UTI  व IDFC हैं। एक्टिव अप्रोच में निचेशक इक्विटी (E), डेट (G) या बैलेन्स फ़ंड (C ) में प्रपोशन करने का निर्णय लेने की स्वतंत्रता होती है। इन्वेस्टर अपनी पूरी पेंशन वैल्थ G असैट क्लास में भी इन्वेस्ट कर सकता है। हां, अधिकतम 50% ही E में इन्वेस्ट किया जा सकता है। जिनकी मीडियम रिस्क और रिटर्न वाली अप्रोच है वे इन तीनों का कॉम्बिनेशन चुन सकते हैं। वे, जिन्हें पेंशन फ़ंड चुनने में परेशानी महसूस होती है वे ऑटो च्वॉइस इन्वेस्टमेंट ऑप्शन चुन सकते हैं।…

अब मुझे तो लिखते भी नहीं बन रहा है, इतनी हिंग्लिश है, अब बताईये क्या यह लेख किसी हिन्दी लेखक ने लिखा है या फ़िर किसी सामान्य आदमी ने, क्या इस तरह के लेखक ही समाचार पत्र समूह को चला रहे हैं।

 

द्वारा अप्रूव पेंशन फ़ंड में इन्वेस्ट किया जा सकता है। इस समय साथ पेंशन फ़ंद

Wednesday, October 13, 2010

क्या हिन्दी अखबार पढ़ना बंद कर देना चाहिये.. समझ ही नहीं आता है कि हिन्दी है या हिंग्लिश.. असल हिन्दी क्या खत्म हो जायेगी.. ?

अभी कुछ दिनों पहले एक चिट्ठे पर किसी अखबार के बारे में पढ़ा था कि पूरी खबर ही लगभग हिंग्लिश में थी, शायद कविता वाचक्नवी जी ने लिखा था, अच्छॆ से याद नहीं है। अभी  लगातार नवभारत टाईम्स में भी यही हो रहा है।

मसलन कुछ मुख्य समाचार देखिये -

१. इंडिया का गोल्डन रेकॉर्ड

२. विमान की इमरजेंसी लैंडिंग

३. पानी सप्लाई दुरुस्त करने में जुटे रिटायर्ड इंजिनियर

४. गेम्स क्लोजिंग सेरेमनी में म्यूजिक, मस्ती और नया एंथम

अब कुछ अंदर के पन्नों की खबरें -

१. सलमान पर इनकम टैक्स चोरी का आरोप (अपीलेट आदेश को हाईकोर्ट की चुनौती)

२. साइलेंस जिन के नियमों पर पुलिस लेगी फ़ैसला

३. कॉर्पोरेट्स को मिलेगी इंजिनियरिंग कॉलेज खोलने की इजाजत (’सेंटर ऑफ़ एक्सिलेंस’ के जरिए स्किल्ड वर्कफ़ोर्स की उम्मीद)

४. बच्चों को अपना कल्चर बताना है।

अब अगर यही हाल रहा तो पता नहीं हमारी नई पीढ़ी हिन्दी समझ भी पायेगी या नहीं, क्या हिन्दी के अच्छे पत्रकारों का टोटा पड़ गया है, अगर ऐसा ही है तो हिन्दी चिट्ठाकारों को खबरें बनाने के लिये ले लेना चाहिये। कम से कम अच्छी हिन्दी तो पढ़ने को मिलेगी और चिट्ठाकारों के लिये नया आमदनी का जरिया भी, जो भी चिट्ठाकार समाचार पत्र समूह में पैठ रखते हैं, उन्हें यह जानकारी अपने प्रबंधन को देनी चाहिये। महत्वपूर्ण है हिन्दी को आमजन तक असल हिन्दी के रुप में पहुँचाना।

Friday, October 08, 2010

मुंबई की बस के सफ़र के कुछ क्षण… बेस्ट के ड्राईवर का गुस्सा.. बाबा..

     घर से आज ९.२५ पर निकल पाया तो लगा कि शायद अपनी बस आज छूट जायेगी, सोचा कि अब तो अगली बस ९.५० की ही मिलेगी, परंतु हाईवे पर पहुँचते ही अपनी तो बाँछें खिल गई, क्योंकि जबरदस्त ट्रॉफ़िक था, कोई गाड़ी अच्छे से किसी से टकरा गई थी। और तीन तीन बस ट्रॉफ़िक में फ़ँसी हुई थीं जिसमें सबसे पीछे वाली बस अपनी थी, फ़िर से ड्राईवर से मुस्कराहट का आदान प्रदान हुआ और उन्होंने आगे से ही चढ़ने का इशारा किया परंतु सभ्यता से हम बस के पीछे वाले दरवाजे से चढ़ लिये।

    बस में आज भीड़ कुछ कम थी, और ठीक ठाक तरीके से खड़े होने की जगह मिल गयी थी, पर थोड़ी देर में ही भीड़ का दबाब बड़ने लगा और जाने पहचाने चेहरे नजर आने लगे, अपना मोबाईल निकाला और निम्बज्ज में लॉगिन किया कि ट्विटर पर नया क्या है, गूगल चैट, याहू चैट और स्कायपी पर कितने और कौन कौन ऑनलाईन हैं, कुछ चैटिंग पर काम की बातें भी कर ली गईं, कुछ देर बाद ही हमें एक सीट मिल गई और हम इत्मिनान से मोबाईल पर ही इकोनोमिक्स टाईम्स पढ़ने लगे।

    बस में भीड़ का दबाब बड़ता ही जा रहा था, दो लाईन से तीन लाईन और एक चौथी लाईन आने जाने वालों की लगी थी, बिल्कुल पैक हो चुकी थी बस.. थोड़ी ही देर में स्टॉप आते जाते और बस यात्रियों को उतारकर और लेकर आगे बढ़ती रहती।

    बस एक स्टॉप पर से निकली और सिग्नल पर खड़ी हो गई, तो कुछ दो लोग पीछे से दौड़ते हुए आये और आगे वाले दरवाजे से चढ़ लिये, तो ड्राईवर बहुत नाराज हुआ, और इन दोनों पर चिल्लाने लगा बोला कि पीछे दरवाजे से चढ़ो, तो दो लोगों में से एक तो उतर गया पर एक आदमी उतरने को तैयार ही नहीं था, और वह गाली गलौच पर उतर आया, तब तक बस थोड़ा आगे निकल चुकी थी, तो बस ड्राईवर ने बस उधर ही रोकी और बस का इंजिन बंद कर दिया और बोला कि जब तक ये आदमी नहीं उतरेगा तब तक बस आगे नहीं जायेगी, ऊफ़्फ़ ये तो उस आदमी ने हद्द ही कर दी बोला कि नहीं उतरुँगा, तब बस में से सभी लोग उस आदमी के लिये चिल्लाने लगे और कुछ टपोरियों वाली भाषा में ही शुरु हो गये। कुछ लोग कहने लगे "लेट हो रहा है", "गर्मी बहुत हो रही है", तो इतने में एक लड़की का कमेंट आया कि मुंबई में सारी बसें ए.सी. होनी चाहिये, यहाँ इतनी सड़ी गर्मी होती है। आखिरकार वह आदमी उतरा और बस ड्राईवर ने बस इंजिन चालू किया तब जाकर राहत महसूस हुई।

    रोज ही ऐसा कोई न कोई वाकया हो जाता है। कि बस.. लिखना तो बहुत कुछ है पर बस अब ओर नहीं...

Wednesday, October 06, 2010

मेरी वो किताबें … मेरी कविता.. विवेक रस्तोगी

पुरानी किताब

मेरी वो किताबें

जिनकी धूल कभी मैंने झाड़ी थी

उनपर आज फ़िर

धूल की परतें जमीं है

उन परतों में अपनी अकर्मण्यता ढूँढ़ता हूँ

उन परतों में दबा हुआ समय देखता हूँ

जमे हुए रिश्ते पढ़ने की कोशिश करता हूँ

और मेरे छूने पर

उस परत के टूटे हुए कणों को देखते हुए

फ़िर नया करने में जुट जाता हूँ ।

Tuesday, October 05, 2010

काश.. कि मेरे बुलाने पर … मेरी कविता … विवेक रस्तोगी

तन्हाई

(यह फ़ोटो मेरे मित्र सुनिल कुबेर के द्वारा खींची गई है।)

काश..

कि मेरे बुलाने पर

तुम आते

केवल मुझसे मिलने आते

मेरे लिये

मेरे पास आते

ओर मैं और तुम

कहीं बैठकर

गहराईयों

से बातें करते

काश !

Sunday, October 03, 2010

आईडीएफ़सी बॉन्ड के लिये फ़्री में डीमैट खाता १० वर्षों तक (Free Demat Account for 10 Years for IDFC Bonds)

    पिछले लेख आईडीएफ़सी दीर्घकालीन इंफ़्रास्ट्रक्चर बॉन्ड २०१० (IDFC Long Term Infrastructure Bond 2010) के बाद अब यह बॉन्ड बाजार में आ गया है।

    असित सी. मेहता के नितिन कुमावत ने बताया कि आईडीएफ़सी बॉन्ड के साथ उनकी कंपनी डीमैट अकाऊँट फ़्री में उपलब्ध करवा रही है, और अगले दस वर्षों तक कोई ए.एम.सी. शुल्क भी देय नहीं होंगे, बशर्ते उस डीमैट अकाऊँट में और कोई ट्रांजेक्शन न किया गया हो। वैसे यह डीमैट अकाऊँट साधारण ही होगा, एक बार खुलने के बाद आप इसमें अपने शेयर, ईटीएफ़ और म्यूच्यल फ़ंड के ट्रांजेक्शन भी कर सकते हैं, पर इस स्थिती में हर वर्ष लगने वाले ए.एम.सी. (AMC - Annual Maintenance Charges) देय होंगे, जो कि ब्रोंकिंग कंपनियों के नियमानुसार होंगे।

    पर अगर केवल आई.डी.एफ़.सी. बॉन्ड ही लेते हैं तो इस डीमैट अकाऊँट पर कोई शुल्क दस वर्षों के लिये देय नहीं होगा।

    ज्यादा जानकारी के लिये मुंबई के लोग असित सी. मेहता की ब्रांच में इन फ़ोन नंबरों (022 - 21730153, 21730540,2173041,2173042) पर बात करके यह बांड भी ले सकते हैं और डीमैट अकाऊँट भी खुलवा सकते हैं।

Saturday, October 02, 2010

बस स्टॉप पर तीन लड़कियों की बातें

बस स्टॉप पर तीन लड़कियाँ बस के इंतजार में बैठी हुई थीं, सप्ताहांत की खुशी तो थी ही तीनों के चेहरे पर, साथ ही चुहलबाजी भी कर रही थीं।

तभी एक मोटर साईकिल स्टॉप के आगे आकर रुकी और वह लड़का किनारे जाकर रुक गया, हेलमेट उतारा और किसी का इंतजार करने लगा, बाईक भी कोई अच्छी सी ही लग रही थी, पर तभी उन तीनों लड़कियों की आवाज चहकने लगी, एक बोली “देख क्या बाईक है”, दूसरी बोली, “अरे नहीं मोडिफ़ाईड बाईक है, आजकल येइच्च फ़ैशन है, ओरिजिनल का जमाना नहीं है, जो पसंद आये लगा डालो”

सोचने लगा कि लड़कियाँ क्या क्या सोचती हैं, जिस बाईक की ओर लड़कों का ध्यान नहीं जाता वह बाईक लड़कियों की बातों का केन्द्र है।

तभी एक लड़की के मोबाईल पर फ़ोन आ गया, अब इधर की तरफ़ जो बातें सुनाई दे रही थीं, वे इस प्रकार थीं -

“किधर है तू”

“क्या बोलता है”

“अच्छा तू आरेला है मेरे कू लेने को”

तब समझ में आया कि लड़के का फ़ोन है।

“किधर मिलूँ, जिधर तू सिगरेट लेता है, पानी पुरी वाले खड़ेले हैं, अरे मैं उधरीच हूँ रे”

“तू आ न”

तभी एक लड़की की बस आ गई, वह तुरंत दौड़कर सड़क पर गई और बस स्टॉप तक आने का इंतजार करने लगी, जेब से कान कौवे (हैंड़्स फ़्री) निकाले और कान में ठूँस लिये, मुंबई की रफ़्तार में इन कानकौवों का बहुत महत्व है, आधी से ज्यादा मुंबई कानकौवे कान में ठूँसे हुए नजर आते हैं, केवल अपनी दुनिया में मस्त और व्यस्त”

फ़िर वो लड़की जिसका फ़ोन आया था, वह भी बॉय करके चल दी सड़क क्रॉस कर सिगरेट के ठिये पर, जहाँ उसका बॉय फ़्रेंड आने वाला है।

तीसरी लड़की वो भी शायद बस का ही इंतजार कर रही थी, परंतु जैसे ही ये दोनों लड़कियाँ गईं, वो वहाँ से उठकर पैदल ही चल दी, दूसरी तरफ़, समझ नहीं आया कि जब बस पकड़ने आये थे तो दो लड़कियाँ पैदल ही क्यों चली गईं।

वहीं ठिठोली करता हुआ एक समूह खड़ा था जिसमें दो लड़के और दो लड़कियाँ थे, लड़कियों के हाथ में सिगरेट थी और बिल्कुल नशा करने के अंदाज में मस्ती से सिगरेट के कश उड़ा रही थी.. हमारी आधुनिक संस्कृति..

आज घर आते आते बहुत सारी बसों पर एगॉन रेलिगेयर के जीवन बीमा वाले उत्पादों के विज्ञापन देखकर खुशी हुई कि चलो ये तो अच्छा काम हो रहा है।

Friday, October 01, 2010

आखिर इतना बड़ा सरकारी तंत्र रेल्वे कब सुधरेगा..

    गुस्सा होना स्वाभाविक है, जब आपको तत्काल कहीं जाना हो और टिकट न मिले, तो तत्काल का सहारा लेते हैं, रेल्वे ने यह सुविधा आईआरसीटीसी के द्वारा भी दे रखी है, परंतु ८ बजे सुबह जैसे ही तत्काल आरक्षण खुलता है वैसे ही इस वेबसाईट की बैंड बज जाती है, सर्विस अन- अवेलेबल का मैसेज इनकी वेबसाईट पर मुँह चिढ़ाने लगता है।

    कई बार तो बैंक से कई बार पैमेन्ट हो जाने के बाद भी टिकट नहीं मिल पाता है क्योंकि पैमेन्ट गेटवे से वापिस साईट पर आने पर ट्राफ़िक ही इतना होता है कि टिकट हो ही नहीं पाता है, वैसे अगर टिकट नहीं हुआ और बैंक से पैसे कट गये तो १-२ दिन में पैसे वापिस आ जाते हैं, परंतु समस्या यह है कि ऑनलाईन टिकट मिलना बहुत ही मुश्किल होता है।

    सुबह ८ बजे से ८.४५ - ९.०० बजे तक तो वेबसाईट पर इतना ट्राफ़िक होता है कि टिकट तभी हो सकता है जब आपकी किस्मत बुलंद हो। वैसे आज किस्मत हमारी भी बुलंद थी जो टिकट हो गया वरना तो हमेशा से खराब है, इसके लिये पहले भी जाने कितनी बार रेल्वे को कोस चुके हैं।

    करीबन २ महीने पहले से एजेन्टों के लिये व्यवस्था शुरु की गई कि वे लोग जिस दिन तत्काल खुलता है उस दिन ९ बजे से टिकट करवा सकेंगे याने कि सुबह ८ से ९ बजे तक केवल आमजनता ही करवा पायेगी, परंतु इनकी इतनी मिलीभगत है कि जब सीजन होता है तब इनके सर्वर ही डाऊन हो जाते हैं, न घर बैठे आप साईट से टिकट कर सकते हैं और न ही टिकट खिड़की से, पर जैसे ही ९ बजते हैं, स्थिती सुधर जाती है, ये सब धांधली नहीं तो और क्या है।

    टिकट खिडकी पर जाकर टिकट करवाना मतलब कि अपने ३-४ घंटे स्वाहा करना। सुबह ४ बजे से लाईन में लगो, तब भी गारंटी नहीं है कि टिकट कन्फ़र्म मिल ही जायेगा, लोग तो रात से ही अपना बिस्तर लेकर टिकट खिड़की पर नंबर के लिये लग जाते हैं, और टिकट खिड़की वाला बाबू अपने मनमर्जी से टिकट करेगा, उसका प्रिंटर बंद है तो परेशानी, उसके पास खुल्ले न हो तो और परेशानी, जब तक कि पहले वाले यात्री को रवाना नहीं करेगा, अगले यात्री की आरक्षण पर्ची नहीं लेगा, और जब तक कि ये सब नाटक होगा, बेचारा अगला यात्री उसको कोसता रहेगा क्योंकि तब तक उसे कन्फ़र्म टिकट नहीं वेटिंग का टिकट मिलेगा।

    क्या इतना बड़ा सरकारी तंत्र रेल्वे अपना आई.टी. इंफ़्रास्ट्रक्चर ठीक नहीं कर सकता है, या उसके जानकारों की कमी है रेल्वे के पास, तो रेल्वे आऊटसोर्स कर ले, कम से कम अच्छी सुविधा तो मिल पायेगी।

अब क्या चाहते हो तुम … मेरी कविता… विवेक रस्तोगी

अब

क्या चाहते हो तुम,

तुम्हारे लिये और क्या कर गुजरें

देखो तो सही

समझो तो सही,

क्या इतना कुछ काफ़ी नहीं है

अब बोलो भी,

आखिर क्या चाहते है तुम !!

मौन….?

(किसे कहना चाह रहे हैं, क्यों कहना चाह रहे हैं, उसकी ढूँढ़ जारी है, बाकी तो सबका अपना नजरिया है।)

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