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Saturday, July 31, 2010

गपोड़ी बेटेलाल की गप्प के किस्से ३१०७२०१०

    बेटेलाल को सुबह स्कूल के लिये बस पर छोड़ने जाते हैं तो कल उनकी एक मारक गप्प वहीं सुनी, लगभग ५ मिनिट मिलते हैं रोज जब मैं और मेरा बेटा बिल्कुल पास होते हैं, तो अभी दो दिन से स्कूल बस की जगह वीडियोकोच बस आ रही है, मैंने पूछा कि स्कूल बस कहाँ गई और ये वीडियोकोच बस क्यों आ रही है।

    तो बोले कि दो दिन पहले जब हम स्कूल से घर की ओर आ रहे थे तो हमारे स्कूल के ग्राऊँड में से अचानक धुआँ आने लगा तो पता चला कि बस जल गई, हमने कहा ऐसा क्या, चलो फ़िर तो बस अभी आयेगी तो पूछ लेंगे, तो बोलते हैं

“नहीं डैडी, मत पूछना प्लीज”

मैंने कहा “नहीं उससे पूछना पड़ेगा, कि कैसी बसें चलाते हो स्कूल के लिये”

बेटेलाल बोले “डैडी स्कूलबस नहीं जली थी, मैं तो बस ऐसे ही बोल रहा था” “उल्लू बनाया चरखा चलाया”
पर वीडियोकोच बस में बैठे हुए सारे बच्चे बहुत खुश नजर आते हैं।

इटेलियानो पास्ता सचित्र (Iteliano Pasta with Pictures)

    आज जाने कहाँ से ख्याल आया कि आज इटेलियानो पास्ता खाया जाये, पास्ता मसाला मेनिया नहीं,  पर पिज्जाहट और डोमिनो पिज्जा के पास्ते के भाव देखकर होश फ़ाख्ता हो लिये, हमने खुद ही बनाने का महत्वपूर्ण निर्णय ले लिया। और ले आये पास्ता और उसमें लगने वाला समान, सब्जियाँ।

  • समान -
  • पास्ता - २०० ग्राम
  • प्याज -  २
  • शिमला मिर्च - १
  • टमाटर - ४
  • हरी प्याज - १
  • बटर - ३ चम्मच
  • चीज - २ क्यूब

Vegetables Chopped Vegetables

Crushed chees Pasta

Pasta in Boiled Water Cooking Pasta

Iteliano Pasta ready 

    सारी सब्जियों को मनपसंद आकार में काटकर, बटर में १ मिनिट तक गुलाबी कर लें और फ़िर सब्जियों को भी डाल दें और नमक डाल दें।

    पास्ता को पकाने के लिये पहले १-२ लीटर पानी में नमक और १ चम्मच तेल डालकर उबाल लीजिये और जब पानी उबल जाये तो उसमें पास्ता डालकर १०-१२ मिनिट तक पका लें फ़िर पानी नितार कर इस पास्ता को बनी हुई सब्जी में डाल दें और चीज को किसकर डाल दें, नमक स्वादानुसार डाल लें। अगर टमाटर सॉस डालना है तो वो भी डाल सकते हैं, तैयार हो गया इटेलियानो पास्ता।

पकाने का समय - १०-१२ मिनिट

    ३० मिनिट में डिलेवरी देने वाले फ़्रेंचाईजी से लेने से अच्छा हमें खुद ही बनाना अच्छा लगा और पूरे ३० मिनिट भी नहीं लगे समान खरीदने, सब्जी काटने और बनाने में।

कुल लागत - लगभग ६०-६५ रुपये ३-४ लोगों के लिये अच्छी मात्रा में। और अगर बहुराष्ट्रीय कंपनी को ऑर्डर देते तो बिल होता कम से कम २४० रुपये और पास्ता की मात्रा भी कम। यम्मी यम्मी बना पास्ता।

Thursday, July 29, 2010

प्रात:भ्रमण के दौरान “मधुबन में राधिका नाचे रे, गिरधर की मुरलिया बाजे रे…”

    आज सुबह घूमने के दौरान कुछ पुरानी यादें ताजा हो गईं, घूमते हुए एक वृद्ध सज्जन के पास से निकले तो उनके जेब में रखे मोबाईल से गाना बज रहा था “मधुबन में राधिका नाचे रे, गिरधर की मुरलिया बाजे रे…”, हमें अपने घर की याद आ गई, क्योंकि हमारे पापा और मम्मी जी को भी यह गाना बहुत पसंद है, और मुझे भी, शास्त्रीय संगीत पर आधारित (मेरे ज्ञान के अनुसार) गाना लाजबाब है।

कोहिनूर (1960) फ़िल्म के इस  गाने का लुत्फ़ उठाईये -

Monday, July 26, 2010

व्यक्तिगत दुर्घटना बीमा, क्या आपके साथ दुर्घटना नहीं हो सकती [Personal Accident Insurance Policy]

    शर्मा साहब ३४ वर्ष के हैं, हँसता खेलता परिवार है उनका, प्यारी सी पत्नी और प्यारे प्यारे दो बच्चे हैं। भविष्य की सारी योजनाओं के लिये शर्मा साहब ने बराबर वित्तीय प्रबंधन कर रखा है। और सभी चीजों का ध्यान रखा हुआ था, बीमा से लेकर बाकी सभी सही वित्तीय उत्पादों में उन्होंने निवेश किया हुआ है। शर्मा साहब पेशेवर सॉफ़्टवेयर इंजीनियर हैं, और बाकी लोगों की तरह अपने ऑफ़िस रोज आते जाते हैं। वे मुंबई के बाहरी उपनगर में रहते हैं, जहाँ परिवार के लिये सभी तरह की सुविधाएँ उपलब्ध हैं। पर रोज अपने ऑफ़िस जाना उनके लिये सबसे बड़ा सरदर्द है। उनको रोज लोकल ट्रेन से अपने ऑफ़िस आना जाना होता, और भीड़ इतनी होती कि कई बार तो लोकल ट्रेन के पायदान पर खड़े होकर यात्रा करना होती। एक दिन रोज की यात्रा के दौरान शर्मा साहब चलती लोकल ट्रेन से गिर पड़े, अब शर्मा साहब शारीरिक और मानसिक रुप से स्वस्थ्य नहीं थे, उन्होंने अपने दोनों पैर इस दुर्घटना में गँवा दिये, और अपने ऑफ़िस जाने की स्थिती में भी नहीं थे, स्वास्थ्य के खर्चे इतने बढ़ गये कि वे होमलोन में डिफ़ाल्टर हो गये। और जितना पैसा उन्होंने बचाया था वह बहुत तेजी से खर्च होने लगा।

    शर्मा साहब का जीवन बहुत ही बुरी स्थिती में पहुँच गया। तो आपको क्या लगता है ? कि इस स्थिती से निपटने के लिये वे क्या कर सकते थे ? खैर अगर वे मात्र ५०० से १००० रुपये की कोई दुर्घटना बीमा योजना अपने लिये ले लेते तो इस तरह से उन्हें वित्तीय प्रबंधन में असफ़लता नहीं होती।

    शर्मा साहब की कहानी केवल एक उनकी ही नहीं है, हम लोग रोज यात्राएँ करते हैं इतने जोखिम हमेशा आसपास रहते हैं, पर यह सोचते हैं कि हमारे साथ दुर्घटनाएँ हो ही नहीं सकती हैं। असल में जिंदगी जीने का एक तरीका वह है। अगर कुछ हो जाये……. तो उसके लिये एक अच्छी रणनीति बनायें अपने लिये व्यक्तिगत दुर्घटना बीमा योजना लें।

जोखिम क्यों लेना ?

    थोड़ा सा ऐसे समझें कि अपने परिवार के सुरक्षा के लिये आपने मृत्यु के जोखिम से बचाने के लिये जीवन बीमा लिया है। यह समान तर्क अपने लिये दें तो, कि अगर आपकी आय बंद हो जाये, आपके साथ घटी भयानक दुर्घटना के कारण अगर आप अपने कार्य पर जाने में सक्षम नहीं हैं तो ….? आपकी आय बंद हो जायेगी। इस तरह के स्थिती से बचने के लिये व्यक्तिगत दुर्घटना बीमा योजना लिया जाना चाहिये। अगर आप अस्थायी या स्थायी विकलांग होने की स्थिती में अपने वित्तीय जोखिम को हस्तांतरित कर सकते हैं, तो आप क्यों नहीं करते ?

किन लोगों को इसकी जरुरत है ?

    व्यक्तिगत दुर्घटना बीमा योजना से आप किसी अनचाही दुर्घटना से अस्थायी या स्थायी विकलांग होने की स्थिती में हो सकने वाले वित्तीय जोखिम से सुरक्षित रह सकते हैं। तो हर उस  व्यक्ति को यह दुर्घटना बीमा योजना लेना चाहिये जो अपने आपको और अपने परिवार को ऐसी किसी भी स्थिती से होने वाले वित्तीय जोखिम से बचाना चाहता है। और अगर केवल आप ही अपने परिवार में कमाने वाले हैं तब तो यह बहुत ही जरुरी है। व्यक्तिगत दुर्घटना बीमा योजना १८ से ७० वर्ष के किसी भी व्यक्ति द्वारा ली जा सकती है।

क्या सुरक्षा मिलती है ?

    व्यक्तिगत दुर्घटना बीमा योजना से आपको सुरक्षा मिलती है, नॉमिनी को दुर्घटना से होने वाली आकस्मिक मौत की स्थिती में बीमा धन, संपूर्ण या आंशिक विकलांगता या अस्थायी विकलांगता की स्थिती में कुछ निश्चित बीमा धन की सुरक्षा मिलती है। बीमित राशि का भुगतान आंशिक हो सकता है या पूर्ण भी हो सकता है यह दुर्घटना की गंभीरता पर निर्भर करता है।

    उदाहरण के लिये - यूनाईटेड इंडिया इंश्योरेन्स की व्यक्तिगत दुर्घटना बीमा योजना में आकस्मिक मृत्यु या स्थायी पूर्ण अशक्तता  या कोई दो अंग (या दोनों आँखें) न रहने की स्थिती में बीमित राशि का १००% भुगतान होगा। पर आंशिक विकलांगता की स्थिती में याने कि किसी भी एक अंग या एक आँख के नुक्सान होने पर बीमित राशी के ५०% का भुगतान किया जाता है। अस्थायी पूर्ण अशक्तता की स्थिती में बीमा कंपनी बीमित रकम का १% का भुगतान हर सप्ताह करती है जो कि अधिकतम ३००० रुपये और अधिकतम ५२ सप्ताह के लिये दिया जाता है। स्थायी आंशिक विकलांगता के मामले में भुगतान बीमित रकम का कुछ भाग होगा जो कि योजना के नियम और शर्तों के मुताबिक होगा। प्रीमियम की राशि आपके बीमित रकम की राशी पर निर्भर करती है। अतिरिक्त प्रीमियम भुगतान करने पर स्वास्थ्य व्यय के जोखिम से भी सुरक्षा पा सकते हैं। लगभग सभी कंपनियों की योजनाओं के मानक समान ही होते हैं पर सभी कंपनियों की बीमा शर्तें अलग हो सकती हैं। हालांकि व्यक्तिगत दुर्घटना बीमा योजना एक करार जैसा होता है, आप अगर किसी अंग का ज्यादा रकम का बीमा करवाना चाहते हैं तो करवा सकते हैं। योजना में शर्तें बिल्कुल साफ़ शब्दों में लिखी होती हैं।

    फ़िर भी आपको योजना के नियम और शर्तें पूरी तरह से पढ़ लेना चाहिये कि उसमें किस अंग की कितनी बीमा धन से सुरक्षा है।

स्वास्थय, जीवन बीमा और दुर्घटना बीमा में क्या संबंध है ?

    आपमें से कुछ लोगों ने स्वास्थ्य बीमा, जीवन बीमा, अपने वाहन का बीमा तो ले रखा है और आप सोचते हैं कि मुझे व्यक्तिगत दुर्घटना बीमा योजना की कोई जरुरत नहीं हैं। आपके बीमा एजेन्ट ने जीवन बीमा बेचते समय आपको बताया था कि इसमें दुर्घटना बीमा से भी सुरक्षा है, बीमा एजेन्ट की कही गई बातों पर आँख बंद करके विश्वास मत कीजिये और जीवन बीमा योजना के दस्तावेजों को ध्यान से पढ़िये। शायद ही कोई जीवन बीमा योजना दुर्घटना के जोखिम से सुरक्षा देती है, आमतौर पर ऐसा नहीं होता है और जोखिम से पर्याप्त सुरक्षा भी नहीं होती है। तो इसलिये यह मेरी सलाह है कि अलग से व्यक्तिगत दुर्घटना बीमा योजना जरुर लें जो कि आपके जीवन में होने वाली आकस्मिक स्थिती में वित्तीय जोखिम से सुरक्षा प्रदान करे। भारत में दुर्घटना बीमा योजना के लिये  प्रीमियम की राशि पूरे विश्व में सबसे कम है। जो कि १५०-१८० रुपये प्रति लाख रुपये के लिये होती है। अब सोच क्या रहे हैं जल्दी से व्यक्तिगत दुर्घटना बीमा योजना लीजिये और अपने को और अपने परिवार को सुरक्षित कीजिये या इंतजार कर रहे हैं किसी आकस्मिक दुर्घटना का ….।

Saturday, July 24, 2010

अंधेरी में ज्ञान पाने के लिये मुंबई के २ २ मिनिट की कीमत बारिश के बीच जद्दोजहद …. विवेक रस्तोगी

    आज अंधेरी में जागोइन्वेसटर पाठक मिलन था, समय तय किया गया था सुबह १० बजे से दोपहर २ बजे तक । क्लास रुम का जितना भी खर्च आना था वह सबको साझा करना था। सही मायने में वित्तीय प्रबंधन शिक्षा के लिये यह मुंबई में शुरु किया गया एक प्रयास है। जागोइन्वेस्टर.कॉम ब्लॉग मनीष चौहान लिखते हैं।

   तो सुबह ९ बजे घर से निकल पड़े थे क्योंकि अंधेरी पहुँचने में पुरे ४५ मिनिट का अनुमान लगाया था। ९ बजे नहीं निकल पाये हम निकल पाये ९.०५ बजे घर से और हाईवे तक पैदल बस स्टॉप पर ९.०८ बजे पहुँच गये। वहाँ जाकर बोरिवली स्टेशन की बस पकड़ी, हमारा अनुमान था कि लगभग ९.१७ बजे तक हम बोरिवली स्टेशान पहुँच जायेंगे।

    बोरिवली से कांदिवली ३ मिनिट, कांदिवली से मालाड ४ मिनिट, मलाड से गोरेगांव ४ मिनिट, गोरेगांव से जोगेश्वरी ६ मिनिट और जोगेश्वरी से अंधेरी लगभग ३ मिनिट लगता है, याने कि बोरिवली से अंधेरी २० मिनिट लगते हैं।

  और फ़िर हमें टिकट भी लेना था क्योंकि हम रोज लोकल ट्रेन में तो जाते नहीं हैं, हमारे पास रेलकार्ड है, जिसे कि रेल्वे स्टेशन पर लगे टर्मिनल से फ़टाफ़ट टिकट लिया जा सकता है। हमने रिटर्न टिकट लिया मतलब बोरिवली से अंधेरी जाने का और वापस बोरिवली आने का।

    फ़िर वहीं लगे उद्घोषणा टीवी पर देखा कि ९.२१ की चर्चगेट स्लो तीन नंबर प्लेटफ़ॉर्म और ९.२५ की चर्चगेट फ़ास्ट दो नंबर प्लेटफ़ार्म पर थी। हम फ़टाफ़ट दौड़ते हुए २-३ प्लेटफ़ॉर्म पर पहुँचे और ब्रिज से ही देखा कि ९.२१ की ट्रेन तो नदारद थी लगा कि चली गई परंतु भीड़ देखकर और इंडिकेटर पर ९.२१ का समय देखकर अंदाजा लगाया  कि ट्रेन लेट है। हमें तो अंधेरी तक ही जाना था तो हम ९.२५ की लोकल में चढ़ लिये।

  सेकंड क्लॉस के डिब्बे में बहुत दिन बाद चढ़े थे, अरे लोकल में ही बहुत दिनों बाद चढ़े थे और पीक समय था पर शनिवार होने के कारण चढ़ने को मिल गया था। अंदर घुसते ही पीछे से धक्का पड़ा और आवाज आई “अंदर दबा के चलो …. ” “भाईसाहब जरा धक्का मारकर !!!”, हम हाथ में छाता और अपनी किताब कापी पकड़े भीड़ में दुबके खड़े थे, जो गेट पर खड़े थे वो हर स्टॆशन पर दरवाजे की जनता का बराबर तरीके प्रबंधन कर रहे थे, “ए कांदिवली वालों को चढ़ने दे रे, जगह दे रे…”, “ऐ मालाड चलो आओ रे, ऐ इस तरफ़ से नहीं चढ़ने का” “ चल दबाके अंदर होले…”

    फ़िर जोगेश्वरी निकला और हम भी गेट के पीछे की भीड़ में लाईन में खड़े हो लिये और आगे वाले से पूछ कर आश्वस्त हो लिये “अंधेरी….” तो उसने धीरे गर्दन “हाँ” में हिला दी, और बाहर बारिश अपने पूरे जोरों से शुरु हो चुकी थी, ऐसी बारिश मुंबई के लिये थोड़ी अच्छी नहीं होती क्योंकि मुंबई में बारिश का पानी भर जाता है।

    जैसे ही अंधेरी स्टेशन आया तो आवाज आई “ऐ चल उड़ी मार उड़ी…” और जब तक ट्रेन स्टेशन पर रुकती तब तक तो हम भी प्लेटफ़ॉर्म पर थे। बारिश पूरे जोरों पर थी, हमने एक ओर पाठक से ९.४५ पर मिलना तय किया था, अंधेरी स्टेशन के एक्सिस बैंक के ए.टी.एम. के पास, वो हैं आशुतोष तिवारी जो कि हिन्दी ब्लॉगर भी हैं उनका ब्लॉग है मेरी अनुभूतियाँ । जोरों की बारिश में हम चल दिये अपने गंतव्य की ओर।

    वहाँ जाकर ४ घंटॆ कैसे निकल गये पता ही नहीं चला, गजेन्द्र ठाकुर जो कि सी.एफ़.पी. भी हैं, उन्होंने म्यूचयल फ़ंड पर इतनी अच्छी जानकारियाँ जुटाई थीं, कि समय का पता ही नहीं चला। अब अगली मीटिंग का दिन २८ अगस्त का है जिसमें एस.आई.पी., एस.टी.पी और एस.ड्ब्ल्यू.पी. पर जानकारी साझा की जायेगी।

Friday, July 23, 2010

झाबुआ कॉलेज जाते समय दो तालाब और भी बहुत सारी यादें…. मेरे किस्से … विवेक रस्तोगी

    कॉलेज में पहले वर्ष में ही कॉलेज की हवा लग गयी, झाबुआ जी हाँ यह मध्यप्रदेश में एक आदिवासी क्षैत्र है और यहाँ के भील भिलाले बहुत प्रसिद्ध हैं। पहले भी एक पोस्ट लिखी है यहाँ चटका लगाकर देख सकते हैं “झाबुआ के भील मामा”।

    अपने कॉलेज जाते समय बीच में दो तालाब पड़ते थे, पहला तालाब तो हमारे घर के पास ही था और उसमें पानी थोड़ा कम होता था, केवल बरसात में पुरा जाता था। दूसरा तालाब हमारे कॉलेज के पास था जिसे पार करने के बाद ही कॉलेज जाया जा सकता था। बहुत ही सुन्दर दृश्य बनता था, और खासकर बारिश में तो कहने ही क्या, पुल के ऊपर एक फ़ीट पानी बहता था और कॉलेज आने जाने वाले रेलिंग के सहारे तालाब पार किया करते थे। तालाब में कमल के फ़ूल खिला करते थे कभी कोई कमल पास में खिल गया तो हम उसे ऐसे ही तोड़ लिया करते थे।

    दूर से ही तालाब का पुल दिखाई पड़ता था, वहीं दूर से ही कोई हरे,नीले रंग की स्कर्ट पहनी हुई लड़की दिखाई देती, तो साईकिल और तेज कर देते, पता है पास जाकर देखते कि भील जा रहा है, वहाँ के भील लोगों का पहनावा है यह, शाल को लँगी जैसा लपेट लेंगे और दूर से ऐसा लगेगा कि लड़की जा रही है, पास जाकर देखा तो भील मामा।

एक शेर अर्ज किया करते थे -

“दूर से देखा तो लगा हेमामालिनी बाल हिला रही है,

पास जाकर देखा तो पता चला कि भैंस पूँछ हिला रही है।”

    वहीं पास में भील कमल की जड़ याने कि कमलककड़ी वहीं से तोड़कर बेचते थे। कमल में लक्ष्मीजी रहती हैं, इसलिये हम कमल को बहुत पसंद किया करते थे, एक हमारा मित्र था नाम उसका भी कमल था, बस काला था तो हमने उसका नाम कालिया रख दिया था, और हम लोग कहते थे कमल कालिया, काला पड़ने की भी कहानी है, झाबुआ आने के पहले उसके पिताजी खरगोन में रहते थे, और खरगोन निमाड़ में आता है, कहते हैं निमाड़ की गर्मी में अच्छे अच्छे जल जाते हैं, इतनी झुलसती हुई गर्मी होती है निमाड़ में।

    कॉलेज के इस तालाब के एक किनारे शायद मंदिर था और दूसरे किनारे सर्किट हाऊस था, फ़िर थोड़े आगे जाने पर बायीं तरफ़ आदिवासी होस्टल था और फ़िर कॉलेज, कॉलेज के गेट के पहले एक रास्ता बायीं तरफ़ जाती थी जो कि गोपाल कॉलोनी का शार्टकट था और मेन रोड से बसें और अन्य परिवहन साधन रानापुर की ओर जाते थे, आगे कहाँ जाते थे वह हमें अब याद नहीं आ पा रहा है।

    कॉलेज के गेट में प्रवेश करते ही पार्किंग के लिये दो स्टेंड बने हुए थे जिसमें शेड भी लगे थे, और आगे जाने पर “शहीद चंद्रशेखर आजाद” की प्रतिमा लगी थी, और हमारे कॉलेज का नाम है “शहीद चंद्रशेखर आजाद महाविद्यालय, झाबुआ”, फ़िर कॉलेज की इमारत और पीछे की ओर बड़ा मैदान। जहाँ पर हम एन.सी.सी. की परेड किया करते थे फ़िर बाद में करवाते थे। बहुत सी यादें जुड़ी हुई हैं।

shahid chandra shekhar aazad

शहीद चंद्रशेखर आजाद को मेरा नमन

Thursday, July 22, 2010

सुरक्षित निवेश मासिक आय योजना (म्यूचयल फ़ंड) के संग (Secured Investment through MIPs [MF])

    मासिक आय योजना (म्यूचयल फ़ंड) मुख्यत: डेब्ट उत्पादों पर आधारित योजना है, जिसमें आमतौर पर कोष का ८०% तक डेब्ट उत्पादों में और बाकी का इक्विटी उत्पादों में निवेश किया जाता है।

    मासिक आय योजना (म्यूचयल फ़ंड) का मुख्य उद्देश्य निवेशकों को नियमित रुप से लाभांश के रुप में भुगतान करना होता है, हालांकि यह अनिवार्य नहीं होता है, लाभांश का वितरण फ़ंड हाउस के विवेक और वितरण योग्य धन होने पर निर्भर करता है।

निवेश के उद्देश्य -

    मासिक आय योजना (म्यूचयल फ़ंड) का मुख्य उद्देश्य निवेशकों को नियमित रुप से लाभांश प्रदान करना है जो कि ज्यादातर डेब्ट उत्पादों और एक छोटा हिस्सा इक्विटी में निवेश किया जाता है। ये मुख्यत: यील्ड ब्याज दर के डेब्ट उत्पादों (कमर्शियल पेपर्स, सर्टिफ़िकेट ऑफ़ डिपोजिट, गोवरमेंट सिक्योरिटिज और ट्रेजरी बिल्स) में निवेश करते हैं। डेब्ट उत्पाद पोर्टफ़ोलियो को स्थिरता और निरंतर वापसी की सुनिश्चितता प्रदान करते हैं, जबकि इक्विटी उत्पाद  ज्यादा वापसी के लिये सहायक होता है। मासिक आय योजना (म्यूचयल फ़ंड) बाजार से जुड़े रहते हैं (केवल उतने हिस्से के लिये जितने कि इक्विटी में निवेश है)।

जोखिम -

    पोर्टफ़ोलियो में डेब्ट उत्पादों के होने से, मासिक आय योजना (म्यूचयल फ़ंड) अर्थव्यवस्था में होने वाले ब्याज दर परिवर्तन प्रभावी होते हैं (क्योंकि अधिकतर उत्पाद डेब्ट उत्पाद होते हैं) ।

    जब अर्थव्यवस्था में ब्याज दरों में कमी आती है तब मासिक आय योजना (म्यूचयल फ़ंड) की एन.ए.वी. बड़ जाती है (बॉन्ड की कीमतों में वृद्धि के कारण)।

    और अगर ब्याज दर बढ़ती है तो मासिक आय योजना (म्यूचयल फ़ंड) की एन.ए.वी. कम हो जाती है, इस समय  तब अच्छी वापसी के लिये इस उत्पाद को इक्विटी पर निर्भर रहना पड़ता है।

    पोर्टफ़ोलियो में इक्विटी उत्पाद शामिल से : चूँकि मासिक आय योजना (म्यूचयल फ़ंड) बाजार से जुड़े हैं (जो कि आमतौर पर १५-२०% तक रहता है) । ये बैलेन्सड फ़ंड से कम जोखिम वाले होते हैं (इसमें ६०-७०% तक इक्विटी में निवेश होता है)  लेकिन शुद्ध डेब्ट फ़ंडों से थोड़ा जोखिम वाले होते हैं (शुद्ध डेब्ट फ़ंड केवल डेब्ट प्रतिभूतियों में निवेश करते हैं)।

    कोई भी सही सही भविष्यवाणी तो कर नहीं सकता कि कब शेयर बाजार और डेब्ट बाजार अपने उतार चढ़ाव पर होंगे। यह निवेशको के लिये पूँजी कटाव और लाभांश का भुगतान न होने का जोखिम पैदा करता है। अधिकांश मासिक आय योजना (म्यूचयल फ़ंड) के फ़ंड मैनेजर अतीत में कुख्यात रह चुके हैं, डेब्ट निवेश में से ३०% तक का निवेश इक्विटी बाजार में निवेश करने के बाद और बाजार का पूरा मजा लेते हैं जब बाजार अपने पूरे जलवे पर होता है, जिससे इस शेयर बाजार के चढ़ाव का फ़ायदा निवेशक को होता है और एन.ए.वी. काफ़ी बड़ जाता है, पर इसके उलट अगर उतार हो एन.ए.वी. कम हो जाता है यानि के निवेशक को नुकसान।

    निवेशक को इक्विटी पोर्टफ़ोलियो का मूल्यांकन कर लेना चाहिये और जोखिम स्वीकार्य होने के बाद ही निवेश करना चाहिये।

रिटर्न - मासिक आय योजना (म्यूचयल फ़ंड) सीमित अस्थिरता के साथ  स्थिर रिटर्न देता है, पिछले तीन वर्षों में, अधिकतर मासिक आय योजना (म्यूचयल फ़ंड) ने १२-१३% का औसत रिटर्न दिया है।

अवधि - मासिक आय योजना (म्यूचयल फ़ंड) को कम से कम ३-५ वर्ष के लिये निवेश करना चाहिये।

कर कितना लगेगा - मासिक आय योजना (म्यूचयल फ़ंड) डेब्ट फ़ंड है, पर लाभांश पर लाभांश वितरण कर (१२.८६७%) है।

    अगर एक वर्ष के पहले फ़ंड की यूनिट बेचते हैं और उस पर अगर कुछ लाभ है तो उस पर शार्ट टर्म कैपिटल गैन कर लागू होता है, शुद्ध लाभ को आपकी करयोग्य आय में जोड़ दिया जायेगा और जो भी व्यक्तिगत आयकर की स्लैब लागू होगी। और अगर एक वर्ष के बाद बेचते हैं, और लाभ होता है तो लांग टर्म कैपिटल गैन कर लगेगा जो कि १०% होता है (इंडेक्सेशन के बिना) और २०% इंडेक्सेशन लाभ के साथ, जो भी कम हो।

निवेश किसे करना चाहिये -

    ज्यादा जोखिम न उठाने वाले निवेशक जो कि बैंक सावधि जमा से ज्यादा अच्छे और सुरक्षित रिटर्न चाहते हैं, उनके लिये मासिक आय योजना (म्यूचयल फ़ंड) अच्छा विकल्प है। हालांकि मासिक रिटर्न की गारंटी नहीं है, स्थिर आय के लिये बैंक के जैसे नहीं है।

स्कीम नाम एन.ए.वी. १ वर्ष के रिटर्न ५ वर्ष के रिटर्न
HDFC MIP Long Term 21.997 14.6 13
Reliance MIP 20.947 14.6 12.9
Canara Robeco 28.43 10.4 13.7

NAV as on 22 July 2010

मासिक आय योजना (म्यूचयल फ़ंड) के विकल्प -

    मासिक आय योजना (म्यूचयल फ़ंड) के विकल्प हैं बैंक की सावधि जमा योजना, पोस्ट ऑफ़िस एम.आई.पी., फ़िक्स्ड मैच्योरिटी प्लान्स।

निष्कर्ष -

    मासिक आय योजना (म्यूचयल फ़ंड) आपको हर माह निश्चित राशि नहीं मिलती है। हर मासिक लाभांश ब्याज दर के उतार चढ़ाव और बाजार के उतार-चढ़ाव पर निर्भर रहता है। लेकिन मासिक आय योजना (म्यूचयल फ़ंड) “नियमित आय उत्पाद” की श्रेणी में सबसे ज्यादा रिटर्न देने के कारण सबसे अच्छॆ हैं और कर में भी।

    नियमित आय के लिए म्युचुअल फंड की एमआइपी पर या किसी एक ही उत्पाद पर ही निर्भर नहीं होना चाहिये । अपने निवेशों को हमेशा अलग अलग जगह करना चाहिये जिससे हानि कम से कम हो।

Wednesday, July 21, 2010

सिगरेट का असली नशा तो धुआँ अंदर लेने पर ही होता है, और असली नुक्सान भी। …. अपने किस्से … विवेक रस्तोगी

    कॉलेज के मेनगेट पर शटर के पास बैठकर दो विल्स मुँह में दबाई और चपरासी काका से शिप माचिस ली फ़िर उसमें से एक तीली निकाली और आग लगाने के लिये जैसे ही माचिस पर घर्षण करने वाले थे कि प्रिंसिपल सर आते दिखे, चुपचाप माचिस साईड में रखी, दोनों विल्स सिगरेट एक हाथ में पीछे दबाई और प्रिंसिपल सर जैसे ही पास आये दूसरे हाथ से झुककर चरण स्पर्श किये, और प्रिंसिपल सर अंदर अपने रुम में चले गये।

    फ़िर वापिस से दोनों विल्स मुँह में और माचिस की तीली घर्षण के लिये अग्रसर, और एक सर्र की आवाज से तीली जली और मुँह में लगी दोनों विल्स सिगरेट में जोर से अंदर कश मारा, जिससे दोनों विल्स सिगरेट एक बार में ही जल ली।

    एक विल्स सिगरेट अपने दोस्त को दी और दूसरी अपने मुँह में दबाये कश खींचे जा रहे थे, तब सिगरेट पीनी तो आती नहीं थी, बस झांकीबाजी करते थे, मुँह में धुआँ लेकर नाक से निकालने को ही सिगरेट पीना समझते थे।

हमारे एक सीनियर आये जो कि अच्छॆ मित्र भी थे, बोले “ऐ क्यों सिगरेट खराब कर रहे हो”

हम बोले “क्यों”

सीनियर बोले “बताओ हम बताते हैं कि सिगरेट कैसे पीते हैं”

    और उन्होंने हमारे हाथ से सिगरेट ली और कश अंदर खींचा और धुएँ का तो अता पता ही नहीं था बोले धुआँ पेट में अंदर तक लो तभी तो नशे का मजा आयेगा। फ़िर थोड़ी देर बाद अपने पेट में से पता नहीं कैसे पूरा धुआँ मुँह से बाहर निकाला। हम तो देखकर ही दंग रह गये, कि ऐसा भी होता है।

सीनियर बोले “अब ऐसा करके बताओ”

हम बोले “लाओ, हम भी करके देखते हैं”

    फ़िर जो सुट्टा मारा तो जो खाँसे कि बस आँखें लाल और आँखों से पानी बाहर, सिगरेट पीने का अभ्यास बहुत ही महँगा सा लग रहा था। पर माने नहीं, केवल दो दिन की सिगरेट प्रेक्टिस के बाद उस्तादी हो गई।

    साथ ही हमें सीनियर ने बताया कि सिगरेट का असली नशा तो धुआँ अंदर लेने पर ही होता है, और असली नुक्सान भी।

तुम कहाँ कहाँ से आती हो …. मेरी कविता …… विवेक रस्तोगी

तुम कहाँ कहाँ से आती हो

कभी मेरे लेपटॉप के कीबोर्ड से

कभी मेरे उदात्त्त मन से

कभी दुखभरे दिल से

कभी उमंग भरे मन से

कभी मेरी अलमारी के अंदर से

कभी मेरे तकिये के नीचे से

कभी मेरे बेटे के जबां से

कभी बारिश की बूँदों से

कभी ठंडे पानी से नहाते हुए

कभी सोते समय कभी उठते समय

कभी डोर से उतरती हुई

कभी डोर से चढ़ती हुई

पर जब तुम आती हो

तो ऐ “कविता”

सबके होश उड़ाती आती हो।

Tuesday, July 20, 2010

चांसलर सिगरेट के कसैलेपन से विल्स तक का सफ़र और ऐश की परिभाषा…

    चांसलर सिगरेट लेकर टेकरी के पीछे छुपते हुए दोनों साईकिल से जाते थे…… किसी पहाड़ी में छिपकर रोज वो चांसलर सिगरेट जो गहरे चाकलेटी रंग की होती थी…थोड़ी मीठी सी लगती थी … पर दो-चार कश लेने के बाद फ़िर कड़वी लगने लगती थी… क्यों वो बाद में पता चला .. सिगरेट तो पीनी आती नहीं थी ….. पहले कश में ही सिगरेट का फ़िल्टर अपनी जीभ से गीला कर देते थे और फ़िर वो कसैलापन मुँह में चढ़ता ही जाता ।

    सिगरेट के जलते हुए सिरे को देखते हुए उस सिगरेट को खत्म होते देखते थे… सिगरेट का धुआँ और उसकी तपन शुरु में असहनीय होती थी… बाद में पता चला कि जब सिगरेट जलती है और जो आग उस सिगरेट को ऐश में बदलती है उसका तापमान १०० डिग्री होता है… पहली बार हमारे भौतिकी विज्ञान के प्रोफ़ेसर ने बताया था कि इसे ऐश कहते हैं…

    हम तब तक जिंदगी के मजे लेने को ही ऐश समझते थे, पर उस दिन हमें असलई ऐश समझ आई कि सिगरेट की राख जो कि जिंदगी को भी राख बना देती है, उसे ऐश कहते हैं… पता था कि ऐश करना अच्छी बात नहीं है… परंतु बहुत देर बाद समझ में आई ये बात…

    एक मित्र था कालिया कहता था कि किसी भी नये शहर में जाओ तो सिगरेट और दारु से दांत काटे मित्र बड़ी ही आसानी से बन जाते हैं, किसी भी पान की गुमटी को अपना अडडा बना लो और फ़िर देखो …. जब शहर बदला तो यही फ़ार्मुला अपनाया और चांसलर छोड़ विल्स के साथ बहुत से दोस्त बनाये…

    अब लगता है वो ऐश खत्म होने से अच्छी दोस्ती खत्म हो गई, लोग आपस में बात करने के लिये समय नहीं निकाल पाते… कम से कम ऐश करते समय आपस में पाँच मिनिट बतिया तो लेते हैं…

पर क्या करे हम ऐश करना छोड़ चुके हैं…. पर वो चांसलर का कसैलापन अभी भी याद है…

नई सुबह का इंतजार है ….. मेरी कविता …… विवेक रस्तोगी

नई सुबह का इंतजार है

जो मेरे जीवन को महका देगी

जो मेरे मन को लहका देगी

नई परिभाषा होगी

नयापन सा होगा

हिम्मत से सारोबार होगा

नवचेतन मन नये आयाम

नई पृथ्वी नई हवा

सब कुछ अलग होगा

और मैं भी कुछ नया सा !!!

Monday, July 19, 2010

हमारे घर में नया मेहमान आया है… :) :D

    आज शाम को हमारे घर में एक नया मेहमान आया है, बिटिया आई है, मेरे छोटे भाई शलभ को आज बिटिया की प्राप्ति हुई, बहु दिल्ली में ही थी और भाई शाम की फ़्लाईट पकड़ कर दिल्ली पहुँचा है।

    कितना रोमांचकारी पल होता है पिता बनने का, उससे बात करने से ही पता चल रहा था, जब बिटिया इस दुनिया में आई तो हमारा भाई फ़्लाईट में था, तो हमने तुरंत एक एस.एम.एस. कर दिया … [Congrats Dad !! bitiya ghar me aayi hai, khushiya lai hai :)]

    जब भाई के प्लेन दिल्ली में उतर गया तो जैसे ही मोबाईल खोला हमारा एस.एम.एस. मिलने से उसे पता चला और तब तक तो हम लगभग सभी अपने परिचितों को एस.एम.एस. या फ़ोन कर चुके थे।

    घर पर बात हुई तो मम्मी बोली कि अब तो ताऊ बन गये हो, और घर में बिटिया आई है, अब घर में रक्षाबंधन का त्यौहार भी मना करेगा। हम खुशी के मारे कुछ बोल ही नहीं पा रहे थे। बहुत ही सुन्दरतम एहसास होता है घर में नये मेहमान आने का और वो भी प्यारी बिटिया रानी के आने का।

Sunday, July 18, 2010

गपोड़ी बेटेलाल की गप्प के किस्से १८०७२०१०

शाम को पार्क में घुमाने ले गये तो बेटे की गप्पे सुनिये -

हमारे स्कूल में रोज कराटॆ करवाते हैं और कराटे करवाते हुए २ किमी दौड़ते हैं।

मैंने पूछा और कराटॆ मॆं फ़र्स्ट कौन आता है, तो बोले “कराटे में नहीं दौड़ में, हमेशा मैं फ़र्स्ट आता हूँ, और हमारे सर इतना तेज दौड़ते हैं, तब भी मेरे पीछे रह जाते हैं”

“फ़िर दौड़ ४० किमी की हो जाती है और ४० किमी की दौड़ खत्म होते ही ७० किमी की हो जाती है, फ़िर नदी आ जाती है, तो सर कहते हैं कि उड़ के पार कर लो”

मैंने पूछा “उड़के !”

तो बेटेलाल बोले “हाँ सर कहते हैं कि दोनों हाथों को पंख बनाकर उड़ाते हैं, और पैर से किक मारते हैं, तो उड़ने लगते हैं”

आज से गपोड़ी किस्से शुरु किये हैं। जिससे बचपन के किस्से जो हम भूल जाते हैं, वो लिखित में हमेशा मेरी पास यादें बनकर मेरे पास और आपके पास रहें।

INR Logo  ॓यह रुपये का नया रुप है क्या दिखाई देता है। हमने INR Font डाऊनलोड किया है। अगर यहाँ नहीं दिखाई दे तो चित्र लगा देते हैं।

पॉवर-पैक जींस जिसकी जेब में 220 वोल्ट बिजली दौडती है

सोचिये अगर कोई जेबकतरा आपकी जींस की जेब में आपका पर्स निकालने के लिये हाथ डालता है तो उसे 22o वोल्ट का बिजली का झटका लगता है, जी हाँ यह विशेष जींस तैयार की है वाराणसी के हाईस्कूल फ़ेल नौजवान ने, जो कि विज्ञान के सामान्य सिद्धांत पर आधारित है।

जींस को तैयार किया है श्याम चौरसिया ने जो कि वाराणसी उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। यही नहीं वे कहते हैं कि अगर उनके अनुसार थोड़े से सुधार और किये जायें तो आपके सारे कपड़े ही “पॉवर-पैक” हो जायेंगे।

जिस भी कपड़े को “पॉवर-पैक” करना हो उसमें एक छोटी सी बैटरी से चलने वाली किट लगानी होगी।

श्याम चौरसिया का कहना है कि “जब मैंने यह तैयार की थी तो केवल जेबकतरों को ही ध्यान में रखा था, पर अगर इसे लड़्कियों की टी शर्ट और कपड़ों में भी लगा दें तो छेड़खानी के मामले रुक सकते हैं।”

अब अगर आपको लगता हो कि ये बैटरी से चलने वाला अविष्कार महँगा होगा, तो नहीं बिल्कुल नहीं केवल तीन सौ रुपये खर्च करने होंगे और अगर और उन्नत तकनीक चाहिये तो १०० रुपये ज्यादा खर्च करना होंगे।

ज्यादा जानकारी यहाँ पढ़ सकते हैं।

मेरे स्वप्न में, वही नदी क्यों आती है…. मेरी कविता …. विवेक रस्तोगी

बारबार मेरे स्वप्न में

वही नदी क्यों आती है

जो मुझे बुलाती है

कहती है कि आओ जैसे तुम पहले

मेरे पास आकर बैठते थे

वैसे ही पाँव डालकर बैठो,

अब तो तुम

समुंदर के पास हो

है बहुत विशाल

पर मुझे बताओ

कि कितनी बार उसने तुम्हें

अपने पास बैठने दिया

जैसे मैंने ??

क्योंकि शब्दों से मेरा जीवन जीवन्त है …. मेरी कविता … विवेक रस्तोगी

शब्दों से मेरा जीवन जीवन्त है

नहीं तो सुनसान रात्रि के

शमशान की सन्नाटे की गूँज है

सन्नाटे की सांय सांय में

जीवन भी कहीं सो चुका है

शमशान जाने को समय है

पूरी जिंदगी मौत से डरते हैं

शमशान जाने से डरते हैं

पर एक दिन मौत के बाद

सबको वहीं उसी सन्नाटे में

जाना होता है,

जहाँ रात को सांय सांय

हवा अपना रुख बदलती है

जहाँ रात को उल्लू भी

डरते हैं,

जहाँ पेड़ों पर भी

नीरवता रहती है

मैं जाता हूँ तो मुझे

मेरे शब्द जीवित कर देते हैं

क्योंकि शब्दों से मेरा जीवन जीवन्त है।

Saturday, July 17, 2010

फ़िर भी मेरी सुबह और दिन भागते हुए शुरु होते हैं…..मेरी कविता … विवेक रस्तोगी

रोज सुबह भागते हुए

दिन शुरु होता है,

पर सुबह तटस्थ रहती है,

सुबह अपनी ठंडी हवा,

पंछियों की चहचहाट,

मंदिर की घंटियाँ,

मेरे खिड़्की के जंगले से आती भीनी भीनी

फ़ूलों की खुश्बु,

सब कुछ तो ताजा होता है

फ़िर भी मेरी सुबह और दिन

भागते हुए शुरु होते हैं।

Friday, July 16, 2010

तुम इतने भयानक क्यों थे..! … मेरी कविता … विवेक रस्तोगी

सिसकती खिड़्कियाँ

चिल्लाते दरवाजे

विलाप करते रोशनदान

चीखते हुए परदे

सब तुम्हारी याद दिलाते हैं

मेरे अतीत

तुम इतने भयानक क्यों थे !

कुछ है क्या मेरे लिये ? मेरे आने से पहले …… मेरी कविता ….. विवेक रस्तोगी

कुछ है क्या मेरे लिये ?

या सब पहले ही खर्च हो चुका है

मेरे आने से पहले,

कुछ है क्या करने के लिये ?

या सब पहले ही हो चुका है

मेरे आने से पहले,

कुछ है क्या कहने के लिये ?

या सब पहले ही कह चुके हैं

मेरे आने से पहले,

कुछ है क्या सुनने के लिये ?

या सब पहले ही सुन चुके हैं

मेरे आने से से पहले,

हमेशा जिंदगी में सब कुछ,

मेरे आने से पहले ही क्यों हो जाता है,

और जो मैं करता हूँ, वह

बाद मैं सोचता हूँ क्या मैं इसे ऐसा कर सकता था ?

बस सोचता हूँ कि सब पहले ही क्यों हो चुका होता है

मेरे आने से पहले ?

Monday, July 12, 2010

क्या आपको हिन्दी वर्णमाला आती है ? [ Do you know Hindi Alphabets]

जब से मेरा बेटा पढ़ना सीख रहा है, मुझे भी वापस पूरी हिन्दी वर्णमाला याद हो गई है।

अ आ इ ई उ ऊ ऋ ए ऐ ओ औ अं अ:

क ख ग घ ङ

च छ ज झ ञ

ट ठ ड़ ढ ण

त थ द ध न

प फ़ ब भ म

य र ल व स श ष ह

क्ष त्र ज्ञ

हमने याद किया कि हमें आखिरी बार वर्णमाला कब याद थी, तो याद आया कि स्नातकोत्तर संस्कृत में हमने यह पढ़ा था, पर किसी कारणवश हम उपाधि नहीं ले पाये थे। फ़िर अपने मोबाईल पर वर्णमाला मिली, पर उस समय हमें वर्ग याद रहता था, फ़िर बाद में वर्ग भी भूल जाते थे।

और सुधिजन विद्वान बतायें कि क्या यह हिन्दी वर्णमाला पूर्ण है, क्योंकि आजकल कुछ नये शब्द इसमें जोड़े जा रहे हैं, जो कि मुझे पच नहीं रहे हैं।

जैसे कि - ड़, ढ़, श्र

आप बताईये क्या आपको हिन्दी वर्णमाला आती है ?

Sunday, July 11, 2010

स्विप या सिप में क्या सारा पैसा एक ही फ़ंड में लगाना उचित है ? (Investment should be in 1 fund ?? in SIP or SWP)

    पिछली पोस्ट [स्विप (SWP) क्या है, और ये कैसे सेवानिवृत्ति के बाद के लिये अच्छा उत्पाद है ? (What is Systematic Withdraw Plan)] पर डॉ. महेश सिन्हा जी ने सवाल किया था, क्या सारा पैसा एक ही फ़ंड में लगाना उचित है।

    मेरा जबाब है नहीं, अगर सारा पैसा एक ही फ़ंड में लगा दिया और वो अपना प्रदर्शन नहीं कर पाया फ़िर आपके भविष्य का क्या ?

    आपका पैसा कम से कम ५ म्यूचुयल फ़ंडों में निवेशित होना चाहिये, जिसमें लार्जकैप डाईवर्सिफ़ाईड फ़ंड, बैलेन्स्ड फ़ंड,स्माल एवं मिडकैप फ़ंड सबमें आपका निवेश होना चाहिये। हाँ आज से ५ वर्ष पहले तक ज्यादा तरीके के म्यूच्यल फ़ंड उपलब्ध नहीं थे, परंतु अब तो जैसा म्यूच्यल फ़ंड चाहिये वैसा मिलता है।

    हम पिछले १ वर्ष के रिटर्न की गणना करें स्विप की तो पायेंगे - निवेश तिथि ९ जुलाई २००९ निवेशित रकम १,००,००० रुपये, जिसमें आप अपनी निवेशित रकम में से १२,००० रुपये १२ महीने में निकाल भी चुके हैं, और आज मूल रकम ८८ हजार रुपये है।

कुछ लार्जकैप म्यूचयल फ़ंड -

फ़ंड का नाम वर्तमान रकम वापसी
रिलायंस ग्रोथ - ग्रोथ 1,33,234.41 51.4%
रिलायंस विजन - ग्रोथ 1,26,728.40 44.1%
एच.डी.एफ़.सी. टॉप २०० 1,25,214.84 42.29%
डी.एस.पी. ब्लेकरॉक टॉप १०० 1,18,900.61 35.11%

कुछ बैलेन्स्ड म्यूचयल फ़ंड -

फ़ंड का नाम वर्तमान रकम वापसी
डी.एस.पी. ब्लेकरॉक बेलेन्स्ड फ़ंड - ग्रोथ 1,21,010.33 37.51%
बड़ौदा पायोनियर बैलेन्स्ड 1,06,911.12 21.49%
केनरा रोबेको बेलेन्स 1,20,934.93 37.43%
एच.डी.एफ़.सी.बेलेन्स्ड फ़ंड 1,30,369.77 48.15%

कुछ स्मॉल मिडकैप फ़ंड -

फ़ंड का नाम वर्तमान रकम वापसी
डी.एस.पी. ब्लेकरॉक 1,58,195.10 79.77%
एच.एस.बी.सी. मिडकैप 1,34,062.97 52.34%
आई.डी.एफ़.सी. 1,40,779.75% 59.98%
डी.एस.पी. ब्लेकरॉक माइक्रो कैप फ़ंड 1,77,672.85 101.9%

    जो म्यूचयल फ़ंड आज अच्छा प्रदर्शन कर रहा है इसका मतलब यह नहीं है कि भविष्य में भी अच्छा प्रदर्शन करेगा, इसके लिये बाजार का ज्ञान होना भी बहुत जरुरी है।

    म्यूच्यल फ़ंड हमेशा अपने वित्तीय सलाहकार से सलाह करके ही खरीदें, आप ऊपर दी गई तालिका में देख सकते हैं, एक गलत निर्णय और आपके निवेश का सत्यानाश, बहुत सारे फ़ंड ऐसे भी हैं जो प्रदर्शन नहीं कर पाये, इससे बेहतर है कि अपने वित्तीय सलाहकार को शुल्क देकर सलाह लेना, तो आप अपने निवेश का बेहतर प्रदर्शन पा सकते हैं।

Saturday, July 10, 2010

स्विप (SWP) क्या है, और ये कैसे सेवानिवृत्ति के बाद के लिये अच्छा उत्पाद है ? (What is Systematic Withdraw Plan)

    स्विप (SWP - Systematic Withdraw Plan) ऐसी योजना है जो कि निवेशक अपने म्यूचयल फ़ंड में से कुछ पैसा नियमित अंतराल से निवेश में से निकालने देती है। निकाला गया पैसा किसी ओर योजना में निवेश किया जा सकता है या फ़िर कुछ ओर खर्चों के लिये इसका उपयोग कर सकते हैं। साधारणतया: स्विप को सेवानिवृत्ति के बाद होने वाले नियमित खर्चों को पूरा करने के लिये अच्छे से उपयोग किया जा सकता है।

    स्विप से नियमित अंतराल के बाद कुछ नियत राशि या फ़िर variable राशि निकाल सकते हैं। निकासी स्विप से मासिक, तिमाही, छ:माही या वार्षिक कर सकते हैं। इस योजना में समय अंतराल निवेशक को अपनी जरुरत और प्रतिबद्धताओं के अनुसार चुनना चाहिये।

    साधारणतया: स्विप में कई लाभ हैं, यह आपके निवेश से एक नियमित समय अंतराल के बाद आपको आपकी चाही गई रकम तो देते ही हैं, साथ में आपकी मूल निवेश की गई रकम सीधे बाजार में निवेश रहती है, तो निवेश पर वापसी बहुत अच्छी होने की उम्मीद होती है, आपका मूल निवेश मुद्रास्फ़ीति से भी दो-दो हाथ करता रहता है और स्विप आपका भविष्य सुरक्षित करने में मददगार साबित होता है।

    स्विप में आप शेयर बाजार के उतार चढ़ाव को भी झेल सकते हैं। नियमित अंतराल के बाद रकम निकासी से औसत मूल्य अच्छा मिलता है और निवेशक बाजार के उतार चढ़ाव का आनंद ले सकता है।

स्विप कैसे कार्य करती है - (How SWP working ?)

    स्विप म्यूचयल फ़ंड में ही एक योजना है, जिसमें नियमित अंतराल के बाद यह आपको अपने निवेश में से कुछ रकम निकासी की सुविधा देती है।

    अब म्यूचयल फ़ंड खरीदते हैं, तो उसे स्विप में ले सकते हैं, जिसमें आपको बताना होता है कि कितना रुपया हर महीने/तिमाही में कौन सी तारीख को चाहिये। जिस दिन म्यूचयल फ़ंड खरीदा जाता है, उस दिन की एन.ए.वी. से आपको आपके निवेश की यूनिट मिल जाती हैं। और फ़िर अगले महीने से आपकी चाही गई रकम उन यूनिटों में से बेचकर आपको दे दी जाती हैं। इससे फ़ायदा यह है कि अगर लंबी अवधि में देखें तो हम बाजार के उतार चढ़ाव बहुत ज्यादा पायेंगे और ये उनसे लड़ने में सक्षम हैं।

    एक उदाहरण देखते हैं - एक व्यक्ति वर्ष २००२ में सेवानिवृत्त हुए, उन्होंने वित्तीय विशेषज्ञ की सेवाएँ ली और अपनी सेवानिवृत्ति राशि का २० लाख रुपया स्विप में लगाने का निर्णय लिया। और उन्होंने ९ जुलाई २००२ को रिलायंस ग्रोथ ग्रोथ म्यूचयल फ़ंड लिया। ९ जुलाई २००२ की एन.ए.वी. ३१.१८५ रुपये थी, और उन्हें ६४,१३३.३९७५ यूनिट मिलीं।

    अब हर माह उन्हें शुरु की २ तारीख को ही २०,००० रुपये मिल जाते थे, और उन्होंने उसे आज तक जारी रखा है, जैसा कि आप सभी ने देखा है कि इन पिछले आठ वर्षों में बाजार ने अपने कई उतार चढ़ाव देखें हैं और कई बने हैं और कई बर्बाद हुए हैं, आज अगर उनके फ़ंड की उन्नति को देखा जाये तो आप पायेंगे कि पिछले आठ वर्षों में उन्होंने स्विप से १९.२० लाख रुपये तो निकाले ही हैं और आज उनके पास ४५,५७७.८७९२ यूनिट उपलब्ध हैं जिसकी एन.ए.वी.  ४५९.८४६८ है, और कुल निवेश की राशि आज हो गई है २ करोड़ से भी ज्यादा जी हाँ बिल्कुल सही पढ़ा आपने उनकी आज की रकम है २,०५,६९,६०२.२५ रुपये। जी २५,६१२% की वापसी।

    दूसरा उदाहरण देखिये - एक और व्यक्ति थे उन्होंने अपने राशि बैंक में मासिक आय योजना में रखी थी, और उन्हें ब्याज उस समय मिला लगभग १२% पर आज उनकी मूल राशि तो २० लाख रुपये ही है, जो कि आज की मुद्रास्फ़ीति से लड़ने में असक्षम है।

इस तालिका में देखिये -

निवेश योजना दिनांक रकम आहरित रकम वर्तमान राशि
रिलायंस ग्रोथ - ग्रोथ म्यूचयल फ़ंड स्विप योजना ९ जुलाई २००२ २०,००,००० १९,२०,००० २,०५,६९,६०२.२५
ग्रोथ - २५,६१२%
बैंक में सावधि जमा मासिक आय योजना ९ जुलाई २००२ २०,००,००० १९,२०,०० २०,००,०००
ग्रोथ - ० %

तो अब आप ही समझ सकते हैं कि निवेश में किसका निर्णय सही था।

    कर कितना देना पड़ता है - (Income Tax !!!)

    अभी तक कर का प्रावधान इस प्रकार था -

    पहले वर्ष शार्ट टर्म कैपिटल गैन टैक्स देना होता था, जितनी यूनिट आपकी बाजार में बिकी हैं, उस हर यूनिट पर होने वाले फ़ायदे पर और एक वर्ष के बाद लांग टर्म कैपिटल गैन टैक्स से मुक्त था, पर इंडेक्सेशन से कर लगता था।

    अब नये कर प्रस्ताव में लांग टर्म कैपिटल गैन टैक्स की फ़िर से बहाली की गई है, जिसमें निवेशक को अब हर यूनिट पर होने वाले फ़ायदे पर अब एक वर्ष की अवधि के बाद भी कर देना होगा और इंडेक्सेशन के ऊपर भी कर देय होगा।

    इतने कर देने के बाबजूद भी यह योजना बहुत ही अच्छी है, जोखिमपूर्ण भी है। पर इसकी वापसी की तुलना किसी और वित्तीय उत्पाद से करना बहुत ही मुश्किल है।

वित्तीय विशेषज्ञ की सेवाएँ - ( Services of Financial Planner !!!)

    मेरी राय है कि जब आप बाजार आधारित कोई भी उत्पाद खरीदते हैं, और अगर खुद विशेषज्ञ नहीं हैं तो वित्तीय विशेषज्ञ की समय समय पर सेवाएँ जरुर लें जो आपके धन को सुरक्षित रखने में आपकी मदद करेगा।

    जैसे पहले उदाहरण में वित्तीय विशेषज्ञ की सेवाएँ केवल निवेश के समय ही ली गईं, अगर नियमित रुप से लेते, तो यही रकम लगभग ४ करोड़ हो गई होती। वित्तीय विशेषज्ञ अपनी सेवाओं के लिये कुछ मामुली सा शुल्क लेते हैं परंतु हमें वह शुल्क ज्यादा लगता है, अगर थोड़ा सा शुल्क देकर आपको अपने निवेश से ज्यादा बेहतर वापसी मिल रही है तो हर्ज ही क्या है।

ये भी पढ़ें -

सेवानिवृत्त हो रहे हैं ? सेवानिवृत्ति का धन, कैसे और कहाँ निवेश करें …. जिससे भविष्य अनिश्चिंत न हो.. ? (Getting Retired, Where to Invest the amount for good returns after retirement)

निवेश के लिये ज्यादा जानकारी पढें

Friday, July 09, 2010

मुंबई में हवस, हो सकता है कि गलती लड़्की की ही हो।

सीन १ - ऑफ़िस से निकलते हुए

    ऑफ़िस से निकले, गलियारे से होते हुए पैसेज में आये, वहाँ चार लिफ़्ट हैं बड़ी बड़ी, २५ लोग तो आराम से आ जायें इतनी बड़ी, पर हम साधारणतया: आते जाते समय सीढ़ियों का ही इस्तेमाल करते हैं, जिससे मन को शांति रहती है कि चलो कुछ तो व्यायाम हो गया। जैसे ही पैसेज में पहुँचे तो एक लिफ़्ट का इंडिकेटर नीचे जाने का इशारा कर रहा था, और हम लिफ़्ट के लोभ में उसमें सवार हो लिये।

    लिफ़्ट से नीचे जाते समय एक सुविधा होती है कि कोई न कोई पहले से रहता है तो ग्राऊँड फ़्लोर का बटन नहीं दबाना पड़ता है, जबकि इसके उलट ऊपर जाना हो तो बटन दबा है या नहीं अपने फ़्लोर का ध्यान रखना पड़ता है।

    जैसे ही लिफ़्ट में पहुँचे तो देखा कि एक लड़की पहले से थी, मोबाईल हाथ में और मोबाईल का हेंड्स फ़्री कान में लगा हुआ, किसी गाने का आनंद उठा रही थी, हमने एक नजर देखा और लिफ़्ट के कांच में अपने को निहारने लगे कि कितने मोटे हो गये हैं, बाल बराबर हैं या नहीं, तो ध्यान दिया कि वो लड़की टकाटक हमारी ओर देखे जा रही थी, बस हमें शरम आ गई, वैसे ये कोई विशेष बात नहीं है, विपरीत लिंगी आकर्षण में सब देखते हैं।

    पर मुंबई में लोगों की नजरें बहुत खराब होती हैं, आप नजर से पहचान सकते हैं कि साधारण तरीके से देख रहा है या हवस की नजर से, कोई भी कैसा भी हो बस हवस का शिकार होता है, फ़िर भले ही वो नजर की हवस हो या मन को तृप्त करने की।

सीन २ - बस को पकड़ने की जद्दोजहद

    हम सबकुछ भूलकर ऑटो लेने निकल पड़े, तो बस स्टॉप से होकर गुजरे थोड़ा आगे सिग्नल है लिंक रोड का, जिस पर शाम के समय लम्बा ट्राफ़िक रहता है, बसें एक के पीछे एक लगी रहती हैं, एक बस स्टॉप पर नहीं रुकी और एक लड़का और एक लड़की उस बस के पीछे दौड़ने लगे, क्योंकि आगे सिग्नल था और बस की गति कम थी और जैसे तैसे बस में सवार हो लिये, लड़के और लड़की ने जमकर सुनाई कंडक्टर को, इतने मॆं उसके पीछे वाली बस से एक लड़की उतरी और आगे वाली बस में चढ़ने की कोशिश में दौड़ने लगी, परंतु जब तक चढ़ पाती सिग्नल हरा हो गया और बस की गति तेज हो गई और इस चक्कर में वह चढ़ नहीं पाई।

    उसके बाद उसने बस न पकड़ पाने और अपनी नादानी में पहले तो अपना पैर पटका और फ़िर एक हाथ की हथेली पर दूसरे हाथ से मुक्का बनाकर बस न पकड़ पाने की असफ़लता प्रदर्शित की, जब उसे ध्यान आया कि वह सड़क पर यह कर रही है तो सकपकाकर आसपास देखा तो पाया कि हम उसकी गतिविधियों को देख रहे हैं, तो मुस्करा उठी और हम भी।

सीन ३ - हो सकता है कि गलती लड़्की की ही हो।

    ऑटो में घर जा रहे थे कि एस.वी.रोड मलाड पर एक नजारा देखा, मोटर साइकिल पर एक लड़का बैठा था और एक लड़की उसके पास में खड़ी थी, लड़के ने लड़की की सूट की कॉलर पकड़ रखी थी और दूसरे हाथ से घूँसा दिखा रखा था।

    तो ऑटो वाला बोला कि इस लड़के को लोग अभी जम कर पिटेंगे तभी इसको समझ में आयेगा। तो मैं बोला कि तुम ये क्यों सोचते हो कि लड़के की गलती होगी हो सकता है कि लड़की सड़क पर बीच में चल रही होगी और लड़का बाईक से गिरते हुए या उसकी दुर्घटना होने से बच गया होगा, इसलिये गुस्सा हो रहा होगा। ऑटो वाला बोला परंतु ऐसा थोड़े ही होता है।

    मैंने उसको बोला कि स्कूटर और ट्रक की टक्कर में लोग बेचारे ट्रक वाले को ही मारते हैं, क्यों क्योंकि स्कूटर छोटी गाड़ी है, पर गलती तो स्कूटर की भी हो सकती है ना !! तो बोलता है कि हाँ साहब बराबर बोलते हैं। हो सकता है कि गलती लड़्की की ही हो।

अब चेक पर अगर काटापिटी हुई तो बैंकें चेक नहीं लेंगी।

    यह समाचार शायद सब ने हाल ही में अखबारों में पढ़ा होगा कि बैंकें काटापिटी वाले चेक नहीं लेंगी, पर क्या आपको पता है यह केवल दिल्ली के लिये है, जहाँ कि क्लियरिंग के लिये चेक ट्रंकेशन सिस्टम (CTS) लागू किया गया है, और अभी यह केवल दिल्ली में ही लागू है अब आगामी दिनों में CTS चैन्नई में शुरु होने वाला है, फ़िर यह नियम चैन्नई के लिये भी लागू होगा।

    और किसी शहर में अगर आपको कोई परेशान करे फ़िर वह वित्तीय संस्थान ही क्यों न हो, आप बैंकिग ओम्बड्समैन से शिकायत कर सकते हैं, क्योंकि यह नियम अभी केवल और केवल दिल्ली के लिये है, और जल्दी ही केवल चैन्नई के लिये।

बैंकों के बारे में ज्यादा जानकारी के लिये मेरे ब्लॉग पर जाने के लिये यहाँ चटका लगाईये।

Thursday, July 08, 2010

९वीं कक्षा में चुंबन, 7 वर्ष के भतीजे के दोस्त की गर्लफ़्रेंड [kiss in 9th Class, Grilfriend of 7 year old boy]

    आज सुबह दिन की शुरुआत कोई खास नहीं थी पर फ़िर भी कुछ लम्हें लिखना चाहूँगा, सुबह ऑफ़िस के लिये घर से निकले तो बहुत तेज बारिश शुरु हो गई, और हम ऑटो लेकर निकल पड़े ऑफ़िस की ओर। रास्ते में याद आ गई पुरानी कुछ बातें जो कि एक साथी के साथ हमने की थीं। समाज मॆं दो चीजों के बारे में खुलकर बात नहीं की जाती है, एक है पैसा और दूसरा है काम (Sex), हम थोड़ी बहुत कोशिश कर रहे हैं कि पैसे के बारे में खुलकर बातें हों जैसे कि और विषयों पर होती है, एक बार हमने अपने एक साथी के साथ “काम” के ऊपर भी खुलकर बात करने की कोशिश की।

हमने सीधे पूछा कि “तुम्हारी कोई गर्लफ़्रेंड है”,

मित्र बोला “नहीं आजकल तो कोई नहीं है, पर पहले ९ रह चुकी हैं।”

मैंने पूछा “तुमने पहली बार कितनी उम्र में लड़की का चुंबन लिया था”

तो वह शरमा गया और बोला “बोस कोई लफ़ड़ा है तुम मेरी पोलपट्टी लेकर मेरे से कोई काम करवाने वाले हो”

मैंने कहा “नहीं भई मैं तो बस ऐसे ही पूछ रहा हूँ।”

तो बोला “मैं जब ९ वीं क्लास में पढ़ता था तब पहली बार एक लड़की का चुँबन लिया था”

मैंने फ़िर से धैर्य के साथ पूछा “क्या साथ मॆं पढ़ती थी ?”

मित्र बोला “नहीं, दो साल छोटी थी, और घर पर आना जाना था, सामने की बिल्डिंग में रहती थी”

मैंने पूछा “चुंबन कहाँ लिया था, स्कूल में या घर में या कहीं और ?”

अब तो वो और सशंकित हो गया, फ़िर बोला “बोस जरुर कोई लफ़ड़ा है !!”

मैंने कहा “अरे मैं तो बस ऐसे ही पूछ रहा हूँ, कि मैं अपनी जिंदगी में कितना पीछे रहा हूँ और हमारी आज की पीढ़ी क्या कर रही है ?”

तब बोला “घर में चुंबन लिया था”

और फ़िर आज की युवा पीढ़ी के लिये बोलता है कि “अपने भतीजे के साथ बाजार गये थे, तो बाजार में भतीजे की सहपाठिन मिल गई, उसने हाय हैलो किया और मम्मी से बोला कि “मम्मी ये मेरे दोस्त की गर्लफ़्रेंड है”, और उनका भतीजा दूसरी कक्षा में पड़ता है।

फ़िर बोला “हमने तो ९ वीं में चुंबन लिया था, पार आज कल की पीढ़ी में यह ५-६ कक्षा में ही हो जाता है”

हमें आश्चर्य होने लगा कि हम शायद अब बहुत ही बूढ़े हो गये हैं, इसलिये हमने शादी के पहले चुंबन नहीं लिया यार फ़िर हम किसी और ही सभ्यता में रहते थे।

अब आप बताईये आपने पहली बार चुंबन कब लिया था :)

Wednesday, July 07, 2010

मेरे घर में चोरी और भारत के लोकतंत्र का मजाक नक्सलवादियों का भारत बंद आज

    आज सुबह सुबह घर (उज्जैन) से माताजी का फ़ोन आया कि बेटा आज एक दुर्घटना हो गई, तुम्हारा कमरे में पीछे से चोर घुस गये और लॉकर में से समान ले गये। अब हम सुबह सुबह नींद में कुछ समझ ही नहीं पाये ।

    फ़िर पूरा वाकया बयान किया कि सुबह पौने पाँच बजे पापाजी उठे तो हमारे कमरे में उन्हें खटपट की आवाज आई, चूँकि हम वहाँ रहते नहीं हैं तो हमारा कमरा बाहर से बंद ही रखा जाता है। तो पापाजी ने  आवाज लगाई कि अंदर कौन है, तो कुछ जबाब नहीं आया, और चोर/चोरों ने बाहर से तीनों दरवाजों की कुण्डी भी लगा दी थी, फ़िर पापाजी ने किरायेदार को मोबाईल करके बुलाया और बाहर से दरवाजे खोले गये। फ़िर पीछे जाकर देखा जहाँ हमारेक मरे की खिड़की थी और जहाँ से कमरे में चोर लोहे की मजबूत जाली को मोड़कर और खिड़की खोलकर घुसे थे, फ़िर कमरे का मुआयना किया तो लॉकर तोड़ा गया था जो कि लोहे की अलमारी में था। कागज सुरक्षित थे, बस जो पर्स था उसका सारा समान गायब था अब उसमें क्या था याद करने की कोशिश की तो थोड़ा बहुत समान याद आया, और हाँ नकद याद था तो सब मिलाकर याद बन पड़ा कि लगभग १५-२० हजार का समान होगा, चाँदी का समान था अब चाँदी का भाव भी तो आसमान छू रहा है।

    वैसे तो उज्जैन में घर असुरक्षित हो गये हैं, चोर पूरी तरह से सक्रिय हैं, पुलिस के पास बराबर हफ़्ता पहुँच जाता होगा ये हमें उम्मीद है। अब सोचा जा रहा है कि घर में सिक्योरिटी सिस्टम लगा दिया जाये।

    वैसे हमने घर पर कहा है कि पुलिस में चोरी की रिपोर्ट जरुर दर्ज करवायें।

    सुबह सुबह हमने टीवी न्यूज देखी कि बारिश के क्या हाल हैं क्योंकि रात भर मुंबई में भारी बरसात हुई है, परंतु टीवी तो अपने किस्मत के सितारे में ज्यादा व्यस्त थे, तभी नीचे बस दो ही ब्रेकिंग न्यूज थीं ।

१. पंजाब हरियाणा में बारिश का कहर

२. नक्सलियों ने आज भारत बंद की घोषणा की, गृह मंत्रालय ने अलर्ट जारी किया।

    तो उपरोक्त दोनों में हमारे भारत बंद वाले शूरवीर कहाँ हैं, बाहर सड़क पर निकलें और बाढ़ में फ़ँसे लोगों की मदद करें और नक्सलियों से सामना करें।

Tuesday, July 06, 2010

“सन्ध्या-सुन्दरी” कविता सूर्यकान्त त्रिपाठी ’निराला’ रचित “कविश्री” से

दिवसावसान का था समय,

मेघमयआसमान से उतर रही है

वह सन्ध्या-सुन्दरी परी-सी

धीरे धीरे धीरे।

तिमिराञ्चल में चञ्चलता का नहीं कहीं आभास,

मधुर मधुर है दोनों उसके अधर,

किन्तु जरा गम्भीर, - नहीं है उनमें हास-विलास,।

हँसता है तो केवल तारा एक

गूँथा हुआ उन घँघराले काले-काले बालों से,

हृदयराज्य की रानी का वह करता है अभीषेक।

अलसता की-सी लता

किन्तु कोमलता की वह कली

सखी नीरवता के कन्धे पर डाले बाँह,

छाँह सी अम्बर पथ से चली।

नहीं बजती उसके हाथों में कोई वीणा,

नहीं होता कोई अनुराग-राग-आलाप,

नूपुरों में भी रुनझुन रुनझुन नहीं,

सिर्फ़ एक अव्यक्त शब्द सा “चुप, चुप, चुप”

                                              है गूँज रहा सब कहीं -

व्योम-मण्डल में - जगतीतल में -

सोती शान्त सरोवर पर उस अमल कमलिनी-दल-में-

सौन्दर्य गर्विता सरिता के अति विस्तृत वक्ष:स्थल में-

धीर वीर गम्भीर शिखर पर हिमगिरि-अटल-अचल में -

उत्ताल-तरङ्गाघात प्रलय घन गर्जन-जलाधि प्रबल में-

क्षिति-में -- जल में नभ में अनिल-अनल में,

सिर्फ़ एक अव्यक्त शब्द-सा “चुप, चुप, चुप”

                                               है गूँज रहा सब कहीं, -

और क्या है ? कुछ नहीं।

मदिरा की वह नदी बहती आती,

थके हुए जीवों को वह सस्नेह

                                  प्याला एक पिलाती,

सुलाती उन्हें अङ्कों पर अपने,

दिखलाती फ़िर विस्मृति के वह अगणित मीठे सपने;

अर्धरात्रि की निश्चलता में हो जाती जब लीन,

कवि का बढ़ जाता अनुराग,

विरहाकुल कमनीय कण्ठ से

आप निकल पड़ता तब एक विहाग।

Monday, July 05, 2010

“बादल राग” कविता सूर्यकान्त त्रिपाठी ’निराला’ रचित “कविश्री” से

निर्दय विप्लव की प्लावित माया -

यह तेरी रण-तरी,

भरी आकांक्षाओं से,

घन भेरी-गर्जन से सजग, सुप्त अंकुर

उर् में पृथ्वी के, आशाओं से

नव जीवन की, ऊँचा कर सिर,

ताक रहे हैं, ऐ विप्लव के बादल !

                                           फ़िर फ़िर

बार बार गर्जन,

वर्षण है मूषलधार,

हृदय थाम लेता संसार,

सुन-सुन घोर वज्र हुंकार।

अशनि-पात से शायित उन्नत शत शत वीर,

क्षत विक्षत-हत अचल शरीर,

         गगनस्पर्शी स्पर्धा-धीर।

हँसते हैं छोटे पौधे लघु-भार-

                   शस्य अपार,

हिल हिल,

खिल खिल,

हाथ हिलाते,

तुझे बुलाते,

विप्लव-रव से छोटे ही हैं शोभा पाते।

अट्टालिका नहीं है रे

                         आतङ्क भवन,

सदा पङ्क ही पर होता जल विप्लव प्लावन

क्षूद्र प्रफ़ुल्ल जलज से सदा छलकता नीर,

रोग शोक में भी हँसता है शैशब का सुकुमार शरीर।

रुद्ध कोश, है क्षुब्ध तोष,

अंगना-अंग से लिपटे भी

आतंक-अङ्क पर काँप रहे हैं

धनी, वज्रगर्जन से, बादल,

त्रस्त नयन-मुख ढाँप रहे हैं।

जीर्ण-बाहु, शीर्ण शरीर,

तुझे बुलाता कृषक अधीर,

ऐ विप्लव के वीर!

चूस लिया है उसका सार,

हाड़मात्र ही हैं आधार,

ऐ जीवन के पारावार !

भारत बंद करने से क्या होगा ? जिम्मेदार लोगों को बंद करो ! मैं इसका विरोध करता हूँ !!

    भारत बंद को राजनैतिक दलों ने जनता को अपनी ताकत बताने का हथियार बना दिया है, और टी.वी. पर देखकर ही पता चल रहा था कि राजनीति में अब केवल और केवल गुंडों का ही अस्तित्व है, क्या आम आदमी ऐसा कर सकता है ??

पुतला बनाकर जलाना

टायर जलाना बीच सड़क पर

डंडा लेकर लहराना

इत्यादि

शायद आपका जबाब भी होगा “नहीं”, पर क्यों और ये लोग कौन हैं जो ये सब कर रहे हैं -

    आम आदमी तो बेचारा अपने घर में दुबका बैठा अपनी रोजी रोटी की चिंता कर रहा था और ये बदमाशी करने वाले लोग राजनैतिक दलों के आश्रय प्राप्त लोग हैं, जिन्हें अगर २-४ लठ्ठ पड़ भी गये तो उसकी भी सारी व्यवस्था इन दलों ने कर रखी है। टी.वी. पर फ़ुटेज दिखाये जा रहे थे लोग डंडे खा रहे थे पर बड़े नेता ४-५ पंक्ति पीछे मीडिया को चेहरा दिखा रहे हैं, फ़िर ब्रेकिंग न्यूज भी आ जाती है कि फ़लाने नेता प्रदर्शन करते गिरफ़्तार, सब अपने को बचा रहे हैं, बस भाड़े के आदमी पिट रहे हैं।

    जो राष्ट्र का एक दिन का नुकसान इन दंगाईयों ने किया, उसकी भरपाई कैसे होगी ? जो हम लोगों के कर से खरीदी गई या बनाई गई सार्वजनिक वस्तुओं की तोड़ फ़ोड़ की गई है, उसका हर्जाना क्या ये खुद भरने आयेंगे ? आम आदमी को सरेआम बेईज्जत करना, क्या ये राजनैतिक दलों को शोभा देता है, (जैसा कि टीवी फ़ुटेज में दिखाया गया, बोरिवली में लोकल से उतारकर लोगों को चांटे मारे गये)। तो इन राजनैतिक पार्टियों को बंद का साफ़ साफ़ मतलब समझा देना था। बंद महँगाई के खिलाफ़ नहीं था बंद था अमन के खिलाफ़, बंद था शांति के खिलाफ़, बंद था आम आदमी के खिलाफ़।

    अगर इन राजनैतिक दलों को वाकई काम करना है तो कुछ ऐसा करते जिससे एक दिन के लिये महँगाई कम हो। अपनी गाड़ियों से सब्जियाँ और दूध भिजवाते तो लागत कम होती और आम आदमी को एक दिन के लिये महँगाई से राहत मिलती। ऐसे बहुत से काम हैं जो किये जा सकते हैं, पर इन सबके लिये इनकी अकल नहीं चलती है।

शायद इस बंद का समर्थन हम भी करते अगर इसका कोई फ़ायदा होता, हमारे फ़ायदे -

सब्जी ५०-८० रुपये किलो है वो १०-२० रुपये किलो हो जायें।

दाल १००-१६० रुपये किलो हैं वो ४०-५० रुपये किलो हो जायें।

दूध ३० - ३९ रुपये लीटर है वो १५-२० रुपये लीटर हो जाये।

पानी बताशे १५ रुपये के ६ मिलते हैं, वो ५-६ रुपये के ६ हो जायें। :)

    भले ही पेट्रोल, डीजल और गैस के भाव बड़ें वो सहन कर लेंगे पर अगर आम जरुरत की चीजें ही इतनी महँगी होंगी तो जीना ही मुश्किल हो जायेगा, पेट्रोल डीजल नहीं होगा तो सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल किया जा सकता है। सरकार हड़ताल करने वाले राजनैतिक दलों की भी थी और भविष्य में भी आयेगी परंतु क्या इन लोगों ने महँगाई कम करने के लिये कोई कदम उठाया ? नहीं क्यों इसका कारण इनको भारत बंद के पहले जनता को बताना चाहिये था, और ये भी बताना चाहिये था कि सरकार कैसे महँगाई कम कर सकती है ? आखिर ये भी तो सरकार चलाना जानते हैं। कैसे करों को कम किया जा सकता है, कैसे कमाई बढाई जा सकती है, फ़िर ये भारत बंद से क्या हासिल होगा ?   कुछ नहीं बस जनता को अपनी शक्ति प्रदर्शन दिखाने के ढ़ोंग के अलावा और कुछ नहीं है ये भारत बंद ।

“भारत बंद - मैं इसका विरोध करता हूँ”

“मुझे स्नेह क्या मिल न सकेगा” कविता सूर्यकान्त त्रिपाठी ’निराला’ रचित “कविश्री” से

मुझे स्नेह क्या मिल न सकेगा ?

स्तब्ध दग्ध मेरे मरु का तरु

क्या करुणाकर, खिल न सकेगा ?

                 जग दूषित बीज नष्ट कर,

                 पुलक-स्पन्द भर खिला स्पष्टतर,

                 कृपा समीरण बहने पर क्या,

                 कठिन हृदय यह हिल न सकेगा ?

मेरे दुख का भार, झुक रहा,

इसलिए प्रति चरण रुक रहा,

स्पर्श तुम्हारा मिलने पर क्या,

महाभार यह झिल न सकेगा ?

“प्यार के अभाव में मेरी जिंदगी

एक वीराना बन कर रह गयी है

अगर तुम देख लो, यह सँवर जाये ।” अज्ञात

Sunday, July 04, 2010

ज़ूही की कली कविता सूर्यकान्त त्रिपाठी ’निराला’ रचित “कविश्री” से

विजन-वन-वल्लरी पर

सोती थी सुहागभरी-

स्नेह-स्वप्न-मग्न-अमल-कोमल-तनु तरुणी

जूही की कली,

दृग बन्द किये, शिथिल, पत्रांक में।

वासन्ती निशा थी;

विरह-विधुर प्रिया-संग छोड़

किसी दूर-देश में था पवन

जिसे कहते हैं मलयानिल।

 

आई याद बिछुड़न से मिलन की वह मधुर बात,

आई याद चाँदनी की धुली हुई आधी रात,

आई याद कान्ता की कम्पित कमनीय गात,

फ़िर क्या ? पवन

उपवन-सरद-रितु गहन-गिरि-कानन

कुंज-लता-पुंजों को पार कर

पहुँचा जहाँ उसने की केलि

                                कली-खिली-साथ !

सोती थी,

जाने कहो कैसे प्रिय आगमन वह ?

नायक ने चूमे कपोल,

डोल उठी वल्लरी की लड़ी जैसे हिंडोल।

इस पर भी जागी नहीं,

चूक क्षमा माँगी नहीं,

निंद्रालस वंकिम विशाल नेत्र मूँदे रही -

किम्बा मतवाली थी यौवन की मदिरा पुए,

                                                     कौन कहे ?

निर्दय उस नायक ने

निपट निठुराई की,

कि झोंकों की झाड़ियों से

सुन्दर सुकुमार देह सारी झकझोर डाली,

मसल दिये गोरे कपोल गाल;

चौक पड़ी युवती,

चकित चितवन निज चारों ओर फ़ेर,

हेर प्यारे को सेज पास

नम्रमुखी हँसी, खिली

खेल रंग प्यारे संग ।

 

इस कविता में छायावाद की romaniticism का प्रभाव है।

कुछ शब्दों के अर्थ -

विजन - एकान्त

वल्लरी - वेल

गात - प्रेम विभोर होकर कांपते हुए उसके सुन्दर

निद्रालस - निद्रा में अलसाये हुए कटाक्ष

भारती वन्दना कविता सूर्यकान्त त्रिपाठी ’निराला’ रचित “कविश्री” से

भारती जय, विजय करे 
कनक-शस्य-कमल धरे !
लंका पदतल-शतदल,
गर्जितोर्मि सागर-जल
धोता शुचि चरण-युगल
स्तव कर बहु-अर्थ-भरे!
तरु-तृण-वन-लता-वसन,
अंचल में खचित सुमन,
गंगा ज्योतिर्जल-कण
धवल-धार हार गले!
मुकुट शुभ्र हिम-तुषार,
प्राण प्रणव ओङ्कार,
ध्वनित दिशाएँ  उदार,
शतमुख-शतरव-मुखरे !

कुछ शब्दों के अर्थ -
कनक-शस्य-कमल धरे ! - प्राकृतिक वैभव से सुसज्जित है।
स्तव - प्रार्थना, गान
खचित - सजा हुआ है।
ज्योतिर्जल-कण - प्रकाशमान जल के कण
प्राण प्रणव - तेरी प्राण शक्ति ही औंकार शब्द है।


कवि परिचय -
जन्म - महिषादल मेदिनीपुर में माघ शुल्क ११ संवत १९५५ (सन १८९८) मृत्यु - १५ अक्टूबर १९६१। पिता - रामसहाय त्रिपाठी महिषादल राज्य के कर्मचारी थे। मैट्रिक तक शिक्षा प्राप्त करके दर्शन और बंगला साहित्य का विशेष अध्ययन किया ।
पहली काव्य रचना १७ वर्ष की आयु में की। “समन्वय” और “मतवाला” के सम्पादक रहे।
मुख्य रचनाएँ
अनामिका [१९२३] परिमल [ १९३०] अप्सरा (उपन्यास) [१९३१] अलका (उपन्यास) [१९३३] प्रबन्ध पद्य (निबन्ध) [१९३४] गीतिका [१९३६] तुलसीदास [१९३९] प्रबन्ध प्रतिमा (निबन्ध) [१९४०] बल्लेसुर बकरिहा (उपन्यास) [१९४१] कुकुरमुत्ता [१९४३] नये पत्ते [१९४६] बेला [१९४६] अपरा [१९४८] अर्चना [१९५४] आराधना [१९५५]

Saturday, July 03, 2010

स्वास्थ्य के लिये शुल्क बिना सोचे समझे और वित्तीय प्रबंधन के लिये सोच समझकर ? [ Fees for Health and Wealth]

    आपमें से कितने लोग ऐसे हैं जो कि स्वास्थ्य के लिये शुल्क सोच समझकर देते हैं, अगर शुल्क ज्यादा होता है तो तकाजा करते हैं या डॉक्टर को बिना दिखाये वापिस आ जाते हैं, एक भी नहीं ? आश्चर्य हुआ !!! आखिर आप अपने स्वास्थ्य के लिये कोई जोखिम नहीं लेना चाहते हैं, आप हमेशा अच्छे डॉक्टर को ही चुनेंगे, भले ही उनके यहाँ कितनी भी भीड हो, नहीं, पर क्यों ??

    जब स्वास्थ्य प्रबंधन के लिये आप इतना खर्च कर सकते हैं तो अपने वित्तीय प्रबंधन के लिये क्यों नहीं ?? ओह मुझे लगता है कि यहाँ आपको लगता है कि आप बहुत ही विद्वान हैं और अपने धन को बहुत अच्छे से प्रबंधन कर रहे हैं, आपसे अच्छा प्रबंधन कोई कर ही नहीं सकता है, ये वित्तीय प्रबंधन करने वाले लोग तो फ़ालतू का शुल्क ले लेते हैं, या फ़िर अगर कोई वित्तीय प्रबंधक ज्यादा शुल्क लेता है तो कम शुल्क वाले वित्तीय प्रबंधक को ढूँढ़ते हैं। नहीं ??

जैसे स्वास्थ्य के लिये कोई समझौता नहीं करते हैं फ़िर वित्तीय प्रबंधन के लिये कैसे करते हैं ?

जैसे स्वास्थ्य के लिये कोई तकनीकी ज्ञान आपके पास नहीं है, वैसे ही वित्तीय प्रबंधन के लिये है ?

जैसे स्वास्थ्य के लिये आप अपने चिकित्सक को सभी परेशानियाँ बता देते हैं, क्या वैसे ही वित्तीय प्रबंधक को अपनी सारी आय, खर्च, जमा और ऋण बताते हैं ?

क्या आपने कभी सोचा है कि कम शुल्क देकर आप अपने पैर पर ही कुल्हाड़ी मार रहे हैं, जी हाँ, क्यों ?

अगर वित्तीय प्रबंधक ने गलत सलाह दे दी तो ? आपके वित्त की ऐसी तैसी हो जायेगी ।

    और अगर ज्यादा शुल्क वाला अच्छा वित्तीय प्रबंधन करता है तो शुल्क थोड़ा ज्यादा लेगा परंतु आपको वित्तीय रुप से सुरक्षित कर देगा, और यकीन मानिये कि आप सोच भी नहीं सकते आपके वित का इतनी अच्छी तरह से प्रबंधन कर देगा। क्योंकि आपको आज के बाजार के बहुत सारे उत्पाद पता ही नहीं होंगे और होंगे भी तो कैसे कार्य करते हैं, उसका पता नहीं होगा।

एक छोटी सी बात -

    अगर आपके शहर में ४ चिकित्सक हैं, और आपके घर में कोई बीमार पड़ गया, तो आप किस चिकित्सक को दिखायेंगे, आप शहर में नये हैं, तो दवाई की दुकान पर पूछेंगे या फ़िर अपने आस पड़ौस में पूछताछ करेंगे। आपको पता चलेगा कि ३ चिकित्सक तो ऐसे ही हैं पर जो चौथा चिकित्सक है, उसके हाथ में जादू है, उसकी फ़ीस भले ही ज्यादा है परंतु उसका ईलाज बहुत अच्छा है। तो आप उस ज्यादा फ़ीस वाले चिकित्सक के पास जाना पसंद करेंगे।

    परंतु वित्तीय प्रबंधक चुनते समय ऐसा बिल्कुल नहीं है, क्योंकि सब कहीं न कहीं पढ़ लिखकर अपने आप को ज्ञानी समझने लगते हैं, कि हमें वित्तीय प्रबंधक की कोई जरुरत ही नहीं है, और खुद ही प्रबंधन करके अपने वित्त को बढ़ने में बाधा बन जाते हैं। पहले पता कीजिये कि कौन अच्छा प्रबंधन करता है, शुल्क कितना है ये आप मत सोचिये क्योंकि अगर वित्तीय प्रबंधन अच्छे से हो गया तो शुल्क बहुत भारी नहीं होता है। 

    वित्तीय प्रबंधन के लिये सर्टिफ़ाईड फ़ाईनेंशियल प्लॉनर को बुलायें, जैसे हमारे देश में सी.ए., सी.एस. होते हैं वैसे ही सी.एफ़.पी. होते हैं, जो कि भारत सरकार द्वारा अंतर्राष्ट्रीय मापद्ण्डों पर दिया जाने वाला सर्टिफ़िकेट है। ये लोग वित्तीय प्रबंधन में विशेषज्ञ होते हैं, और भारत में यह तीन वर्ष पहले ही शुरु हुआ है। इसमें भविष्य बहुत ही अच्छा है इसके बारे में तो बहुत से लोगों को पता ही नहीं है, और तीन वर्ष में केवल १००४ सी.एफ़.पी. (CFP) ही बाजार में आ पाये हैं।

सी.एफ़.पी. (CFP) के अंतर्जाल के लिये यहाँ चटका लगाईये।

    तो अब आपको फ़ैसला करना है कि आपको अपने वित्त का प्रबंधन वित्तीय चिकित्सक से करवाना है या फ़िर जैसा अभी तक चल रह है वैसे ही करना है। अपनी सोच बदलिये और जमाने के साथ नये उत्पादों में निवेश कर अपने वित्त को नई उँचाईयों पर पहुँचाइये।

Friday, July 02, 2010

डॉक्टर इतना नगदी कैसे मैनेज करते होंगे ? बेटा अस्पताल से वापिस घर आया, फ़िर कुछ अनुभव, [Back to Home, My experience]

   २९ जून को रात १० बजे बेटे को अस्पताल में भर्ती करवाने के बाद फ़िर अस्पताल के अनुभव, ओह मन कड़वा हो जाता है।

    बेटा बिना मम्मी के सोता नहीं है, मम्मी से ज्यादा लगाव है तो मम्मी को ही रुकना था हम अस्पताल की कार्यवाही करके घर आकर सो गये। पर बेटा अस्पताल में और हम घर में सो रहे थे तो हमें भी नींद नहीं आयी, सुबह ५ बजे ही नींद खुली हम तैयार होकर फ़िर अस्पताल की ओर दौड़ पड़े। अस्पताल पहुँचकर पता चला कि बेटा और बेटे की मम्मी दोनों ही रातभर सो नहीं पाये, रात को सिलाईन चढ़ने के कारण, हाथ सीधा ही पकड़कर रखना था और बेटे को सिलाईन की आदत तो थी नहीं, तो उसे अजीब सा लग रहा था।

    हमने कहा जाओ तुम घर जाओ और बेटे को मैं देख लूँगा, सो जाओ नहीं तो तबियत खराब हो जायेगी। बेटे की मम्मी भी घर गयी थोड़ी देर सोयी भीं पर ज्यादा नींद नहीं आयी और खाना बनाकर लौट आयीं। हमने कहा कि चलो कोई बात नहीं, इधर ही बेटे के पास सो जाओ।

    किसी तरह दूसरा दिन खत्म हुआ ३ सिलाईन और ४ इंजेक्शन एँटीबायोटिक्स के लग चुके थे। दिन खत्म होते होते तो हमारे बेटेलाल ने चिल्लाना शुरु कर दिया कि हाथ में दर्द हो रहा है जहाँ सिलाईन लगी थी, पर सूजन कहीं भी नहीं थी, हमने कहा कि नाटक मत करो, ये तो होगा ही। घर पर खाना नहीं खाओगे तो सिलाईन से ऊर्जा मिलेगी। अब सोच लो कि घर पर खाना खाना है या ये सिलाईन चढ़वानी है।

    बस कल रात १ जुलाई को अस्पताल से छुट्टी मिल गई, एँटीबायोटिक्स का पूरा कोर्स भी हो गया। उम्मीद है कि अब यह ठीक रहेगा।

    पिछले चिठ्ठे में जो बातें उठायीं थीं वह सब सही निकलीं, हमने ये अनुभव किया कि डॉक्टर इलाज बहुत अच्छा करता है पर जहाँ मरीज को भर्ती करवाने की बात आती है, वह राक्षस जैसा हो जाता है, अब हमने यह निर्णय लिया है कि इलाज तो इन्हीं डॉक्टर के यहाँ करवायेंगे पर अगर कभी फ़िर से भर्ती करने के लिये बोला तो दूसरे डॉक्टर के पास ले जायेंगे। शायद भर्ती करने की जरुरत ही न हो, पर उसकी भूख को शांत करने के लिये केवल हम ही क्यों शिकार बनें ? और जितने भी आसपास के बच्चे के अभिभावक हैं और जिन्हें हम जानते हैं कि ये सब उसी डॉक्टर से इलाज करवाते हैं। उनहें भी जागरुक करने का जिम्मा हमने लिया है, कि जिससे हम थर्ड ओपिनियन नहीं ले पाये पर वो लोग ले पायें।

    जी हाँ थर्ड ओपिनियन, मैंने सबकी टिप्पणियों को पढ़ा और मैं सभी को धन्यवाद ज्ञापित करना चाहूँगा मेरा हौसला अफ़जाई करने के लिये और बेटे के स्वास्थय लाभ के लिये। ये जो था ये सेकंड ओपिनियन ही था और अब आगे से निश्चय किया है कि थोड़ा सा अपना ज्ञान चिकित्सा के क्षैत्र में भी होना चाहिये जिससे कोई बेबकूफ़ न बना सके, क्योंकि जितनी भी डॉक्टरों की दुकान लगी हैं, सब लूटने की ही दुकानें हैं। मैं यह एक जनर्लाइज स्टेटमेंट दे रहा हूँ क्योंकि गेहूँ के साथ तो घुन भी पिसता है।

   अब एक सवाल जो तीन दिन के मंथन के बाद मेरे वित्तीय प्रबंधन वाले मस्तिष्क में घूमड़ रहा है, कि डॉक्टर के पास इतना नगदी आता है, तो यह कैसे मैनेज करते होंगे और अगर इस प्रोफ़ेशनल फ़ीस को आयकर में नहीं दिखाते होंगे तो यह तो काला धन हो गया। फ़िर इसे सफ़ेद कैसे करते होंगे। क्या हमारी सरकार का ऐसा कोई नियंत्रण है जिससे यह काला धन ज्यादा होने से रोका जा सके ?

हमने थोड़े से अतिरिक्त समय में लाभ उठाया और सूर्यकान्त त्रिपाठी “निराला” जी की कविश्री की कविताओं का आनंद लिया।

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