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Wednesday, June 30, 2010

मेरे बेटे की खराब तबियत में मेरे विचार और घटनाक्रम। क्या डॉक्टर एकाधिक व्यक्तित्व विकार के शिकार होते हैं ? [ Doctor’s with Multiple Disability Disorder ?]

    कल मेरे बेटे की तबियत कुछ ज्यादा ही खराब हो गयी, जैसे ही शाम को मैं घर पहुँचा तो पता चला कि ये दोपहर से सो ही रहा है और कुछ खाया भी नहीं है। आज लगातार पाँचवा दिन है जबकि बुखार कम नहीं हुआ है और १०२ चल रहा है। मैंने तुरन्त ही बच्चे के विशेषज्ञ डॉक्टर को फ़ोन लगाया और पूछा कि कब कहाँ मिलेंगे। और तुरन्त ही उनके नर्सिंग होम लेकर चल दिये।

    इन डॉक्टर के यहाँ हमारा बेटे को हम लगातार दिखाते रहे हैं, उन्होंने अपनी जाँच पूरी की और तुरन्त ही रक्त और मूत्र जाँच के आदेश दे दिये। और लेब को तुरन्त रिपोर्ट देने का बोला। हम कुछ समयांतरल के बाद वापिस डॉक्टर के पास पहुँचे तो वो बोले कि WBS कम है, और टायफ़ाईड होने की संभावना है, कमजोरी बहुत ज्यादा है। इसलिये इसी समय बालक को भर्ती करवा दीजिये।

    उनका बोलना था कि हमारा कलेजा मुँह को आ गया कि जरा सी जान और अस्पताल में भर्ती, हमने कहा क्या घर पर रहकर चिकित्सा नहीं हो सकती है, डॉक्टर बोले हो सकती है पर क्यों जोखिम लें, पहले ही इतनी कमजोरी है और ज्यादा कमजोरी हो गयी तो। हम क्या बोल सकते थे। चुपचाप अपनी गर्दन हिलाई और घर पर फ़ोन लगाया कि तैयार हो जाओ, अस्पताल में भर्ती करवाना है।

   जब हमें डॉक्टर ने बोला था कि भर्ती करवा दो तो हमें डॉक्टर का चेहरा शैतान को होता दिखा था कि उसके मुँह पर अचानक बोलते बोलते ही कान बड़े हो गये हैं, मुँह बड़ा हो गया है, सिर पर दो सींग उग आये हैं, नाक बड़ी हो गयी है और दाँत बाहर को राक्षस जैसे निकल आये हैं।

    हम तो हमेशा से डॉक्टर को भगवान का रुप मानते हैं, परंतु कभी कभी लगता है कि नहीं ये लोग एकाधिक व्यक्तित्व विकार का शिकार होते हैं, तभी तो पल में अपनी बातों से मरीज और मरीज के परिवार का विश्वास जीत लेते हैं और फ़िर उनकी जेब काटने लगते हैं।

    हमारे जो डॉक्टर हैं, वे लगभग हमारी ही उम्र के होंगे, और अभी अभी नया नर्सिंग होम खोला है, और मुंबई में दो जगह नर्सिंग होम हैं। घरवाले भी सोचते होंगे कि वाह हमारे बेटे ने क्या व्यवसाय जमाया है। मुझे लगता है कि मेरा डॉक्टर पर ज्यादा विश्वास है और भगवान पर तो अटूट विश्वास है। और ये सब बातें न जाने क्यों मेरे दिलोदिमाग में आ गई हैं।

    शायद एकदम से मेरी पितृग्रंथी को चोट लगी हो, या फ़िर अस्पताल में खराब अनुभवों से। उम्मीद है कि इलाज कर रहे डॉक्टर हिन्दी ब्लॉग नहीं पढ़ते होंगे और उन्हें बुरा भी नहीं लगेगा। अब हम जा रहे हैं हमारे बेटॆ के पास कल से उसे दो इंजेक्शन और १ सिलाइन चढ़ चुकी है, हमारी घरवाली रातभर से सोई नहीं है, अब हम जा रहे हैं अपने लख्तेजिगर के पास…

Tuesday, June 29, 2010

आई.आर.डी.ए. ने यूलिप के लिये नये नियम बनाये

आई.आर.डी.ए. ने यूलिप का बंधक समय ३ वर्ष से बड़ाकर ५ वर्ष कर दिया है। सभी यूलिप में मृत्यु और स्वास्थ्य का बीमा होगा, पेंशन स्कीम को छोड़कर। नये नियम १ सितंबर से प्रभावी होंगे।

अलग से उपलब्ध टॉप अप के अलावा, मूल बीमा किश्त में ही जीवन बीमा भी बीमित होना चाहिये।

पेंशन या वार्षिक उत्पादों में किसी भी तरह की आंशिक निकासी नहीं होगी। यूलिप पेंशन उत्पादों को वार्षिक उत्पादों में परिवर्तित किया जाना चाहिये।

यूलिप पेंशन और वार्षिक उत्पाद ४.५% की वापसी की गारंटी दे सकेंगे।

बीमित से लिये जाने वाले बीमा शुल्क बंधक अवधि में समान रुप से लिये जाने चाहिये।

एन.ए.वी. की ४०% तक का ॠण उपलब्ध होगा।

१० वर्ष से कम के बीमा पर ३% प्रतिवर्ष तक प्रभार लिया जा सकता है।

१० वर्ष से ज्यादा के बीमा पर २.२५% प्रतिवर्ष तक प्रभार लिया जा सकता है।

फ़्रंट लोडिंग शुल्कों को पहले चार वर्ष में ही लिया जा सकता है।

Monday, June 28, 2010

ब्लॉगिंग में ५ वर्ष पूरे अब आगे… कुछ यादें…कुछ बातें... विवेक रस्तोगी

    आज से ठीक ५ साल पहले  मैंने अपना ब्लॉग बनाया था और आज ही के दिन पहली पोस्ट दोपहर २.२२ पर “छाप”  प्रकाशित की थी, हालांकि उस पर एक भी टिप्पणी नहीं आयी, फ़िर एक माह बाद जुलाई में एक और पोस्ट लिखी “नया चिठ्ठाकार” जिस पर आये ४ टिप्पणी, जिनमें देबाशीष और अनूप शुक्ला जी प्रमुख थे, एक स्पाम टिप्पणी भी थी, वह आज तक वहीं है क्योंकि उस समय हमें स्पाम क्या होता है पता नहीं था :)

   फ़िर नारद, अक्षरग्राम शुरु हुए, शायद आज के नये हिन्दी ब्लॉगरों ने जीतू भाई की पुरानी पोस्टें नहीं पढ़ी होंगी अगर पढ़ेंगे तो आज भी तब तक हँसेंगे कि पेट में बल ने पढ़ जायें, छोटी छोटी बातों को इतने रसीले और चुटीले तरीके से लिखा है कि बस !!

    उस समय के कुछ चिठ्ठाकारों में कुछ नाम ओर याद हैं, ईस्वामी, मिर्चीसेठ, रमन कौल, संजय बेंगाणी, उड़नतश्तरी, अनुनाद सिंह, उनमुक्त, रवि रतलामी। और भी बहुत सारे नाम होंगे जो मुझे याद नहीं हैं, पर लगभग सभी का सहयोग रहा है इस सफ़र में और मार्गदर्शन भी मिला।

    अभी तक कुल ५३५ पोस्टें लिख चुके हैं, हालांकि पोस्टों की रफ़्तार पिछले वर्ष से बढ़ी है, और उम्मीद है कि आगे भी कुछ सार्थक ही लिख पायेंगे।

    मैंने अपने लिये जो विषय चुने हैं, वे हैं वित्तीय उत्पाद पर लेखन, वित्तीय प्रबंधन पर लेखन, बीमा क्षैत्र पर लेखन जिन विषयों पर उनके विशेषज्ञों को भी लिखने में संकोच होता है वह भी हिन्दी में, तो मैंने एक छोटी सी कोशिश शुरु की है, इसमें मेरी सराहना की है कमल शर्मा जी ने, मेरे लेखों को मोलतोल.इन के खास फ़ीचर में स्थान देकर।

    इस ५ वर्ष के सफ़र में तकनीक और ब्लॉगरों को बदलते देखा है, पहले जब २००५ में मैंने हिन्दी चिठ्ठाकारी शुरु की थी, मुझे थोड़ा सा याद है कि मैं शायद ८० वाँ हिन्दी ब्लॉगर था, वो भी इसलिये कि उस समय शुरुआती दौर में माइक्रोसॉफ़्ट ने शुरुआती १०० हिन्दी ब्लॉगरों की एक सूची अपने अंतर्जाल पर लगायी थी, अब वह लिंक मेरे पास नहीं है, गुम गया है अगर किसी के पास हो तो जरुर बताइयेगा। मुझे अच्छा लगता था कि अब अंतर्जाल पर हिन्दी भी शुरु हो चुकी है और जल्दी ही अपना पराक्रम दिखायेगी, हमारे भारत के लोगों के लिये संगणक एक साधारण माध्यम हो जायेगा, क्योंकि अंग्रेजी सबकी कमजोरी है। परंतु यह हिन्दी आंदोलन इतनी तेजी से नहीं चला और न ही अंतर्जाल कंपनियों ने हिन्दी को इतना महत्व दिया पर अब भारतीय उपभोक्ताओं को रिझाने के लिये हिन्दी की दिशा में कार्य शुरु किया गया है, या यूँ कहें बहुत अच्छा काम हुआ है।

    पहले कृतिदेव फ़ोंट में हिन्दी में लिखते थे फ़िर ब्लॉगर.कॉम पर आकर उसे कॉपी पेस्ट करते थे, इंटरनेट कनेक्शन ब्रॉडबेन्ड होना तो सपने जैसा ही था, एक पोस्ट को छापने में कई बार तो १ घंटा तक लग जाता था। अब पिछले २ वर्षों से हम हिन्दी लिखने के लिये बाराह का उपयोग करते हैं, फ़ोनोटिक कीबोर्ड स्टाईल में। पहले जब हमने लिखना शुरु किया था तो संगणक पर सीधा लिखना संभव नहीं हो पाता था, पहले कागज पर लिखते थे फ़िर संगणक पर टंकण करते थे, पर अब परिस्थितियाँ बदल गई हैं, अब तो जैसे विचार आते हैं वैसे ही संगणक पर सीधे लिखते जाते हैं, और छाप देते हैं। अब कागज पर लिखने में परेशानी लगती है, क्योंकि उसमें अपने वाक्यों को सफ़ाई से सुधारने की सुविधा नहीं है, पर संगणक में कभी काट-पीट नहीं होती, हमेशा साफ़ सुथरा लिखा हुआ दिखाई देता है।

    इतने समय अंतराल में केवल यही सीखा है कि अपने लिये लिखो जैसे अपनी डायरी में लिखते हो, अब अपने पाठकों के लिये भी लिखो जो चिठ्ठे पर भ्रमण करने आते हैं। अब देखते हैं कि यह चिठ्ठाकारी का सफ़र कब तक अनवरत जारी होगा।

“चिठ्ठाकारी चलती रहे” [Happy Blogging]

Sunday, June 27, 2010

नवभारत टाइम्स मुंबई ने हिन्दी के अपमान करने का जैसे फ़ैसला ले लिया है ?

आज सुबह जैसे ही हिन्दी का अखबार संडे नवभारत टाइम्स ( जो कि रविवारीय नवभारत टाइम्स  होना चाहिये) आया तो पहले पेज के मुख्य समाचारों को देखकर ही हमारा दिमाग खराब हो गया।

आप भी कुछ बानगी देखिये -

१. बातचीत में पॉजिटिव रुख (२६/११ के आरोपियों के वॉइस सैंपल देने की पाक ने भरी हामी)

२. २६/११ का वॉन्टेड जिंबाब्वे से गिरफ़्तार

३. धारावी ने कलप ने की खुदकशी

४. यूएस सक्सेस में इलाहाबादी हाथ

अब बताइये इनका क्या किया जाये, जैसे हिन्दी का अपमान करने की ही ठान रखी है, इस अखबार ने।

क्या हिन्दी को समर्पित लोगों की कमी है, भारत में, या फ़िर नवभारत टाइम्स हिन्दी अखबार को लेकर पाठकों के प्रति प्रतिबद्ध नहीं हैं। ये तो पाठकों के साथ सरासर धोखा है। ऐसी हिन्दी का मैं सरासर विरोध करता हूँ।

अगर कोई मेरी बात को उनके प्रबंधन तक पहुँचाये तो शायद प्रबंधन भी नींद से उठे।

Saturday, June 26, 2010

केवल नामांकन ही बीमा पॉलिसी के लिये क्यों पर्याप्त नहीं है [ Why nomination only is not enough in Insurance ?]

    क्या आपने कभी सोचा है कि बीमा दावा राशि का कानूनी रुप से लाभार्थी कौन है ? या उस राशि पर कौन कौन दावा कर सकता है ?

    अधिकांश लोगों को लगता है कि बीमा दावा का पैसा उनके पति/पत्नी या बच्चे को मिल जायेगा और वे जीवन में आने वाली काठिनाईयों से बच पायेंगे । बहरहाल, यह थोड़ा सा सच है, या कहें आंशिक रुप से सही है । कानून के अनुसार हर संबंधित व्यक्ति जो कि आर्थिक रुप से बीमित व्यक्ति पर आश्रित है, बीमा दावा से मिलने वाले धन पर पर दावा कर सकता है।

    लगभग सभी लोग बीमा लेते समय पति/पत्नि को बीमा दावा के लिये नामित करते हैं, और यही समझते हैं कि अगर दुर्भाग्य से मृत्यु हो भी गई तो बीमाधन उनके पति/पत्नि को मिल जायेगा। यह भी आंशिक रुप से सही है, नामांकन का मतलब होता है कि वह नामित व्यक्ति बीमा धन का दावा कर सकता है, पर उसका उपयोग नहीं कर सकता । वह बीमा धन कानूनीतौर पर सभी आश्रितों में बांटी जानी चाहिये।

    तो अगर आप चाहते हैं कि बीमा धन किसी एक व्यक्ति विशेष के पास ही जाना चाहिये तो बीमा कागजातों पर नामांकन काफ़ी नहीं है। आपको एक वसीयत तैयार करवाना चाहिये जिस पर साफ़ शब्दों में लिखा हो कि बीमा धन से प्राप्त होने वाला धन नामित व्यक्ति/विशिष्ट व्यक्ति को ही दिया जाये, और कोई इस धन का अधिकारी नहीं है। कानूनी रुप से मान्य होने के लिये यह वसीयत पंजीकृत होनी चाहिये।

    इसलिये अगर आप ने अभी तक यह नहीं किया है, तो जल्दी से पहले अपने वकील के पास जाईये और सलाह लीजिये और वसीयत तैयार कीजिये।

    क्योंकि इसका सबसे बड़ा एक कारण तो ये है कि आप जिंदगी की परेशानियों से अपने परिवार को  बचाने के लिये  जैसे तैसे अपनी बीमा किश्त का भुगतान कर रहे हैं, कि जब अगर आप न हों उनके साथ, तो वे आर्थिक रुप से सक्षम हों, दुखी न हों। वसीयत करिये यह बहुत जरुरी है।

DNA मुंबई में छपा यह आलेख भी पढ़िये ।

Friday, June 25, 2010

वित्तीय स्वतंत्रता पाने के लिये ७ महत्वपूर्ण विशेष बातें [Important things to get financial freedom…]

क्या आपने कभी सोचा है कि "अगर मैं वित्तीय स्वत्ंत्र हो जाऊँ तो ?" अगर ऐसा हो जाये तो कितना अच्छा हो...

१) बुनियादी जरुरतों के लिये काम ना करना पड़े, केवल अपने मासिक बिलों और ऋण के  भुगतान के लिये कमाना पड़े, बाकी के अपने बचे हुए कैरियर में... नहीं !!

२) और् नहीं !! वो अंतहीन काम करने का समय !! केवल अपने आपको इस अंतहीन चूहा दौड़ में श्रेष्ठ साबित करने के लिये, क्योंकि अगर आप जीत् भी गये तब भी आप है तो चूहे ही ना ....

३) जीवन को भरपूर आन्ंद से जीने की इच्छा और् क्षमता, अपने परिवार के साथ और ज्यादा वक्त गुजारना, अपने परिवार को छुट्टियों पर ले जाना या फ़िर किसी अच्छे रेस्त्रां में कभी भी ले जाना जब आपकी इच्छा हो ...

४) आप जो भी अपने मन का नहीं कर पा रहे थे, उसे अपने पूरे मन से कर पायें ..

अच्छे विचार, लेकिन आप शायद सोच रहे होंगे कि मैं दिन् मैं भी सपने देखता हूँ ?  तो कह सकते हैं हाँ भी और ना भी ...

हाँ - क्योंकि दिन के सपने मुझे अच्छे विचारों की और् प्रेरित करते हैं, कि मैं कैसे और अच्छे से अपनी जिंदगी में र्ंग भरूँ । आखिरकार हमें एक बार ही जीवन मिला है, तो हम् इसे और सार्थक बनाते हैं।

नहीं - क्योंकि नय विचारों के साथ, हम नये मिलने वाले अवसरों का विश्लेषण कर सकते हैं, और् सबसे प्रभावी दृष्टिकोण को अपना सकते हैं। विचारों के साथ ही अवसर आते हैं, अवसर के साथ कार्य और कार्य के होने से परिणाम आता है !!

तो मैं आपको जो कुछ आगे बताने वाला हूँ उससे आपको अपने वित्तीय स्वतंत्रता को पाने के लिये आप अभी जहाँ अभी खड़े हैं उससे एक् कदम आगे होंगे।

७ जरुरी वित्तीय बातें, जो कि सभी लोगों को पता होना चाहिये -
१) धन का महत्व् समझना
२) धन पर् नियंत्रण रखना
३) धन को बचाना
४) धन को निवेश करना
५) धन कमाना
६) धन को बचाना
७) धन को बांटना सीखना

१) धन का महत्व् समझना - क्या आप धन का महत्व् समझते हैं और् उसकी इज्जत करते हैं ? अगर आज आपको वित्तीय हानि होती है तो क्या आप उसका बर्तमान और भविष्य में होने वाले परिणाम को जानते हैं।

क्या आप अपनी पूरी मासिक आय खर्च कर देते हैं, और् कुछ भी बचा नहीं पा रहे हैं, शर्मिन्दा होने की क्या बात् है, केवल आप अकेले ही ऐसे नहीं हैं, ऐसे बहुत् से लोग् हैं ।

जब तक हम धन का महत्व समझना शुरू नहीं करेंगे, तब तक हम अपने कार्य के महत्व को, बचत की जरुरतों को, और अपनी जबाबदेही को भी नहीं समझ पायेंगे ।

आप कितना खर्चा कर रहे हैं, कितना कमा रहे हैं, अपना धन कहाँ और् कैसे रख रहे हैं, यह सबसे जरूरी है, तो इससे आपको पता चल जायेगा कि केवल अपनी जीवन की आवश्यकताओं को ही पूरा कर रहे हैं या फ़िर् कुछ अपने  लिये अतिरिक्त धन बचा भी सकते हैं।

२) धन पर् नियंत्रण रखना - मुझे लगता है कि अधिकतर लोगों की कमाई का केवल एक ही जरिया होता है नौकरी । इसी से आपके और आपके परिवार के जरुरी खर्चे चलते हैं, और यहीं इसी एक कमाई के सधन के लिये आप दिनरात काम करते हैं, । अगर आप ल्ंबे समय के लिये बीमार पड़् जायेंगे तो ??  घरखर्चा कैसे चलेगा ।

इस परेशानी से बचने का एकमात्र उपाय है कि आपकी नौकरी के साथ साथ आपकी विविध तरह से  दूसरी कमाई भी हो, केवल जब आप ये लक्ष्य प्राप्त कर लेंगे तभी आप अपने आप को वित्तीय स्वत्ंत्र बना सकते हैं, और मस्ती में जिंदगी निकाल सकते हैं।

३) धन को बचाना - अगर आपके पास बहुत सारा धन है, और आप उसे बचाते नहीं हैं, आपके पास उससे ज्यादा धन नही आयेगा, आप और धन नहीं जोड़् पायेंगे। इसे "नकदी प्रवाह प्रब्ंधन" कहा जाता है। आपको अपनी आमदनी बढ़ाकर् खर्चों में कटौटी करना होगी, यही धन वृद्धि का मूल म्ंत्र है। अगर आपके पास अतिरिक्त धन होगा, तो बाजार में बहुत सारे नये वित्तीय उत्पाद हैं निवेश करने के लिये, जिनसे आपके धन में अच्छी वृद्धि हो सकती है।

४) धन का निवेश करना - कुछ आम उत्पाद जो कि आजकल बाजार में उपलब्ध हैं, शेयर, म्यूचयल फ़्ंड्, बांडस, मकान इत्यादि। इतनी सारे विकल्पों के होने के कारण, किसी अनुभवी वित्तीय प्रब्ंधक के साथ सलाह करके उस वित्तीय उत्पाद का विवरण प्राप्त करके निवेश करना उचित होगा, और आप अपने धन को समझदारी से अच्छी जगह निवेश कर पायेंगे। ऐसे वित्तीय उत्पाद बेचने वालों से बच कर रहें जो कि ज्यादा कमीशन वाले उत्पाद बेचने के लिये उत्साहित करते हैं, जो कि आपके ल्ंबी अवधि के योजना के लिये अच्छे न हों ।

५) धन कमाना - एक् बार आपने अपने धन को निवेशित करने के लिये अच्छा रास्ता चुन लिया, फ़िर स्ंयम के साथ अपने धन को बढ़्ते हुए देखें।  "धन स्ंयम के पेड़ पर बड़ा होता है"।

६) धन को बचाना - जब आपके पास धन होता है, तो आपको पता होता है कि धन आसानी से नही आया है, तो अगला कदम है मेहनत से कमाये हुए धन को बचाना। बुरे समय से निपटने के लिये अपने धन को सुरक्षित रखें या फ़िर् वापिस निवेश कर दें। आपको हमेशा अपने पास किसी भी आपात स्थिती से निपटने के लिये कम से कम ६ महीने का खर्चा नकद (बैंक् एकाऊँट) में रखना चहिये।

७) धन को बांटना सीखना - ज्यादा धन आपके पास होने पर्, आप वो सब कर सकते हैं जो करना चहते हैं, जिन सबका मैंने शूरु में उल्लेख किया है। अपने परिवार को सुख सुविधाओं के साथ ज्यादा समय दे सकते हैं, परिवार को छुट्टियों पर घुमाने ले जा सकते हैं, या जब भी आप चाहें किसी अच्छे रेस्त्रां में ले जा सकते हैं। आप अपने परिवार को ज्यादा लाड़ प्यार, सम्मान, समय दे सकते हैं जो पहले नहीं दे पा रहे थे। आप अपनी नौकरी छोड़कर कुछ अपने मन का, जो आपको पसंद है, कर सकते हैं। सही नहीं है क्या ये कि मैं और शायद आप भी हमेशा यही सोचते हैं कि कब अपना मनपसंदीदा काम करने को मिलेगा।

मुझे विश्वास है कि आप भी मेरी तरह वित्तीय स्वतंत्रता पाने के लिये रास्ता खोज रहे होंगे। “समय और ज्वार-भाटा किसी का इंतजार नहीं करते हैं” इसलिये यह बहुत जरुरी और महत्वपूर्ण है कि वित्तीय योजना आज से ही बनायी जाये और उस पर अमल भी किया जाये। और इन ७ महत्वपूर्ण विशेष बातों को रोज ध्यान में रखें।

Thursday, June 24, 2010

शिक्षा में निवेश और धन के महत्व को शामिल होना ही चाहिये ? [ Investment and importance of money should be part of our education system]

    लगभग सभी लोग अपने जीवन के महत्वपूर्ण १६-२० वर्ष शिक्षा ग्रहण करते हैं, परंतु उस शिक्षा में कहीं भी यह नहीं सिखाया जाता है कि धन कैसे कमाया जाता है, धन कितना महत्वपूर्ण है, धन को सही तरीके से कैसे निवेश किया जाये इत्यादि।

    शिक्षा में हम ग्रहण करते हैं, विषयगत ज्ञान, जो कि इतिहास, भौतिक विज्ञान, वनपस्पति विज्ञान, हिन्दी इत्यादि होते हैं। जिनसे हम उन विषयों में पारंगत तो हो जाते हैं, पर धन की महत्वपूर्णता को समझ नहीं पाते हैं, और न ही ये सीख पाते हैं कि अगर निवेश किया जाये तो कहाँ।

    जब कमाने लगते हैं तो रिश्तेदारों के, दोस्तों के या माता पिता के कहने पर उनके अनुभव से धन को निवेश करने लगते हैं। परंतु क्या कभी आपने सोचा है कि जब २० वर्ष शिक्षा ग्रहण अपने बलबूते पर की, उन विषयों में पारंगत हुए तो फ़िर धन के निवेश में क्यों नहीं, जबकि हमने शिक्षा ग्रहण इसलिये की है कि हम अपना भविष्य सामाजिक और आर्थिक रुप से सुदृढ़ रख पायें।

    जब नौकरी लगती है और निवेश की बारी आती है तो अच्छे अच्छे लोगों के दिमाग हिल जाते हैं, भले ही वे अपने विषयों में पारंगत हो, परंतु निवेश में कतई नहीं। निवेश में पारंगत होना केवल और केवल व्यक्तिगत रुचि है। निवेश भी अपने आप में एक बहुत बड़ा विषय है और इसमें पारंगत होना सभी के लिये अनिवार्य होना चाहिये परंतु हमारी शिक्षा में निवेश विषय नहीं है।

    नौकरी के बाद पहली बार आयकर रिटर्न भरना होता है तो पसीने छूटने लगते हैं, जबकि आयकर विभाग ने अपने रिटर्न बहुत ही आसान कर दिये हैं, हम जब से नौकरी कर रहे हैं, तब से हम खुद ही अपना रिटर्न भर रहे हैं, आप बताईये क्या आप भी खुद ही आयकर रिटर्न भरते हैं या फ़िर इसे भरना बहुत बड़ा सरदर्द मानकर कुछ फ़ीस देकर बाजार से भरवा लेते हैं।

तो बताईये शिक्षा में निवेश और धन के महत्व को शामिल होना चाहिये या नहीं ?

Tuesday, June 22, 2010

ऑटो की हड़ताल , किराये में बढ़ौत्तरी और हम आम आदमी… मुंबई में विवेक रस्तोगी

    सुबह ९ बजे तक सब ठीक था, परंतु एकाएक सीएनबीसी आवाज पर एक न्यूज फ़्लेश देखा कि मुंबई में ऑटो की हड़ताल, फ़िर हम दूसरे न्यूज चैनलों पर गये परंतु कहीं भी कुछ नहीं आ रहा था।  अपने सहकर्मी के साथ रोज ऑटो में जाते थे उसका फ़ोन आया कि आ जाओ हम घर से निकले तो वो अपनी मोटर साईकिल पर आया हुआ था, हम उसकी मोटर साईकिल पर लद लिये। सड़कों पर दूर दूर तक ऑटो और टेक्सियाँ कहीं दिखाई नहीं दे रही थीं।

    पर आज कमाल की बात हुई कि हम केवल १० मिनिट में ही ऑफ़िस पहुँच गये जो कि रोज से लगभग आधा है, और तो और बसें भी अपनी पूरी स्पीड से चल रही थीं, ऐसा लगा कि ये ऑटो और टेक्सी वाले ही ट्राफ़िक न्यूसेंस करते होंगे, तभी तो कहीं भी कोई ट्राफ़िक नहीं, ऐसा लग रहा था कि हम मुंबई नहीं कहीं ओर हैं, और इस शहर में ऑटो और टेक्सियों की पाबंदी है।

    सी.एन.जी. गैस की कीमत ३३% बढ़ायी गई है, और ऑटो यूनियनों की मांग थी कि बेस फ़ेयर १.६ किमी के लिये ९ रुपये से बढ़ाकर १५ रुपये कर दिया जाये और उसके बाद प्रति किमी ५ से बढ़ाकर ६.५० रुपये कर दिया जाये। तो मांग मान ली गई और बेस फ़ेयर ९ रुपये से बढ़ाकर ११ रुपये कर दिया गया और उसके बाद प्रति किमी. ५ से बढ़ाकर ६.५० रुपये कर दिया गया है। सीधे सीधे २५% की ऑटो किराये में बढ़ौत्तरी कर दी गई है। अभी तक हमें एक तरफ़ के ४० रुपये लगते थे अब ५० रुपये लगेंगे, याने कि महीने के ५०० रुपये ज्यादा खर्च होंगे।

    अब सरकार को कन्वेन्स एलाऊँस ८०० से बढ़ाकर २००० रुपये कर देना चाहिये जिससे आयकर में ही कुछ राहत मिले।

    पूरा मुंबई बिना ऑटो और टेक्सी के बहुत ही अच्छा लग रहा था, अगर इनको हटा दिया जाये और बेस्ट अपनी बसें बड़ा दे तो ज्यादा अच्छा है।

    शाम को ऑफ़िस से निकले तो फ़िर ऑटो की तलाश शुरु की, क्योंकि हमारे सहकर्मी को कुछ काम था तो पहले आधे घंटे तक तो ऑटो ही नहीं मिला फ़िर सोचा कि चलो बस से बोरिवली जाते हैं और फ़िर वहाँ से अपने घर तक की बस मिल जाती है, तो थोड़े इंतजार के बाद ही सीधे घर के ओर की ही बस मिल गई। बस के पिछले दरवाजे पर लटकते हुए अगले स्टॉप पर अंदर हो पाये। फ़िर थोड़ी देर में ही बस लगभग खाली जैसी थी, तो हमने कंडक्टर से पूछा ये रोज ऐसी ही खाली आती है क्या ? वो बोला कि आज खाली है ऑटो के हड़ताल के कारण लोग ऑफ़िस नहीं जा पाये।

    खैर हम घर पहुँचे तो टीवी पर खबर देखी कि दिल्ली में तो लूट ही मच गई है, पहले २ किमी के लिये २० रुपये और फ़िर २ किमी. के बाद ६.५० रुपये कर दिया गया है। शायद अब दिल्ली में ऑटो वाले मीटर से चलें।

    खैर अपन तो आम जनता है और हमेशा से अपनी ही जेब कटती है और हम कुछ बोलते नहीं हैं, बोल भी नहीं पाते हैं। बस हमेशा लुटने को तैयार होते हैं, और हम कर भी क्या सकते हैं।

Monday, June 21, 2010

आपके डेस्कटॉप पर क्या है ? कहीं कोई आपकी फ़ाईलों से फ़ायदा तो नहीं उठा रहा है ? [What's on Desktop ? Anyone is using your infromation ?]

    आपके डेस्कटॉप पर कितना कचरा है और कितनी काम की फ़ाईले हैं, उसमें कितनी सार्वजनिक हैं, कितनी निजी हैं, कितनी गोपनीय और कितनी अतिगोपनीय हैं। क्या कभी सोचा है ?

    सोचा भी है तो कभी ध्यान नहीं दिया, कभी अपना परीक्षा का एन्ट्री टिकट की पी.डी.एफ़. फ़ाईल छोड़ दी, कभी कोई महत्वपूर्ण दस्तावेज काम करते करते डेस्कटॉप पर छोड़ दिया, अपने वित्तीय आंकड़ों को छोड़ दिया। अपने कुछ निजी चित्र जो कि शायद किसी से भी शेयर नहीं करना थे, वे डेस्कटॉप पर ही कॉपी करके छोड़ दिये हैं।

    हम बहुत ही ज्यादा आलसी नहीं हैं ? अपने काम के महत्वपूर्ण दस्तावेजों को संभालने में ? सोचिये अगर ढंग से जमाया जाये तो कितना समय लगेगा। अरे १ मिनिट ज्यादा लगेगा, परंतु हम इधर से उधर घूमना, गप्पें मारने में वो एक मिनिट गंवाना उचित समझते हैं। परंतु दस्तावेजीकरण में नहीं।

    डेस्कटॉप पर कई बार कुछ फ़ाईलें ऐसी होती हैं, जो किसी एक आदमी को न बतानी हो और वो ही आपके कम्प्य़ूटर पर आकर बैठ जाये और गलती से उसकी नजर उस फ़ाईल पर पढ़ जाये, और वो खोल ले तो !!! आप तो संकोच के मारे मरे ही जा रहे हैं, तो ऐसी परिस्थितियों से बचने के लिये १ मिनिट बहुत जरुरी है।

    अगर कोई जरुरी फ़ाईल ढ़ूँढ़नी है, तो नहीं मिलेगी क्योंकि आपको याद ही नहीं है कि वह फ़ाईल कहाँ सेव कर दी है, फ़िर ढूँढते रहेंगे और अपना कीमती वक्त बर्बाद करते रहेंगे। नहीं !!!

    अगर सभी श्रेणियों के फ़ोल्डर एक फ़ोल्डर के अंदर बनाकर अच्छे से दस्तावेजीकरण कर दिया जाये तो वक्त की बचत भी होगी और एक तरह के दस्तावेज एकदम मिलेंगे।

    जैसे ओफ़िस का एक फ़ोल्डर बना लिया - फ़िर अलग अलग प्रोजेक्ट के फ़ोल्डर, और निजी नाम से एक और भी जरुरत के अनुसार और फ़िर प्रोजेक्ट फ़ोल्डर में जरुरत अनुसार फ़ोल्डर बना सकते हैं, जिससे जब किसी प्रोजेक्ट की फ़ाईल की जरुरत हो तो एकदम से उस फ़ोल्डर में जाकर मिल पाये।

    थोड़े से आत्मअनुशासन से अपने गोपनीय दस्तावेजों की गोपनीयता बचा सकते हैं। अब खुद देखिये कि आपके डेस्कटॉप पर कोई ओर बैठ जाये तो कौन कौन सी फ़ाईलें नहीं दिखना चाहिये, तो शुरु हो जाईये अपना डेस्कटॉप की फ़ाईलों को करीने से लगाने में, बात मानिये पहली बार १० मिनिट से ज्यादा नहीं लगेंगे। और ज्यादा सुखी और खुशी महसूस करेंगे।

टेलिकॉलर्स, टेलिवार्ता, ३७ लाख के लिये बीमा और रिलायंस फ़ार्मा फ़ंड का विश्लेषण [Telecallers, Call, Insurance for 37 lacs, Reliance Farma Fund ]

    आजकल लगभग हर रोज कहीं न कहीं से टेलीकालर्स के कॉल से परेशान हैं, DND चालू है तब भी लगता है कि इन लोगों पर सरकार का कोई डर नहीं है और बेधड़क फ़ोन खटका रहे हैं, फ़ोन आते हैं २ प्रकार की कंपनियों के, क्रेडिट कार्ड और इंश्योरेन्स कंपनी। और दोनों से कैसे निपटना है वो हमने सीख लिया है - आप भी देखिये।

१. क्रेडिट कार्ड -

कॉलर - “सर, मैं स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया से बोल रही हूँ”

मैं - “ क्यों बोल रही हैं, मत बोलिये”

कॉलर - “सर यह फ़ोन क्रेडिट कार्ड के लिये किया गया है, क्या आप स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया का कार्ड उपयोग करते हैं”

मैं - “ जी हाँ करते हैं” [बिल्कुल नहीं करते हैं, और दूसरी तरफ़ से खुद ही फ़ोन कट हो जाता है :D]

२. इंश्योरेन्स कंपनी -

कॉलर - “सर, मैं टाटा ए.आई.जी. इंश्योरेन्स कंपनी से बोल रही हूँ”

मैं - “ क्यों बोल रही हैं, मत बोलिये”

कॉलर - “सर एक इन्वेस्टमेन्ट सेविंग स्कीम है जो कि आपको समझाना है, जो आपके लिये बहुत अच्छी है”

मैं - “नहीं समझना है, टाईम नहीं है”

कॉलर - [हावी होते हुए] “आप एक बार समझिये तो सही, केवल हर महीने २ हजार रुपये जमा करने हैं और २५ वर्ष के बाद आपको ३७ लाख रुपये मिलेंगे, कंपनी १% और २% का बोनस भी देती है” [ फ़िर कुछ गणना बताती है]

मैं - “३७ लाख रुपये !!! आप दे ही नहीं सकते हैं, झूठ बोल रही हैं आप, क्यों लोगों को गुमराह कर रही हैं”

कॉलर - “नहीं सर, ३७ लाख आपको मिलेंगे और साथ ही मिलेगा ५ लाख का बीमा और मेडीक्लेम भी”

मैं - “नहीं नहीं सब है मेरे पास”

कॉलर - “सर इतनी सुविधाएँ और किसी प्रोडक्ट में नहीं है और रिटर्न भी”

मैं - “चलिये अच्छा मैं आपकी पॉलिसी ले लेता हूँ,बशर्ते कंपनी मुझे यह लिख कर दे कि ३७ लाख रुपया मिलेगा, २५ वर्ष के बाद”

कॉलर - “नहीं सर, कोई भी कंपनी यह लिखकर नहीं दे सकती कि ३७ लाख मिलेगा, वैसे अगर ज्यादा मिला तो ?”

मैं - “अगर लिखकर नहीं दे सकते तो दावा क्यों करते हो, और अगर ज्यादा मिले तो कंपनी रख ले मुझे तो केवल ३७ लाख से मतलब है”

कॉलर - “नहीं सर कंपनी ऐसा नहीं कर सकती”

मैं - “नहीं फ़िर मेरा कोई इंटरेस्ट नहीं है, अगर आप लिखकर दें कि ३७ लाख मिलेगा तो मेरा नंबर आपके पास है ही, आप फ़ोन करके अपना एजेन्ट मेरे पास भेज दीजियेगा, मैं हाथों हाथ पॉलिसी ले लूँगा”

कॉलर - [हताश होकर] “नहीं सर लिखकर नहीं दे सकते !” और फ़ोन काट देती है।

    यहाँ पर एक बात रखना चाहूँगा, अगर इश्योरेन्स कंपनियाँ जानती हैं कि अगले २५ वर्षों में इतना रिटर्न मिलेगा पर IRDA के नियम से वे लिखकर कुछ नहीं दे सकती हैं, तो क्यों हम ULIP और जमा वाले इश्योरेन्स उत्पाद लेते हैं, सीधे म्यूचयल फ़ंड में क्यों नहीं बचत करें।

    मैंने एक SIP शुरु की है रिलायंस फ़ार्मा बहुत ही अच्छा म्यूचयल फ़ंड है, और इसका प्रदर्शन बहुत ही जोरदार रहा है, और मेरा मानना है कि आने वाले समय में फ़ार्मा क्षैत्र की बिक्री बड़ने ही वाली है, तो मोनोपॉली जैसा सेक्टर है, सेक्टर फ़ंड में इससे अच्छा और कोई फ़ंड नहीं लगता। अगले ५ वर्षों में इसमें बहुत अच्छे रिटर्न्स की उम्मीद है और लंबी अवधि में तो और भी ज्यादा।

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इन्श्योरेन्स के लिये पढें [चटका लगायें]

Sunday, June 20, 2010

कुछ खरीदारी मैगी मसाला पास्ता, सी.एफ़.एल., पेस्ट्री, पढ़ने के लिये बच्चों को रिश्वत ? [एक सवाल]

   कल ऐसे ही घर से दोपहर के वक्त सामान लेने के लिये निकला अब हँसिये मत घर के लिये समान तो सब ही लाते हैं, बस एक दूसरे को बताते हुए शर्म खाते हैं, नहीं लाओ तो वीकेंड बर्बाद और पूरा वीक भी वीकेंड जैसा ही रहता है।

    सबसे पहले गये किराना दुकान पर, हमें बोला गया था कि मैगी का पास्ता मसाला मैनिया लाना है, हमने दुकानदार को वही बोला तो जबाब मिला कि मसाला मैनिया कुछ नहीं आता, मसाला  और कुछ अजीब सा नाम बोला तो हमने कहा कि यही दे दो २ पैकिट, ऐसा लग रहा था कि हमें ये सब चीजें पता न होने से यह लग रहा है कि हम आऊटडेटेड होते जा रहे हैं। फ़िर जेब से एकॉर के फ़ूड कूपन निकाले और कुछ चिल्लर निकालकर पेमेन्ट किया। वैसे तो और भी किराना स्टोर हैं परंतु यह सुपरबाजार जैसा है और अपने कस्बे के जैसा भी है, अगर ऑर्डर दो तो समान निकाल भी देता है, नहीं तो खुद नये जमाने के हिसाब से शॉपिंग कर लो अपनी बास्केट उठाकर।

    वहाँ से निकले तो हमें सी.एफ़.एल. लेनी थी, किराना पर पूछा तो बोला नहीं पास की दुकान पर मिलेगी, हम चल दिये अपना झोला उठाये, जी हाँ अपना झोला क्योंकि मुंबई में प्लास्टिक की पोलिथीन को प्रतिबंधित कर दिया गया है।

--------------- सी.एफ़.एल. के लिये हार्डवेयर की दुकान पर -----------------------------------

भैया, एक सी.एफ़.एल. देना,

“कितने वोल्ट की दूँ ?”,

हम बोले दे दो १२ वोल्ट की, पर ये बताईये कि इस पर कितनी गारंटी है,

“छ: महीने की”,

फ़िर हम बोले ओह मतलब जो फ़्यूज हुई है हम उसका आलरेडी ९ महीने ज्यादा इस्तेमाल कर चुके थे, मतलब १५०% का फ़ायदा।

“नहीं सा..ब वैसे तो यह ३००० घंटे चलती है और कई बार ३-४ साल भी चल जाती है, पर गारंटी छ: महीने की ही है”

ओह, अब हम याद करने लगे कि ये ३००० घंटे क्या हमारा परिवार पिछले १५ महीने में नहाता ही रहा होगा क्या ?

“वैसे आपको बाथरुम में लगानी है तो १२ वोल्ट की जगह ८ वोल्ट की लीजिये, लोग तो ५ वोल्ट की भी लगाते हैं”

हमने कहा चलो ८ वोल्ट की ही दे दो।

“टेस्ट कर देता हूँ”

फ़िर उसने सी.एफ़.एल. के ऊपर ही आज की तिथि और गारंटी खत्म होने की तिथि दोनों ही अंकित कर दीं।

--------------------------------- मोजिनीज पर ----------------------------------------------

    वहाँ से निकले किसी ओर दुकान के लिये परंतु वहीं मोजिनीज पेस्ट्री की दुकान दिख गई तो सोचा चलो कोई चॉकलेट वाली पेस्ट्री बेटेलाल के लिये ले लेता हूँ, क्योंकि कई दिनों से हमने पेस्ट्री नहीं खिलाई है, एक चॉकलेट फ़ुल्ली लोडेड वाली पेस्ट्री घर के लिये पैक करवा ली।

------------------------------स्टेशनरी की दुकान पर -----------------------------------------

    मुंबई में लगभग सभी दुकानें मल्टी टास्किंग करती हैं, अपने नाम के अन्रुरुप तो समान मिलता ही है परंतु और भी समान मिल जायेगा, मसलन स्टेशनरी की दुकान पर प्लास्टिक का समान, फ़ोटोकॉपी, गेम्स सीडी और भी बहुत कुछ…

    हमारे बेटेलाल के एग्जामस शुरु होने वाले हैं सोमवार से और स्कूल में फ़ाईल को फ़्लोरोसेंट रेड कलर में कवर करके मंगाया गया है, तो कवर लेना था, खुद के लिये एक फ़ाईल लेनी थी, और जिलेटिन लेनी थी बेटेलाल की किताबों के लिये, स्कोर शीट में किताबें मैंटेन करने के भी ५ नंबर जो हैं।

    सड़क से ही एक लड़के ने दुकानदार से कुछ पूछा, दुकानदार ने कहा “है आ जाओ”, तो लड़के की मम्मी ने वहीं से कहा कि बेटा नहीं मिलेगा चलो कल देखेंगे । लड़का बोला नहीं मम्मी है चलो …. और वो जबरदस्ती खींचता हुआ मम्मी को दुकान में ले आया । लड़्के को गेम्स की सीडी चाहिये थी।

    दुकानदार ने ४-५ सीडी निकालकर दे दी और बोला कि सील मत खोलना, अगर सील खुल गई तो आपने खरीद ली है यह मान लिया जायेगा, हमने सोचा वाकई यहाँ पर सभी लोग कितने प्रोफ़ेशनल हैं, नहीं तो खरीददार का क्या है वो तो खोलकर देख ही लेगा । साथ में दुकानदार चेता भी रहा था, एक एक सीडी महँगी है, जिस गेम की लेनी हो वही लेना, ऐसा नहीं हो कि दूसरे गेम की ले जाओ और आपके पैसे फ़ालतू में खर्च हो जायें।

बात तो एकदम सही कह रहा था।

एक गेम की सीडी खरीद ली गई, और दुकानदार ने ३८० रुपये दाम बताया तो वे बोलीं कि इस पर तो ३९० लिखा है आपने बस इतना ही कम किया।

“नहीं मैंने कुछ कम नहीं किया है, देखिये ३८० रुपये ही लिखा है”

कुछ तो कम कीजिये ना अपनी तरफ़ से कुछ तो डिस्काऊँट दीजिये ??

“मैडम ये डिस्काऊँटेड प्राईस ही है”

तो वे अपने पर्स में खुल्ले तलाशने लगीं।

“५०० का नोट दे दीजिये मैं पूरी ईमानदारी से बाकी पैसे लौटाता हूँ”

उसका इतना बोलते ही हमें भी हँसी छूट गई।

    साथ में वे बोलती भी जा रही थीं - आज इसने पूरे ४ घंटे पढ़ाई की है, परसों से एग्जाम है, फ़िर अपने बेटे से भाव कर रही थीं कि यू गेट वन गेम सी.डी. एस आई प्रामिस्ड, नाऊ यू हैव टू रीड २ होवर्स मोर, ओनली ऑफ़्टर देट यू विल प्ले गेम  ओन कम्पयूटर ।

बेटा भी कुछ आरग्यूमेंट करता जा रहा था।

और वे माँ बेटे चले गये।

    फ़िर मैं दुकानदार से मुखतिब हुआ कि बताओ आजकल बच्चों को पढ़ाने के लिये भी रिश्वत देना पड़ती है, और हमारे जमाने में पूरा पढ़ लो तब भी जूते ही पढ़ते थे, ऐसे पढ़ाई करते हैं, याद तो पूरा है नहीं, ये सब करने से क्या फ़र्क पड़्ता है और भी बहुत कुछ [ मैं याद नहीं करना चाहता ..]

और आजकल बस कैसे भी करके पढ़ लें सिलेबस पूरा कर लें, याद है या नहीं, क्वालिटी है या नहीं उससे किसी को कोई मतलब नहीं है।

हमने भी अपना पेमेन्ट किया और घर चल दिये।

    सोच रहे थे कि हमारे बेटे ने भी तो आज जितना पढ़ाया उतना पढ़ लिया और ये पेस्ट्री कहीं हम भी रिश्वत के लिये ही तो नहीं ले जा रहे हैं, या फ़िर ये केवल पिता का प्यार है कि बेटेलाल ने बहुत दिनों से पेस्ट्री नहीं खाई है, पेस्ट्री देखकर ही खुश हो जायेगा, और बोलेगा -

“अरे वा डैडी, आप तो बहुत ही प्यारे हो, मैंने तो बहुत दिनों से पेस्ट्री नहीं खाई थी, मजा आ गया डैडी…”

सोच रहा हूँ…

Friday, June 18, 2010

शीघ्र सेवानिवृत्ति कैसे ? भाग ४ [सेवानिवृत्ति से प्राप्त होने वाले धन का कैसे प्रयोग करें] [Early Retirement How ? Part 4]

    सेवानिवृत्ति धन को कैसे निवेश करें, यह सबसे बड़ी सरदर्दी है, और इस बारें में कोई भी खुलकर बात नहीं करना चाहता है।

    यह तो तय है कि इस धन को जोखिम वाले वित्तीय उत्पादों में नहीं लगा सकते हैं जैसे कि शेयर बाजार।

    इस धन को परंपरागत निवेशों में निवेश कर सकते हैं, परंतु वहाँ पर हमारा धन मुद्रास्फ़ीति से मुकाबला नहीं कर पाता है।

    मुद्रास्फ़ीति से मुकाबले के लिये सबसे अच्छा वित्तीय उत्पाद है, स्विप (SWP - Systematic Withdraw plan), सिप का बिल्कुल उल्टा जैसे सिप में हम पैसे जमा करते हैं, वैसे ही स्विप में जमा रकम से कुछ निर्धारित रकम हम निकालते हैं। इस वित्तीय उत्पाद को कम ही लोग उपयोग करते हैं, क्योंकि लोगों को इसके बारे में जानकारी ही नहीं है, इसका उपयोग कैसे किया जा सकता है।

    आप अपने स्विप विभिन्न म्यूचयल फ़ंड में लगा सकते हैं, जिससे अगर कोई एक फ़ंड अच्छा प्रदर्शन नहीं कर रहा हो तो आप उसे किसी दूसरे फ़ंड में स्विच कर सकें।

स्विप के फ़ायदे -

स्विप में आप निर्धारित रकम तो निकालते ही हैं तथा साथ ही यह रकम बाजार के प्रदर्शन के आधार पर बदलती रहती है, लंबी अवधि के लिये देखेंगे तो शायद ही इससे अच्छा किसी और वित्तीय उत्पाद का प्रदर्शन होगा।

कितना निकालें -

अपने निवेश का १ % निकालें यह मानक के अनुरुप है। अगर ज्यादा निकालेंगे तो ठीक नहीं रहेगा।

उदाहरण - अगर ५ लाख रुपये जमा कर रहे हैं तो मासिक ५,००० रुपये निकालना चाहिये।

लंबी अवधि के लिये स्विप का परिणाम देखें -

    ५ लाख रुपये १७ जून २००४ को रिलायंस ग्रोथ ग्रोथ में स्विप के लिये निवेश किया और ५,००० रुपये मासिक निकासी किये। तो उसने ६ वर्षों में ३,६०,००० रुपये तो निकासी किये ही और साथ में मूलराशि २४,७१,६१० रुपये हो गई। जी हाँ यह असल के आँकड़े हैं, इसके लिये आप गूगल पर SWP calculator search कर गणना कर सकते हैं।

    ५ लाख रुपये १७ जून २००९ को रिलायंस ग्रोथ ग्रोथ में स्विप के लिये निवेश किये और ५००० रुपये मासिक निकास किये।  तो इन १२ महीनों में निकासी रकम हुई ६०,००० रुपये और साथ में मूलराशि हो गई ६,११,९१५ रुपये।

    इस तरह से अपने रुपयों को ४-५ म्यूचयल फ़ंडों में निवेश करें और बाकी का ५ लाख रुपये जो कि आपने अपने बच्चे की पढ़ाई के लिये रखा है उसे लंबी अवधि के लिये अच्छे म्यूचयल फ़ंडों में निवेश करें। जिससे जरुरत के समय आपके पास जरुरत से कहीं ज्यादा रकम होगी।

आपको भविष्य में कभी भी धन के लिये किसी को देखना ही नहीं पड़ेगा।

    मैं तो अपनी शीघ्र सेवानिवृत्ति की योजना बना चुका हूँ, अगर आप भी बना रहे हैं और कोई सवाल हो तो जरुर पूछिये, टिप्पणी में नहीं तो ईमेल में कैसे भी। मैं आपके सवालों का उत्तर जल्दी से जल्दी देने की कोशिश करूँगा।

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शीघ्र सेवानिवृत्ति कैसे ? भाग ३ [वित्तीय लक्ष्य को कैसे प्राप्त करें, १५ लाख या १५ करोड़ ?] [Early Retirement How ? Part 3]

वित्तीय लक्ष्य को कैसे प्राप्त करें -

    वित्तीय लक्ष्य निर्धारित करने से कुछ नहीं होता, उन्हें प्राप्त करना भी एक चुनौती है। सबसे बड़ा प्रश्न है कि वित्तीय लक्ष्य कैसे प्राप्त करें ?

    इसके लिये हमें विभिन्न वित्तीय उत्पादों को समझना होगा, जो कि हमें वित्तीय लक्ष्य प्राप्त करने में मदद करते हैं।

१. बैंक की सावधि जमा (Fixed Deposit) , आवर्ती जमा (Recurring Deposit)

२. पोस्ट ऑफ़िस की सावधि जमा (Fixed Deposit) , आवर्ती जमा (Recurring Deposit), पी.पी. एफ़. इत्यादि

३. सीधे शेयर बाजार में निवेश करना

४. म्यूचयल फ़ंड के द्वारा बाजार में निवेश करना

    उपरोक्त दिये गये उत्पादों में १ और २ नंबर वाले उत्पाद हमारे परंपरागत उत्पाद हैं, और उनमें ब्याज कम मिलता है, पर निवेश सुरक्षित है।

    ३ और ४ नंबर के उत्पाद में वही निवेशित कर सकता है जो कि जोखिम लेने की क्षमता रखता हो। शीघ्र सेवानिवृत्ति के लिये उम्र कम होती है इसलिये जोखिम लिया जा सकता है। पर यह नहीं कहते कि पूरा पैसा आप बाजार में लगायें, उसका सूत्र होता है १०० में से अपनी उम्र घटा लें उतना आपको शेयर बाजार में निवेश करना चाहिये और जितनी उम्र है उतना १ व २ नंबर वाले उत्पादों में निवेश करना चाहिये।

उदाहरण के लिये - उम्र है ३० वर्ष तो १०० में से ३० कम किया, ७० प्रतिशत निवेश शेयर बाजार में और ३०% प्रतिशत सुरक्षित निवेश में होना चाहिये।

सावधि जमा (Fixed Deposit) , आवर्ती जमा (Recurring Deposit) में जमा करने पर एक तय ब्याज दर से ही परिपक्वता पर भुगतान होता है।

    जबकि शेयर बाजार में सीधे निवेश और म्यूचयल फ़ंड के द्वारा निवेश करने पर  जोखिम ज्यादा है पर लंबी अवधी में परिपक्वता पर भुगतान भी कई गुना ज्यादा होता है। इस विकल्प में थोड़े समय २-३ वर्ष के लिये निवेश की तो बिल्कुल ही नहीं सोचें।

    शेयर बाजार में निवेश करने के लिये अच्छी कंपनियों का चुनाव करें और बेहतर मार्गदर्शन के लिये अपने शेयर ब्रोकर या  वित्तीय योजनाकार (Certified Financial Planner) की सेवा ली जा सकती है।

    म्यूचयल फ़ंड में निवेश हमेशा सिप (Systematic Investment Plan) के द्वारा ही करें, और लंबी अवधि के लिये विविध क्षैत्र (Diversified Sector) में निवेश करने वाले फ़ंड का चुनाव बेहतर है। क्षैत्रिय फ़ंडों (Sector Funds)  का भी चुनाव कर सकते हैं जैसे कि फ़ार्मा फ़ंड, बैंकिंग सेक्टर फ़ंड इत्यादि। क्षैत्रिय फ़ंडों चुनाव करने के पहले अपने वित्तीय योजनाकार (Certified Financial Planner) से जरुर मशवरा कर लें।

    सिप (Systematic Investment Plan) में किये गये निवेश की वापसी पिछले १० वर्षों की लगभग १५-२० % है, और विगत ५ वर्षों की ३५%  तक वापसी है।

उदाहरण -

    अगर १८ जून २००० को २००० रुपये की सिप में आज तक निवेश किया जाता तो उसकी कितना निवेश होता याने कि १८ जून २०१० तक -

१८,२२,४०२ रुपये याने कि ६७९.४३ % तक वापसी

    यह गणना मैंने रिलायंस ग्रोथ ग्रोथ प्लान के लिये की है, आप भी यह गणना यहाँ पर चटका लगाकर कर सकते हैं

    लंबी अवधि में निवेश करने के लिये शेयर बाजार में सीधे निवेश और म्यूचयल फ़ंड सबसे अच्छी जगह हैं।

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Thursday, June 17, 2010

एक मुलाकात अलबेला खत्री जी के साथ मुंबई में

Albela Khatri & Vivek Rastogi    यह चेहरा आपने बुद्धु बक्से पर कई बार देखा होगा अरे मेरा नहीं जो मेरे साथ हैं, ये हैं अलबेला खत्री जी, प्रसिद्ध हास्य व्यंग्य कवि और हास्य इंटरटेन्मेन्ट व्यक्तित्व।

Albela Khatri & Vivek Rastogi Mumbai प्लेट की तरफ़ मत देखिये उसका माल तो हम हजम कर चुके हैं। :)

    अलबेला जी से बहुत सारी बातें हुईं, भाषा के उपयोग पर भी बहुत सी चर्चा हुई, अगर आज के साहित्यकार आज से ६० वर्ष पहले उपयोग होने वाली हिन्दी लिखेंगे तो शायद ही आज की पीढ़ी पढ़ना पसंद करेगी और अगर करेंगे भी तो कुछ चुनिंदा लोग।

    भाषा वह होनी चाहिये जो कि सबको आसानी से समझ में आ जाये । भाषा ज्यादा क्लिष्ट होने पर पाठक या श्रोता कम या गायब हो जाते हैं।

    वहीं पर हमारी मुलाकात हुई शंभू शिखर जी से भी वे भी हिन्दी ब्लॉगर हैं और लॉफ़्टर ३ में आ चुके हैं।

    जितनी देर हम अलबेला जी के साथ रहे मुंबई में बारिश पुरजोर बरस रही थी, बाहर मुंबईवासी बारिश से तरबतर हो रहे थे और हम ब्लॉगरस में। साथ ही फ़ोन पर हमारी बात हुई पाबला जी से, और वे भी हमारी मुलाकात का हिस्सा बने।

शीघ्र सेवानिवृत्ति कैसे ? भाग २ [कितना वित्तीय लक्ष्य निर्धारित करें] [Early Retirement How ? Part 2]

    वित्तीय लक्ष्य निर्धारित करते समय मुद्रास्फ़ीति का भी ध्यान रखें । लगभग ६% प्रतिवर्ष से मुद्रास्फ़ीति की गणना करें।

कितना वित्तीय लक्ष्य निर्धारित करें -

१. बच्चे की शिक्षा - शीघ्र सेवानिवृत्ति लक्ष्य को प्राप्त करते समय यह माना गया है कि मासिक खर्चों में १२ वीं कक्षा तक का शिक्षा खर्च आपने जोड़ लिया है। उच्च शिक्षा के लिये अभी से निवेश करके रखें जैसे अगर अभी ५ लाख रुपये उच्चशिक्षा में लगते हैं तो ११ वर्ष बाद लगभग १५ लाख रुपये होने चाहिये।

२. सेवानिवृत्ति धन - सेवानिवृत्ति धन इतना होना चाहिये कि आपका मासिक खर्च भी चलता रहे और हो सके तो उसमें से कुछ बचत भी हो सके, अगर आप अपने मन माफ़िक कुछ ओर कार्य शुरु कर रहे हैं, जिससे आमदनी हो रही है तो फ़िर यह तो सोने पर सुहागा है। मूल प्रश्न कितना वित्तीय लक्ष्य होना चाहिये, यह आपको खुद ही गणना करना होगी, आज के जरुरी खर्चे और बच्चे की शिक्षा जोड़कर जो भी रकम आती हो, वह है आपकी पेन्शन तो उसका १०० गुना ज्यादा आपको सेवानिवृत्ति धन के मद में रखना होगा।

उदाहरण - आज के मासिक खर्च २०,००० रुपये होते हैं, तो २० लाख रुपये चाहिये सेवानिवृत्ति के लिये। आकस्मिक खर्च ६ महीने के मासिक खर्च के बराबर मतलब १,२०,००० रुपये।
तो सेवानिवृत्ति धन हो गया २१,२०,००० रुपये।

शिक्षा खर्च और शीघ्र सेवानिवृत्ति धन मिलाकर हो गया लगभग २६ लाख रुपये।

रिटायरमेंट केलकुलेटर के लिये गूगल में सर्च कर गणना कर सकते हैं।

    मेरा मानना है कि सेवानिवृत्ति संतुष्ट जीवन होता है और सेवानिवृत्ति वही ले सकता है जिसका मन संतुष्ट हो चुका हो, नहीं तो मरते दम तक कार्य करके पैसा कमाना ही व्यक्ति का एकमात्र उद्देश्य होता है, और वह पैसा ही उसके काम नहीं आता है और तो और साथ में भी ले जा नहीं सकते, सब यहीं पर छोड़कर जाना पड़ता है।

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Sunday, June 13, 2010

छोटा सा इंटरनेशनल मुंबई ब्लॉगर मिलन, हिन्दी भाषा के विकास पर चिन्तन

    मेरा पन्ना ब्लॉग के जितेन्द्र चौधरी जी कुवैत से मुंबई निजी यात्रा पर आये हुए हैं, तो उनसे थोड़ा सा समय लेकर आज १३ जून २०१० को  एक छोटा सा इंटरनेशनल मुंबई ब्लॉगर मिलन आयोजित किया गया । आयोजन का स्थान था, गोरेगांव पूर्व में फ़िल्म सिटी के सामने जावा ग्राईंड कैफ़े शॉप।

    ब्लॉगर मीट में आमंत्रण तो सभी ब्लॉगर्स को भेजा गया था परंतु अपने निजी कार्यों के चलते और मिलन अलसुबह ९.३० बजे रखने से कुछ ही ब्लॉगर्स आ पाये।

    सबसे पहले देवकुमार झा जी, फ़िर हम विवेक रस्तोगी, फ़िर शशि सिंह जी, फ़िर जीतू भाई (जितेन्द्र चौधरी), अनिल रघुराज जी और अभय तिवारी जी पहुंचे।

फ़ोटो एलबम देखने के लिये फ़ोटो पर क्लिक करें ।  

शशि सिंह जी और जीतू भाई की बहुत पहले की दोस्ती है, ये दोनों हिन्दी ब्लॉग जगत के शुरुआती योद्धा हैं। देवाशीष को भी याद किया गया जो कि उनके उसी दौर के मित्र थे, जब कि हिन्दी चिठ्ठा लिखने वाले कुछ ५० ब्लॉगर्स ही होंगे।

    जीतू भाई ने अपने अनुभव साझा किये, हिन्दी ब्लॉगजगत के शुरुआती दिनों के, जब तकनीकी रुप से किसी को भी ज्यादा महारत हासिल नहीं थी और लोगों को चैटिंग कर करके उनकी समस्याएँ हल करके हिन्दी ब्लॉगिंग के लिये उत्साहित किया जाता था, आज तो फ़िर भी ब्लॉगर्स तकनीकी रुप से काफ़ी सक्षम हैं और हिन्दी के लिये बहुत ही ज्यादा तकनीकी समर्थन उपलब्ध है।

बीच में अलबेला खत्री जी का फ़ोन आया, वे मुंबई आये हुए हैं और हमसे मिलने की इच्छा जाहिर की तो हमने बताया कि अभी एक छोटी सी हिन्दी ब्लॉगर मीट हो रही है, और अगर हमें पहले से पता होता तो हम आपको भी सूचित कर देते। जल्दी ही अलबेला खत्री जी से भी मुलाकात होगी।

हिन्दी भाषा और उसके अवरोधों पर विशेष चर्चा की गई, कि हिन्दी भाषा का विकास कैसे हो ?

    हिन्दी के विकास के लिये क्षैत्रिय भाषाओं का विकास होना बहुत जरुरी है, अगर क्षैत्रिय भाषाओं का विकास होता है तो हिन्दी का विकास तो अपने आप ही हो जायेगा। नये शब्दों के लिये जो बोझ हिन्दी के कन्धे पर है वह भी बँट जायेगा, और विकास तीव्र गति से होगा।

    क्षैत्रिय भाषाएँ हिन्दी रुपी वृक्ष की टहनियाँ हैं। बोलियों और भाषाओं की बात की गई। अगर आजादी के समय प्रशासन की भाषा संस्कृत होती तो शायद आज हमारी सर्वमान्य भाषा अंग्रेजी की जगह संस्कृत होती। अंग्रेजी बोलना हमारा मजबूरी हो गया है। हिन्दी का सत्यानाश हिन्दी बोलने वालों ने ही किया है। अब जैसे फ़्रेंच लोगों को देखें तो उन्हें अंग्रेजी आती है परंतु वे फ़्रेंच में ही बात करते हैं, क्योंकि वे अपनी भाषा से प्यार करते हैं, भाषा का सम्मान करते हैं।

    आज अंग्रेजी के मामले में हम हिन्दुस्तानी अंग्रेजों को टक्कर दे रहे हैं, उनसे आगे निकल रहे हैं।

    जीतू भाई ने भाषा के संदर्भ में ही अपना एक यूरोप का मजेदार किस्सा सुनाया, वे अपने दोस्त के साथ ब्रिटिश म्यूजियम घूमने गये थे और एक स्टेच्यू के सामने खड़े होकर मजाक कर रहे थे और कुछ टिप्पणियाँ कर रहे थे, वहीं पास में एक वृद्ध अंग्रेज खड़ा हुआ था उसने अवधी में जबाब दिया, और अवधी के ऐसे शब्दों का उपयोग किया कि हम लोग भी चकरा गये कि अरे अवधी के ये शब्द कैसे बोल पा रहा है, जिन्हें हम भी अच्छॆ से नहीं जानते हैं। तो फ़िर उसने बताया कि मैं भारत में ही पैदा हुआ था और हिन्दी बहुत ही अच्छी भाषा है, हिन्दी बहुत ही मीठी भाषा है और मैं हिन्दी भाषा से बहुत प्रेम करता हूँ वह इतनी अच्छी तरह से हमारी भाषा में बात कर रहा था कि हम चकित थे क्योंकि इतनी अच्छी तरह से तो हमें भी अपनी भाषा पर अधिकार नहीं है। फ़िर तो उसे अंग्रेज से बहुत बातें हुईं।

    जीतू भाई ने एक और किस्सा बताया कि वे जर्मनी में थे और उनके एक मित्र फ़्रेंच और जर्मनी में ही बात करते थे, उन्हें अंग्रेजी भी अच्छी आती थी, पर वे हर जगह फ़्रेंच या जर्मनी में ही बात करते थे, उनसे पूछा तुम अंग्रेजी में बात क्यों नहीं करते हो, तो उसका जबाब सुनकर सन्न रह गया, कि यार ये मेरी भाषा है अगर मैं अपनी मातृभाषा की इज्जत नहीं करुँगा तो कौन करेगा।

    हमें यह महसूस हुआ कि हम लोग अपनी भाषा छोड़कर दूसरी भाषाएँ बोलना शुरु कर देते हैं, तो क्या हम लोग अपनी भाषा की इज्जत नहीं करते हैं। अगर विकल्प न हो तो ठीक है परंतु अगर विकल्प है तो हमें अपनी भाषा में ही बात करनी चाहिये।

    ज्यादा दूर जाने की जरुरत नहीं है, अगर चैन्नई में लोगों को देख लो वे अपनी तमिल भाषा में ही बात करते हैं, अगर आप हिन्दी या अंग्रेजी में बात करेंगे तो बोलेंगे नहीं आती है, परंतु अगर हिन्दी में गाली दे दो तो फ़िर जितनी अच्छी हिन्दी उन्हें आती है, उतनी हमें भी नहीं आती है। वे अपनी भाषा का सम्मान करते हैं।

   जीतू भाई ने मदुरै का अपना एक और किस्सा सुनाया, कि वहाँ ऑटो वाले सब रजनीकांत स्टाईल में गले में रुमाल बांधकर रहते हैं, और हिन्दी नहीं आती है ऐसा बताते हैं, उनकी बात कुछ पैसे को लेकर हुई, और झगड़ा बड़ता गया, पर जैसे ही इनके एक मित्र ने तैश में आकर गाली दी, तो उस ऑटो वाले की धाराप्रवाह हिन्दी सुनकर पसीने आ गये। बोला कि गाली दिया इसलिये हिन्दी में अब बोल रहे हैं, गाली क्यों दिया…।

    हिन्दीभाषी इलाका न होने पर भी इतनी अच्छी तरह से हिन्दी बोलना और समझना कैसे संभव है ? इसका सबसे बड़ा योगदान है, बॉलिवुड का, बॉलिवुड की हिन्दी फ़िल्मों के कारण सभी को हिन्दी अच्छॆ से आती है।

    दुबई में ही देख लीजिये वहाँ अरबी अल्पसंख्यक हैं, वहाँ का ट्रैफ़िक पुलिस वाला अगर गाड़ी को रोकेगा और अगर काला आदमी मिलेगा तो सीधे मलयाली में बात करना शुरु कर देगा, और अगर बोलो नहीं मलयाली नहीं तो हिन्दी में शुरु हो जायेगा, हिन्दी भी नहीं तो अंग्रेजी में बोलने लगेगा।

    हिन्दी भाषा बोलने के तरीके से ही पता चल जाता है कि उस व्यक्ति को कितनी हिन्दी बोलनी आती है, जैसे कोई “भाईसाहब” बोलेगा तो सबके बोलने का तरीका अलग अलग होगा, उससे ही पता चल जायेगा कि हिन्दी कितनी गहराई से आती है।

    सब अपनी मातृभाषा से प्रेम करते हैं और वही बोलना चाहते हैं, पर जहाँ पेट की बात आती है, मजबूरी में दूसरी भाषा सीखनी पड़ती है, केरल में ही देख लीजिये सबको हिन्दी बहुत अच्छे से समझ में आती है। पेट के लिये दूसरी भाषा सीखनी ही पढ़ती है क्योंकि वह मजबूरी है। अंग्रेजी भी हम यहाँ पेट भरने के लिये ही सीखते हैं, न कि अपने शौक से।

    जीतू भाई ने कुवैत का एक उदाहरण बताया कि एक डिपार्टमेंटल स्टोर में गये तो अरबी सबको आती है किसी को नहीं भी आती है, वहाँ पर दुकानदार होगा अरबी, खरीदने वाला होगा हिन्दी,  बीच में सेल्समैन होगा फ़िलिपिनो, तीनों बोलेंगे अपनी अपनी भाषा पर समझा देंगे। शारीरिक भाषा, अगर आप कुछ बोलना चाहो कुछ चाहिये तो आप आराम से समझा सकते हैं, और वो भी समझेगा क्योंकि पेट का सवाल है। और कई बार नहीं भी समझ में आता है तो वहाँ पर सफ़ाई करने वाले होते हैं, अधिकतर बंगाली होते हैं, और उनको अधिकतर सारी भाषाएँ आती हैं, वे समझा देते हैं। लेकिन जहाँ तक की शारीरिक भाषा का सवाल है, सब समझा सकते हैं।

    भाषा से कहीं भी अवरोध नहीं होता है, शारीरिक भाषा से भी इसकी पूर्ती की जा सकती है। हम हमारी भाषा का कितना सम्मान करते हैं, ये हम पर और हमारे समाज पर निर्भर करते हैं।

पुरानी मुंबई ब्लॉगर मिलन की रिपोर्टिंग के लिये यहाँ चटका लगायें।

Saturday, June 12, 2010

शीघ्र सेवानिवृत्ति कैसे ? भाग १ [Early Retirement How ? Part 1]

    शीघ्र सेवानिवृत्ति के लिये वित्तीय लक्ष्यों को निर्धारित करना आवश्यक होता है, दो महत्वपूर्ण तत्व हैं शीघ्र सेवानिवृत्ति की योजना बनाने के लिये - भविष्य के वित्तीय लक्ष्य और जरुरी मासिक खर्चों का आकलन ।

भविष्य के लिये वित्तीय लक्ष्य कैसे निर्धारित करें -

१. घर - रहने के लिये घर, जो कि आपकी जरुरतों के अनुसार हो सकता है।

२. कार - आपकी जरुरतों के अनुसार।

३. बच्चे की शिक्षा - बच्चे की उच्च शिक्षा में लगभग आज ८-१० लाख रुपये लगते हैं, तो मुद्रास्फ़ीति को ध्यान में रखते हुए, अपने बच्चे की उम्र के हिसाब से कितना धन होगा, निर्धारित करें।

४. बच्चे की शादी - शादी में आज लगभग १० लाख रुपये खर्चे होते हैं, कम या ज्यादा हो सकते हैं। बच्चों की शादी साधारण तरीके से भी हो सकती है।

५. सेवानिवृत्ति धन - यह इतना होना चाहिये कि कम से कम आपके मासिक खर्चे आराम से हो जायें और वर्तमान स्तर का जीवन यापन कर पायें।

कौन से वित्तीय लक्ष्य जरुरी हैं ?

१. बच्चे की शिक्षा

२. सेवानिवृत्ति धन

ये दो लक्ष्य बहुत जरुरी हैं अगर अपना घर नहीं है तो घर भी बहुत जरुरी है। अगर पैतृक घर है तो इस लक्ष्य को हटाया जा सकता है।

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शीघ्र सेवानिवृत्ति की उम्र क्या होनी चाहिये ?आपको कितने चाहिये १५ लाख या १५ करोड़ [Early Retirement !! When ?]

शीघ्र सेवानिवृत्ति कब ? [Early Retirement !! When ?]

    आज के युग में पढ़ाई कम से कम २० वर्ष की हो गई है, और जब तक युवापीढ़ी बाजार में आती है, उसकी उम्र २३-२४ वर्ष हो गई होती है, बाजार में आते ही उसकी नौकरी शुरु हो जाती है, और वह अपने घर के बुजुर्ग के बराबर ही कमाने लगता है और खर्च उनके मुकाबले लगभग बिल्कुल भी नहीं होता है। तो वह अपने शौक पूरे करता है और जो भविष्य की योजना निर्धारित करके चलता है वह अच्छे से निवेशित भी करता है। इस प्रकार वह आराम से सैटल भी हो जाता है और १२-१७ वर्ष में ही अपने सारी योजनाओं को मूर्त रुप दे सकता है, तो उसे ३० वर्ष तक नौकरी करने की आवश्यकता नहीं होती है।

    शीघ्र सेवानिवृत्ति की उम्र को निर्धारित नहीं किया जा सकता है, जब भी हमारे वित्तीय लक्ष्य पूर्ण हो जायें, तभी शीघ्र सेवानिवृत्ति की सही उम्र होती है। फ़िर भले ही वह ३० वर्ष ही क्यों न हो।

    जरुरी नहीं है कि जो कार्य आप कर रहे हैं वह अपनी इच्छा से कर रहे हों, हो सकता है कि अपनी इच्छा के विरुद्ध कर रहे हों, परंतु भविष्य की चिंता करते हुए और ज्यादा पैसा देखते हुए सोचते हैं कि अब तो यही करना होगा, अगर मन की करी तो लक्ष्य पूर्ण नहीं हो पायेगा।

    शीघ्र सेवानिवृत्ति के लिये वित्तीय लक्ष्यों का पता होना चाहिये और उन वित्तीय लक्ष्यों को प्राप्त करने के बाद कैसे सही तरीके से निवेशित किया जाये यह भी पता होना चाहिये। जिससे खर्चे अच्छे से चलते रहें और आप अपने मनपसंदीदा कार्य में सही तरीके से ध्यान लगा पायें।

    वित्तीय लक्ष्य एक ऐसी विषय वस्तु है जो कि सबके लिये अलग अलग हो सकती है, किसी के लिये १५ लाख भी शीघ्र सेवानिवृत्ति के लिये बहुत होगा और किसी के लिये १५  करोड़ भी कम होगा । तो शीघ्र सेवानिवृत्ति की उम्र तो वित्तीय लक्ष्य साफ़ होने पर ही निर्धारित की जा सकती है।

बताइये क्या आप मेरे नजरिये से सहमत हैं।

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Friday, June 11, 2010

वो १ मिनिट का दृश्य और उसके चेहरे का संतोष…

    वह बहुत तेजी से चावल खा रहा था, जिसमें शायद दाल और कुछ सब्जी मिली हुई थी, पीले रंग की पीतल की तश्तरी से बड़ा सा बर्तन था, उसके बाँहें जो कि साँवली नहीं नहीं काली ही थीं.. उसमें से मसल्स दिख रहे थे… गंदी मैली बनियान या शायद गंदे रंग की बनियान पहने हुआ.. और लुंगी को डबल कर मद्रासी श्टाईल में लपेट कर पहना हुआ था… चेहरे पर गजब का संतोष था.. समय शाम का था लगभग ६.३० बजे का.. चेहरे पर संतोष से ऐसा लग रहा था कि उसने आज जो भी काम किया है उससे वो संतुष्ट है और खुश है कि वह आज का कार्य पूरा कर सका। और यह तो शायद सभी ने महसूस किया होगा जिस दिन कार्य बराबर होता है तो भूख कुछ ज्यादा ही लगती है। दिमाग की किसी ग्रंथी का संबंध जरुर पेट से रहता है।

    यह दृश्य अपने कार्यालय से घर लौटते समय ऑटो से १ मिनिट से भी कम समय में हमने किसी घर में देखा, जो कि सड़क किनारे ही था। केवल १ मिनिट के दृश्य के लिये भी कभी कभी इंसान कितने ही दिन सोचने पर मजबूर हो जाता है।

Wednesday, June 09, 2010

शीघ्र सेवानिवृत्ति [क्यों ?] [Early Retirement Why ?]

शीघ्र सेवानिवृत्ति क्यों ?

    जब कार्य स्थल पर कठिनाईयाँ आने लगती हैं, तो बहुत से लोग इस स्थिती से पलायन करने के लिये शीघ्र सेवानिवृत्ति के लिये सोचने लगते हैं, परिवार का यह मानना होता है। परंतु आजकल की बदली हुई कार्य की परिस्थितियों को हमारे परिवार नहीं समझ पा रहे हैं , कि कितने दबाब में कार्य करना होता है, जब निजी कंपनियाँ ज्यादा रुपया देती हैं तो हरेक रुपये के एवज में निचोड़ कर काम भी लेती हैं। परिवार को लगता है कि हमारा पुत्र ज्यादा रुपया कमाकर वैभवशाली जीवन निर्वाह कर सकता है, परंतु अगर हम उस पुत्र की मनोस्थिती समझें तो शायद उसकी कार्य करने की परिस्थितियों को समझने में असमर्थ होंगे। क्योंकि जो कार्य आजकल की पीढ़ी कर रही है, जैसे कर रही है वह परिवार के बुजुर्ग समझ ही नहीं सकते, क्योंकि उन्होंने वैश्विक तौर तरीकों से कभी कार्य ही नहीं किया है और न ही उतनी क्षमता का प्रदर्शन किया है। इसका मतलब यह नहीं है कि उनकी क्षमताओं में कोई कमी थी, परंतु उन्हें उन कार्य परिस्थितियों का अंदाजा ही नहीं है।

    शीघ्र सेवानिवृत्ति एक ऐसा विषयवस्तु और जीवनचर्या है जो कि आज के युवा को बहुत पसंद आ रहा है। शीघ्र सेवानिवृत्ति क्यों लिया जाये ? और इसके बाद करें क्या ? ये सब सवाल होते हैं, हमारे परिवार के बड़े बुजुर्गों के, जिनकी सोच को रुढिवादी बोला जा सकता है, परंतु बेकार नहीं, क्योंकि उन्हें जिंदगी का अनुभव होता है और सोच परिपक्व होती है। हाँ वो हमारे इस शीघ्र सेवानिवृत्ति के निर्णय से एकदम सहमत तो नहीं होंगे, परंतु उन्हें बदली हुई परिस्थितियों को समझाया जा सकता है।

    कितने लोग नौकरी या व्यापार अपनी खुशी से करते हैं और कितने लोग इसे मजबूरी से करते हैं, करना कुछ चाहते हैं परंतु कुछ ओर ही कर रहे होते हैं। जैसे किसी की इच्छा तो वैज्ञानिक बनने की होती है परंतु बन जाते हैं पत्रकार, या बैंकर या कुछ ओर । बस इस प्रकार से केवल अपने जीवन यापन के लिये जिस भी क्षैत्र में मौका मिल जाता है उसी में कार्य करने लगते हैं, फ़िर भले ही मन मारकर कार्य कर रहे होते हैं।

नौकरी या व्यापार क्यों करते हैं ?

    नौकरी या व्यापार करने का मुख्य उद्देश्य होता है, "पैसा कमाना"। और भी उद्देश्य होते हैं जो कि इस प्रकार हो सकते हैं - समाज में अपनी पहचान बनाना, अपनी प्रतिभा से सबको कायल करना, वैभवशाली जीवन शैली को जीना, अपने को संतुष्ट करना, और भी बहुत कुछ।

आखिर कब तक करें -

    जैसी जीवनशैली से आप संतुष्ट हों और उस जीवनशैली में ही मजे में जीवन जी सकें और अपने बच्चों और निर्भर सदस्यों का भविष्य निखार सकें।

    परंपरागत तौर पर ५५ से ६५ वर्ष तक की उम्र सेवानिवृत्ति की मानी जाती है, क्योंकि उस समय आय का एकमात्र साधन घर का मुखिया ही होता था, या फ़िर आय कम होती थी। परंतु अब बदली हुई परिस्थितियों में आय भी बड़ी है, जीवन स्तर भी बड़ा है। पहले सेवानिवृत्ति पर जितना धन सेवानिवृत्त को मिलता था उससे कहीं ज्यादा धन तो आज की पीढ़ी ३५ वर्ष की उम्र में जमा कर लेती है। तो उस धन को निवेश कर आराम से शीघ्र सेवानिवृत्ति का मजा ले सकते हैं, परंतु कोई इस विषय पर नहीं सोचता है, और मशीनी तरीके से पूरी जिंदगी निकाल देते हैं।

    अगर जीवन यापन के लिये जरुरी रकम हमें मिलती रहे तो अपने रहन सहन और घर खर्च की चिंता के बगैर हम अपने मन पसंदीदा कार्य को कर सकते हैं।

    परंतु भविष्य के प्रति अनिंश्चिंत होकर बिना योजना के  वह कार्य करता रहता है। योजना बनाने से सुदृढ़ भविष्य का निर्माण कर सकते हैं, और अपने परिवार और समाज को सही दिशा में बड़ा सकते हैं। जितना समय हम ज्यादा रुपया कमाने में देंगे, उससे कहीं ज्यादा हम अपने परिवार और समाज के लिये समय देने की प्रतिबद्धता कर दे सकते हैं। और अपने राष्ट्र का एक उज्जवल भविष्य निर्माण कर सकते हैं।

पाठकों की राय अपेक्षित है --

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Tuesday, June 08, 2010

यूनियन कार्बाइड की जहरीली गैस में लोग अभी भी घुटकर मर रहे हैं ।

      कल खबर सुनी कि २५ वर्ष के बाद यूनियन कार्बाइड का फ़ैसला न्यायालय ने दे दिया है, वो २ दिसंबर की काली रात एकदम गहरी स्याह हो उठी जब इस जहरीली गैस ने भोपाल को अपने आगोश में ले लिया था, और आज फ़िर ऐसा लगा कि वापिस वही गैस पूरे देश में फ़ैल गई है, और जिनके पास दिल हैं वे सभी लोग घुटकर मरे जा रहे हैं। मेरा भारत महान, उसके नेता और न्यायपालिका महान !!!

    जहरीली गैस से मरे हुए और मरने वाले लोगों और घुट रहे लोगों को नम श्रद्धांजली।

Monday, June 07, 2010

झमाझम मानसून की बारिश, मुंबई में फ़्रेंच विन्डो के आनंद और छाता

    आज सुबह फ़िर एक नये सप्ताह की शुरुआत हुई, वो भी मानसून की बारिश के साथ, चारों ओर घनघोर बादल छाये हुए थे, और झमाझम बारिश हो रही थी। इसी बीच सुबह हम अपने बेटे को स्कूल बस पर छोड़ने गये तो वो जिद करने लगा कि छाता ले चलो, हमने उससे कहा कि छाते की जरुरत ही नहीं है, ज्यादा तेज बारिश नहीं है। बस हमने इतना कहा और बारिश जोरों की होने लगी, पहले तो पेड़ के नीचे शरण ली, पर बारिश कुछ ज्यादा ही झमाझम थी फ़िर हमने एक दुकान के नीचे शरण ली, जैसे ही बस आयी वैसे ही हम दौड़कर सड़क पर आ गये।

    मुंबई में पहली बारिश नहीं है, दो दिन पहले आधी रात को जबरद्स्त बारिश थी, समय तो हम देख नहीं पाये, पर यहाँ पर प्रचलित फ़्रेंच विन्डो के कारण प्रकृति के आनंद ले लेते हैं। सोते हुए अपने पर कुछ हवा के साथ बूँदे उड़कर आयीं, तो एकदम पता चल गया कि बारिश आ गई है, जल्दी से उठे और विन्डो के काँच बंदकर वापिस से सो लिये।

    आनंद बिल्कुल वैसा था जब अपने घर पर छत पर कभी कभार सो लिया करते थे, और रात को बारिश आ जाती थी, तो गद्दा तकिया चादर सब उठाकर भागते थे, घर में खटखटाते थे, किवाड़ खुलने पर पता चलता कि बारिश बंद हो गई है, तो फ़िर मन मारकर घर में ही सो जाते थे। यह सोचकर गुस्सा आता था कि बारिश को आना ही है तो जरा ज्यादा आये, हमारा बोरिया बिस्तर समेटने में इसको क्या मजा आता है।

    बिस्तर पर लेटे लेटे ही रात में तारे गिन लो, खुली हवा का आनंद लो, यह सब आनंद अपने छत पर सोने में आते थे, अब यही सब आनंद मुंबई के छोटे से फ़्लेट में भी आते हैं, बस अंतर यह है कि ऊपर छत रहती है, यही तो फ़्रेंच विन्डो के आनंद हैं।

    आज सुबह सुबह ही छाते की खोज हुई तो एक छाता अलमारी में लटका हुआ मिल गया, कि चलो अब तो मेरी सुध ली, फ़िर छाते को चेक किया गया, तो ठीक ठाक अवस्था में पाया गया। तय किया गया कि आज ही २ छाते ओर लाने होंगे, मानसून जो आ गया है।

    वैसे हमारी आदत है कि हम छाते का उपयोग कम से कम करते हैं, क्योंकि बारिश प्राकृतिक है और उसका आनंद न लिया तो बस फ़िर ?

    आजकल तो फ़िर भी छाते का उपयोग करने लगे हैं, नहीं तो पहले तो यह हालत थी कि हमारा रेनकोट डिक्की में ही पड़ा रहता था, और हम बारिश के आनंद लेते हुए घर पहुँचते थे [खामख्वाह में रेनकोट भीग जाता और फ़िर उसको सुखाने की जद्दोजहद में लगो] J

    आप सबको भी मानसून की शुभकामनाएँ और बिना छाता और रेनकोट के बारिश को प्राकृतिक रुप में महसूस करके देखें, आनंद आयेगा।

Sunday, June 06, 2010

शीघ्र सेवानिवृत्ति क्यों ? कब ? और कैसे ? [Early Retirement why ? when ? and how ?]

    शीघ्र सेवानिवृत्ति एक ऐसा विषय है जो आजकल के युवाओं की पहली पसंद है, आज का युवा जल्दी से जल्दी अपनी वित्तीय स्थिती मजबूत कर अपने इच्छा अनुरुप कार्य करना चाहता है।

    हम अभी उज्जैन गये थे तो अपने मित्र से पूछा कि अगर आज वापिस उज्जैन आना हो और शीघ्र सेवानिवृत्ति का विचार हो तो कम से कम अपने पास कितना पैसा होना चाहिये। तो उसका एकदम से जबाब मिला १ करोड़ रुपया, हम फ़क्क उसका चेहरा देखते ही रह गये, और हम उससे उस १ करोड़ की गणना का गणित पूछने लगे तो वह गणित बताने में अक्षम रहा, और बोला कि ऐसा लगा कि अगर १ करोड़ हो तो जिंदगी अच्छी कटेगी। क्या आप भी ऐसा सोचते हैं ? और ये भी बतायें कि १ करोड़ को कैसे निवेश करेंगे ?



    शीघ्र सेवानिवृत्ति पर हमने अपने लेपटॉप पर बहुत कुछ लिख रखा है, पर इस पर मौत की काली स्क्रीन का साया है, हमें आशा है कि हम उसे जल्दी ही ठीक कर अपने लेख जो कि विन्डोज लाईव राईटर पर लिखे हैं, प्राप्त कर लेंगे। तब तक हम बात करते हैं शीघ्र सेवानिवृत्ति के लिये आवश्यक धन की, आगे हम विस्तृत चर्चा करेंगे कि शीघ्र सेवानिवृत्ति क्यों ? कब ? और कैसे ?

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Saturday, June 05, 2010

माइक्रोसॉफ़्ट का बग "मौत की काली स्क्रीन" समाधान ढूँढ़ रहे हैं, Black Screen of Death

हमारा लेपटॉप - सोनी वायो, VGN-CR506E

 हमारा लेपटॉप फ़ँस गया Black Screen of Death के चुंगल में, उपाय ढूँढ़ रहे हैं। यह एक बग है जो कि माइक्रोसॉफ़्ट के OS  में होता है। इसमें लोगिन स्क्रीन के बाद काली स्क्रीन दिखाई देती है, और हमारा विस्टा कोई भी गतिविधी करने से मना कर देता है। जब कल अपना लेपटॉप खोला तो ये वाला बग आया हमारे OS में, अब गूगल पर अपने डेस्कटॉप में इसका समाधान ढ़ूँढ रहे हैं।

जितने भी समाधान बताये गये हैं, वह सब कर चुके या कोशिश कर रहे हैं, परंतु अभी तक सफ़लता नहीं मिली 
है -

१. Ctrl + Alt + Del बटन दबाकर टॉस्क मैनेजर में जाकर नये टॉस्क पर क्लिक कर iexplorer.exe करें तो यह शुरु हो जायेगा।

२. रजिस्ट्री में संपादन के लिये remove C:\WINDOWS\system32\drivers\ntndis.exe from
KEY_LOCAL_MACHINE\SOFTWARE\Microsoft\Windows
NT\CurrentVersion\Winlogon\Shell\explorer.exe
C:\WINDOWS\system32\drivers\ntndis.exe

समस्या यह है कि किसी भी तरह से हम इस विस्टा को कंट्रोल नहीं कर पा रहे हैं, F8 दबाने के पश्चात सेफ़ मोड में भी नहीं आ रहा है, Last good configuration भी नहीं चल रहा है,  विन्डो पीई से अब USB से बेकअप ले रहे हैं, फ़िर देखते हैं कि क्या कर सकते हैं।

अभी कोशिश जारी है, क्योंकि उसमें विन्डोज लाईव राईटर में कुछ लेख हमने लिखे हुए हैं, उन्हें बचाना है। और कुछ महत्वपूर्ण फ़ाईलें भी हैं। खोज जारी है, और तो और हमारी विस्टा की रिकवरी डिस्क भी काम नहीं कर रही है, अब विस्टा को डाऊनलोड कर इंस्टाल करना होगा।

यहाँ हम इसके सवाल के जबाब के लिये घूम चुके हैं - 


Friday, June 04, 2010

कुछ गंभीर चिंतन [लेपटॉप, गर्मी, लेखन की विषयवस्तु, ब्लॉगरी, अधूरापन]

      सुबह कुछ लिखने का मन था, लेपटॉप खोला लिखने के लिये तो पता नहीं क्या समस्या उसमें आ गयी है, तो अब मन मारकर अपने बेटे के संगणक पर लिख रहे हैं, क्योंकि जो सुविधाजनक स्थिती हाथों की और टाईपिंग पेड की  होती है, वह संगणक (डेस्कटॉप) पर नहीं।


    गर्मी ऐसी हो रही है कि अच्छे अच्छों के पसीने छुटा दिये हैं, कहीं भी बाहर थोड़ी देर के लिये खड़े हो जाओ, तो शर्ट और बनियान के नीचे से पीठ पर रीढ़ की हड्डी के ऊपर, गर्दन से पसीने की धार बहने लगती है, और पूरे जिस्म पर चिपचिपानी गर्मी से चिलचिलाता पसीना, यहाँ तक कि सुबह नहाकर गुसलखाने से बाहर निकलो तो बाहर निकलते ही पसीने से नहा लो, नहाना न नहाना सब बराबर है। सुबह उठने के बाद की ताजगी पता नहीं कहां खो गई है।

    सुबह मन हुआ कि चलो कुछ इस विषय पर लिखा जाये जो कि सभी के काम आयेगा, परंतु तभी अखबार आ गया, तो उसमें उसी विषय पर जिन दोनों विषयों पर हम लिखने की सोच रहे थे, वही आलेख छपे थे, लगा कि इन अखबार वालों को भी लगता है कि ब्लॉगर्स के लिये लिखने को कुछ छोड़ना नहीं है, वैसे लिखने की तो हम ८-१० दिन से सोच रहे थे, परंतु व्यस्तता के कारण संभव न हो सका।

    अब सोच रहे हैं कि वापस नये सिरे से विषयवस्तु पर सोचा जाये और लिखा जाये, क्योंकि वित्तीय विषयों पर हिन्दी में लेखन बहुत ही कम है, जो कि आम जन को जागरुक बनाये। निवेश के मायने बताये।

    वैसे भी परेशानी बताकर तो आती नहीं है, जो काम हम चाहते हैं कि हो जाये तो अगर आसान काम भी होगा तो भी उसमें इतनी मुश्किलें आयेंगी, कि हम भी सोचेंगे कि वाकई जब समय खराब हो तो छोटी से छोटी मुश्किल भी बड़ी हो जाती है। वैसे एक बात और हम शायद उल्टा सोचते हैं, जब समय खराब होने की बातें कर रहे होते हैं, तो शायद समय अच्छा चल रहा होता है, क्योंकि अगर खराब होता तो बहुत कुछ खराब हो सकता था, परंतु कुछ नहीं हुआ। तो ये सोचकर शांति रखना चाहिये और संतुष्टि से जीवन बिताना चाहिये।

    वैसे भी आज के लेखन के विषय पर जो हमने सोचा था, हम उससे पथभ्रष्ट हो चुके हैं, जो विषय था वो तो मीठे सपनीले सपने के साथ ही खत्म हो गया, जब तक याद था तब तक हमारा निजी संगणक (लेपटॉप) ही नहीं खुला। अब भूल बिसार गये। जल्दी ही कुछ नई रचनाएँ लिखने की जरुरत है, जो हमारी उँगलियों की खुराक है।

    कल ही हमारी श्रीमतीजी ने बोला कि क्या हुआ आज संगणक नहीं खुला और ब्लॉगरी शुरु नहीं हुई, तो हमें अहसास हुआ कि हमारे साथ ही कुछ गलत है, क्यों मन उचाट हुआ जा रहा है, क्यों मन विमुख हुआ जा रहा है, लगता है जिंदगी में कुछ चीजें अधूरी हैं, अधूरेपन का अहसास होता है, इस रिक्तता की पूर्ति कैसे होगी पता नहीं ?

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