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Wednesday, May 26, 2010

ऐसे ही कुछ भी, कहीं से भी यात्रा वृत्तांत भाग – ८ [बच्चों की चिल्लपों पूरी ट्रेन में, और एक ब्लॉगर से मुलाकात] आखिरी भाग

पहला भागदूसरा भाग, तीसरा भाग, चौथा भाग, पाँचवा भाग, छठा भाग, सातवां भाग

    ट्रेन में हमारे बेटेलाल को खेलने के लिये अपनी ही उम्र का एक और दोस्त अपने ही कंपार्टमेंट में मिल गया, और क्या मस्ती शुरु की है, दोनों एक से बढ़कर एक करतब दिखाने की कोशिश कर रहे थे। पूरा डब्बा ही बच्चों से भरा हुआ था, लग रहा था कि अभी स्कूल की छुट्टियाँ चल रही हैं।

    ट्रेन में बैठते ही हमारे बेटेलाल को भूख लगने लगती है चाय पीने की इच्छा होने लगती है, उस वक्त तो कुछ भी खिला लो पता नहीं उनके पेट में कौन घुसकर बैठ जाता है।

    बेटेलाल अपने दोस्त के साथ मस्ती में मगन थे, फ़िर शौक चर्राया कि अपर बर्थ पर जायेंगे, तो बस फ़ट से अपर बर्थ पर चढ़ लिये, उनके दोस्त के मम्मी और पापा हमसे कहते रहे कि अरे गिर जायेगा, हम बोले हमने ट्रेंड किया है चिंता नहीं कीजिये नहीं गिरेगा। तो बस उसकी देखा देखी उनके दोस्त भी अपर बर्थ पर जाने की जिद करने लगे, उनके पापा ने चढ़ा तो दिया पर उनका दिल घबरा रहा था, अपर बर्थ पर जाने के बाद तो दोस्त की भी हालत खराब हो गई, वो झट से नीचे आने की जिद करने लगा, तो बेटेलाल ने खूब मजाक उडाई। फ़िर वो भी नीचे आ गये आखिर उनके दोस्त जो नीचे आ गये थे। बस फ़िर रुमाल से पिस्टल बनाकर खेलना शुरु किया फ़िर तकिये से मारा मारी। एक और लड़का जो कि देहरादून से आ रहा था और इंदौर जा रहा था, बोला कि इन बच्चों में कितनी एनर्जी रहती है जब तक जागते रहेंगे तब तक मस्ती ही चलती रहती है और मुँह बंद नहीं होता। काश अपने अंदर भी अभी इतनी एनर्जी होती।

    खैर फ़िर खाना शुरु किया गया, और फ़िर बेटेलाल को पकड़ कर अपर बर्थ पर ले गये कि बेटा अब बाप बेटे दोनों मिलकर सोयेंगे। फ़िर उन्हें २-३ कहानी सुनाई पर सोने का नाम नहीं लिया, बोले कि लाईट जल रही है, पहले उसे बंद करवाओ, तो लाईट बंद करवाई फ़िर तो २ मिनिट भी नहीं लगे और सो लिये। हम फ़िर नीचे उतर कर आये और बर्थ खोलकर बेडरोल व्यवस्थित किया और बेटेलाल को मिडिल बर्थ पर सुलाकर, और अपने बेग की टेक लगा दी जिससे गिरे नहीं। और सोने चल दिये क्योंकि सुबह ५ बजे उज्जैन आ जाता है। रात को एक बार फ़िर नींद खुली तो देखा कहीं ट्रेन रुकी हुई है, पता चला कि ट्रेन ३ घंटे देरी से चल रही है, और किसी पैसेन्जर ट्रेन के लिये इस एक्सप्रेस ट्रेन को रोका गया है। हम फ़िर सो लिये सुबह छ: बजे हमारे बेटेलाल की सुप्रभात हो गई, और फ़िर चढ़ गये हमारे ऊपर कि डैडी उठो सुबह हो गई, उज्जैन आने वाला है देखा तो शाजापुर आने को अभी समय था, हमने कहा बेटा सोने दो और खुद भी सो जाओ या खिड़की के पास बैठकर बाहर के नजारे देखो। हम तो सो लिये पर बेटेलाल ने अपनी माँ की खासी परेड ली। सुबह साढ़े सात हमारे बेटेलाल फ़िर जोर से चिल्लाये डैडी उज्जैन आ गया, हमने कहा अरे अभी नहीं आयेगा, अभी तो कम से कम आधा घंटा और लगेगा, तो नीचे से हमारी घरवाली और आंटी दोनों बोलीं एक स्वर में “उज्जैन आ गया है”, अब तो हम बिजली की फ़ुर्ती से नीचे उतरे और फ़टाफ़ट समान उठाकर उतर लिये।

   प्लेटफ़ॉर्म नंबर ६ पर आने की जगह आज रेल्वे ने हम पर कृपा करके ट्रेन को प्लेटफ़ॉर्म नंबर १ पर लगाया था, तो हमारी तो बांछें खिल गईं, बस फ़िर बाहर निकले तो ऑटो करने की इच्छा नहीं थी, तांगे में जाने को जी चाह रहा था, पर एक ऑटो वाला पट गया, तो तांगे को मन मसोस कर छोड़ ऑटो में चल दिये।

    दो दिन जमकर नींद निकाली गय़ी यहाँ तक कि दोस्तों को भी नहीं बताया कि हम उज्जैन में हैं। फ़िर किसी तरह तीसरे दिन घर से निकले भरी दोपहर में दोस्तों से मिले फ़िर सुरेश चिपलूनकर जी से मिले और बहुत सारी बातें की। फ़िर चल दिये घर क्योंकि महाकाल जाना था, हमारा महाकाल जाने का प्रिय समय रात को ९.३० बजे का है, क्योंकि उस समय बिना भीड़ के अच्छे से दर्शन हो जाते हैं, और नदी भी अच्छी लगती है, रामघाट पर। फ़िर वहाँ कालाखट्टा बर्फ़गोला और आते आते छत्री चौक पर फ़ेमस कुल्फ़ी। उसके एक दिन पहले ही शाम परिवार के साथ घूमने गये थे तो पानी बताशे और फ़्रीगंज में फ़ेमस कुल्फ़ी खाई थी।

    चौथे दिन याने कि १९ मई को वापिस हमें मुंबई की यात्रा करनी थी और हम वापिस मुंबई चल दिये अवन्तिका एक्सप्रेस से, अपनी उज्जैन छोड़कर जहाँ हमारी आत्मा बसती है, जहाँ हमारे प्राण लगे रहते हैं, केवल पैसे कमाने के लिये इस पुण्य भूमि से दूर रह रहे हैं। बहुत बुरा लगता है। जल्दी ही वापिस उज्जैन जाने की इच्छा है, इस बारे में भी सुरेश चिपलूनकर जी से विस्तृत में बात हुई।

    मुंबई आते हुए भी बहुत सारी घटनाएँ हुई और लोग भी मिले परंतु कुछ खास नहीं, सुबह ५.३० पर ट्रेन बोरिवली पहुँच गय़ी और हम ऑटो पकड़कर १० मिनिट में अपने घर पहुँच गये। इस तरह हमारी लंबी यात्रा अंतत: सुखद रही।

कुल यात्रा २५२५ किलोमीटर की तय की गई।

Tuesday, May 25, 2010

ऐसे ही कुछ भी, कहीं से भी यात्रा वृत्तांत भाग – ७ [कुछ चित्र मेरी यात्रा के, धौलपुर, उज्जैन रामघाट, महाकाल नंदीगृह और विजयपथ उपन्यास]


धौलपुर के कुछ फ़ोटो, जो कि हमने रिक्शे पर से अपने नये मोबाईल से खींचे।

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धौलपुर स्टेशन के कुछ और फ़ोटो जिसमें हमारे “लाल” लाल रंग के कपड़ों में नजर आ रहे हैं, इन्हें श्टाईल में फ़ोटो खिंचाने का बहुत शौक है।

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स्टेशन के कुछ फ़ोटो और ट्रेन में बैठने के बाद के कुछ फ़ोटो…

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उज्जैन रामघाट के कुछ फ़ोटो, मतलब नदी किनारे, जहाँ सिंहस्थ पर पैर रखने की जगह नहीं होती है।

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महाकाल मंदिर उज्जैन के नंदीगृह में खींचा गया फ़ोटो

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विजयपथ उपन्यास जो कि इस बात उज्जैन प्रवास पर हमने पढ़ा। ओमप्रकाश कश्यप जी इसके लेखक हैं और आपका ब्लॉग भी है।

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जारी ....

Monday, May 24, 2010

ऐसे ही कुछ भी, कहीं से भी यात्रा वृत्तांत भाग – ६ [मोबाईल का अलार्म, मवाली दंपत्ति की असलियत सामने आई]


    झांसी से ट्रेन चलने लगी, अब कंपार्टमेंट में हम तीन लोग ही बचे, मवाली दंपत्ति और मैं। मवाली श्रीमती जी के पास उनके मोबाईल पर फ़ोन पर फ़ोन आये जा रहे थे पर वे उठा नहीं रही थीं, इस पर वे उस मवाली से बोलीं कि देखो कितने फ़ोन आ रहे हैं, और मैं उठा भी नहीं सकती, तो लड़का बोला कि फ़ोन उठाकर बात तो कर ही लो, इस पर लड़की बोली कि फ़ोन उठाया तो ट्रेन की आवाज आयेगी और उनको पता चल जायेगा कि मैं तुम्हारे साथ ट्रेन में हूँ। सुबह किसी स्टेशन पर पहुँचकर फ़ोन करुँगी और बोल दूँगी कि फ़ोन नीचे कमरे में था और मैं छत पर घूम रही थी।

    हमने भी अपना खाना निकाल कर खाना शुरु कर दिया था और साथ में यह घटनाक्रम हो रहा था, अब तो हमें पक्का यकीन हो गया कि ये शादीशुदा नहीं हैं और ये लड़की इसके चक्कर में आ गई है, या पता नहीं कुछ और पर रात घिरने के साथ ही उनकी हरकतें बढ़ने लगीं। लड़का और लड़की इस तरीके से बैठे थे कि वे चेहरे को चूम सकें और चूम भी रहे थे, हम बेचारे खिड़की के बाहर अँधेरे में ट्रेन से मनोहारी दृश्य देख रहे थे।

    अपना खाना हो गया और हमने अपने बैग से चादर और तकिया निकाल लिया कि एकाध घंटा सो लिया जाये अब धौलपुर १ बजे के पहले तो नहीं आने वाला है, और अपने मोबाईल में अलार्म भी लगा लिया, ये जानते हुए भी कि अगर एक बार सो गये तो फ़िर अलार्म क्या कोई नहीं उठा सकता है, जब तक कि नींद पूरी नहीं हो जाये। चादर बिछाई, तकिये में हवा भरी और लोअर बर्थ पर ही सो लिये, मवाली दंपत्ति ओह माफ़ कीजियेगा अब दंपत्ति नहीं कहूँगा केवल मवाली कहूँगा, क्योंकि अब पता चल गया है कि वे दंपत्ति नहीं हैं, वे भी सोने की तैयारी करने लगे, लड़के ने चादर अपर बर्थ पर बिछा दी और लड़की सोने के लिये चली गई, लड़का बाहर सिगरेट फ़ूँकने।

    हमने उससे जाने से पहले बोला कि भई हमें ग्वालियर में उठा देना, नहीं तो पता नहीं कहाँ उतरेंगे। वो ओके बोलकर चल दिया। इसी दौरान हमारी आँख लग गई, थोड़ी देर मतलब कितनी देर वो हमें भी नहीं पता पर आँख थोड़ी से खुली तो देखा कि मवाली लड़का ऊपर बर्थ पर बैठा हुआ है और लड़की उसकी गोदी में सिर रखकर लेटी हुई है। मोबाईल पर बातें हो रहीं थीं और हाथ भी घूम रहे थे, हमने सोचा कि ये सब देखने से अच्छा है कि सो ही जायें, और वैसे भी हमारी आँखें खुलने का नाम नहीं ले रही थीं। हम फ़िर सो लिये।

    फ़िर आँख खुली तो पाया कि ट्रेन ग्वालियर में खड़ी है, और ये मवाली लोग अपने में ही मशगूल हैं, पर देखने लायक स्थिती में नहीं हैं, पता नहीं लोग घर पर ये सब क्यों नहीं करते हैं ? क्या ये आजादी सबको अच्छी लगती है ? ये प्रश्न खुद से था या किसी ओर से ये भी नहीं पता। क्योंकि इस तरह के दृश्य अवन्तिका एक्सप्रेस जो कि मुंबई से इंदौर चलती है आम होते हैं, कालेज से आई नये लड़के लड़कियों की फ़ौज किसी सोफ़्टवेयर कंपनी में रिक्रूट हुई होती है और जहाँ ३-४ दिन की छूट्टियाँ हुईं तो रिजर्वेशन की मारा मारी तो होती ही है, आरक्षित बर्थ कम होती हैं तो लड़के लड़कियाँ युगल बनाकर अपर बर्थ पर एक दूसरे से चिपककर सो जाते हैं, पता नहीं ये सब अपनी संस्कृति का कितना ध्यान रखते हैं, पर ये आजादी निश्चित ही ठीक नहीं है। हम इस संदर्भ में और कुछ लिखना नहीं चाह रहे हैं, इसलिये माफ़ी चाहते हैं, क्योंकि ये सब देखकर मन खिन्न हो जाता है, कि माँ बाप ने पता नहीं कितने अरमानों से इन लोगों को भविष्य संवारने के लिये यहाँ भेजा है और ये देखो पता नहीं क्या संवार रहे हैं।

    ग्वालियर में हम उठ कर बैठ गये क्योंकि अब हमारा सफ़र केवल ४५ मिनिट का था और हम सोने का खतरा मोल नहीं लेना नहीं चाहते थे, ट्रेन अपनी फ़ुल रफ़्तार से भागी जा रही थी और हम खिड़की के पास बैठकर बाहर से आती गरम हवा का लुत्फ़ ले रहे थे। डबरा निकला फ़िर आया मुरैना स्टेशन तो हमने भी फ़ोन करके बोला कि मुरैना निकल गया है स्टेशन लेने भेज दो, क्योंकि रात को १ बजे धौलपुर में स्टेशन से अकेले निकलना सुरक्षित नहीं रहता है, लूट होती ही रहती है। हालांकि हमारे पास ऐसा कुछ था नहीं परंतु डर तो डर ही होता है।

    हम अपना समान लेकर ट्रेन के दरवाजे के पास आ गये, वहाँ पर लोग अपनी चादर बिछाकर सोये हुए थे जिनको रिजर्वेशन नहीं मिला था, निकलने के लिये पूरी जगह छोड़ी हुई थी कि किसी को आने जाने में तकलीफ़ न हो। रात थी इसलिये चंबल की घाटियाँ दिख नहीं रही थीं पर हम उन्हें महसूस कर रहे थे, मैंने २-३ बार इन बीहड़ घाटियों को बहुत पास से देखा है, जहाँ प्रसिद्ध डाकुओं ने राज किया है, और आज भी बहुत डाकू हैं। फ़िर चंबल का पुल आया वहाँ से धौलपुर केवल ५ मिनिट का रास्ता होता है। आखिरकार ट्रेन स्टेशन पर रुकी और हम चल दिये घर की ओर अपने साले साहब के साथ।

    शाम को वापिस उज्जैन के लिये निकलना था, इसलिये बातचीत सुबह पर छोड़कर चुपचाप सो लिये। बातचीत होती रही, साथ हम सोते भी रहे थकान के कारण, दिन में कहीं मिलने जाना था तो २-३ घंटे बाजार में मिल भी आये। धौलपुर में तो अभी से ही दोपहर मॆं लू चलने लगी थी, बहुत दिनों बाद लू का अहसास हुआ था। शाम को हमारी ट्रेन ५.३० बजे थी देहरादून इंदौर, ३ ए.सी. में पहले से ही रिजर्वेशन था इसलिये निश्चिंत थे कि बस गर्मी थोड़ी देर और सहनी है। जब घर से निकले थे तब ट्रेन केवल ५ मिनिट लेट बतायी गयी थी, और धीरे धीरे पूरे ५० मिनिट लेट हो गयी। रेल्वे की संचार क्षमता पर हमें कोई शक नहीं परंतु कार्य करने वाले तो आदमी ही हैं ना, कितनी ही बार हमने इस बाबत झांसी मंडल में शिकायत भी की है, परंतु वही ढ़ांक के तीन पात। हर बार झांसी मंडल से एक पत्र आ जाता है कि शिकायत दुरुस्त की गई है, अब आगे से शिकायत नहीं होगी, अब तो खैर हमने शिकायत करना ही बंद कर दी है।


जारी….

ऐसे ही कुछ भी, कहीं से भी यात्रा वृत्तांत भाग – ५ [“जो भक्त हो आठ हाथों वाली का, उसका क्या बिगाड़ लेंगे ये दो हाथ वाले”]


    थोड़ी देर में ही विदिशा आया जो कि मेरी जन्मस्थली है, मुझे अच्छी तरह से याद है कि जब मैं अपने होश में पहली बार विदिशा से मालवा एक्सप्रेस से ही निकला था तब मैंने ट्रेन से उतरकर विदिशा की माटी को अपने माथे पर लगाया था, पता नहीं बड़ी अजीब सी झनझनी आयी थी, कुछ लोग तो एकटक मुझे देखे जा रहे थे, पर मैं अपने में मशगूल मातृभूमि के प्रेम में मगन था।

    विदिशा में डॉक्टर साहब से कुछ लोग मिलने वाले आये थे,  इसलिये उनके मित्र डॉक्टर साहब पहले ही चले गये थे,  शायद उनके परिवार के ही थे और उनके ससुराल पक्ष के लग रहे थे, क्योंकि जितनी इज्जत लड़के को ससुराल पक्ष की ओर से मिलती है वह अपने पक्ष से नहीं, आखिर दामाद होता है, वे मिलने वाले खिड़की से ही मिल लिये २ लीटर की ठंडी बोतल भी दे गये।

    ललितपुर आने को था और हम लोगों की बातचीत अपने पूरे जोर पर थी, तभी वो मवाली लड़का बोला कि मैं वैष्णोदेवी जा रहा हूँ और अब तक लगभग ९० बार जा चुका हूँ, मैं देवी भक्त हूँ इसलिये गुजरात में भी देवी के मंदिर में भी जाता हूँ, नाम नहीं बताया कि कौन सा मंदिर, और फ़िर एक डॉयलाग कि “जो भक्त हो आठ हाथों वाली का, उसका क्या बिगाड़ लेंगे ये दो हाथ वाले”।

    मवाली श्रीमती जी के पास उनके मोबाईल पर फ़ोन पर फ़ोन आये जा रहे थे, और उनके चेहरे से उनकी परेशानी झलक रही थी सारे कॉल को मिस काल जान बूझकर करवाती जा रही थीं। और मुँह में ही कुछ गाली जैसा बुदबुदा रही थीं, खैर हमें तो इतना समझ में आया कि दाल में कुछ काला है और ये वैधानिक रुप से पति पत्नि नहीं हैं, क्योंकि उनकी हरकतें नये पति पत्नि से ज्यादा प्रेमी प्रेमिका की लग रहीं थी।

    ललितपुर गार्ड साहब को भी उतरना था और डॉक्टर साहब के दोस्त डॉक्टर साहब को भी, गार्ड साहब तो केवल ट्रेन के बाहर देखते और बिल्कुल सही समय बता देते कि अब केवल ३० मिनिट का रास्ता है, अब १५ मिनिट बचे हैं, हम उनसे बहुत प्रभावित हुए आखिर उन्होंने अपनी जिंदगी के महत्वपूर्ण वर्ष गार्ड की नौकरी करते हुए निकाले थे और उनको रास्ता याद नहीं होगा तो किसे होगा। थोड़ी देर बाद कहीं ट्रेन को रोक दिया गया, शायद आऊटर था, तो गार्ड साहब बोले कि ध्यान रखना पड़ता है कि कहीं ललितपुर तो नहीं, अभी पिछले दो –तीन दिन से ललितपुर में इस समय लाईट नहीं रहती है, तो कई बार तो लोगों को पता ही नहीं चलता है कि ललितपुर आ गया है। खैर थोड़ी देर में ही ललितपुर आ गया, और हमारे पास वाली डॉक्टर दंपत्ति अपने डॉक्टर मित्र को विदा देने गये, तभी अचानक ट्रेन की खिड़की पर उतरने वाले डॉक्टर साहब हमसे हाथ मिलाने आये और बोले कि मिलकर बहुत खुशी हुई। वाह साहब केवल ट्रेन में कुछ देर बैठकर बातें करने से भी अच्छी दोस्ती हो जाती है।

    ट्रेन चल दी तो डॉक्टर दंपत्ति ने अपना खाना शुरु कर दिया, खाना हमारे पास भी था परंतु पेट भरा सा लग रहा था, इसलिये सोचा कि थोड़ी देर बाद खायेंगे। मवाली लड़का बहुत शेखी बघार रहा था कि अपने दोस्त तो भोपाल से लेकर झाँसी तक रहते हैं, खाना बाहर से आ जायेगा, और वो बेचारा अपने फ़ोन से फ़ोन खटकाते हुए परेशान हो गया परंतु दोस्त लोग तो सो रहे थे न क्योंकि उसके दोस्त भी निशाचर थे, जब फ़ोन आया तब गाड़ी विदिशा में खड़ी थी, तो वह बोला कि अब रहने दो मैं ट्रेन में ही खाने का आर्डर कर रहा हूँ। तो गार्ड साहब ने भी चुटकी ले ही ली थी, “कितना भी बड़ा भाई हो, परंतु भूख तो सभी को लगती है, और कभी कभी दोस्त भी काम नहीं आते हैं।” हम उसकी और देख रहे थे, वो खिसियाये जा रहा था, बेचारा कर भी क्या सकता था।

    झांसी रात को ९.३० का सही समय था ट्रेन का परंतु ट्रेन कुछ देरी से चल रही थी, डॉक्टर साहब अपने ससुराल किसी की शादी में जा रहे थे, और उनको लेने उनके साले साहब स्टेशन पर आ रहे थे, डॉक्टर दंपत्ति को ४-५ दिन रहना था और झांसी की गर्मी की सोच सोचकर ही आधे हुए जा रहे थे। क्योंकि हम भी झांसी की गर्मी झेल चुके हैं पूर्व में केवल ७ दिन में ही हालत खराब हो गयी थी। वे अपने साले साहब से लगातार फ़ोन पर संपर्क साधे हुए थे, ट्रेन लगभग १०.१५ पर झांसी आयी, हमने डॉक्टर दंपत्ति को विदा दी और उन्होंने कहा कि जब भी उज्जैन आयें मिलने जरुर आयें।

Sunday, May 23, 2010

ऐसे ही कुछ भी, कहीं से भी यात्रा वृत्तांत भाग – ४ (निशाचर और दिनचर, रेल्वे में गार्ड का महत्व)


    अब अपने मवाली भाईसाहब बोले कि अपनी दिनचर्या तो शाम से शुरु होती है, और सुबह खत्म होती है, हम थोड़ा चकराये कि ये भला क्या बात हुई। फ़िर वे खुलासा करके बोले कि अपना काम लेनदेन का है, सुबह सात बजे सोते हैं शाम को सात आठ बजे उठते हैं, फ़िर तैयार होकर थोड़ी देर अपने ऑफ़िस (?) हिसाब किताब देखने जाते हैं और फ़िर दोस्तों के साथ बैठकर रातभर दारुबाजी करते हैं और सुबह होते ही घर चले जाते हैं।

    रात १२ बजे बाद के इंदौर में खाना खाने के तमाम अड्ड़े बता डाले उन्होंने।

    तो हमने उनसे कहा इसका मतलब कि आप निशाचर हैं, जिन्हें रात पसंद होती है,  और दिन में इनको अच्छा नहीं लगता है। तो मवाली युगल मुस्करा उठा जैसे हमने उनके राज की बात कह दी हो, निशाचर को रात पसंद होती है और जैसे जैसे सूरज सिर चढ़ता है वैसे वैसे उनकी तकलीफ़ बढ़ती जाती है।

    हमने कहा कि हम तो भई दिनचर हैं, हमारी बैटरी तो रात १० बजते ही डाऊन हो जाती है और ज्यादा से जयादा १२ बजे तक बस, पर सुबह ६ बजे पूरी तरोताजगी महसूस करते हैं। हम रातभर नहीं जग सकते हैं, हमारा स्टेशन रात को १२.३० बजे आने वाला है, इसलिये आज तो हमारी बहुत बड़ी आफ़त है।

    दिनचर और निशाचर पर बात ही हो रही थी कि एक और बुजुर्ग जो कि लगभग ६५ के थे, सीट खाली देखकर बैठ गये और हमारी बातचीत में शामिल हो गये।

    उन्होंने बताया कि वे रेल्वे में गार्ड थे और २५ वर्ष पहले रिटायरमेंट ले लिया, हमने गार्ड सुना बहुत था कि ट्रेन में होते हैं पर पता नहीं था कि गार्ड आखिर करता क्या है, क्या केवल लाल और हरी झंडी दिखाना ही गार्ड का काम है ? तो उन्होंने बताया कि गार्ड पूरी ट्रेन का मुखिया होता है, और ट्रेन में चल रहा पूरा स्टॉफ़ याने कि पुलिस, टी.सी. और ड्राईवर गार्ड को रिपोर्ट करते है। अगर किसी को भी कोई समस्या हो तो गार्ड को रिपोर्ट कर सकता है, अगर किसी स्टेशन पर टिकट नहीं मिलता है तो गार्ड से टिकट भी ले सकता है।

    फ़िर उन्होंने बताया कि गार्ड को बहुत सारी सुविधाएँ होती हैं, तत्कालीन रेलमंत्री माधवराव सिंधिया ने कहा था कि गार्ड और ड्राईवर तो रेल्वे की रीढ़ की हड्डी है, इनका ध्यान रखना बहुत जरुरी है। फ़िर उन्होंने बताया कि भोपाल में रेल्वे का गार्ड और ड्राईवर का रेस्ट रुम बिल्कुल होटल जैसा उन्होंने बनाया जिसमें बाद में ए.सी. भी लगवाया। जितनी सुविधाएँ सिंधिया जी ने रेलमंत्री के तौर पर दीं उतनी किसी ने भी नहीं दीं।

    गार्ड साहब को भी ललितपुर जाना था जब उन्होंने रेल्वे में मिलने वाली सुविधाओं को बताया तो हमारी तो आँखें और मुँह खुले ही रह गये। सेवानिवृत्ति के बाद भी सुविधाएँ कम नहीं होतीं। काम बहुत मेहनत का होता है और पैसा भी बहुत मिलता है, बस एक बात बोली उन्होंने कि अगर घरवाली समझदार हो तो सबकी लाईफ़ बन जाती है, बच्चों की पढ़ाई का ध्यान रखे और पैसे को ढ़ंग से जोड़ ले। वैसे तो यह बात हमारे ख्याल से सबके साथ लागू होती है।

    यह पोस्ट हम “वांटेड” फ़िल्म देखते हुए लिख रहे थे, ये फ़िल्म बहुत बार देख ली है, परंतु पता नहीं इस फ़िल्म में क्या है जो एक्शन के कारण बांधता है। सलमान खान का डॉयलाग “एक बार जो कमिटमेंट मैंने कर दी, फ़िर तो मैं अपनी भी नहीं सुनता” कानों को भाता है।

ऐसे ही कुछ भी, कहीं से भी यात्रा वृत्तांत भाग – ३ [हिन्दी ब्लॉग की मार्केटिंग]

पहला भागदूसरा भाग
    तभी सीहोर स्टेशन आ गया और डॉक्टर साहब प्लेटफ़ार्म पर अपनी मिसेज के लिये आईसक्रीम लेने चल दिये। वे बोलीं कि हमें तो स्ट्राबेरी पसंद है, तो बस डॉक्टर साहब स्ट्राबेरी आईसक्रीम ले आये उनके लिये, आखिर १४ वीं सालगिरह जो थी शादी की।

    दूसरी तरफ़ मवाली युगल की पत्नि जी किसी बात पर अपने शौहर से नाराज होकर ट्रेन की खिड़की की ओर आलथी पालथी मार कर बैठी थीं, तो उनके शौहर ने बाहर से जाकर खिड़की से पूछा कि क्या खाओगी, आईसक्रीम या कोल्डड्रिंक। वो बोली कि कुछ नहीं खाऊँगी, एक बार बोला ना समझ में नहीं आता कि नहीं खाना। अभी थोड़ी देर पहले ही खाना खाया है ना। पर शौहर बार बार पूछ रहा था कि क्या खाओगी और वो बार बार उसकी बेईज्जती कर रही थी बड़े प्यार से। और वो बेचारा प्यार में अपनी बेईज्जती सहे जा रहा था।

    मिसेज डॉक्टर ने अपनी आईसक्रीम खत्म करने के बाद बोलीं कि इस आईसक्रीम को खाने के बाद तो मेरा जी खराब हो रहा है, तो मिसेज मवाली बोली कि अच्छा हुआ कि मैंने आईसक्रीम नहीं खाई। हम भी मन ही मन सोच रहे थे कि चलो अपनी भी इच्छा हो रही थी, पर आईसक्रीम नहीं खाई अच्छा हुआ।

    तभी डॉक्टर साहब के फ़ैमिली फ़्रेन्ड की मिसेज भी आ गईं तो जगह की कमी को देखते हुए डॉक्टर साहब निकल लिये अपने मित्र के पास जो कि ४-५ कंपार्टमेंट दूर ही बैठे हुए थे और उन्हें ललितपुर जाना था। तो महिलाओं की बातें शुरु हुईं, शिक्षा पर फ़िर रहन सहन पर और फ़िर फ़ैशन पर। पर जैसे ही उनकी वे मित्र आई थीं, हम उनको देखते रहे और पहचानने की कोशिश करते रहे कि इनको कहाँ देखा है पर हमें याद नहीं आ रहा था। जब वे चलीं गई तो हमने मिसेज डॉक्टर से पूछा कि ये कौन थीं, तब उन्होंने परिचय दिया तो हमने बाकी की जानकारी उनको बता दी। तो वे बोलीं कि अरे आप तो उनको बहुत अच्छे से जानते हैं। हम इसलिये पहचान नहीं पाये क्योंकि हम उनसे लगभग १३ वर्ष पहले मिले थे।

    भोपाल आ चुका था और गर्मी के गरम गरम थपेड़े अभी भी कम नहीं हुए थे, हमने अपने टकले से टोपी को हटा लिया तो मवाली भाईसाहब बोले कि ये क्या, तो अपुन बोले कि ये अपना हेयर श्टाईल है। वे बोले मगर हेयर है किधर, मैं बोला अपना तो ऐसाइच है क्या !! :D

    अब तक डॉक्टर साहब अपनी ठंडी रखने वाली २ लीटर वाली बोतल में २ बिसलरी उलट चुके थे, और जैसे ही ट्रेन चलने लगी गटागट १ लीटर पी लिये, और फ़िर से पानी की तिकड़म शुरु कर दी गई।

    भोपाल से ट्रेन चली तो डॉक्टर साहब के मित्र वे भी डॉक्टर साहब थे, मैं उनको देखते ही पहचान गया परंतु वे नहीं पहचाने । अब जरुरी तो नहीं न कि आप किसी को पहचान जायें और वो भी आपको पहचान जाये। हमने उनको याद दिलाया कि फ़लां वर्ष में आपका क्लीनिक वहाँ था और हम आपके पास आते थे, तब जाकर थोड़ा उन्होंने याद करने की कोशिश की, पता नहीं उसमें वे कितना सफ़ल हुए। ये डॉक्टर साहब ने बी.ए.एम.एस., एम.डी, एम.ए. (फ़िलोसफ़ी) और भी पता नहीं २-४ डिग्रियां और पढ़ रखी थीं, और उज्जैन में वे वक्ता और अच्छे विचारक के रुप में जाने जाते हैं और धनवंतरी आयुर्वेदिक महाविद्यालय में व्याख्याता हैं। सभी वेद पुराण और दर्शनों के मर्मज्ञ हैं, बहुत सारी बातें उनसे हुईं। उन्होंने स्वामी रामदेव जी से भी मिलने के किस्से सुनाये। उन्होंने बताया कि वे साहित्य पढ़ने के बहुत शौकीन हैं और आज भी साहित्य पढ़ते ही रहते हैं, और लगातार पढ़ने के कारण पढ़ने की रफ़्तार भी बड़ गय़ी है। हमने उन्हें ब्लॉग लिखने के लिये प्रेरित किया कि आप जैसे ज्ञानी व्यक्ति के विचार पढ़ना सबको अच्छा लगेगा, और अगर तकनीकी मदद की जरुरत हो तो हमें बताइयेगा। अब ब्लॉग लेखन पर उनसे बराबर फ़ॉलोअप लेंगे। अब हमने तो हिन्दी ब्लॉगिंग करने के लिये बहुत मार्केटिंग की, हिन्दी एग्रीगेटर्स अपने ब्लॉग के बारे में बताया। अब देखते हैं कि क्या परिणाम होता है।

    वैसे जब भी हम यात्रा में होते हैं तो हिन्दी ब्लॉग की मार्केटिंग जरुर करते हैं, अब पाठक तो लाने ही पड़ेंगे। कुछ इस तरह के प्रयास भी करना होंगे।

Saturday, May 22, 2010

ऐसे ही कुछ भी, कहीं से भी यात्रा वृत्तांत भाग – २ [मोबाईल ट्रेकर की जानकारी साझा की]


    इस मवाली युगल ने ही दो सीटों को ८०० रुपये देकर अपने नाम करवा लिया था, बंदा लगता तो भाई ही था। बिल्कुल अनिल कुमार स्टाईल के बाल और फ़िल्मी अंदाज में शर्ट के दो बटन खुले हुए। और उनकी पत्नी बिल्कुल हीरोईन श्टाईल में वस्त्र धारण किये हुए थीं।

    उनकी बातें चल रही थीं, बिल्कुल चिपक कर बैठे हुए थे और आसपास की दीन दुनिया से अनजान अपनी बात में गुम थे। लड़का कह रहा था कि कुछ नहीं हुआ था, तो लड़की बोल रही थी नहीं हमने सुना था कि फ़लाने ने पहले तो धमकाने के लिये हाथ उठाया फ़िर बाद में गुस्से में आकर किसी को चाकू मार दिया। तो लड़का बोला अरे वो तो है ही ऐड़ा, अकल वकल लगाता नहीं है और जिधर देखो उधर अपना गुस्सा निकालता है। बस ऐसी ही मवालीगिरी की उनकी बातें चल रहीं थीं।

    गर्मी के मारे बुरा हाल हुआ जा रहा था, जो ठंडा पानी हम एक बोतल लाये थे, वह तो सीहोर आने तक ही खत्म हो चुका था या कहें उबल गया था और वह पानी पीने की तो बिल्कुल इच्छा भी नहीं हो रही थी। मिनरल वाटर की बोतलें बिक तो रही थीं पर ठंडी नहीं, फ़िर भी हमने एक बोतल पानी की ले ही ली और अपनी प्यास बुझाई, बोतल थी बैली की। जब बोतल ली तो हमें याद आया कि शायद पहली मिनरल वाटर बनाने वाली कंपनी बिसलरी थी, और अब मिनरल वाटर के लिये बिसलरी शब्द पर्यायवाची बन गया है, ब्रांड बन गया है। मवाली युगल भी गर्मी से परेशान था और थोड़ा पानी पीने के बाद जब थोड़ी देरे में ही पानी उबलने लगता तो उसी मिनरल वाटर से हाथ मुँह धो लेता। अब बताईये मिनरल वाटर से मुँह धो रहे हैं, और गर्मी का हवाला दे देकर बोल भी रहे हैं कि गर्मी के कारण बिसलरी से मुँह हाथ धोने पड़ रहे हैं।

    तभी डॉक्टर साहब से हमारी बातचीत शुरु हुई, तो बातों में ही बात आ गई कि अगर आजकल किसी का भी मोबाईल नंबर या कोई और आवश्यक जानकारी होती है वह हम सीधे मोबाईल में ही लिख लेते हैं और अगर बाईचांस किसी का मोबाईल गुम जाता है तो बस उसकी तो आफ़त ही समझो। हमने उन्हें बताया कि हमारा मोबाईल भी गुम चुका था पर मोबाईल ट्रेकर होने के कारण हमें वापिस मिल गया। फ़िर तो सारे कंपार्टमेंट में बैठे लोगों का ध्यान हम पर केन्द्रित हो गया। तो डॉक्टर साहब की मिसेस बोलीं कि मोबाईल ट्रेकर क्या होता है और कैसे काम करता है।

मोबाईल ट्रेकर -

    मोबाईल ट्रेकर सेमसंग कंपनी के मोबाईल में ही एक फ़ीचर होता है जो कि साथ में आता है, अगर आपका मोबाईल कहीं गुम जाता है, और चोर दूसरी सिम जैसे ही बदलता है तो उस सिम का नंबर आपके द्वारा की गई सैंटिंग्स के मोबाईल नंबर पर एस.एम.एस. के माध्यम से आ जाता है, और चोर कितने भी नंबर बदल ले, आपके पास सारे नंबरों के एस.एम.एस. आते रहेंगे। और चोर मोबाईल ट्रेकर बंद भी नहीं कर सकता क्योंकि उसे उसका पासवर्ड पिन पता नहीं होता है। इस स्थिती में चोर के पास केवल दो ही रास्ते होते हैं कि या तो मोबाईल को फ़ेंक दे या फ़िर आपको वापिस करे दे।

    वैसे मोबाईल ट्रेकर सोफ़्टवेयर आप अपने मोबाईल में डाउनलोड कर सकते हैं, जैसे मैंने अभी नोकिया E63 मोबाईल लिया तो सबसे पहले OVI Store से मोबाईल ट्रेकर ही डाउनलोड किया और पासवर्ड पिन सेट किया।

    अगर आपने भी मोबाईल ट्रेकर अपने मोबाईल में संस्थापित नहीं किया है तो आज ही करें। क्योंकि हर दिन या सप्ताह में नियमित रुप से डाटा का बेकअप लेना असंभव होता है।

    तो हाथोंहाथ डॉक्टर साहब के मोबाईल पर जो कि सेमसंग का था, सेटिंग्स करवा दी वे भी खुश हो गये और अपने ये मवाली भाई उनके पास २-३ मोबाईल थे उसमें से १ सेमसंग का था उन्होंने तो मोबाईल ट्रेकर की सेटिंग करके उसकी सिम भी बदल कर सफ़लतापूर्वक परीक्षण भी कर डाला।


जारी…

Friday, May 21, 2010

ऐसे ही कुछ भी, कहीं से भी यात्रा वृत्तांत भाग – १

    सुबह उज्जैन पहुँचे तैयार हुए और फ़िर घर पर बातें कर ही रहे थे कि वापिस अपनी ट्रेन का समय हो गया, मालवा एक्सप्रेस धौलपुर के लिये। धौलपुर एक छोटा सा स्टेशन है राजस्थान राज्य का, जो कि दिल्ली भोपाल सेंट्रल लाईन पर ग्वालियर और आगरा के बीच में पड़ता है।

    ट्रेन उज्जैन से दोपहर सवा दो बजे चलती है और रात को साढ़े बारह बजे पहुँचती है, जब दोपहर को उज्जैन से सवा दो बजे हम ट्रेन में चले तो तपती हुई दोपहरी का अंदाजा हुआ, गरम हवा के थपेड़े सीधे आ रहे थे, हमने अपने टकले को थोड़ा आराम देने के लिये उसके ऊपर टोपी लगा ली, क्योंकि हम अब इस गरम हवा के थपेड़े सहने के आदि नहीं थे। (घरवाली के आदेश का पालन किया गया, आदेश तो पुदीनहरा की टेबलेट लेने का भी था, परंतु हमारी ट्रेवलिंग मेडीकल किट में नहीं थी)

    जब हम ट्रेन में अपने कंपार्टमेंट में पहुँचे तो वहाँ दो सहयात्री पहले से ही मौजूद थे जो कि उज्जैन से ही ट्रेन में चढ़े थे, जो कि युगल थे और उस दिन उनकी शादी की १४ वीं सालगिरह भी थी, सो फ़ोन पर फ़ोन आये जा रहे थे, चूंकि वे उज्जैन के ही थे तो थोड़े ही देर में जान पहचान निकल आयी।

    तभी उन्होंने बताया कि हमारे एक भाईसाहब हैं जो कि घर से ठंडा पानी लेने गये हैं, सफ़र झांसी तक का है तो पानी की जरुरत तो पड़ती ही रहेगी। तभी उनकी पत्नी बोलीं कि पानी की बोतल तो यहाँ स्टेशन पर मोल भी मिलती है फ़िर घर जाने की क्या जरुरत है,  तो पति महोदय का जबाब था - “झक्की की झक है”, उसका कोई इलाज नहीं है। अब भला बताईये ४ लीटर ठंडे पानी के लिये १० कि.मी. आना जाना वो भी मात्र १५ मिनिट में, पता नहीं वो भाईसाहब आ भी पाये या नहीं।

    हम छावा (शिवाजी सामंत लिखित) पढ़ने में व्यस्त थे, तभी टी.सी. आये और हमारे टिकट चेक किये, आजकल इंटरनेट टिकट लेने पर फ़ोटो आई.कार्ड टी.सी. जरुर देखते हैं, पहले बिना फ़ोटो आई.कार्ड के ही काम चल जाता था।

    आरक्षित शयनयान श्रेणी में यात्रा करने के बाबजूद जिस स्टेशन पर ट्रेन रुकती लोग इसमें चढ़ते जाते और जगह देखकर बैठ जाते कि अगले स्टेशन पर उतरना है। टी.सी. भी उनसे ४०-५० रुपये लेकर उन्हें बैठने देते। अब बताइये भला कि कोई क्या बोल सकता है। टी.सी. की कमाई का ये भी बढ़िया धंधा है स्लीपर में।

    थोड़ा समय बीतने के बाद लगभग १ घंटे के बाद फ़िर टी.सी. आया कि फ़लाने नाम का कोई आया क्या इस सीट पर, वहाँ कोई नहीं था, बस टी.सी. के मुख पर मुस्कान फ़ैल गई। अरे उसकी जेब गरम होने वाली थी, थोड़े ही देर में एक युगल जो कि जम्मू तक जा रहा था, वैष्णो देवी की यात्रा करने के लिये। युगल नया लग रहा था, जैसी कि उनकी चुहलबाजी चल रही थी और हमारी बातचीत में वे भी शामिल हो गये, लड़का मवाली लग रहा था और लड़की भी बातचीत से वैसी ही लग रही थी पर सभ्य दिखाने की कोशिश कर रहे थे। हमें लगा कि शायद लड़के के घरवालों ने जैसे को तैसा करने के लिये इस तरह की लड़की से शादी की होगी।

उलझनें जिंदगी की …. मेरी कविता …. विवेक रस्तोगी

उलझनें जिंदगी की

बढ़ती ही जा रही हैं

जैसे इनके बिना जीना

दुश्वार हो

उलझनें हों तभी

प्रेम की कीमत

सुलझन की कीमत

पता चलती है

क्यों

इतने बेकाबू हो जाते हैं

कुछ पल

कुछ क्षण अपनी जिंदगी के

कुछ बेहयाई भी

छा जाती है

पर फ़िर भी इम्तिहान

खत्म नहीं होता

कहीं झुरमुट में दूर

कोई शाख पर छुपकर

बैठकर

देख रहा है

पता ही नहीं है

वो उलझन है

या सुलझन है…

Friday, May 14, 2010

“ऐ टकल्या”, विरार भाईंदर की लोकल की खासियत और २५,००० वोल्ट

    हम चल दिये ५ दिन के लिये मुंबई से बाहर, बोरिवली स्टेशन से हमारी ट्रेन थी, हम ट्रेन के आने के ठीक १० मिनिट पहले प्लेटफ़ॉर्म पर पहुँच गये, तो चार नंबर प्लेटफ़ार्म से ट्रेन जाती है, और इसी प्लेटफ़ॉर्म से विरार, भाईंदर की लोकल ट्रेनें भी जाती हैं। इन लोकल ट्रेन में पब्लिक को देखते ही बनता है, बाहर की पब्लिक तो इन लोगों को देखकर आश्चर्य करते हैं।विरार भाईंदर की लोकल ट्रेन को देखकर बाहर के लोगों को आप आँखें फ़ाड़ फ़ाड़कर देखते हुए देखे जा सकते हैं ।

    विरार भाईंदर लोकल ट्रेन की बहुत सारी खासियत हैं, मसलन ट्रेन की छत पर यात्रा करना, बाहर से खिड़की के ऊपर चढ़कर यात्रा करना, बंद दरवाजे की रेलिंग पर चढ़कर यात्रा करना, गेट पर खड़े हुए हीरो लोग प्लेटफ़ॉर्म पर खड़े हुए लोगों पर फ़ब्ती कसते हैं, डब्बे में इतनी भीड़ होने के बाबजूद और लोगों का चढ़ जाना, और सबसे बड़ी खासियत गुटबाजी अगर आप पहली बार जा रहे हैं तो गेट पर खड़े लोग आपको चढ़ने ही नहीं देंगे, और अगर उतरना है तो उतरने नहीं देंगे।

    भले ही बेचारे रेल्वे वाले चिल्ला चिल्लाकर अधमरे हो जायें, कि ट्रेन की छत पर यात्रा न करें २५,००० वोल्ट का करंट बहता है, कई लोग तो निपट भी चुके हैं, पर हीरोगिरी करने से बाज आयें तब न, बस इनको नहीं सुनना है तो नहीं सुनना है, शायद कानून को मजाक समझते हैं ये लोग।

    हम अपनी हेयरश्टाईल याने कि टकले थे, (टकलापुराण और टकले होने के फ़ायदे रोज ४० मिनिट की बचत) तो एक फ़ब्ती हमें भी मिली “ऐ टकल्या”, तो हमने पहले अपने आसपास खड़े लोगों को देखा तो पाया कि “केवल अपन ही टकले हैं, और कोई टकला नहीं है”, बड़ा ही आनंद आया कि चलो कोई तो है जो हमको फ़ब्ती कस सकता है।

Thursday, May 13, 2010

आयकर बचाने के लिये इंफ़्रास्ट्रक्चर बांड्स में २०,००० रुपये का निवेश करना चाहिये क्या ?

    २०१० के बजट में आयकर में जो राहत दी गई हैं, उनमें से एक है इंफ़्रास्ट्रक्चर बांड्स में २०,००० रुपये तक के निवेश की अनुमति दी गई है।

    इस राहत के बाद लगभग सभी लेखों में और वित्त मंत्री जी ने भी यही कहा कि यह एक सकारात्मक कदम है। लेकिन एक ही बात हरेक आदमी के लिये कैसे सकारात्मक हो सकती है ? अगर नकारात्मक भी नहीं है तो भी कम से कम कई लोगों को तो कोई फ़र्क ही नहीं पड़ने वाला है।

    हम यहाँ पर कर बचाने के लिये इन बांडों में निवेश करना कितना सही है यह देखेंगे और यह विश्लेषण २०१० की नई कर नीति के दृष्टिकोण को ध्यान में रखकर कर रहे हैं जो कि इस प्रकार है -

१. आय १.६ लाख रुपये से ५ लाख रुपये तक
२. आय ५ लाख रुपये से ८ लाख रुपये तक
३. आय ८ लाख रुपये या उससे ज्यादा

    किसी भी करबचत उत्पाद को समझने के लिये हमें चार प्रमुख मानकों को समझना चाहिये -

वास्तविक कर बचत (सबसे ज्यादा बचत मान लीजिये जितनी संभव हो)
निवेश से मुनाफ़ा वापसी (कम से कम जितने समय निवेश बंधक रहने वाला है)
अवसरित कीमत (अगर यही रकम किसी और उत्पाद में निवेश की जाये तो कितना मुनाफ़ा वापसी होगा)
उत्पाद पर होने वाले मुनाफ़ा वापसी पर मुद्रास्फ़ीति का प्रभाव
(आपके निवेश की क्या कीमत होगी जब आप इस उत्पाद को भुनायेंगे ?)

धारणाएँ -

    हम दो मानदंड मान लेते हैं, हमें अपनी ही कुछ धारणा बनानी पड़ेगी बंधक समय (Lock-In Period) के लिये, क्योंकि अभी तक वित्त मंत्री ने अभी तक इस बारे में कोई घोषणा नहीं की है। आमतौर पर अगर हम दूसरे कर बचत वित्तीय उत्पादों को देखें तो हम दो परिदृश्य ले सकते हैं तीन वर्षीय और पांच वर्षीय।

    मान लेते हैं कि इंफ़्रास्ट्रक्चर बांड की वापसी दर होगी लगभग ५.५ % प्रतिवर्ष।

और साथ ही मुद्रास्फ़ीति की समग्र दर हम ८% मान लेते हैं।

१.६ - ५ लाख रुपये के कर समूह में आने वाले लोगों को १०% आयकर देना होगा।

१. वास्तविक कर बचत - २०,००० रुपये का १०% याने कि २,००० रुपये (अगर आप २०,००० रुपये का निवेश इंफ़्रास्ट्रक्चर बांड में करते हैं, तो आपकी करयोग्य आय २०.००० रुपये से कम हो जायेगी और आपको आयकर में १०% का फ़ायदा होगा)।

२. आपको कितनी रकम वापिस मिलेगी अपने बंधक समय (Lock-in Period) के बाद ? अगर ३ वर्ष का बंधक समय है तो २०,००० रुपये के निवेश से जो आय होगी वह होगी लगभग ३४८५ रुपये। जब आप इसे अपनी निवेश की गई रकम में जोड़ेगे तो आपको निवेश की जो वापसी होगी वह है २५,४८५ रुपयों की (२०,००० रुपये + ३,४८५ रुपये + २,००० रुपये)।

३. अगर इसी राशि को बाजार में किसी और उत्पाद में निवेश करते तो वह आपको लगभग १५-१८% की वापसी देता। सेंसेक्स और म्यूचुअल फ़्ंड में लंबी अवधि के निवेश के बाद यह दर बहुत कम है पर हम गणना में १५% लेते हैं। इस निवेश से आपको २७,३७६ रुपये मिलेंगे जो कि इस प्रकार है - २०,००० रुपये - २,००० रुपये = १८,००० रुपये @१५% की दर से ३ वर्ष के लिये निवेश की गणना की गई है।

४. ८% मुद्रास्फ़ीति का मुकाबला करने के लिये कम से कम आपकी राशि ३ वर्ष के बाद कितनी होनी चाहिये ? राशि होना चाहिये लगभग २५,१९४ रुपये।

    इस प्रकार हम देखते हैं कि १.६ से ५ लाख रुपये वाले कर समूह में आने वाले व्यक्तियों के लिये इंफ़्रास्ट्रक्चर बांड जो कि एक कर बचत उत्पाद है, से केवल २९१ रुपये का ही फ़ायदा होता है (२५,४८५ रुपये - २५,१९४ रुपये)। जबकि आयकर देने के बाद बची हुई राशि को किसी बाजार के किसी अच्छे उत्पाद में लगाने से १८९१ रुपये का फ़ायदा है।

    पर अगर आप के आयकर में २,००० रुपये से ज्यादा का फ़ायदा हो रहा है, और वो तब होगा जब आप ५ लाख से ऊपर वाले कर समूह में आते हैं, उन लोगों को इंफ़्रास्ट्रक्चर बांड में ही निवेश करना चाहिये, ना कि दूसरे वित्तीय उत्पादों में।

    यह सलाह केवल उन्हीं लोगों के लिये है जो कि १.६ से ५ लाख के कर समूह में आते हैं।

Tuesday, May 11, 2010

ये आई.ए.एस. में लोग सेवा करने जाते हैं या कमाने जाते हैं ? यह एक यक्ष प्रश्न है कि इन आई.ए.एस. की इज्जत करें या न करें, और अगर आज के युवा की सोच ही ऐसी होगी परिवार की होगी तो इस राष्ट्र का भविष्य क्या होगा।

    दो साल पहले की बात है, हम करोल बाग में एक रेस्त्रां में खाना खा रहे थे, और हमारे पीछे वाली टेबिल पर कुछ छ: लड़के बैठे हुए थे, जो कि मूलत: झारखंड और बिहार के लग रहे थे।

    हमने खाना ऑर्डर किया और अपनी बातें करने लगें परंतु ये लड़के अपनी बातें इतनी तेज आवाज में बात कर रहे थे कि हम अपनी बात कर ही नहीं पा रहे थे और वे जिस तरह की बातें कर रहे थे वैसी हमने पहले कभी सुनी भी नहीं थीं, इसलिये चुपचाप हमने उनकी ही बातें सुनने का फ़ैसला ले लिया।

    वे बात कर रहे थे सिस्टम की, जी हाँ प्रशासन की, क्या हम यहाँ झक मारने आये हैं समाज के लिये नहीं !!!, आई.ए.एस. बनना है और करोड़ों कमाना है, अरे रुतबा का रुतबा और कमाई की कमाई, किसी कंपनी का सीईओ भी क्या कमाता होता आई.ए.एस. की कमाई के आगे।

    बातों में पता लगा कि उनमें से २-३ के पिता आई.ए.एस. हैं, और बाकी २-३ सामान्य लोग हैं परंतु दाँतकाटी दोस्ती लग रही थी उन सबमें, जिनके पिता आई.ए.एस. थे वे कुछ किस्से बता रहे थे कि फ़लाने ने आई.ए.एस. की पोस्टिंग मिलने के २-३ साल के अंदर ही करोड़ रुपया अंदर कर लिया वो भी किस सफ़ाई से, कहीं कोयला खदान की बात हो रही थी कि वहाँ पर किसी परमीशन या ठेके के लिये आई.ए.एस. ने ४० करोड़ की रिश्वत ली थी और मंत्री को पता चल गया तो मंत्री ने कमीशन माँगा तो उस आई.ए.एस. ने उस मंत्री को पैसे देने की जगह पैसा खर्च करके उसको गद्दी से ही हटवा दिया।

    फ़िर किसी आई.पी.एस. की बात चली कि ये लोग भी कम नहीं होते हैं, रंगदारी करते हैं और व्यापारियों से एक मुश्त रकम या फ़िर सप्ताह लेते रहते हैं, बस व्यापारी बड़ी मुर्गी होता है।

    तभी उनमें से एक आई.ए.एस. का सुपुत्र बोला उसके दूसरे मित्र को जो कि शायद किसान परिवार से था, कि बेटा पढ़ाई कर जम कर और केवल हरे हरे नोटों के सपने देख, और देख कि तेरा रसूख कितना बढ़ जायेगा, लोग सलाम ठोकेंगे, कभी भी करोड़ रुपया अंदर कर सकता है। तो किसान परिवार के लड़के का उत्तर सुनकर तो हम दंग ही रह गये, वो बोला “हमारे पिताजी ने कहा है कि तू केवल पढ़ाई पर ध्यान दे, और ये आई.ए.एस. की परीक्षा पास कर ले, जितना पैसा खर्च होता है ३०-४० लाख रुपया होने दे, तू चिंता मत कर हम खेत खलिहान बेच देंगे घर बेच देंगे, तू आई.ए.एस. बन गया तो ये खर्चा तो कुछ भी नहीं है ये तो निवेश है, इसका दस गुना तुम हमें २-३ साल में कमा कर दे दोगे” !!!

    हम हमारे विचारों में खो गये कि ये आई.ए.एस. की परीक्षा और आई.ए.एस. बनने का जुनून तो किसी और दिशा में मुड़ गया है। और ये केवल करोलबाग की ही बात नहीं है, जहाँ आई.ए.एस. की तैयारी कर रहे लोग मिलेंगे, आपको इस तरह की बातें सुनना शायद आश्चर्यजनक न लगे। क्योंकि हमने ये चर्चाएँ कई बार दिल्ली में अलग अलग जगह पर सुनी हैं।

    इसलिये अब हमारे सामने यह एक यक्ष प्रश्न है कि इन आई.ए.एस. की इज्जत करें या न करें, और अगर आज के युवा की सोच ही ऐसी होगी परिवार की होगी तो इस राष्ट्र का भविष्य क्या होगा।

Sunday, May 09, 2010

मेरी चाहतें ….. रोज उठना ना पड़ता, रोज नहाना न पड़ता…, रोज खाना ना पड़ता…, काश कि बुशर्ट भी पेंट जैसी ही होती…, जिससे प्रेस जल्दी होती.. ।

    रोज रात को सोने के बाद …. सुबह उठना क्यों पड़ता है … कितना अच्छा होता कि …. रोज उठना ना पड़ता, रोज नहाना न पड़ता…, रोज खाना ना पड़ता…, रोज पानी ना भरना पड़ता, रोज बस मीठी नींद के आगोश में रहते…, रोज सुबह की सैर पर नहीं जाना पड़ता…, रोज ऑफ़िस न जाना पड़ता…, सप्ताहांत सप्ताह में एक की जगह दो होते…

    ऐसी मेरी चाहें तो अनगिनत हैं पर कभी पूरी नहीं होती हैं, सब सपना सा है, दो दिन सप्ताहांत पर आराम करने के बाद सोमवार को ऑफ़िस जाना जान पर बन आता है, कि हाय ये सोमवार इतनी जल्दी क्यों आ गया, हमने ऐसा कौन सा पाप किया था, कि ये ऑफ़िस में हर सोमवार को आना पड़ता है।

    शुक्रवार को तो मन सुबह से प्रसन्न होता रहता है कि बेटा बस आज और काम करना है फ़िर तो दो दिन आराम, अहा !!! कितना मजा आयेगा।

    पर चाहतें भला कब किसकी पूरी हुई हैं, ये पंखा देखो न कितनी आवाज करता है…, सोचने में विघ्न डालता है…, बंद कर दो तो पसीना सर्र से बहने लगता है…, काश कि मैं अभी कहीं ठंडे प्रदेश में छुट्टियाँ काट रहा होता…, वहाँ की वादियों को देखकर मन में सुकून काट रहा होता…, रोज ये चिल्लपों सुनकर तंग आ गया हूँ…, क्यों पेंट पर जल्दी प्रेस (इस्त्री) हो जाती है …., और बुशर्ट पर समय क्यों लगता है…, काश कि बुशर्ट भी पेंट जैसी ही होती…, जिससे प्रेस जल्दी होती.. । इस्त्री की जगह कोई ऐसी मशीन होती कि उसमें कपड़े डालो तो धुल भी जाये और इस्त्री होने के बाद बिल्कुल तह बन कर अपने आप बाहर आ जाये …, और अपने आप अलमीरा में जम जायें।

    चाहतों का कोई अंत नहीं है…, अभी दरवाजे पर दस्तक हुई है … शायद अखबार आया है…, तीन तीन अखबार और मैं इत्ती सी जान…, काश कि इन अखबारों को पढ़ना न पड़ता…, कोई अखबार का काढ़ा आता … हम उसे पी जाते और उसका ज्ञान अपने आप दिमाग में चला जाता…, पर ऐसा नहीं है… इसलिये हम चले अखबार बांचने और आप जाओ टिप्पणी बक्से में टीपने, और पसंद का चटका लगाने…।

Friday, May 07, 2010

ऐसे ही कीबोर्ड तोड़ता रहूँगा... "यार अपनी किस्मत में तो सटर्डे और सन्डे कपड़े धोना ही लिखा है" … आधुनिक युग में मजदूरी… स्क्रोल व्हील

    क्या लिखूँ समझ में नहीं आ रहा है, क्यों लिखूँ ये भी समझ में नही आ रहा है, बस लिखना है इसलिये लिखते जा रहा हूँ, बहता जा रहा हूँ और ये क्रम रोज ही जारी है, परेशान भी नहीं हो रहा हूँ.... और ना ही परेशान होने की कोशिश कर पाता हूँ...

    कहीं दूर मन में छन से आवाज आती रहती है, कि क्या जिंदगी में पाने के लिये आये हो... क्या कर रहे हो ... क्या तुम अपने आप से सन्तुष्ट हो... या अपने में ही अपनी चिंगारी दबाते जा रहे हो... और रोज रोज अपने में ही मरे जा रहे हो... क्या है यह ... जिंदगी बहुत तेजी से दौड़ती जा रही है ... जैसे रोज कीबोर्ड पर हमारी ऊँगलियाँ ... ऊँगलियाँ कीबोर्ड पर दौड़ती नहीं हैं ... मजबूरी में चल रही होती हैं ... कोई अंदर से चीख रहा है कब तक मैं उसकी आवाज नही सुनूँगा ... और ऐसे ही कीबोर्ड तोड़ता रहूँगा... हमेशा दिल घबराया हुआ सा रहता है ... आँखें पथरायी हुई सी रहती हैं।

    अब वो देखने की कोशिश कर रहा हूँ जो होता तो है पर मैं उस तरफ़ ध्यान नहीं देता हूँ या सिंपली कहूँ इग्नोर कर देता हूँ..।

    मेरी दिनचर्या के कुछ दृश्य जो घटित तो रोज होते हैं, पर ध्यान मैंने आज दिया -

१. वाशरूम - दो लड़के जो मुंबई से कहीं बाहर से आये हुए लग रहे है, आज शुक्रवार है, इसलिये सब लोग जीन्स और टीशर्ट में ही दिख रहे हैं, मैं लघुशंका के लिये शौचालय खाली है ?, ढ़ूँढ़ता हूँ और कान में उन लड़कों की बातें भी सुनाई दे रही हैं... देखिये हमारा शरीर भी कितना मल्टीटास्किंग है .. हाथ से हम वाशरुम का दरवाजा खोल रहे हैं और कानों से उन दोनों लड़कों की बातें सुन रहे हैं, पहला लड़का दूसरे से "अरे यार कल फ़िर धोबी बनने का दिन आ गया है", दूसरा बोला "यार अपनी किस्मत में तो सटर्डे और सन्डे कपड़े धोना ही लिखा है", "कितने साल हो गये कपड़े धोते हुए ….!!!" । इतने में हम वाशरुम के अंदर चले जाते हैं, और वो आवाजें सुनाई देना बंद हो जाती हैं, पर अपने अंदर से आवाज आने लगती हैं, "सोच क्या रहा है, बेटा थोड़े समय पहले तेरी भी यही हालत होती थी, बस अब तेरे दिन फ़िर गये हैं", और यही सोचते हुए वापिस अपने क्यूबिकल तक आ गये।

२. कैंटीन - शाम चार बजते बजते दिन बोझिल सा होने लगा है.. जैसे इस नीरस सी जिंदगी में और कुछ बचा ही नहीं है ... अंदर ए.सी. की ठंडी हवा भी अजीब सी घुटन पैदा करती है ... आज भूख कुछ ज्यादा लगी तो सोचा कि चलो आज कैंटीन में कुछ खा लेते हैं .. पता चला कि आज मिस्सल पाव है ... पहले तो मन एकदम खिल गया कि चलो आज यही खा लेते हैं ... वैसे भी अपना मनपसंद है ... पर जैसा हर बार होता है … अपने साथ … वही हुआ … पाव खत्म हो गया और ब्रेड से मिस्सल खानी पड़ी ... हर बार ऐसा ही होता है जिंदगी में, मैं सोच में डूब गया कि मुझे जो चाहिये होता है या जो करने का मन होता है वह या तो होता ही नही है या फ़िर कुछ हिस्सा बचा होता है ... और हमेशा हम अपनी कुँडली को कोसते रहते हैं, क्योंकि इसमें हम कुछ कर नही सकते हैं।

३. क्यूबिकल - अपनी जिंदगी का अहम हिस्सा हम इस क्यूबिकल में गुजार देते हैं, जहाँ बेजान सी लकड़ी की डेस्क, सामने काँच का पार्टीशन, एक फ़ोन, पानी की बोतल और हर समय कोसता हुआ खाली चाय का कप रहता है, पास ही भगवान श्रीकृष्ण का फ़ोटो जो काम के बीच में याद दिलाता रहता है कि तुम अभी भी जिंदा हो और तुम्हारी जिंदगी में धार्मिकता बची हुई है, अपनी घूमने वाली कुर्सी पर बैठकर मजदूरी करके शाम को ए.सी. की तपन से बाहर आकर गरम हवा बिल्कुल हिमालय की ताजगी देती है।

४. मजदूर - आज के इस आधुनिक युग में मजदूरी की परिभाषा वही है, बस मजदूरी बदल गयी है, काम बदल गया है, मजदूरी का पैमाना बदल गया है, हम धूप में पत्थर नहीं तोड़ते हैं न ही हमारा शरीर हट्टा कट्टा है और न ही शरीर से पसीना चू रहा होता है ... और न ही सूखी रोटी खा रहे होते हैं ... केवल एक ही समानता है विद्रुप आहत दिल। और मजदूर मजबूरी में, जो कि केवल पैसे के लिये अपने दिल और मन  पर बारबार चोट कर रहा है। हम हुए आधुनिक मजदूर पर दिल और मन से बिल्कुल अभिन्न हैं पारंपरागत मजदूरी से ...  हम उससे जुड़े हुए हैं।

५. माऊस - अपनी कुर्सी में धँसकर केवल माऊस चलाते जाओ, कभी लेफ़्ट क्लिक करो कभी राईट, कभी स्क्रोल व्हील घुमाते रहो। इतने साल हो गये इस माऊस को पर देखो टेक्नोलाजी कि माऊसे आगे की कोई चीज आयी ही नहीं, वो बेचारा माऊस सोच रहा होगा कि ये इंसा कब तक ट्रेकबाल या रोशनी के सहारे मुझे दौड़ाता रहेगा, मुझे भी आजादी दो, मुक्ति दो मैं थक गया हूँ।

Wednesday, May 05, 2010

सेवानिवृत्त हो रहे हैं ? सेवानिवृत्ति का धन, कैसे और कहाँ निवेश करें …. जिससे भविष्य अनिश्चिंत न हो.. ? (Getting Retired, Where to Invest the amount for good returns after retirement)

यह लेख अनीता कुमार जी को समर्पित है, उनके कहने पर ही मैंने सेवानिवृत्ति कोष को अभी आज के बाजार में कैसे निवेश किया जाये, पढ़ा और उनके लिये ही लिखा है। आशा है सबको पसंद आयेगा।

    सेवानिवृत्ति के समय आपको एक बड़ी धनराशि मिलती है। जो कि आपके भविष्य निधि, नकदीकरण, पेंशन का रुपांतरण, ग्रेच्युटी इत्यादि की राशि मिलाकर होती है।

    उस समय सबसे बड़ा सवाल आपके सामने आता है कि “इस धनराशि को कहाँ और कैसे निवेश किया जाये ?” निवेश के लिये ऐसी कौन सी जगह सुरक्षित है, जहाँ अभी भी निवेश से अच्छी वापसी की उम्मीद हो ?

    यहाँ हम देखेंगे कि सेवानिवृत्ति के धन को निवेश करने वाले वित्तीय उत्पाद की क्या विशेषताएँ होनी चाहिये और कुछ विकल्पों के सुझाव भी देंगे।

    आप सारी जिंदगी अपने परिवार के लिये कार्य करते हो, बहुत परिश्रम करके अथक प्रयासों से अपने जीवन में प्रगति करते हैं। और अंत में एक दिन आता है जब आपको आराम की जरुरत होती है – आपकी सेवानिवृत्ति ! आप अपने जीवन का आनंद लेने के लिये एक बार वापिस से स्वतंत्र हैं। और वो सब चीजें कर सकते हैं को कि आप कार्य करते हुए नहीं कर सकते थे।

    लेकिन सेवानिवृत्ति इन सब सुख के साथ  के साथ ही एक महत्वपूर्ण प्रश्न भी लेकर आता है – धन को कहाँ निवेश करना है जो कि आपको सेवानिवृत्ति लाभों के रुप में मिला है।

    यह कोई साधारण सा सवाल नहीं है। आखिरकार आपकी जिंदगी भर की मेहनत के धन का प्रश्न है।

समस्या बहुत महत्वपूर्ण है -

    सेवानिवृत्ति के समय आपको दसियों लाख रुपया मिलता है। वह इसलिये क्योंकि आपको बहुत सारी जगह से धन मिलता है – भविष्य निधि, स्वैच्छिक भविष्य निधि, सेवानिवृत्ति, छुट्टी नकदीकरण, पेंशन का रुपांतरण इत्यादि ।

    आपको आपने उन निवेशों से भी धन प्राप्त हो सकता है, जब आपने निवेश किया होगा तो यह सोचकर किया होगा कि सेवानिवृत्ति के समय यह पैसा भी साथ में मिल जायेगा, और उसकी परिपक्वता भी पूर्ण हो रही हो। जो कि सार्वजनिक भविष्य निधि (पी.पी.एफ़.), जीवन बीमा पालिसी इत्यादि हो सकती हैं।

    इस प्रकार, अब आपके सामने ऐसी स्थिती उत्पन्न हो जाती है कि इतना सारा धन कहाँ निवेश करें, कैसे करें, जिससे सेवानिवृत्ति के बाद भी आपके मासिक खर्चों के लिये राशि बराबर मिलती रहे । इतनी बड़ी राशि जो कि शायद अपने पूरे जीवन में कभी एक साथ निवेश नहीं की होगी ।

सेवानिवृत्ति के बाद  मिलने वाले रिटर्न की विशेषताएँ -

    सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाले धन को निवेशित करने के लिये वित्तीय उत्पादों में क्या विशेषताएँ होनी चाहिये ?

स्थायी रिटर्न

    समस्या बहुत जटिल है, क्योंकि आप अपने सेवानिवृत्ति से मिलने वाले धन को कुछ इस तरह से निवॆश करना चाहते हैं कि सुरक्षित और स्थायी रिटर्न भी मिलता रहे और सेवानिवृत्ति के बाद मिला धन भी आपके जीवनकाल तक आपके साथ सुरक्षित रहे।

    आपको अपनी आय बाजार के मानक से अच्छी रखनी होगी, जो कि आपके वर्तमान व्ययों का ध्यान तो रखेंगे ही और भविष्य में होने वाले दिन-ब-दिन के खर्चों में होने वाली मदों में भी मदद करेगी।

    विशेष रुप से यह उन लोगों के लिये महत्वपूर्ण है जिनको पेंशन नहीं मिलने वाली है।

सुरक्षित रिटर्न

    चूँकि सेवानिवृत्ति के बाद,  आपके पास आय का स्त्रोत वेतन नहीं आने वाला है। आप पूरी तरह से अपने निवेशित धन पर ही अब अपने जीवनकाल के लिये निर्भर करते हैं।

    इसलिये, सुरक्षित रिटर्न, निवेशित धनराशि की सुरक्षा (मूलधन) बहुत ही महत्वपूर्ण है।

नियमित रिटर्न

    अब यही आपके प्राथमिक आय का स्त्रोत होगा जो कि आपके दैनिक खर्चों का ख्याल रखेगा, तो आप ऐसे वित्तीय उत्पाद में निवेश नहीं कर पायेंगे जहाँ संचयी लाभ मिलता हो।

    आपको ऐसी जगह निवेश करना होगा जहाँ से आपको नियमित रुप से मासिक या त्रैमासिक आय मिलती रहे।

कहाँ निवेश करें -

    तो अब सबसे बड़ा सवाल कि सेवानिवृत्ति के बाद मिली धनराशि को कहाँ निवेशित करें ?

    अगर आप जल्दी सेवानिवृत्ति ले रहे हैं तो सावधि जमा (FD) अच्छा विकल्प नहीं है, क्योंकि इसमें आप बाजार में होने वाले रुपये के अवमूल्यन से लड़ नहीं पायेंगे। सेवानिवृत्ति की योजना को ध्यान में रखते हुए जब आप काम कर रहे होते हैं तभी आय के स्त्रोतों को लक्ष्य बनाया जाना चाहिये जिससे सेवानिवृत्ति पर आपको सोचना न पड़े।

    लेकिन अगर आप इस तरह के आय के स्त्रोत बनाने में अक्षम रहते हैं, तो भी हमारा निवेश का बड़ा हिस्सा परंपरागत निवेशों के लिये ही होगा। सावधि जमा योजना जो कि सुरक्षित, विश्वसनीय और निश्चित आय प्रदान करता है।

वरिष्ठ नागरिक बचत योजना (SCSS)

    सेवानिवृत्ति के बाद बचत के लिये सबसे अच्छा वित्तीय उत्पाद है वरिष्ठ नागरिक बचत योजना (SCSS), जिसमें आप अपना सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाला धन निवेश कर सकते हैं, और ये विशेषकर सेवानिवृत्तों के लिये ही बनाया गया है।

इसकी कुछ विशेषताएँ इस प्रकार हैं -

    पूर्ण सुरक्षा – यह एक सरकारी योजना है, इसलिये यह बिल्कुल सुरक्षित है।

    नियमित नकदी – त्रैमासिक आधार पर ब्याज का भुगतान किया जाता है।

    उचित ब्याज दर - वरिष्ठ नागरिक बचत योजना (SCSS) ९% प्रतिवर्ष की दर से ब्याज देता है।

    उच्च निवेश सीमा - वरिष्ठ नागरिक बचत योजना (SCSS) में १५ लाख रुपये तक निवेश कर सकते हैं।

सेवानिवृत्ति कोष से जितना ज्यादा संभव हो सके उतना वरिष्ठ नागरिक बचत योजना (SCSS) लेना चाहिये।

सावधि जमा (FD)-

    सेवानिवृत्ति कोष निवेश करने की सबसे मनपसंदीदा वित्तीय उत्पाद सावधि जमा है। अच्छे बैंकों में निवेश करें और सावधि जमा से स्थिर रिटर्न मिलता है।

    इसके अलावा, सावधि जमा को कभी भी तोड़ा जा सकता है, और आकस्मिक व्यय के लिये उपयोग कर सकते हैं, इसलिये सेवानिवृत्ति के धन का कुछ हिस्सा निश्चित ही सावधि जमा में रखना चाहिये।

    आकस्मिक या आपातकालीन राशि लगभग आपके छ: माह के खर्चे के बराबर होनी चाहिये जो कि आमतौर पर पर्याप्त होती है। यह राशि आपके आपातकालीन चिकित्सा खर्चों में व्यय करने के लिये भी सक्षम होगी। इसलिये आपको बैंक में सावधि जमा के तौर पर कम से कम छ: महीने के खर्चों के बराबर की राशि रखना चाहिये।

    यदि आप पूर्ण सुरक्षा चाहते हैं, तो आप पोस्ट ऑफ़िस में भी सावधि जमा करवा सकते हैं, यह बिल्कुल बैंक की सावधि जमा के समान है, बस ये पोस्ट ऑफ़िस में होगी, पोस्ट ऑफ़िस में होने कारण सरकार द्वारा सुरक्षित होगा आपका धन।

डाकघर मासिक आय योजना (PO MIS) -

    सेवानिवृत्ति कोष को निवेशित करने के लिये यह भी वरिष्ठ नागरिक बचत योजना (SCSS) जैसी ही एक अच्छी योजना है।

    पूर्ण सुरक्षा – यह एक सरकारी योजना है, इसलिये यह बिल्कुल सुरक्षित है।

    नियमित नकदी – मासिक आधार पर ब्याज का भुगतान किया जाता है।

    उचित ब्याज दर –यह ८% प्रतिवर्ष की दर से ब्याज देता है और परिपक्वता पर ५% बोनस प्रदान करता है, इसका प्रभावी यील्ड ८.९% होता है।

    निवेश सीमा – इसमें ४.५ लाख रुपये तक निवेश कर सकते हैं। संयुक्त खातों के लिये सीमा ९ लाख रुपये है।

अन्य सुरक्षित निवेश के वित्तीय उत्पाद -

    बाजार में कुछ ओर भी वित्तीय उत्पाद हैं जो कि सरकार समर्थित हैं, और पूर्णतया: सुरक्षित होते हैं। इन वित्तीय उत्पादों के साथ समस्या यह है कि इनसे कोई नियमित आय नहीं होती है, ब्याज संचित होता जाता है और परिपक्वता पर मूलधन के साथ ब्याज मिलता है।

    इसलिये शायद यह आपके लिये सेवानिवृत्ति के धन को निवेश करने की अच्छी जगह नहीं होगी।

  • राष्ट्रीय बचत प्रमाणपत्र
  • किसान विकास पत्र
  • भविष्य निर्माण बॉन्ड्स

शेयर बाजार (Stocks)

    सेवानिवृत्त लोगों के लिये निवेश करने के लिये यह एक अपरंपरागत जगह है। लेकिन इस जगह सेवानिवृत्ति के कुछ प्रतिशत धन को निवेशित करने से अनदेखा नहीं करना चाहिये।

    नये नये मेडिकल साधनों के चलते औसत जीवनकाल बड़ने लगा है। आपको सेवानिवृत्ति धन अपने जीवनकाल तक सुरक्षित रखना है।

    अभी तक हमने जितने भी वित्तीय उत्पाद देखे हैं वो मुद्रास्फ़ीति को हरा नहीं सकते, और आपके कोष को बढ़ाने में सक्षम भी नहीं हैं। जिससे आपके बढ़ते हुए खर्चों को पूर्ण किया जा सके। केवल शेयर बाजार एक ऐसी जगह है जहाँ निवेश करने पर आप मुद्रास्फ़ीति से लड़ भी सकते हैं और आपका निवेशित धन बड़ता भी जाता है।

    परंपरागत तौर पर सेवानिवृत्ति कोष को शेयर बाजार में निवेश जोखिम भरा माना जाता है। पर अगर आप अपना कोष बड़ता हुआ देखना चाहते हैं तो व्यावहारिक रुप से यह केवल शेयर बाजार में ही संभव है।

    कम से कम अपने कोष का १०% और यदि संभव हो तो २०% तक शेयर बाजार में निवेश करना चाहिये।

निवेश करते समय निम्नलिखित दिशानिर्देशों का पालन करना चाहिये -

  • शेयरों में सीधा निवेश करने से बचें, म्यूचुअल फ़ंड के जरिये निवेश करें।
  • विविध म्यूचुअल फ़ंडों में निवेश करें, खासकर उन म्यूचुअल फ़ंडों को चुनें जिनकी पूँजी ज्यादा हो (Large Capital). उन्हीं म्यूचुअल फ़ंडों में निवेश करें जो कि आपके धन को अच्छी साख वाली कंपनियों में निवेश करते हैं।
  • एक ही बार में अपने धन को निवेश मत करिये, नियमित समय अंतराल में चरणबद्ध तरीके से निवेश कीजिये, जिससे गलत समय पर बाजार में पैसा लगाने के जोखिम से बच सकें।
  • म्यूचुअल फ़ंड में आप सिस्टमैटिक निवेश योजना (SIP) से औसत लागत प्राप्त कर सकते हैं।
  • जब आप अपने निवेश को निकालना चाहते हो तब भी एक बार में पूरे निवेश को नहीं निकालें। इसे भी नियमित समय अंतराल में चरणबद्ध तरीके से निकालें, जिससे आप बाजार के जोखिम से बच सकते हैं। आप अपने म्यूचुअल फ़ंड की योजना के व्यवस्थित निकासी योजना (Systematic Withdrawl Plan SWP) से निकाल सकते हैं।

आपको अपने सेवानिवृत्ति कोष को निवेशित करने के लिये शुभकामनाएँ।

पाकिस्तान का नया गुटखा… जरुर देखियेगा… आखिर गुटखे का सवाल है.. :)

 

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Tuesday, May 04, 2010

तनख्वाह बड़ी है ? अच्छे तरीके से कैसे उपयोग करें … ? कहाँ निवेश करें ?

    पिछला वर्ष २००८ नौकरीपेशा वर्ग के लिये बहुत मंदी वाला था, जहाँ एक तरफ़ तो अपने खर्चे कम करने पड़े और अपनी बचत में से भी पैसा निकालना पड़ा, और साथ ही कंपनियों द्वारा बाहर निकाले जाने का डर भी।

    कंपनियाँ बड़ी हुई तनख्वाह और बोनस बड़ाने में सक्षम नही थीं और सबने बहुत ही बुरा समय देखा है। खैर, अब ये मंदी का दौर खत्म हो गया है, और समय बदल रहा है और कंपनियाँ भी मंदी के दौर से निकल चुकी हैं।

अंदाजन बढ़ने वाली तनख्वाह के सर्वेक्षण नतीजे -
    सर्वेक्षणों से पता चलता है कि इस वर्ष सबसे ज्यादा वेतन बढ़ौत्तरी होने वाली है। भारत में वर्ष २०१० में वेतन वृद्धि लगभग १०.६ प्रतिशत होने का अनुमान है, जो कि एशिया महाद्वीप में सबसे ज्यादा है और वर्ष २००९ की ६.६ प्रतिशत की वृद्धि से ६० प्रतिशत ज्यादा है। भारतीय कंपनियों के मुकाबले बहुराष्ट्रीय कंपनियों की वेतन वृद्धि लग्भग ११.४ प्रतिशत होगी।

    ऊर्जा, दूरसंचार, दवाई उद्योग, यांत्रिकी, सेवा और निर्माण, तकनीक और ऑटोमोबाइल कुछ ऐसे क्षैत्र है, जहाँ पर वेतन वृद्धि ११.६ प्रतिशत से १२.८ प्रतिशत तक होने का अनुमान है।

    तकनीक और् आऊटसोर्सिंग क्षैत्र में २००९ के बाद जबरदस्त तरीके से व्यापार में उछाल देखा गया है, लेकिन ये बेहद डरी हुई हैं और इकाई के अंक में ही वेतन वृद्धि देने का अनुमान है जो कि ८.५ प्रतिशत से ८.९ प्रतिशत हो सकता है।

ज्यादा आमदनी: क्या करें ?
    मंदी ने भारतियों को धन की महत्ता सिखाई। तो धन का कैसे अच्छे तरीके से प्रबंधन करें / वेतनवृद्धि को कैसे बेहतर तरीके से उपयोग करें जिससे भविष्य में हमें ज्यादा मुनाफ़ा हो ? यह समय धन को उड़ाने का है या फ़िर उसे बचाने का ? या फ़िर जो मितव्ययिता के उपाय हमने इस मंदी के दौरान सीखे उन्हीं को जारी रखने में समझदारी है ?


    क्या यह बिल्कुल उपयुक्त समय है घर का सामान खरीदने के लिये ? आज लेपटॉप या टीवी जिसकी कीमत ४०,००० है वह शायद छ: महीने बाद ३५,००० हो जायेगी, और कुछ अच्छे ऑफ़र्स भी मिल सकते हैं। मोबाईल फोन या आईपोड के दाम एक तिमाही में ३० प्रतिशत तक कम हो जाते हैं। तो वास्तव में उपभोक्ता वस्तुओं पर बड़ी राशि खर्च करने का उपयुक्त समय नहीं है, लेकिन अगर बिल्कुल ही जरुरत हो तो आपको लेना ही चहिये, बस अच्छी तरह से मोलभाव कर लीजिये जिससे आपको अच्छे ऑफ़र मिल पायें ।

मौजूदा ऋणों की ई.एम.आई. बड़ा दें -
    अगर आपके ऊपर किसी भी तरह का लोन (गृह, शिक्षा, ऑटो, क्रेडिट कार्ड) है तो वेतनवृद्धि के धन से आंशिक पूर्व भुगतान या आप अपने लोन की ई.एम.आई. को बड़ाकर निर्धारित अवधि के पहले चुका सकते हैं, जिससे आपको राहत मिलेगी। (“अधिकतर व्यक्तिगत ऋणों में आंशिक पूर्व भुगतान की सुविधा नही होती है।" )

    हर बार जब भी आप अपनी किस्त का भुगतान करते हैं तो उसका एक हिस्सा लोन के ब्याज में चला जाता है और बाकी का बचा हुआ ऋण की रकम में। ऋण लेने के बाद आमतौर पर पहली किस्त जो भरी जाती है वह आप ब्याज भर रहे होते हैं जो कि आपको पता भी नहीं होता है, और ऋण की किस्त के आखिरी हिस्से को जब भर रहे होते हैं वह ऋण की रकम का हिस्सा होती है। उदाहरण के लिये – अगर आपने ६०,००० रुपये का ऋण लिया है और उसकी मासिक किस्त ई.एम.आई. १५०० रुपये जा रही है तो आप उसे बड़ाकर २००० रुपये करवा लीजिये जिससे बड़े हुए ५०० रुपये आपकी ऋण की रकम कम करने में सहायक होंगे और आपको ब्याज कम भरना पड़ेगा।

    तो जल्दी से ऋण चुकाने में अपनी रकम बड़ाईये और ब्याज में अपना पैसा जाने से बचायें।

निवेश और बचत बढ़ायें -

    अगर आपने ॠण नहीं ले रखा है तो आप अपने धन को म्यूचयल फ़ंड, यूलिप, बांड, शेयर इत्यादि में निवेश कर सकते हैं। म्यूचयल फ़ंड नये निवेशकों के लिये सबसे अच्छा वित्तीय उत्पाद है, जबकि आज के बाजार में निवेश के बहुत सारे विकल्प उपलब्ध हैं।

    मैं आपको एस.आई.पी. लेने की सलाह दूँगा, जहाँ आप पूर्व निर्धारित मासिक राशि अपने पसंद के म्यूचयल फ़ंड में निवेश कर सकते हैं। एस.आई.पी. आवर्ती जमा जैसा ही वित्तीय उत्पाद है बस एस.आई.पी. (SIP) बाजार के रिटर्न देने की क्षमता रखता है और आवर्ती जमा (Recurring Deposit) एक निश्चित ब्याज राशि।

    एस.आई.पी. की प्रत्येक मासिक राशि को एक ईंट के तौर पर देखें तो भविष्य में इससे आपको बिल्डिंग बनती नजर आयेगी। नियमित बचत के लिये यह बिल्कुल सही समाधान है।

    ५००० रुपये का एस.आई.पी. अगर १५ वर्षों तक जमा करते हैं, तो १५% के हिसाब से लगभग ३३ लाख रुपये हो जाता है। १५% बहुत कम लगाया है जबकि कई फ़ंडों में यह ६०% तक गया है।

    बहुत सारे फ़ंड हाऊस के फ़ंड अच्छॆ हैं तो आज ही चुनें और निवेश शुरु करें।

    इस वर्ष अच्छे वेतन वृद्धि की उम्मीद है और आप अपने बड़े हुए वेतन को अपने भविष्य के लिये निवेशित करें, क्योंकि पिछले दो वर्षों में आप लोग सीख ही गये होंगे कि खर्चों में कटौती कैसे करना है।

    कुछ तरीके वेतन वृद्धि के लिये मैंने बताये हैं, बाजार में और भी वित्तीय उत्पाद उपलब्ध हैं, जिनमें आप निवेश कर सकते हैं, और अपनी गाढ़ी मेहनत की कमाई को अपने परिवार के भविष्य के लिये सुरक्षित रख सकते हैं। आप पैसा कमाने के लिये कार्य करते हैं और ये वित्तीय उत्पाद आपके पैसे को भविष्य में अच्छे रिटर्न देने के लिये कार्य करते हैं।

51,000 से ज्यादा पेज विजिट हो चुके हैं.. ब्लॉग जगत और पाठकों का शुक्रिया

आज जब अपने ब्लॉग को देख रहे थे तो स्टेटकाऊँटर पर नजर पड़ी तो देखा कि 51,000 से ज्यादा का मीटर नजर आ रहा है तो सोचा कि आज ब्लॉग जगत और पाठकों का शुक्रिया अदा करता चलूँ।

उम्मीद है कि भविष्य में भी आप लोगों का आशीर्वाद और प्यार बना रहेगा।

Monday, May 03, 2010

वो पितृत्व का मेरा अहसास, अनमोल पल मेरी जिंदगी का…

    हरेक पिता के जीवन में पहला पल ऐसा आता है जो कि पिता को पितृत्व का अहसास दिलाता है और वो होता है बच्चे का परिवार में आगमन। क्या आपको याद नहीं आता ?

    मेरे जीवन का वो पल पितृत्व का मैं कभी भूल नहीं सकता, सुबह दस बजे का समय था, मेरी श्रीमती जी आपरेशन थियेटर में थीं, प्राकृतिक प्रसव नहीं था हमें दोनों याने कि जच्चा और बच्चा की चिंता थी।

    थोड़ी देर बाद ही डॉक्टर साहब दौड़े हुए खुद खबर देने आये और गले लगकर बधाई दी “जच्चा और बच्चा दोनों स्वस्थ है”, वो पल मेरी जिंदगी का सबसे महत्वपूर्ण पल बन गया। उस पल मैं पिता बन चुका था और अचानक ही अपने आप बड़े होने का अहसास होने लगा था, कि अब मैं बाप बन चुका हूँ। अचानक ही जिम्मेदारी का अहसास होने लगा था, कि अभी तक मैं केवल पत्नी की ही जिम्मेदारी थी अब ब्च्चे की भी है। मैंने डॉक्टर से एक बार भी यह नहीं पूछा कि लड़का है या लड़की, लिंग का कोई माइना नहीं होता पिता के लिये, पिता के लिये तो बच्चा एक अनमोल रतन होता है।

    उस पल मेरे आँखों में अचानक ही आँसू आ गये और लगा कि पूरी दुनिया में पटाखे फ़ूट रहे हैं, मेरी खुशी के लिये। मैं कुछ बोल नहीं पा रहा था, और अपनी खुशी को व्यक्त भी नहीं कर पा रहा था।

    थोड़ी देर बाद जब मेरे पापा मम्मी आये तो मैंने उन्हें बताया कि “पापा मैं पापा बन गया”, और अश्रुधारा थी कि रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। जिंदगी में इतनी खुशी और पितृत्व का अहसास पहली बार था।

    जिंदगी के उस अनमोल पल को मैं कभी नहीं भुला सकता, आखिर मेरे “पितृत्व” का पल था वह ।

विद्यालयीन प्रतियोगिता का सर्वश्रेष्ठ चित्र (ओर्कुट फ़ीवर)

Sunday, May 02, 2010

जब बेटा अपने माता पिता को अपने साथ गाँव से शहर ले जाने की जिद करता है, तो पिता के शब्द अपने बेटे के लिये - डॉ. राम कुमार त्रिपाठी कृत “शिखंडी का युद्ध” कहानी “वानप्रस्थ”

पिछले दिनों जब हम उज्जैन प्रवास पर थे तब हमने डॉ. राम कुमार त्रिपाठी कृत “शिखंडी का युद्ध” पढ़ी थी जिसकी एक कहानी “वानप्रस्थ” से ये कुछ शब्दजाल बहुत ही अच्छे लगे। और मन को छू गये।

जब बेटा अपने माता पिता को अपने साथ गाँव से शहर ले जाने की जिद करता है, तो पिता के शब्द अपने बेटे के लिये -

थोड़ी देर बाद माँ के आंसू कम हुए तो बोली, ’बेटे, तुम्हें कैसे समझाऊँ अपने भीतर की बात। तुम्हारे पिताजी ही तुम्हें अच्छी तरह समझा सकते हैं। उनकी बातें तो पूरी तरह से मैं नहीं समझती, लेकिन इतनी जरुर समझती हूँ कि तुमसे वे बहुत ज्यादा प्यार करते हैं, मुझ से कहीं अधिक क्योंकि वे हमेशा मुझे समझाते रहते हैं कि

“अगर हम लोगों का लगाया हुआ वृक्ष आज इतना बड़ा हो गया है कि अपना फ़ल खिलाकर अनेकों को तृप्त कर सकता है, अपनी छाया में अनेकों को विश्राम दे सकता है, तो क्या हम लोगों को उस पेड़ से चिपके रहना चाहिये ? कदापि नहीं ? उचित तो यही होगा कि हर क्षण हर घड़ी उसकी रक्षा के लिए तत्पर रहना चाहिये ताकि उसकी डाली पर किसी दुष्ट की कुल्हाड़ी न चले और उसकी छाया घट न जाए। हम लोग तो अब चौथेपन में आ चुके हैं। अभी का जीवन वानप्रस्थ की तरह व्यतीत करना चाहिए था, अत: जंगल न सही घर ही में रहना है, किंतु एकाकी। अपने लगाये पेड़ से दूर। उसकी छाया से दूर ताकि जीवन के अंतिम क्षणों में उसकी हल्की छाया भी कल्पतरु की छाया लगे, हल्का स्पर्श भी अमृत-सा लगे और उसकी तना का रंचमात्र आलिंगन भी अनंत ब्रह्मांड का आलिंगन बन जाये।”

Saturday, May 01, 2010

मुंबई ब्लॉगर्स मीट २५ अप्रैल २०१० – सबकुछ एक ही किश्त में, सबकी शिकायत के मद्देनजर.

मुंबई ब्लॉगर्स मीट हुई थी पिछले रविवार २५ अप्रैल २०१० को पर विवरण हम आज लिख पा रहे हैं, वैसे तो विभा रानी जी, रश्मि रविजा जी, जादू जी और हम अपनी एक तुरत फ़ुरत पोस्ट तो लिख ही चुके थे।

ब्लॉगर्स मीटिंग शाम ४ से ७ बजे तक एक स्कूल में रखी गई थी, और मीटिंग को ऊर्जावान बनाने का काम किया था विभा रानी जी, बोधिसत्व जी और आभा जी ने।

हम बिल्कुल ३.४५ दोपहर को अपने घर से निकले क्योंकि जहाँ मीटिंग थी वहाँ का रास्ता केवल हमारे लिये १० मिनिट का था, जब हम ब्लॉगर मीटिंग स्थल पर पहुँचे तो पाया कि जैसे ही हम ऑटो से उतर रहे हैं, विमल कुमार जी अपनी बाईक खड़ी करके हेलमेट उतार रहे थे और वही पहचान गये अरे भई क्या हालचाल हैं, पिछली मुंबई ब्लॉगर्स मीट में विमल कुमार जी से हमारी पहली मुलाकात हुई थी।

फ़िर मुलाकात हुई विभा रानी जी से और उनकी बिटिया कोशी से, कोशी भी ब्लॉगर हैं। विभा रानी जी से हमारा पहली बार परिचय हुआ, विमल कुमार जी ने बताया कि आपके ब्लॉग छम्मकछल्लोकहिस को अभी अवार्ड मिला है। हमने उन्हें बधाई दी।

इतने में ही बोधिसत्व जी और आभा जी भी आ गये, फ़िर हम बोधिसत्व जी और विमल कुमार जी थोड़ा पास ही घूमने चल दिये, तो आप दोनों के इलाहबादी किस्से सुनकर हम चकित हो रहे थे और मन ही मन उनके किस्से सुनकर आनंद भी आ रहा था, और कभी ऐसा लगा ही नहीं कि हम पहली या दूसरी बार मिल रहे हैं।

जब तक हम पहुँचे वापिस स्कूल की कक्षा में जहाँ कि ब्लॉगर्स मीट होनी निश्चित थी, तब तक अनिल रघुराज जी भी आ चुके थे, अनिल रघुराज जी से भी हमारी पहली मुलाकात थी। तभी बोधिसत्व जी के पास फ़ोन आया अभय तिवारी जी का, बस थोड़ी देर में ही अभय तिवारी जी भी आ गये। फ़िर आये अनिता कुमार जी और घुघुती बासुती जी, वैसे तो अनिता कुमार जी से चैट होती रहती है पर साक्षात दर्शन पाकर अच्छा लगा। इतने में रश्मि रविजा जी भी आ गईं, फ़िर आज राज सिंह जी और फ़िर ब्लॉगर फ़ैमिली जी हाँ यूनुस खान, ममता और जादू जी।
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विभा रानी जी, रश्मि रविजा जी, विमल कुमार जी, बोधिसत्व जी, अभय तिवारी जी
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विभा रानी जी, रश्मि रविजा जी, विमल कुमार जी, बोधिसत्व जी, अभय तिवारी जी
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विमल कुमार जी, बोधिसत्व जी, अभय तिवारी जी, अनिल रघुराज जी, अनीता कुमार जी
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अनिल रघुराज जी, अनीता कुमार जी

परिचय का दौर शुरु हुआ, विभा रानी जी ने अपना परिचय दिया उन्होंने बताया कि उनका एक ब्लॉग है बच्चों की कविताओं का जो कि हमें भी बहुत अच्छा लगा।

फ़िर परिचय हुआ हमारा याने कि विवेक रस्तोगी कल्पतरु का तो हमने बताया कि कुछ आध्यात्म पर लिखते हैं और कुछ वित्तीय और कुछ हल्के फ़ुल्के चिठ्ठे।

आभा मिश्रा जी ने अपने ब्लॉग अपना घर के बारे में बताया कि जो भी कुछ लिखने को होता है वह इस ब्लॉग पर लिखती हैं।
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आभा मिश्रा जी

रश्मि रविजा जी ने बताया कि वे दो ब्लॉग लिखती हैं जिसमें एक कहानियों के लिये समर्पित है और दूसरे पर जो भी इच्छा होती है लिखती हैं।
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घुघुती बासुती जी ने अपने ब्लॉग का परिचय दिया और बताया कि कैसे अपने मानस स्तर के लोगों से मेलजोल हुआ। ब्लॉग जगत में आकर सामाजिक वर्जनाओं के बीच अपनी पहचान बनाकर आज वे बहुत खुश हैं, आज उनको लोग उनके खुद की वजह से जानते हैं जो कि केवल उनकी अपनी पहचान हैं, और लोग मिलने के लिये ढूँढ़ते हुए घर तक पहुँच जाते हैं। घुघुती बासुती जी ने फ़ोटो लेने का मना कर दिया था तो हमने उनकी इच्छा का पूरा सम्मान किया और आशा है कि पूरा ब्लॉगजगत इस सम्मान को बनाये रखेगा।

अनीता कुमार जी ने अपने ब्लॉग लेखन की शुरुआत अपने एक लेख से की थी जो लिखा तो किसी के कहने पर था पर उन्हें वह लेख पसंद नहीं आया तो अपना ब्लॉग बनाकर उन्होंने पोस्ट बना दी।

फ़िर यूनुस खान जी के ब्लॉग से आजकल वे वाद्ययंत्रों के बारे में सीख रही हैं, और उन्हीं के कारण गानों में ज्यादा रुचि जागृत हुई, कि गानों के साथ कौन से साज बज रहे हैं ये भी जानने को और सीखने को मिला।
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राज सिंह जी

राज सिंह जी अपना ब्लॉग चलाते हैं राजसिंहासन और वे एक फ़िल्म बना रहे हैं जो कि अगले २६ जनवरी को प्रदर्शित करने की इच्छा रखते हैं, आपने अपनी फ़िल्म के बारे में जानकारियाँ दी।

अनिल रघुराज जी ने अपने ब्लॉग के बारे में बताया और अपने नये वित्तीय हिन्दी पोर्टल अर्थकाम.कॉम [... क्योंकि जानकारी ही पैसा है!] के बारे में बताया कि भारत में धन का उपयोग कैसे करना है उसके जागृति नहीं है और वे अपना योगदान राष्ट्र को इस पोर्टल के माध्यम से दे रहे हैं।

ममता जी ने जादू और अपना परिचय दिया कि वे जादू के साथ इतनी व्यस्त रहती हैं कि जादू का ब्लॉग ही अब उनका ब्लॉग हो चला है, पर फ़िर भी कोशिश रहती है कि अपने ब्लॉग पर कुछ न कुछ पोस्ट करती रहें और नियमित रहें।
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जादू जी, ममता जी
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राज सिंह जी, अनिल रघुराज जी, जादू जी, ममता जी
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यूनुस खान जी, विमल कुमार जी
यूनुस खान जी ने अपने ब्लॉग के बारे में बताया रेडियोवाणी संगीत को समर्पित उनका ब्लॉग है और अभी हाल ही में तीन वर्ष पूर्ण किये हैं और अब वे वाद्ययंत्रों के बारे में जानकारी दे रहे हैं।
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अभय तिवारी जी और यूनुस खान जी

अभय तिवारी जी और बोधिसत्व जी ने अपने परिचय में ब्लॉग से संबंधित जानकारी दी और साथ में खानपान का दौर भी चलता रहा।

विमल कुमार जी ने बताया कि जो गाना उन्हें लगता है कि इस गाने में कुछ विशेष है या यह गाना सबको सुनाना चाहिये बस अपने ब्लॉग के माध्यम से सुना देते हैं।

वैसे तो रश्मि रविजा जी [मुंबई ब्लॉगर्स मिले कुछ ऐसे, बहुत पुरानी पहचान हो जैसे], अनीता कुमार जी [ ब्लोगर मीट और आलसीराम], जादू जी['जादू' की पहली ब्‍लॉगर्स-मीट ] और विभा रानी जी [ मुंबई ब्लॉगर्स मीट- बोलती तस्वीरें!] ने मुंबई ब्लॉगर मीट पर विस्तार से चर्चा कर दी है उस विस्तार से चर्चा करना मेरे लिये अब मुश्किल हो रहा है क्योंकि समय ज्यादा बीत चुका है और बिल्कुल गजनी स्टाईल में अपने को शार्ट टर्म मेमोरी लोस हो गया है।

पंकज उपाध्याय जी और महावीर सेमलानी जी से हमारी बात हुई थी परंतु आप दोनों ब्लॉगर्स मुंबई के बाहर थे। नीरज गोस्वामी जी से क्षमा चाहेंगे कि हम जान बूझकर नहीं भूले थे, पर ये सबक था हमारे लिये कि अब नहीं भूलेंगे। देवकुमार झा जी आपका भी स्वागत है, मुंबई ब्लॉगर बिरादरी में, आगे से ध्यान रखेंगे । सतीश पंचम जी का जौनपुर जाने का कार्यक्रम निश्चित था, इसलिये वे भी सम्मिलित नहीं हो पाये।

और अंत में एक बात पहली बार हमने बिना किस्त के ये इतनी लंबी पोस्ट लगाई है, सब टिप्पणी पढ़कर हाँफ़ रहे हों परंतु आशा है कि  फ़ोटो देखकर सबकी थकान मिट गई होगी।

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