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Wednesday, September 29, 2010

एनईएफ़टी क्या है, क्या आप इसका उपयोग करते हैं..(What is NEFT.. are you using NEFT for Fund Transfer ?)

क्या आप एनईएफ़टी (NEFT) का उपयोग करते हैं या अभी भी चेक से ही भुगतान करते हैं। किसी को भी अगर धन अंतरण करना हो तो आप क्या अपनाते हैं, चेक या एनईएफ़टी (NEFT) ?

चेक अंग्रेजों के जमाने की बात हो गई, जो कि वाकई अंग्रेजों के द्वारा ..

 

आगे पढ़ने के लिये यहाँ चटका लगाईये

Tuesday, September 28, 2010

आईडीएफ़सी दीर्घकालीन इंफ़्रास्ट्रक्चर बॉन्ड २०१० (IDFC Long Term Infrastructure Bond 2010)

इस बार के बजट भाषण में वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने आयकर में लाभ की घोषणा की थी, धारा 80CCF के तहत २०,००० रुपयों तक का निवेश विशेष बुनियादी सुविधाओं वाले बॉन्ड में किया जा सकेगा।

इसकी आकर्षक बात यह है कि अभी तक की जाने वाली १,००,००० रुपयों की बचत के बाद ये बचत की जा सकती है।

कुछ समय पहले IFCI ने अपने बुनियादी सुविधाओं वाले बॉन्ड बाजार में उतारे थे। अब IDFC ने भी अपने बॉन्ड बाजार में लाने की घोषणा कर दी है। बॉन्ड बाजार में इस गुरुवार ३० सितम्बर २०१० से खुल रहे हैं जो कि सोमवार १८ अक्टूबर २०१० तक लिये जा सकेंगे। निवेशक को यह बॉन्ड खरीदने के लिये डीमैट एकाऊँट और पान (PAN)  होना जरुरी है।

आईडीएफ़सी इस सार्वजनिक निर्गम से लगभग ३,४०० करोड़ रुपये बाजार में बॉन्ड बेचेगी। इन बॉन्डों की परिपक्वता अवधि १० वर्ष की होगी और लॉक इन अवधि ५ वर्ष की होगी। निवेश करने के लिये चार विकल्प हैं -

१.  पहले वर्ग में ८% ब्याज प्रतिवर्ष, जिसे कि हर वर्ष निवेशक को दे दिया जायेगा।

२. दूसरे वर्ग में ८% ब्याज प्रतिवर्ष तो दिया जायेगा, पर ब्याज वापिस से निवेश हो जायेगा, याने कि चक्रवृद्धि ब्याज।

३. तीसरे वर्ग में ७.५% ब्याज प्रतिवर्ष देय  होगा जो कि बॉय बैक के विकल्प के साथ उपलब्ध होगा।

४. चौथे वर्ग में ७.५% ब्याज प्रतिवर्ष तो होगा पर ब्याज वापिस से निवेश हो जायेगा और यह बॉय बैक के विकल्प के साथ उपलब्ध होगा।

वास्तविक ब्याज की दर कितनी होगी ?

यह निवेशक के आयकर कटौती पर निर्भर करता है अगर निवेशक ३०% वाले आयकर खंड में आता है तो निवेशक को लगभग १५.७४% का ब्याज का लाभ मिलेगा।

३०.९% के आयकर दायरे में आने वाले निवेशक की आयकर बचत होगी ६,१८० रुपये, तो उसका वास्तविक निवेश हुआ १३,८२० रुपये (२०,००० रुपये - ६,२१८० रुपये)। और अगर पहला वर्ग ८% ब्याज वाला चुना गया है तो हर वर्ष १६०० रुपये ब्याज के मिलेंगे। 

बॉन्ड के संबंध में:

  • 80 CCF धारा के तहत किसी भी इंफ़्रास्ट्रक्चर कंपनी के द्वारा पहला बांड सार्वजनिक निर्गम के द्वारा।
  • क्रेडिट रेटिंग एजेंसी आईसीआरए(ICRA) ने इस बॉन्ड को स्थिरता के  दृष्टिकोण से LAAA के तहत  से  अंकित  किया है रेटेड बांड के रूप में यह निर्गम प्रस्ताव, सुरक्षा के लिहाज से सबसे सुरक्षित श्रेणी में अंकित किया है।
  • इन बांडों  में केवल भारतीय निवासीयों और एचयूएफ  निवेश कर सकते हैं।
  • बॉन्ड को आकर्षक कूपन रेट ७.५% से ८% प्रतिवर्ष कर के लाभ के साथ २०,००० रुपये तक धारा 80 CCF के अंतर्गत जारी किया जा रहा है।
  • यहाँ निवेशक को चार निवेश विकल्प दिये गये हैं जो कि निवेशक अपनी जरुरत के अनुसार चुन सकता है।
  • किसी भी प्रकार के टीडीएस की कटौती नहीं की जाएगी।
  • बांड बीएसई और एनएसई पर सूचीबद्ध किया जाएगा और 5 वर्ष तक लॉक इन रहेगा, इस अवधि के बाद बॉन्ड का ट्रेड किया जा सकता है।
  • निवेशक बॉन्ड को लॉक इन अवधि के बाद इस पर ऋण ले सकते हैं।
  • धारा 80 CCF के तहत निवेशक २०,००० रुपये बचा सकता है, जिसके ऊपने निवेशक को कर की छूट मिलेगी, जो कि धारा 80C, 80CCC एवं 80CCD (80CCE) के तहत मिलने वाली १,००,००० रुपये के छूट के अतिरिक्त होगी।

आईडीएफ़सी बांड

Sunday, September 26, 2010

अर..रे आओ ना ! क्यों इतनी दूरी तुमने बना रखी है… मेरी कविता .. विवेक रस्तोगी

अर..रे

आओ ना ! क्यों इतनी दूरी तुमने बना रखी है.

 

हाँ तुम्हें पाने के लिये बहुत जतन करना पड़ेंगे

हाँ बहुत श्रम करना पड़ेंगे

करेंगे ना !

 

तुम्हें पाने के लिये दुनिया जहान से लड़ना पड़ेगा

शायद युद्ध भी करना पड़ेगा

करेंगे ना !

 

लड़ेंगे मरेंगे पर तुम्हें पाकर ही रहेंगे

तुम कितनी भी दूरी बनाओ, हम पास आकर ही रहेंगे..

Saturday, September 25, 2010

ओह्ह.. तो तुम आ गये … मेरी कविता … विवेक रस्तोगी

इंतजार

ओह्ह..

तो तुम आ गये

कितना इंतजार करवाया

कहाँ छिपे थे,

बहता नीर भी रुक ही गया था

तुम्हारे लिये, पता है….

उड़ते हुए बदरा बौरा से गये थे

तुम्हारे लिये, पता है….

रुकी थी वो गौरैया भी चहचहाने से

तुम्हारे लिये, पता है….

हवा मंद मंद सी हुई थी,

तुम्हारे लिये…

अंधकार गहराने से डर रहा था

तुम्हारे लिये..

बस तुम आओ… तुम्हारे लिये

तुम्हें तुमसे मिलाने के लिये॥

Friday, September 24, 2010

ऊफ़्फ़ कितनी जोर से दरवाजा बंद कर रखा है…मेरी कविता…विवेक रस्तोगी

 

बंद दरवाजे

ऊफ़्फ़

कितनी जोर से दरवाजा बंद कर रखा है

जरा कुंडी ढ़ीली करो

जिससे हलके से धक्के से

ये किवाड़ खुल जाये,

कुंडी हटाना मत

नहीं तो हवाएँ बहुत जालिम हैं।

Wednesday, September 22, 2010

जाती है इज्जत तो जाने दो कम से कम भारत की इज्जत लुटने से तो बच जायेगी

    आज सुबह के अखबारों में मुख्य पृष्ठ पर खबर चस्पी हुई है, कि दिल्ली में कॉमनवेल्थ गेम्स की तैयारी के दौरान ही एक बन रहा पुल गिर गया, और २७ घायल हुए।

    इस भ्रष्टाचारी तंत्र ने भारत की इज्जत के साथ भी समझौता किया और भारत माता की अस्मत को लुटवाने का पूरा इंतजाम कर रखा है, ऐसे हादसे तो हमारे भारत में होते ही रहते हैं, परंतु अभी ये हादसे केंद्र में हैं, क्योंकि आयोजन अंतर्राष्ट्रीय है, अगर यही हादसा कहीं ओर हुआ होता तो कहीं खबर भी नहीं छपी होती और आम जनता को पता भी नहीं होता।

    हमारे यहाँ के अधिकारी बोल रहे हैं कि ये महज एक हादसा है और कुछ नहीं, बाकी सब ठीक है, पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रम के आयोजन में इतनी बड़ी लापरवाही ! शर्मनाक है। हमारे अधिकारी तो भ्रष्ट हैं और ये गिरना गिराना उनके लिये आमबात है, पर उनके कैसे समझायें कि भैया ये अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नहीं चलता, एक तो बजट से २० गुना ज्यादा पैसा खर्चा कर दिया ओह माफ़ कीजियेगा मतलब कि खा गये, जो भी पैसा आया वो सब भ्रष्टाचारियों की जेब में चला गया। मतलब कि बजट १ रुपये का था, पर बाद में बजट २० रुपये कर दिया गया और १९.५० रुपये का भ्रष्टाचार किया गया है।

    अब तो स्कॉटलेंड, इंगलैंड, कनाडा, न्यूजीलैंड और आस्ट्रेलिया ने भी आपत्ति दर्ज करवाना शुरु कर दी है, पर हमारे भारत के सरकारी अधिकारी और प्रशासन सब सोये पड़े हैं, किसी को भारत की इज्जत की फ़िक्र नहीं है, सब के सब अपनी जेब भरकर भारत माता की इज्जत के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं, अरे खुले आम आम आदमी के जेब से कर के रुप में निकाली गई रकम को भ्रष्टाचारी खा गये वह तो ठीक है, क्योंकि आम भारतीय के लिये यह कोई नई बात नहीं है, परंतु भारत माता की इज्जत को लुटवाने का जो इंतजाम भारत सरकार ने किया है, वह शोचनीय है, क्या हमारे यहाँ के नेताओं और उच्च अधिकारियों का जमीर बिल्कुल मर गया है।

    आस्ट्रेलिया के एक मीडिया चैनल ने तो एक स्टिंग आपरेशन कर यह तक कह दिया है कि किसी भी स्टेडियम में बड़ी मात्रा में विस्फ़ोटक सामग्री भी ले जाई जा सकती है, और ये उन्होंने कर के बता भी दिया है, विस्फ़ोटक सामग्री दिल्ली के बाजार से आराम से खरीदी जा सकती है और चोर बाजार से भी।

    अगर यह आयोजन हो भी गया तो कुछ न कुछ इसी तरह का होता रहेगा और हम भारत और अपनी इज्जत लुटते हुए देखते रहेंगे, और बाद में सरकार सभी अधिकारियों को तमगा लगवा देगी कि सफ़ल आयोजन के लिये अच्छा कार्य किया गया, और जो सरकार अभी कह रही है कि खेलों के आयोजन के बाद भ्रष्टाचारियों पर कार्यवाही करेगी, कुछ भी नहीं होगा। उससे अच्छा तो यह है कि कॉमनवेल्थ खेल संघ सारी तैयारियों का एक बार और जायजा ले और बारीकी से जाँच करे और सारे देशों की एजेंसियों से सहायता ले जो भी इस खेल में हिस्सा ले रहे हैं, अगर कमी पायी जाये तो यह अंतर्राष्ट्रीय आयोजन को रद्द कर दिया जाये।

    हम तो भारत सरकार से विनती ही कर सकते हैं कि क्यों भारत और भारतियों की इज्जत को लुटवाने का इंतजाम किया, अब भी वक्त है या तो खेल संघ से कुछ ओर वक्त ले लो या फ़िर आयोजन रद्द कर दो तो ज्यादा भद्द पिटने से बच जायेगी, घर की बात घर में ही रह जायेगी।

Tuesday, September 21, 2010

मुंबई की बस के सफ़र के कुछ क्षण..आगे..३ (श्रंखला पद्धति से टिकट मंगवाया गया) (Mumbai experience of Best Bus)

    आज घर से निकलने में तनिक १-२ मिनिट की देर हो गई, तो ऐसा लगा कि कहीं बस न छूट जाये, चूँकि बस पीछे डिपो से बनकर चलती है, इसलिये हमेशा समय पर आती है। तो हम बिल्कुल मुंबईया तेज चाल से चलने लगे, जिससे बस मिल जाये और वाकई रोज जो दूरी हम ४ मिनिट में पूरी करते थे वह हमने लगभग ३ मिनिट में पूरी कर ली।

    बस स्टॉप से निकल चुकी थी, जैसा कि हमको अंदेशा था, परंतु हमको आता देख ड्राईवर ने आँखों से ही इशारा किया कि आगे के दरवाजे से ही चढ़ जाओ, पर हमें संकोच हुआ और हम पीछे के दरवाजे की ओर देखने लगे, तो ड्राईवर को लगा कि संकोच कर रहे हैं तो हाथों से इशारा कर बोला कि इधर से ही चढ़ जाईये।

    इतनी देर में हमें आगे से किनको चढ़ना चाहिये उसकी सूचना जो कि बस में लगी रहती है, आँखों के सामने घूम रही थी, पर फ़िर भी ड्राईवर जो कि अब हमें पहचानने लगा था क्योंकि रोज ही हम उनको नमस्ते करते थे, तो उन्होंने अपनी दोस्ती आज निभाई थी।

    फ़िर ध्यान आया कि मास्टर तो पीछे है, हमने जेब से पैसे निकाले और श्रंखला पद्धति से टिकट मंगवाया गया, तो हमें याद आया कि दिल्ली में भी डीटीसी की बस में ऐसे ही टिकट मंगवाते थे। आज हम जिस सीट के आगे खड़े थे वह थी अपंगों वाली सीट, थोड़ी देर में ही वह खाली हो गई, तो हम बैठ लिये कि अगर कोई सही उत्तराधिकारी आयेगा तो खुद ही उठ जायेंगे, आगे स्टॉप पर ही एक ज्येष्ठ सज्जन आये तो हम उठने लगे तो बोले नहीं बैठिये, हम बोले नहीं आप बैठिये, हालांकि ज्येष्ठ की परिभाषा बस में ६० वर्ष से अधिक उम्र की होती है, परंतु सफ़ेद बाल को देखकर हम उठ ही गये, हालांकि थोड़े थोड़े हमारे भी बाल सफ़ेद हैं, परंतु फ़िर भी उठ ही गये।

    उन सज्जन ने बैठते ही, अपनी पाकिट में से तीन गुटके निकाले पहले पढ़ा हनुमान चालीसा, दुर्गा चालीसा फ़िर गौरी चालीसा (नाम ठीक से याद नहीं), हमारा भी साथ में हनुमान चालीसा हो गया, हालांकि उनका गुटका गुजराती में था, पर हमें याद था इसलिये कोई परेशानी नहीं हुई।

    ड्राईवर को फ़िर हँसते हुए नमस्ते करते हुए बस से उतर कर आज फ़िर बिल्कुल अपने समय से ऑफ़िस पहुँच गये। लालबागचा राजा के मन्नत के दर्शन करने के बाद हमारे क्यूबिकल के तीन लोग आये थे पूरे १७ घंटे लाईन में लगने के बाद उनको दर्शन हुए थे और वहाँ का प्रसाद भी हमें मिल गया।

Monday, September 20, 2010

मुंबई की बस के सफ़र के कुछ क्षण… आगे..२.. स्स्साले को क्या डेबिट और क्रेडिट भी नहीं पता होता (Mumbai experience Best Bus)

    पिछली पोस्ट पर अरविन्द मिश्रा जी ने पूछा था कि गरोदर स्त्रियाँ कौन सी प्रजाति होती हैं, गर्भवती स्त्री को मराठी में गरोदर कहते हैं, सच कहूँ तो इसका मतलब तो मुझे भी नहीं पता था और न ही जानने की कोशिश की थी, परंतु अरविन्द जी ने पूछा तो ही पता किया।

    इसका मतलब जो स्त्रियाँ आगे के दरवाजे से बेस्ट की बसों में चढ़ती हैं, मतलब जवान स्त्रियाँ वे गरोदर होती हैं, बहुत कठिन है यह भी कहना, खैर सरकार ने जनता को सुविधा देने के लिये नियम बनाया है तो जो स्त्री गरोदर नहीं है वह भी आगे के दरवाजे से चढ़कर नियम तोड़ती हैं, बेचारा ड्राईवर भी क्या बोलेगा। नारी शक्ति से तो सभी का परिचय है। इसलिये पुरुष बेचारा अपनी शक्ति को छिपा लेता है।

    खैर छोड़िये नहीं तो अभी नारी शक्ति वाली आती होंगी काली पट्टी लिये और झाड़ू हाथ में लिये… हम क्या कहना चाह रहे हैं और वे क्या समझकर हमारी लू उतार दें।

    तो नियम केवल पुरुषों के लिये होते हैं, यह बात तो तय है, हमने बेस्ट की बस में चढ़कर जाना है। वैसे तो यह हम पहले से ही जानते हैं परंतु यह बात बेस्ट की बसों में चढ़कर कन्फ़र्म हो गई है।

    आज भी बस के लिये हम तो समय पर अपने स्टॉप पर पहुँच लिये परंतु बस थी कि आ ही नहीं रही थी, समय होता जा रहा था और बैचेनी बढ़ती जा रही थी, फ़िर १० मिनिट लेट बस आई, और हम चढ़ लिये, वैसे तो हमारे स्टॉप से चढ़ने वाले ३-४ लोग ही होते हैं, परंतु बस ठसाठस सी होती है, आखिरी में चढ़े यात्री को डंडा पकड़कर लटकना ही पड़ता है और १-२ मिनिट में ही बस के अंदर हो जाता है। आज आखिरी यात्री हम थे तो हमने जैसे ही डंडा पकड़ा देखा कि बेचारा डंडा भी जंग लगकर सड़ गया है तो उल्टे हाथ की तरफ़ वाला डंडा पकड़कर अंदर हो लिये।

    फ़िर वही राम कहानी सीट के पास खड़े होकर सफ़र करने की, मास्टर और ड्राईवर आज दोनों नये थे, ३-४ लड़के पास खड़े होकर बतिया रहे थे, और कहीं साक्षात्कार देने जा रहे थे। तो उनके डेबिट और क्रेडिट के सिद्धातों को सुन रहा था, बेचारे बोल रहे थे जो पढ़ा इतने साल सब पानी में, व्यवहारिक दुनिया में तो सब उल्टा होता है। अब बेचारा इंटर्व्यूअर भी क्या करे, जो उसे आता होगा वही तो पूछेगा ना, स्स्साले को क्या डेबिट और क्रेडिट भी नहीं पता होता है, और इतनी पढ़ाई करने के बाद हमें क्या समझा है कि हमें ये भी पता नहीं होगा। चल छोड़ न यार आज देखते हैं, कि आज के इंटर्व्यू में क्या होता है।

    तभी पीछे से एक लड़की धक्के मारते हुए आगे की ओर निकल गई और जबरदस्ती उल्टी हाथ की सीट की तरफ़ खड़ी हो गई, जबकि सीधे हाथ की ओर स्त्रियों की आरक्षित सीट होती है, और बड़ी आसानी से सीट मिल भी जाती है, कोई न कोई आरक्षित वर्ग उतरता रहता है और चढ़ता रहता है, और अगर नहीं होता है तो सीट बेचारी खाली ही जाती है, कोई नहीं बैठता, कब कौन कहाँ से आरक्षित वर्ग आ जाये कुछ बोल नहीं सकते।

    अब वह लड़की जहाँ खड़ी थी, थोड़े ही देर में वही सीट से बंदा उतर गया और आम आदमी की सीट आरक्षित वर्ग ने हथिया ली, और सीधे हाथ की एक सीट खाली पड़ी आरक्षित वर्ग के यात्री का इंतजार कर रही थी, हमें बहुत ही कोफ़्त हो रही थी, पर क्या करते चुपचाप शक्ति के आगे नतमस्तक थे, आखिर सरकार ने नियम बहुत सोच समझकर बनाया होगा।

    खैर जैसे तैसे करके अपना स्टॉप आया और बिल्कुल टाईम पर उतर गये, चले भले ही १० मिनिट लेट थे परंतु पहुँच समय पर ही गये, ड्राईवर ने क्या गाड़ी भगाई, बस मजा ही आ गया।

    ऑफ़िस पहुँचे तो सहकर्मियों से बात हुई, बताया गया कि वे लोग लालबागचा राजा के दर्शन करके आये हैं, शनिवार की रात को, और एक सहकर्मी से सिद्धिविनायक का प्रसाद भी खाने को मिला। दिन बढ़िया रहा।

Sunday, September 19, 2010

मुंबई की बस के सफ़र के कुछ क्षण… आगे …१..सीट पर कब्जा कैसे करें (Mumbai Experience of Best Bus)

पिछली पोस्ट को ही आगे बढ़ाता हूँ, एक सवाल था “कंडक्टर को मुंबईया लोग क्या कहते हैं।” तो जबाब है - “मास्टर” ।

अगर कभी टिकट लेना हो तो कहिये “मास्टर फ़लाने जगह का टिकट दीजिये”, बदले में मास्टर अपनी टिकट की पेटी में से टिकट निकालेगा, पंच करेगा और बचे हुए पैसे वापिस देगा, फ़िर बोलेगा “पुढ़े चाल” मतलब आगे बढ़ते जाओ।

जैसे हमारे देश में आरक्षण है वैसे ही बेस्ट बस में आरक्षण को बहुत अच्छॆ से देखा जा सकता है, ४९ सीट बैठने की होती है, जिसमें उल्टे हाथ की पहली दो सीटें विकलांग और अपाहिज और फ़िर उसके बाद की दो सीट ज्येष्ठांचा लोगों के लिये आरक्षित होती हैं, सीधे हाथ की तरफ़ तो महिलाओं के लिये ७ सीटें आरक्षित होती हैं। याने कि लगभग ५०% आरक्षण बस में, जैसे हमारे देश में।

अनारक्षित सीटों पर महिलाओं और ज्येष्ठ लोगों को बैठने से मनाही नहीं है, अब बेचारा आम आदमी इस आरक्षण में पिस पिस कर सफ़र करता रहता है।

अभी कुछ दिनों पहले एक ए.सी. बस में चढ़े तो अनारक्षित सीटों पर महिलाएँ काबिज थीं और महिलाओं की आरक्षित सीटें खाली थीं, सब महिलाएँ भी पढ़ी लिखी सांभ्रांत परिवार की थी जिन्हें शायद महिलाओं के लिये चिन्हित सीटों की समझ तो होगी ही, परंतु फ़िर भी न जाने क्यों, आम आदमी की सीट पर कब्जाये बैठी थीं, हमारे जैसे ३-४ आमजन और खड़े थे, मास्टर को बोला कि इन आरक्षण वर्ग को इनकी सीटों पर शिफ़्ट कर दें तो हम भी बैठ जायेंगे, बेचारा मास्टर बोला कि इनको कुछ बोलने जाऊँगा तो ईंग्रेजी में गिटीर पिटिर करके अपने को चुप करवा देंगी, और ये तो रोज की ही बात है।

अब बताईये महिला शक्ति से कोई उलझता भी नहीं, वे सीटें खाली ही रहीं जहाँ तक कि हमें उतरना था, और उन सीटों पर बैठना हमें गँवारा न था, कि कब कौन सी महिला कौन से स्टॉप पर चढ़ जाये और अपनी आरक्षित सीट की मांग करने लगे, इससे बेहतर है कि खड़े खड़े ही सफ़र करना।

जब महिलाओं को समान अधिकार दिये जा रहे हैं, तो ये आरक्षण क्यों, फ़िर भले ही वह सत्ता में हो या फ़िर बस में या फ़िर ट्रेन में…। खैर हम तो ये मामला छोड़ ही देते हैं, भला नारी शक्ति से कौन परिचित नहीं है.. और फ़िर इस मामले में सरकार तक गिर/झुक जाती हैं… तो हम क्या चीज हैं।

बेस्ट की बस में निर्देशित होता है कि आगे वाले दरवाजे से केवल गरोदर स्त्रियाँ, ज्येष्ठ नागरिक और अपंग ही चढ़ सकते हैं। वैसे कोई कुछ भी कहे बेस्ट की बसें और उसकी सर्विस बेस्ट है।

यह वीडियो देखिये जिसमें प्रशिक्षण दिया जा रहा है कि बेस्ट की बसों में कैसे सीट पर कब्जा किया जाये -

Saturday, September 18, 2010

मुंबई की बस के सफ़र के कुछ क्षण (Mumbai experience of BEST Bus)

    कुछ दिनों से बस से ऑफ़िस जा रहे हैं, पहले पता ही नहीं था कि बस हमारे घर की तरफ़ से ऑफ़िस जाती है। बस के भी अपने मजे हैं पहला मजा तो यह कि पैसे कम खर्च होते हैं, और ऐसे ही सफ़र करते हुए कितने ही अनजान चेहरों से जान पहचान हो जाती है जिनके नाम पता नहीं होता है परंतु रोज उसी बस में निर्धारित स्टॉप से चढ़ते हैं।

    पहले ही दिन बस में बैठने की जगह मिली थी और फ़िर तो शायद बस एक बार और मिली होगी, हमेशा से ही खड़े खड़े जा रहे हैं, और यही सोचते हैं कि चलो सुबह व्यायाम नहीं हो पाता है तो यही सही, घर से बस स्टॉप तक पैदल और फ़िर बस में खड़े खड़े सफ़र, वाह क्या व्यायाम है।

    बस में हर तरह के लोग सफ़र करते हैं जो ऑफ़िस जा रहे होते हैं, स्कूल कॉलेज और अपनी मजदूरी पर जा रहे होते हैं, जो कि केवल उनको देखने से या उनकी बातों को सुनने के बाद ही अंदाजा लगाया जा सकता है।

    कुछ लोग हमेशा बैठे हुए ही मिलते हैं, रोज हुबहु एक जैसी शक्लवाले, लगता है कि जैसे सीट केवल इन्हीं लोगों के लिये ही बनी हुई है, ये रोज डिपो में जाकर सीट पर कब्जा कर लेते होंगे।

    बेस्ट की बस में सफ़र करना अपने आप में रोमांच से कम भी नहीं है, कई फ़िल्मों में बेस्ट की बसें बचपन से देखीं और अब खुद ही उनमें घूम रहे हैं।

    बेस्ट की बसों में लिखा रहता है लाईसेंस बैठक क्षमता ४९ लोगों के लिये और २० स्टैंडिंग के लिये, परंतु स्टैंडिंग में तो हमेशा ऐसा लगता है कि अगर यह वाहन निजी होता तो शायद रोज ही हर बस का चालान बनता, कम से कम ७०-८० लोग तो खड़े होकर यात्रा करते हैं, सीट पर तो ज्यादा बैठ नहीं सकते परंतु सीट के बीच की जगह में खड़े लोगों की ३ लाईनें लगती हैं।

बातें बहुत सारी हैं बेस्ट बस की, जारी रहेंगी… इनकी वेबसाईट भी चकाचक है और कहीं जाना हो तो बस नंबर ढूँढ़ने में बहुत मदद भी करती है… बेस्ट की साईट पर जाने के लिये चटका लगाईये।

एक गाना याद आ गया जो कि अमिताभ बच्चन पर फ़िल्माया गया था -

आप लोगों के लिये एक सवाल कंडक्टर को मुंबईया लोग क्या कहते हैं।

Tuesday, September 14, 2010

खोज रहा हूँ.. क्यों उदास है ये जिंदगी…..मेरी कविता….विवेक रस्तोगी

क्यों उदास है ये जिंदगी

पलकें भारी हैं

होश नहीं है,

जीवन जीवन नहीं है

पर फ़िर भी

इस उदासी भरी जिंदगी को,

जीते जा रहे हैं

अब शायद कुछ बचा न हो

पर फ़िर भी,

इंतजार कर रहे हैं

मन व्याकुल है

आत्मा कष्ट में है,

हर राह में कंटक बिछे हैं

अंतर बीमार है

मन अशांत है

जीवन में

ध्यान छिन्न भिन्न है

अत्र तत्र यत्र सर्वथा

अवांक्षित से विचार

न कोई ओर न कोई छोर

जीवन की डोर

फ़िसली जा रही है

राहें कठिन होती जा रही हैं

संबल अंतहीन के अंत तक

पहुँचा लगता है

हर चीज जो जीवंत है

मेरे लिये उसका अंत ही दिखता है,

अनमोल है सब पर,

मेरे जीवन का मोल और

हर वस्तु का मोल खत्म सा है,

गीता ज्ञान और मर्म

सब निरापद सा लगता है

चहुँ और अवसाद के

घिरे हुए से बादल हैं,

कहीं कोई रोशनी और

उम्मीद दूर दूर तक नहीं है

बस जीवन अवसादपूर्ण है

कैसे इसकी थाह लूँ

गंगा में या हिमालय में

खोज रहा हूँ।

Monday, September 13, 2010

टीपीए क्या होता है, मेडिक्लेम में टीपीए के इंटिमेशन को लेकर नियामक की खामियाँ या उच्च स्तर की मिलीभगत (What is TPA ? Intimation related problem with TPA)

रमेश और टी.पी.ए. के बारे में पहले की पोस्ट यहाँ चटका लगाकर पढ़िये।

टीपीए कौन सा हो, यह जानना भी जरुरी है मेडिक्लेम लेते समय, बीमा नियामक की लगाम भी जरुरी है टीपीए पर (Choose right TPA for Claim Settelment)

इस लेख पर डॉ. महेश सिन्हाजी ने पूछा था कि टीपीए क्या होता है ?

    टीपीए याने कि थर्ड पार्टी एडमिनिस्ट्रेटर, जो कि बीमा कंपनियों से संबद्ध रहते हैं, और बीमा दावे से भुगतान तक की प्रक्रिया को निपटाते हैं। जैसे कि अगर किसी सरकारी या गैर सरकारी कंपनी से मेडिक्लेम लिया तो उसके दावे और भुगतान के लिये दो प्रक्रियाएँ हैं -
१. बीमा कंपनी का खुद का टीपीए हो, याने कि आंतरिक टीपीए, बीमा कंपनी खुद ही दावे और भुगतान की प्रक्रिया निपटाये।
२. बीमा कंपनी आईआरडीए से अधिकृत टीपीए को यह कार्य दे दे, जैसे ही मेडिक्लेम लिया तो पॉलिसी में ही टीपीए का नाम और उसके प्रधान कार्यालय का नाम पता आता है, साथ ही कैशलेस कार्ड के पीछे टीपीए का स्थानीय कार्यालय का पता, फ़ोन नं. और फ़ेक्स की जानकारी होती है।

    यानि कि जिस बीमा कंपनी से आपने मेडिक्लेम लिया उसकी जिम्मेदार पॉलिसी आपको देने के बाद खत्म और वह चाहकर भी बीमित की मदद नहीं कर सकती।

    आईआरडीए के अंतर्जाल पर टीपीए की सूची भी मिलती है, ज्यादा जानकारी के लिये आप टीपीए सूची पर चटका लगाकर देख सकते हैं।

अब पिछली पोस्ट से आगे -

    रमेश ने फ़िर सप्ताह भर इंतजार करने के बाद वापिस से टीपीए को फ़ोन लगाया कि हमारे स्वास्थ्य बीमा भुगतान का क्या हुआ और हमें चैक कब तक मिलेगा। टीपीए के कार्यालय से जबाब मिला कि आपने बीमार होने पर हमें याने कि टीपीए को इसकी जानकारी (Intimation) नहीं दी थी, इसलिये आपका दावा रिजेक्ट कर दिया गया है। तब टीपीए को बताया गया कि हमने आपके दिये हुए फ़ैक्स नंबर पर २४ घंटों के अंदर ही इंटीमेशन फ़ैक्स कर दी थी और बाद में आपके कार्यालय में इंटीमेशन की एक प्रति स्पीडपोस्ट से भी भेजी है, साथ ही सरकारी बीमा कंपनी को भी इंटीमेशन दी है।
   
    पर टीपीए कार्यालय से जबाब मिला कि हमें आपकी तरफ़ से कोई फ़ैक्स नहीं मिला और न ही कोई स्पीड पोस्ट, तो रमेश ने उन्हें बताया कि हमारे पास फ़ैक्स की ओके रिपोर्ट है, जो कि वापिस से आपको फ़ैक्स कर रहे हैं, तो पता चला कि टीपीए कार्यालय ने वह फ़ैक्स की ओके रिपोर्ट भी मानने से इंकार कर दिया क्योंकि उस ओके रिपोर्ट पर टीपीए कार्यालय का फ़ैक्स नंबर प्रिंट नहीं था, तो रमेश ने उनसे कहा कि अभी जो ओके रिपोर्ट की ओके रिपोर्ट आयी है उसमें भी आपका फ़ैक्स नंबर नहीं है। अब टीपीए ने बोला कि आप साबित कीजिये कि आपने हमें इंटीमेशन दी थी, तो रमेश ने अपनी बीमा कंपनी में बात की तो वहाँ से बताया गया कि उन्होंने भी इंटीमेशन फ़ैक्स की है और कभी भी टीपीए को किये गये फ़ैक्स की ओके रिपोर्ट में कभी भी उनका फ़ैक्स नंबर नहीं आता है,टीपीए ने फ़ैक्स मशीन में ही कोई गड़बड़ी कर रखी है, और साथ ही जो प्रति रमेश ने बीमा कंपनी को भेजी थी वो उनके आवक रजिस्टर में चढ़ी हुई है, और साथ ही बीमा कंपनी ने भी स्पीड पोस्ट से टीपीए को जानकारी (Intimation) भेजी है, जो कि उनके जावक रजिस्टर में चढ़ी हुई है।

    जब टीपीए कार्यालय को यह जानकारी दी गई तो वहाँ से कहा गया कि इंटिमेशन की कॉपी जो कि बीमा कंपनी ने प्राप्त की थी, उनके सील और साईन के साथ वाली इंटीमेशन की कॉपी फ़ैक्स करिये और एक फ़ोटोकॉपी स्पीडपोस्ट के द्वारा भेजिये। फ़ैक्स करने के बाद टीपीए कार्यालय से फ़ोन करके पक्का कर लिया कि फ़ैक्स मिल गया है और बीमा कंपनी द्वारा भी अधिकारी अधिकृत पत्र उनको भेजा जा रहा है।

    इसी बीच रमेश ने टीपीए को इंटिमेशन के बारे में टीपीए और आईआरडीए से जानकारी ली तो बहुत सी खामियाँ नजर आईं।

    टीपीए को इंटिमेशन - टीपीए के स्थानीय कार्यालय आपातकाल की स्थिती में २४ घंटों के अंदर इंटिमेशन फ़ैक्स करना होता है और फ़िर फ़ोन पर इस बाबद पक्का कर लिया जाये कि उन्हें इंटिमेशन मिल गई है। अगर पहले से ही किसी चिकित्सा को प्लॉन किया गया है तो भर्ती करने के पहले टीपीए को इंटिमेशन देकर स्वीकृति ले ली जाये।

    खामियाँ - जब रमेश ने टीपीए से पूछा कि हमने आपको इंटिमेशन दी पर हमें इसकी प्राप्ति रसीद नहीं मिली और फ़ैक्स की ओके रिपोर्ट पर भी आपका फ़ैक्स नंबर नहीं है, दो महीने बाद जब हम भुगतान के लिये दावा करेंगे तो आप इंटिमेशन न करने को लेकर हमारा केस रिजेक्ट कर सकते हैं और इंटिमेशन दिया है इसे साबित करने को कह सकते हैं। जब उनसे इस बाबत जबाब मांगा गया तो कार्यालय का जबाब था कि प्राप्ति की रसीद का कोई प्रावधान नहीं है। फ़िर रमेश ने उनसे टीपीए में उनसे संबद्ध उच्च अधिकारी का फ़ोन नंबर मांगा ताकि इस स्थिती को स्पष्ट किया जा सके परंतु टीपीए कार्यालय ने किसी भी उच्च अधिकारी का नंबर देने से मना कर दिया।

    रमेश ने हैदराबाद स्थित आईआरडीए कार्यालय को फ़ोन किया और उनके अधिकारियों से टीपीए को इंटीमेशन के संबंध में जानकारी चाही गई तो उनके भी हाथ बंधे हुए ही नजर आये, वहाँ से भी यही जबाब मिला कि आपके पास फ़ैक्स की ओके रिपोर्ट और कूरियर या स्पीड पोस्ट की रसीद रखना चाहिये। उन्हें कहा गया कि फ़ैक्स की ओके रिपोर्ट में टीपीए का फ़ैक्स नंबर नहीं आता है, तो आईआरडीए के अधिकारी कुछ भी कहने की स्थिती में नहीं थे। और कूरियर और स्पीडपोस्ट से इंटीमेशन में टीपीए यह कहकर क्लेम रिजेक्ट कर सकता है कि २४ घंटों के अंदर सूचित नहीं किया गया, इस पर भी आईआरडीए के अधिकारी कुछ भी कहने की स्थिती में नहीं थे, बस इतना ही कहा गया कि हम इसमें आपकी कोई सहायता नहीं कर सकते हैं, इसके लिये आपको संबद्ध बीमा लोकापाल से संपर्क करना होगा।

    मेडिक्लेम के लिये बीमा कंपनियाँ इतने रुपये लेती हैं परंतु टीपीए के लिये आईआरडीए का कोई भी दिशा निर्देश साफ़ नहीं है, या तो काफ़ी उच्च स्तर पर मिलीभगत है या फ़िर आईआरडीए और बीमा कंपनियों को यह साफ़ नहीं है कि टीपीए के लिये क्या दिशा निर्देश होना चाहिये। बीमा लोकापाल को या नियामक को टीपीए से संबंधित दिशा निर्देशों पर ध्यान देकर इन कमजोरियों को दूर किया जाना चाहिये।

    यहाँ पर टीपीए है हैरिटेज हैल्थ प्राईवेट लिमिटेड, कोलकाता और बीमा कंपनी है यूनाईटेड इंडिया इंश्योरेन्स।

    अब भी अगर कुछ नहीं होता है तो रमेश इस गंदे सिस्टम से लड़ाई का मन बना चुका है, जिसके तहत पहले वह बीमा लोकापाल, भोपाल में शिकायत दर्ज करवायेगा और फ़िर एक इस संबद्ध में जनहित याचिका।

Saturday, September 11, 2010

मेरी जिंदगी के कुछ लम्हे (एन.सी.सी. के बटालियन केम्प और तैयारियाँ)..My life my experience

एन.सी.सी. मे हर वर्ष बटालियन में केम्प लगता था, जिसमें सेना से संबंधित बहुत सारी जानकारियाँ दी जाती, युद्ध क्षैत्र में कैसे दैनिक व्यवहार किया जाता है, फ़ायरिंग करवाई जाती है।

जब कैम्प में जाने की सूचना मिलती तो बड़े जोर शोर से पूरी तैयारी शुरु हो जाती थी, लोहे की पेटी पर रंगरोगन फ़िर अपना नाम और नंबर लिखकर पेटी तैयार करना। बेल्ट, जूते पर पॉलिश करके चमकाना और पीतल के बेज को चमकाना। पूरी आस्तीन के शर्ट और पैंट, जिससे मलेरिया का खतरा न रहे।

ट्रेन से जाना तय होता था, झाबुआ से मेघनगर तक जाने के लिये बस से जाना होता था, उस समय बस का सामान्य किराया ४ रुपये था पर स्टूडेन्ट कन्सॆशन में हमें केवल १ रुपया ही लगता था, अपनी पेटियाँ और बेडिंग बस के ऊपर खुद ही चढ़वानी होती थीं। मेघनगर पहुँचकर वापिस से बस से अपनी पेटियाँ और बेडिंग लेकर फ़िर रेल्वे स्टेशन की ओर प्रस्थान करते थे। लोग हमें घूर घूर कर देखते थे, क्योंकि हम सभी एन.सी.सी. की वर्दी में होते थे, पर हाँ एन.सी.सी. की वर्दी पहनने के बाद खुद को गौरवान्वित महसूस करते थे।

फ़िर इंतजार होता था, देहरादून ट्रेन का जो कि मेघनगर से १० बजे चलती थी और रतलाम लगभग १२ बजे पहुँचती थी, रेल्वे स्टेशन पर बटालियन के ट्रक हमारा इंतजार कर रहे होते थे, फ़िर ट्रक में लदफ़दकर शहर से ८-१० किमी दूर गंगासागर के पास केम्प लगता था।

और दस दिन का कैम्प खत्म करके वापिस घर की ओर लौट पड़ते थे। गोविन्दा की एक फ़िल्म आई थी “शोला और शबनम” जिसमॆं एन.सी.सी. का जीवन काफ़ी हद तक फ़िल्माया गया था, यह फ़िल्म मेरी मन पसंदीदा फ़िल्मों में से एक है आज भी। फ़िल्म के कुछ दृश्य देखिये जिससे एन.सी.सी. के पुराने दिन आज भी याद हो आते हैं -

Friday, September 10, 2010

मेरी जिंदगी के कुछ लम्हे (एन.सी.सी. की परेड और ड्रिल).. My life my experience

कॉलेज में दाखिला लिया था, और कुछ ही दिनों में पता चला कि एन.सी.सी या एन.एस.एस. में से कुछ एक लेना होता है, शुरु से ही हमें सेना अपनी ओर आकर्षित करती थी, बस तो यही आकर्षण हमें एन.सी.सी. की ओर खींचकर ले गया।

अपना नाम हमने एन.सी.सी (नेशनल कैडेट कोर) में लिखवाया और फ़िर हमारे एन.सी.सी. वाले सर ने एन.सी.सी. रुम में बुलाया कि अपनी एन.सी.सी. की ड्रेस ले जाओ, हम भी पहुँच गये एन.सी.सी. रुम में अपने नाप की ड्रेस लेने के लिये। वहाँ जाकर देखा तो पता चला कि लड़कों की भीड़ टूटी पड़ी है। समझ ही नहीं आ रहा था कि इतनी भीड़ में कैसे अपने नाप के कपड़ों का चुनाव करें।

लोहे की अलमारियों में से नई पैंट और शर्ट रखी हुई थीं, जिन पर साईज भी केवल एस, एम और एल लिखा हुआ था, समझ ही नहीं आ रहा था कि कौन से साईज का कपड़ा अपने को सही आयेगा। फ़िर थोड़ा सा बेशरम बनकर वहीं पर शर्ट और पैंट पहनकर देख ही लिये, फ़िर नई जुराबें और मिलिट्री वाले एंकल शूज, टोपी और कुछ एसेसरीज।

एंकल शूज के नीचे तले में घोड़े की नाल लगवानी थी, जिससे कदमताल अच्छा होता था और जूते घिस भी नहीं पाते थे। जब ये शूज पहनकर चलते थे तो खटखट की अलग ही आवाज होती थी।

कॉलेज के मैदान में सप्ताह में दो बार परेड होती थी, गुरुवार और शुक्रवार शाम ४ बजे से ६ बजे तक। चार बजे पहुँचने के बाद सबसे पहले हाजिरी होती थी, फ़िर एन.सी.सी. गीत (हम सब भारतीय हैं) और फ़िर मैदान के ५-६ चक्कर हवलदार दौड़वाते थे, कसम से ५-६ चक्कर में दम निकल जाता था और फ़िर उसके बाद  ड्रिल या कुछ और ट्रेनिंग।

इंतजार होता था शाम छ: बजे का, जब परेड का समापन होता था तब मिलता था नाश्ता दो समोसे या कचोरी और मिठाई के पीस। कभी वहीं खा लेते थे तो कभी अपने साथ रखकर घर पर लाकर आराम से खाते थे।

एन.सी.सी. की वर्दी पहनने से ऐसा लगता था कि मैं भारत माता का सिपाही हूँ और मेरा जन्म सार्थक हो गया और अपने आप पर गर्व महसूस होता।

Thursday, September 09, 2010

मेरी जिंदगी के कुछ लम्हे (राजदूत मोटर साईकिल, मेरी हीरो रेंजर और कालिया का वेस्पा स्कूटर..) My life my experience

कॉलेज के दिनों में कुछ ही दोस्तों के पास स्कूटर या मोटर साईकिल हुआ करती थी, जैसे कालिया के पास एल.एम.एल.वेस्पा और अनुराग के पास राजदूत मोटरसाईकिल, अब आजकल ये दोनों ही ब्रांड देखने को क्या सुनने को भी नहीं मिलते हैं।

RajdootLml_Scooter
ranger   हरी भरी वादियाँ
(चित्र गूगल से लिये गये हैं, आपत्ति हो तो दर्ज करवा दें, हटा लिये जायेंगे, हरी भरी वादियों का चित्र नीरज जाट जी के ब्लॉग से लिया गया है)

कालिया, केटी और मैं वेस्पा पर लदकर अपने शहर से दूर २५ किमी दूर गाँव में अपने दोस्त से मिलने जाते थे, और हरी भरी वादियों में हम दोस्त गाना गाते हुए, वेस्पा लहराते हुए चले जाते थे। कालिया वेस्पा वही ३-४ रुपये लीटर वाले पेट्रोल से फ़ुलटैंक करके आ जाता था और हम तीनों निकल पड़ते थे, सफ़र पर, कभी ऐसे ही लांग ड्राईव पर कभी किसी गांव में, कभी किसी तालाब या नदी के किनारे।

अनुराग की राजदूत बहुत काम की थी,  एक तो उस समय राजदूत शान मानी जाती थी, राजदूत की किक ऐसी कि ध्यान से नहीं मारी तो पलट के आती थी और टांग तोड़ देती थी। राजदूत काले और लाल रंग में बहुतायत में पाई जाती थी।

हम अपनी हीरो रेंजर साईकिल पर शान से घूमते थे, उससे पता नहीं कितने किलोमीटर घूम चुके थे, आगे डंडे पर और पीछे कैरियर पर अपने दोस्तों को बैठाकर घूमते थे। जब पापाजी ने बोला था कि देख लो कौन सी साईकिल लेनी है, तब बाजार में हीरो रेंजर बिल्कुल नई आयी थी, जब हमने बताया था तो पापाजी बोले कि एटलस, बीएसए एस.एल.आर या हीरो की साधारण डंडे वाली साईकिल ले लो। परंतु उस समय हीरो रेंजर बिल्कुल ही नया ब्रांड और नया फ़ैशन था तो भला साधारण साईकिल कैसे पसंद होती।

वो मेरे साईकिल वाले दिन और वेस्पा और राजदूत के सपने देखने वाले दिन, कैसे निकल गये, पता ही नहीं चला कि कब ये दिन निकल गये। जब तक मोटर साईकिल के दिन आये तब तक वापिस से साईकिल वाले दिनों के सपने आने लगे, ये सपने भी न बड़े अजीब होते हैं, पता ही नहीं होता है कि कब कौन से सपने देखने चाहिये और कब नहीं।

Wednesday, September 08, 2010

मेरी जिंदगी के कुछ लम्हे (नदी किनारे पिकनिक और गजानन माधव मुक्तिबोध का साहित्य सृजन).. My life my experience

नदी किनारे पिकनिक मनाने का आनंद ही कुछ और होता है, नदी हमारे शहर से करीबन १० किमी. दूर थी, वहाँ पर शिवजी का प्राचीन मंदिर भी है और एक गोमुख है जिससे लगातार पानी निकलता रहता है, किवंदती है कि पाण्डवों के प्रवास के दौरान यह गौमुख अस्तित्व में आया था। कहते हैं कि गंगाजी का पानी है, और वह कुंड जिसमें पानी आता है हमेशा भरा रहता है। पानी नदी में प्रवाहित होता रहता है।

नदी के पाट पर बड़े छोटे पत्थर, कुछ रेत और उनके बीच में से निकलता नदी का उनमुक्त जल, जो पता नहीं कब कहाँ निकल आता और कैसा अहसास करा जाता। इसीलिये नदी किनारा हमेशा से मेरा पसंदीदा स्थान रहा है। जब हम मंगलनाथ पर नदी के किनारे बैठते थे तो गजानन माधव मुक्तिबोध की याद आ जाती थी, कहीं पढ़ा था कि मुक्तिबोध मंगलनाथ पर नदी के किनारे बैठकर ही साहित्य सृजन किया करते थे।

केवल इसी कारण से नदी हमारा पसंदीदा स्थान था, पिकनिक मनाने के लिये, सब सामान हम अपने साथ ले जाते थे, हम पाँच मित्र थे जो भी सामान पिकनिक में लगता सब अपने अपने घर से कच्चा ले जाते थे, जैसे कि आटा, दाल, मसाले, सब्जियाँ, पोहे.. इत्यादि। सब अपनी सुविधा के अनुसार घर से निकलते थे हालांकि समय निश्चित किया रहता था, पर उस समय मोबाईल तो क्या लैंड लाईन भी घर पर नहीं था।

हम दो दोस्त साईकल से नदी के लिये निकलते थे, हमारे दो दोस्त सारा समान लेकर स्कूटर से पहले ही पहुँच जाते थे। साईकल से १० किमी जाना और फ़िर शाम को आना पिकनिक के मजे को दोगुना कर देता था। इससे लगता था, अहसास होता था कि हम कितने ऊर्जावान हैं।

सुबह नदी पहुँचकर सबसे पहले शिवजी के दर्शन और अभिषेक करके पिकनिक का शुभारम्भ किया जाता। एक दोस्त रुककर लकड़ियाँ बीनकर इकट्ठी करता और उनका चूल्हा बनाने का बंदोबस्त करता और बाकी के चार हम लोग निकल पड़ते पास के खेतों में भुट्टा ढूँढने, जल्दी ही पर्याप्त भुट्टे लेकर वापिस आते और चूल्हे पर पकाकर रसभरे दानों का आस्वादन करते। भुट्टे का कार्यक्रम समाप्त होते होते फ़िर भूख तीव्र होने लगती तो पोहे बनाने की तैयारी शुरु होने लगती, किसी हलवाई को हम साथ लेकर नहीं जाते थे, सब खुद ही पकाते थे, नाश्ते में पोहे सेव और खाने में दाल बाफ़ले और सब्जी। बाफ़ले पकाने के लिये,  कंडे मंदिर से ही मिल जाते थे। खाना पकाने के बर्तन भी मंदिर से उपलब्ध हो जाते थे।

खुद ही पकाते थे और सब मिलकर खुद मजे में खाते थे। कभी अंताक्षरी खेलते कभी कविताएँ सुनाते कभी एकांकी अभिनय करते कभी अभिनय की पाठशाला चलाते, एक मित्र चित्रकार था तो वह सबका पोट्रेट बनाता। खूब मजे भी करते और अपने अंदर की प्रतिभाओं को भी निखारते, भविष्य में करने वाले नाटकों के मंचन की रुपरेखा बनाते।

क्या दिन थे, अब कभी लौटकर नहीं आयेंगे, बस वे दिन तो बीत ही गये, और उनकी यादें जेहन में आज भी ऐसी हैं जैसे कि ये पल अभी आँखों के सामने हो रहे हैं।

Monday, September 06, 2010

मेरी जिंदगी के कुछ लम्हे … (मामा का मतलब, दो माँ, बोल अब मैं तेरा क्या करुँ)… My life my experience

रात को घर लौटते समय प्रोफ़ेसर कॉलोनी की सड़क पर घुप्प अँधेरे  में से होकर चले जा रहे थे, और मस्ती करते हुए तीनों निकले जा रहे थे, पतझड़ का मौसम था तो पेड़ों के पत्ते सड़क पर बिछे हुए थे, और तीनों के स्पोर्ट्स शूज से उन पत्तों के कुचलने की आवाजों से वह वीरान कॉलोनी और वह सन्नाटा उनकी गप्पों के साथ अजीब सी कर्कश ध्वनि पैदा कर रहा था।

इतने में ही पुलिया के पास थोड़ी लाईट नजर आई, और वहाँ पर एक बुलेट खड़ी थी और तीन चार लोग बैठे थे, सिगरेट के धुएँ के छल्ले दूर से ही नजर आ रहे थे, लगा कि लौंडे लपाटे हैं जो प्रोफ़ेसर कॉलोनी के वीरान सन्नाटे में बीयर और सिगरेट पीने आये हैं, बात सही भी निकली, तीन के हाथ में हेवर्ड्स १०००० बीयर की बोतल थी और चौथे के हाथ में ऐरिस्ट्रोकेट व्हिस्की का अद्धा, पानी की बोतल और गिलास भी।

देखा तो पता चला कि शाहरोज अपने दोस्तों के साथ बैठकर मजा मस्ती कर रहा है, दीपक जो कि उसका खास दोस्त था और भी दो दोस्त… जिन्हें मैं पहचानता नहीं..

जब तक हम उनके पास पहुँचे तब तक सब ठीक था, पर हमारे पास पहुँचते पहुँचते दीपक के चेहरे का रंग बदलने लगा था, उसने तीनों को रोका और पूछा कि “क्यों बे इधर से क्यों आ रहे हो,और किधर जा रहे हो”

तो राकू थोड़ा हड़बड़ाया और बोला “तेरे को इससे मतलब, चल निकल”

अब दीपक खड़ा हुआ और बोला “अबे ओ कॉलेज की नई फ़सल, नाके से पॉलिटेक्निक के पास सुट्टा मार कर आ रहे हो ना ?”

राकू “तो तेरे को क्या ..”

दीपक “और स्साले कमीने तू ही है न जो क…? को छेड़ता है, परेशान करता है”

राकू को देखकर अब तो ऐसा लगा कि जैसे काटो तो खून नहीं..

दीपक “बोल स्साले बोल, अब निकाल आवाज.. तेरी तो मा…..?”

राकू “तेरे को क्या, अपन किसी के साथ भी कुछ करेगा तो क्या स्साले तेरे को जबाब देना पड़ेगा, क्या तूने पूरे गाँव का ठेका ले रखा है”

दीपक “अबे क…? की माँ मेरी बहन है, और तो मैं उसका हुआ मामा, समझा, मतलब समझाऊँ”

राकू के कान से शुन्य सी सांय सांय आवाज आने लगी ऐसा लगा कि कान अपने आप ही एक हजार डिग्री के तापमान के हो गये हों।

दीपक “मामा का मतलब, दो माँ, बोल अब मैं तेरा क्या करुँ”

राकू बेचारा क्या बोलता चुपचाप गर्दन झुकाकर खड़ा रहा ।

दीपक बोला “और सुन राकू अगर आज के बाद  तू उसके आसपास नजर आया तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा”

अपुन कुछ बोला नहीं, क्योंकि मुझे पता था कि यह सब चमकाईटिस का ड्रामा है।

शाहरोज खड़ा हुआ और अपुन के पास चलता हुआ आया और आँख मारते हुए बोला “चल निकल, कल मिलते हैं”

कभी कभी अपने दोस्तों को ऐसी चमकाईटिस भी देनी पड़ती है, नहीं तो स्साले बर्बाद हो जायेंगे, इन मायाओं के चक्कर में पड़कर…

Sunday, September 05, 2010

मेरी जिंदगी के कुछ लम्हे…(पिटने दे साले को, बहुत लड़कियों को छेड़ने का कीड़ा है उसमें)… My life my experience

रुपेश दौड़ा दौड़ा आया और बोला “तुम दोनों यहाँ गुमटी पर बैठकर धुआँ उड़ा रहे हो और वहाँ इरशाद और उसके दोस्त प्रिंसीपल रुम के सामने अवनीश लम्बू को पटक पटक के मार रहे हैं, चलो जल्दी चलो, वो इरशाद तुमको देखकर ही उसे मारना बंद कर देगा।”

कान्हा बोला “चलो भाई उस इरशाद की तो ऐसी तैसी कर देते हैं”

अपुन बोला “नहीं, पिटने दे साले को, बहुत लड़कियों को छेड़ने का कीड़ा है उसमें, अच्छा है ठुकाई से निकल जायेगा।”

कान्हा झिड़ककर बोला “अबे कौन से जन्म का बदला निकाल रहा है, चल स्साले लम्बू को बचाते हैं, नहीं तो फ़ालतू में उसकी पसलियों की फ़िक्सिंग अपने को ही करवानी पड़ेगी”

अपुन बोला “तो ठीक है न उधर दोस्ती निभायेंगे। पन अभी बिल्कुल नहीं जाने का, मतलब नहीं जाने का”

कान्हा वो आधी सिगरेट एक ही कश में खींच गया। और लकड़ी के डंडे को पकड़कर खड़ा हो गया था, वही लकड़ी उस गुमटी का आधार थी, शायद उसे सिगरेट चढ़ गयी थी।

“स्साले तुझको कितनी बार समझाया कि एक कश में इतनी मत पिया कर, पन मानने का नहीं, करेगा तो अपने मन की।” अपुन बोला

रुपेश वहीं खड़ा खड़ा हम दोनों के चलने का इंतजार कर रहा था, पन अपुन भी गया नहीं। अपुन का उसूल तोड़ा था लम्बू, लड़कियों के पीछे भागने का नहीं, लड़कियों पर एक रूपया खर्चा नहीं करने का, लड़कियाँ पैसा खर्च करे तो ठीक, नहीं तो इस माया के चक्कर में बिल्कुल नहीं पड़ने का

खैर रुपेश का चेहरा देखकर अब रहा नहीं गया और अपुन बोला “चल, देखते हैं, इरशाद ने लम्बू की कितनी ठुकाई की है, और सुन अगर कोई कसर होगी तो अपुन पूरी कर देगा !” “आखिर लड़की का मामला है और लड़की के मामले में चुपचाप मार खा लेना चाहिये और समझदार दोस्तों को उस लफ़ड़े से दूर ही रहना चाहिये”

रुपेश की तरफ़ देखकर अपुन बोला “स्साले, लड़की का मामला होने पर पुलिस भी बहुत मारती है, और लोग भी दौड़ा दौड़ा कर मारते हैं”

जब तक हम तीनों कॉलेज के शटर वाले मैन गेट पर पहुँचते तब तक इरशाद एन्ड पार्टी लम्बू की ठुकाई करके निकल चुकी थी, और लम्बू वहीं पानी की टंकी पर अपना मुँह धो रहा था, अपुन को आते ही भड़ककर बोला “स्साले कैसे दोस्त हो, जब जरुरत हो तब काम नहीं आते”

अपुन बोला “देख लम्बू, मैं तेरे को पहले ही समझाया था कि झगड़ा बड़ेगा, बच के रहना, पन तेरे को तो मजनूँ का भूत चढ़ा था, तो जा साले पिट और बन मजनूँ”

लम्बू बोला “अबे ये ही दोस्ती है अपनी या इरशाद की दोस्ती निभा रहा था”

कान्हा बोला “ऐ चल ना ज्यादा नौटंकी मत कर अब तेरे को पहले ही बोला था कि लफ़ड़ा होएगा पन तेरी ठस बुद्धि में कुछ आये तो न !”, “चल गुमटी पर चाय पीते हैं, और इस बार तो पूरी छोटी फ़ोर स्क्वेयर को एक ही कश में खींच डालूँगा, पूरे नशे की ऐसी तैसी कर दी”

संतुष्टि कब किसे कहाँ हुई है, कोशिश एक खोज की ? (Satisfaction…)

    संतुष्टि बड़ी गजब की चीज है, किस को कितने में मिलती है इसका कोई मापद्ण्ड नहीं है और मजे की बात यह की इंसान को हरेक चीज में संतुष्टि चाहिये चाहे वह खाने की चीज हो या उपयोग करने की। इंसान जीवन भर अपनी इंद्रियों को संतुष्ट करने मॆं लगा रहता है। इंद्रियाँ शैतानी रुप लेकर इंसान से अपनी तृप्ती पूर्ण करती रहती हैं।

    किसी को केवल पेट भरने लायक अन्न मिल जाये तो ही संतुष्टि मिल जाती है, और प्रसन्न रहता है, पर इंसान की इंद्रियाँ बड़ी ही शक्तिशाली होती जा रही हैं, और केवल पेट भरने से आजकल कुछ नहीं होता, घर, गाड़ी, बैंक बैलेंस सब चाहिये, क्यों ? केवल इंद्रियों की संतुष्टि के लिये, अगर यह सब होगा तो गर्व नामक तरल पदार्थ की अनुभूति होती है ? पर इस सब में इंसान अपने भक्ति की संतुष्टि को भुल जाता है।

    वैसे भी संतुष्टि इंसान की इंद्रियों की ही देन है और उसकी सोच पर ही निर्भर करता है कि उसकी इंद्रियाँ उस पदार्थ विशेष की कितनी मात्रा मिलने पर तृप्त होती हैं, उस इंसान की जीवन संरचना का भी इंद्रियों पर विशेष प्रभाव होता है। केवल इंद्रियों की तृप्ति याने संतुष्टि के लिये इंसान बुरे कार्यों के लिए उद्यत होता है, अगर इंद्रियाँ तृप्त होंगी तो बुरे कार्य भी नहीं होंगे।

    इंसान को जीने के लिये चाहिये क्या दो वक्त की रोटी और तन ढ़कने के लिये कपड़ा, और भगवान ने हर इंसान के हाथों को इतनी ताकत प्रदान की है कि वह अपने लिये खुद यह सब कमा सके। परंतु इंसान ने अपनी ग्रंथियों के पदार्थों की संतुष्टि के लिये दूसरों की रोटी पर भी अधिकार करना शुरु कर दिया, अब हमें केवल रोटी की चिंता नहीं होती, हमें चिंता होती है ऐश्वर्य की, पर इंसान की ग्रंथियाँ यह नहीं समझ रहीं कि ऐश्वर्य पाने के चक्कर में वह कितने लोगों की रोटी ग्रन्थी की संतुष्टि से दूर कर रहा है।

    कहाँ ले जायेगी इंद्रियों की तृप्ति के लिये यह संतुष्टि हमें अपने जीवन में यह तो हम भी नहीं जानते ? परंतु इतना तो है कि अगर सही दिशा में सोचा जाये तो कभी न कभी तो खोज के निष्कर्ष पर पहुँचेगें। खोज जारी है अनवरत है… वर्षों से… हम भी उसका एक छोटा सा हिस्सा हैं…

Thursday, September 02, 2010

जन्माष्टमी पर मुंबई की दही हांडी (Dahi Handi in Mumbai)

    सुबह से ही दही हांडी की धूम है मुंबई में, क्योंकि आज जन्माष्टमी त्यौहार है। आप सबको जन्माष्टमी पर्व की शुभकामनाएँ। हम कहीं दूर दही हांडी देखने तो नहीं गये परंतु घर के पास ही एक आयोजन था जिसको देखने जरुर गये और हाथों हाथ वीडियो भी बना लाये, आप सबको दिखाने के लिये। देखिये -

    ऊपर के वीडियो में दो अलग अलग समूह हांडी फ़ोड़ते हुए और नीचे वाले वीडियो में हांडी फ़ोड़ने के बाद गोविंदाओं की मस्ती…

टीपीए कौन सा हो, यह जानना भी जरुरी है मेडिक्लेम लेते समय, बीमा नियामक की लगाम भी जरुरी है टीपीए पर (Choose right TPA for Claim Settelment)

    रमेश ने मेडिक्लेम ले लिया और खुद को और अपने परिवार को सुरक्षित महसूस करने लगा, टीपीए क्या होता है, कौन सा टीपीए होना चाहिये, यह सब न उनको उनके बीमा एजेन्ट ने बताया न उन्होंने जानने की कोशिश की, उन्हें लगा व्यक्तिगत मेडिक्लेम से अच्छा फ़ैमिली फ़्लोटर मेडिक्लेम पॉलिसी अच्छी है।

    रमेश का सोचना बिल्कुल सही है कि फ़ैमिली फ़्लोटर मेडिक्लेम पॉलिसी अच्छी है, क्योंकि उस बीमा राशि का उपयोग परिवार का कोई भी व्यक्ति कर सकता है। और फ़ैमिली फ़्लोटर में कैशलेस स्कीम ली जिसके लिये उन्होंने कुछ ज्यादा प्रीमियम भी दिया, कि जब भी आपात स्थिती आयेगी तो कम से कम उन्हें अपनी जेब से भुगतान नहीं करना होगा।

    एक दिन रमेश को कुछ समस्या हुई, और उन्हें आपात स्थिती मॆं अस्पताल में भर्ती करना पड़ा, रमेश ने अपने टीपीए को २४ घंटे के अंदर ही खबर कर दी परंतु उनके टीपीए ने कैशलेस का फ़ायदा देने से इंकार कर दिया, वह भी बिना कारण बताये। रमेश को कहा गया कि आप अभी अपने खर्चे पर इलाज करवाईये और बाद में क्लेम करिये, तब भुगतान कर दिया जायेगा। रमेश विकट परिस्थिती में फ़ँस चुका था, क्योंकि ये टीपीए  वाला झंझट उसे पता ही नहीं था, और उसके पास उतना नगद भी नहीं था, पर जैसे तैसे करके उसने इलाज के लिये नकद जुटा लिया और इलाज करवा लिया।

    पॉलिसी के नियमानुसार उन्होंने निर्धारित समय में सारे कागजात उन्होंने टीपीए को भेज दिये और अपने क्लेम के भुगतान का इंतजार करने लगे, पर उनकी राह शायद उतनी आसान नहीं थी। टीपीए से क्लेम का भुगतान १५ से ४५ दिन में हो जाना चाहिये जो कि आई.आर.डी.ए. का नियम है, परंतु बहुत ही कम क्लेम में ऐसा होता है। साधारणतया: टीपीए द्वारा बहुत परेशान किया जाता है या फ़िर क्लेम का भूगतान देने से मना कर दिया जाता है या फ़िर क्लेम भुगतान में बहुत सारी चीजों का भुगतान रोक दिया जाता है।

    रमेश को कागजात जमा करवाये लगभग डेढ़ महीना गुजर गया परंतु क्लेम का भुगतान नहीं आया और न ही टीपीए की तरफ़ से कोई जानकारी का पत्र कि उन्हें कोई जानकारी चाहिये या देरी होने की वजह । रमेश ने अपने एजेन्ट से बात की तो उसने भी हाथ खड़े कर दिये, क्योंकि एजेन्ट के हाथ में भी कुछ नहीं था, क्लेम तो टीपीए को पास करना था। रमेश ने टीपीए के फ़ोन नंबर हासिल किये और संपर्क साधा, तो पता चला कि फ़ाईल अभी डॉक्टर के पास से ही नहीं आयी है, उन्हें एक सप्ताह का इंतजार करने को कहा गया, और बताया गया कि अगर उन्हें किसी कागजात की जरुरत होगी तो बता दिया जायेगा।

    टी.पी.ए. से ४५ दिन बाद रमेश को यह जबाब मिला है, उनकी मुश्किलों का दौर अभी खत्म नहीं हुआ है, परंतु उन्होंने इस विषय में बीमा कंपनी के प्रबंधक से बात की, तो प्रबंधक ने उन्हें बताया कि व्यक्तिगत मेडिक्लेम में इनहाऊस टीपीए होता है तो क्लेम का भुगतान १५-३० दिन में ही हो जाता है और चूँकि यह लोकल होता है तो बीमाधारक बीमा कंपनी में जाकर पूछताछ कर सकता है और प्रगति की जानकारी ले सकता है।

    आईआरडीए ने बहुत सारी कंपनियों को टीपीए का लाईसेंस दिये हैं और आप अपना बीमा करवाने से पहले यह जान लें कि कौन सी टीपीए अच्छा है जो कि क्लेम का भुगतान समय पर करता है, तो आप अपना टीपीए खुद भी चुन सकते हैं, पर अच्छा यही होगा कि बीमा कंपनी और बीमा प्लॉन चुनते समय  देख लें अगर इनहाऊस टीपीए है तो बहुत ही अच्छा है, इनहाऊस टीपीए वाली कुछ कंपनियाँ आईसीआईसीआई लोम्बार्ड, स्टार हेल्थकेयर इत्यादि। जिससे आप मेडिक्लेम से सुरक्षित भी रहें और क्लेम का भुगतान भी समय पर मिले।

    अब अगली बार जब भी मेडिक्लेम का नवीनीकरण करवायें तब इस संदर्भ में पूरी जानकारी प्राप्त करें और उचित बीमा कंपनी से उचित बीमा लें, कौन सा बीमा लेना है यह सबकी अपनी अपनी परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

    वैसे सरकारी बीमा कंपनियाँ टीपीए का विरोध कर रही हैं, क्योंकि बीमा कंपनियाँ केवल बीमा जारी करने तक की प्रक्रिया में ही शामिल होती हैं, कब क्लेम किया गया और कब उसका भुगतान कर दिया गया यह उनको पता बाद में चलता है जब टीपीए से क्लेम भुगतान का पत्र बीमा कंपनियों के पास पहुँचता है। ये टीपीए कंपनियाँ, इसके पीछे बहुत बड़ा खेल चला रही हैं, और बीमा कंपनियों को करोड़ों का चूना भी लगा रही हैं, मेडिक्लेम बीमा के क्षेत्र में बीमा कंपनियाँ इसी कारण से ३००% की हानि में हैं, बीमा नियामकों को इस तरफ़ ज्यादा ध्यान देने की जरुरत है, नहीं तो जल्दी ही बीमा कंपनियाँ मेडिक्लेम करने से कतराने लगेंगी।

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