Thursday, December 31, 2009
Wednesday, December 30, 2009
हिन्दी समाचार पत्र “नवभारत टाईम्स” की आंग्लभाषा के प्रति प्रेम की बानगी देखिये कि पूरा एक पेज ही आंग्लभाषा में शुरु कर दिया…
आज सुबह हिन्दी समाचार पत्र “नवभारत टाईम्स” जब अपने फ़्लेट का दरवाजा खोल कर उठाया तो कुछ अलग लगा। साईड में एक विज्ञापन टाईप का बक्सा मुँह चिढ़ा रहा था, जिसका शीर्षक था – trendz2day. और क्या लिखा था आप भी पढ़िये -
“बदलते जमाने के साथ निखरती जिंदगी में सबसे खुशगवार महक है नई-नई सुविधाओं से लैस गैजेट्स, टेक्नोलॉजी और ट्रेंड्स की उतनी ही तेजी से बदलती दुनिया। इसी दुनिया की विविधताभरी दिलचस्प झलक अब आपको हम लगातार दिखाते रहेंगे, अपनी नई पहल trendz 2 day के जरिये । चूंकि इस दुनिया की सुविधाजनक भाषा इंग्लिश ही है, इसलिए इस हिस्से का किस्सा भी इंग्लिश में – खास आपके लिए।”
अब भला इन टाईम्स ग्रुप वालों को कौन समझाये कि भले ही आंग्लभाषा दुनिया की सुविधाजन भाषा है तो क्या हम भी उसे ही अपना लें अपनी मातृभाषा छोड़कर। अगर हिन्दी का समाचार पत्र है तो सभी चीजें केवल हिन्दी भाषियों के लिये ही होनी चाहिये, यहाँ सुविधा का ध्यान नहीं रखना चाहिये। जिसे इस तरह की चीजें पढ़ने का शौक होगा उसके लिये इस प्रकार का बहुत सारी सामग्री मौजूद है “दुनिया की सुविधाजनक भाषा में”। हाँ अगर टाईम्स यही पेज हिन्दी में शुरु करता तो एक सार्थक पहल होती कि हिन्दी भाषियों के लिये “दुनिया की सुविधाजनक भाषा” की सामग्री वह हिन्दी भाषा में उपलब्ध करवाता। शायद इसमें उसे बहुत मेहनत लगती और जो आदमी बेकार बैठे थे उनसे काम नहीं ले पाते और नये आदमियों को काम के लिये लेना नहीं पड़ा हो। पता नहीं क्या सोच है इसके पीछे।
हिन्दी समाचार पत्र प्रेमियों के लिये तो यह एक तमाचे से कम नहीं है, और मैं इसका विरोध करता हूँ।
सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – ४२ [चम्पानगरी जाते हुए प्रकृति का सुन्दर चित्रण… ]
दूसरे दिन ही मैं और शोण दोनों हस्तिनापुर से चल दिये। यात्रा बहुत लम्बी थी इसलिए हमने श्वेत घोड़े लिये। हम दोनों को ही अब अश्वारोहण का अच्छा अभ्यास हो गया था। मुझे तो सब प्राणियों मॆं अश्व बहुत ही अच्छा लगता था। वह कभी नीचे नहीं बैठता है । सोते समय भी वह खड़े-खड़े ही एक पैर के खुर को मोड़कर नींद ले लेता है। अश्वों के सभी स्वाभाव का मैंने बड़ा सूक्ष्म निरीक्षण किया था। कितना ही उच्छश्रंखल क्यों न हो, उसको वश में कैसे किया जाता है, यह मैं अब अच्छी तरह जान गया था। और फ़िर वह हमारा पीढ़ी-दर-पीढ़ी चला आता हुआ व्यवसाय था। प्रत्येक को अपने व्यवसाय में प्रवीण होना ही चाहिए – संजय काका ने सारथी के रुप में यह जो उपदेश दिया था, उसको मैं कैसे भूल सकता था।
हम लोग हस्तिनापुर की सीमा से बाहर निकले। वसन्त ऋतु के दिन थे वे। चारों ओर भिन्न-भिन्न रंगों के फ़ूल सुशोभित थे। बावा के वृक्ष छोटे-छोटे पीले फ़ूलों से लदे हुए थे। खैर के वृक्ष हलके लाल फ़ूलों से भरे हुए थे। अंजनी के वृक्षों पर नील कुसुम सुशोभित हो रहे थे। उन समस्त वृक्षों पर प्रकृति-देवता की इतनी कृपादृष्टि देखकर पलाश शायद अत्यधिक क्रुद्ध हो उठा था। उसका सम्पूर्ण शरीर रक्तवर्णी लाल सुमनों से आच्छादित था। यही कारण था कि सभी वृक्षों में वह अकेला ही अत्यधिक आकर्षक दिख रहा था।
उन समस्त पुष्पों की एक सम्मिश्रित सुगन्ध वातावरण में तैर रही थी। श्येन, क्रौंच, भारद्वाज, कोकिल, कपोत आदि भिन्न-भिन्न प्रकार के पक्षियों के सम्मेलन का तो यह समय था ही। अपने-अपने गीत वे पंचम स्वर में गा रहे थे। वसन्त ! वसन्त का अर्थ है – प्रकृति-देवता की स्वच्छन्द रंगपंचमी ! वसन्त अर्थात एक-दूसरे का हाथ पकड़े खड़े हुए सप्तस्वरों के खिलाड़ियों का कबड्डी-संघ ! वसन्त है – काल के बाड़े में अटका हुआ निसर्ग देवता के अतलसी वस्त्र का एक सुन्दर धागा। अथवा वर्षाऋतु में चंचल वर्षा ने अपनी निरन्तर गिरती धाराओं की उँगलियों से वर्षाऋतु को जो गुदगुदी की थी, उससे हँसी आने के कारण इधर-उधर पैर पटकते समय नीचे गिरा हुआ उसके पैर का सुन्दर नूपुर ! छि:, किसी तरह भी उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। वसन्त तो बस वसन्त ही है!
निसर्ग देवता के मनोहर रुपों को देखते हुए हम अपनी यात्रा कर रहे थे। रात होने पर समीप ही किसी नगर में ठहर जाते थे। इसी प्रकार आठ दिन बीत गये। अनेक नदियाँ और पर्वत पार कर हम नौवें दिन प्रयाग पहुँचे। प्रयाग ! यहाँ गंगा, यमुना और सरस्वती इन तीन नदियों का संगम था। यहाँ से चम्पानगरी अब केवल पचीस योजन दूर रह गयी थी।
| प्रतिक्रिया : |
Tuesday, December 29, 2009
अपने ग्राहक को पहचानो, एक मजेदार घटना कोका कोला के साथ (Know your customer….)
कोका कोला का एक सेल्समैन अपने मिडिल ईस्ट के काम निराश होकर लौट रहा था।
एक मित्र ने उससे पूछा, “तुम अरब में कोका कोला बेचने में क्यों सफ़ल नहीं हुए ?”
सेल्समैन ने अपने मित्र को समझाया
“जब मैं मिडिल ईस्ट में आया तो मुझे विश्वास था कि मैं अच्छी सेल्स कर पाऊँगा क्योंकि कोका कोला वहाँ कोई जानता ही नहीं था, लेकिन एक समस्या थी कि मैं अरबी भाषा नहीं जानता था। तो मैंने तीन पोस्टरों के माध्यम से अपने संदेश को लोगों तक पहुँचाने की योजना बनाई..”
पहला पोस्टर : एक आदमी रेगिस्तान की गर्म रेत में थक कर बेहोशी की हालत में पड़ा हुआ है।
दूसरा पोस्टर : अब वह आदमी हमारा कोका कोला पेय पी रहा है।
तीसरा पोस्टर : कोका कोला पीने के बाद अब उसमें ताजगी आ गई है।
और इन तीनों पोस्टरों को जगह जगह चिपका दिया गया।
मित्र बोला, “फ़िर तो तुम्हारा काम बन गया होगा !!”
“क्या खाक काम बन गया था”, सेल्समैन बोला “मुझे यह नहीं पता था कि अरब लोग उलटी और से पढ़ते हैं (Right to Left)”
सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – ४१ [कर्ण के गुरु और चम्पानगरी जाने की उत्कण्ठा… ]
बहुत दिन हो गये थे। मैं जब से हस्तिनापुर आया था, तब से केवल एक बार ही चम्पानगरी गया था। वह भी उस समय जब गुरुदेव द्रोण ने अपने शिष्यों की परीक्षा ली थी। उसके बाद पाँच वर्ष बीत गये थे। इच्छा होने पर भी इन पाँच वर्षों में मैं एक भी बार चम्पानगरी को नहीं जा पाया था। क्योंकि यहाँ मैं एक विद्यार्थी के रुप में आया था।
सौभाग्य से मुझको अपने गुरु बहुत अच्छे मिले थे। जिनको गुरुओं का गुरु कहा जाता है, ऐसे ही थे वे। साक्षात सूर्यदेव मेरे गुरु थे। हस्तिनापुर के अखाड़े में पत्थर के चबूतरे पर खड़े होकर मन ही मन निश्चय कर मैंने उनका शिष्यत्व अंगीकार किया था। उन्होंने भी अबतक मेरे साथ अपने प्रिय शिष्य का सा व्यवहार किया था। छह वर्षों के इस कालखण्ड में उन्होंने कितने दुर्लभ रहस्य मुझको बताये थे, वे किस भाषा में बताते थे, यह तो मैं कह नहीं सकता। परन्तु उन्होंने मुझसे जो कुछ कहा था, वह मैंने तुरन्त ही ग्रहण कर लिया था। क्या नहीं सिखाया था उन्होंने मुझको ! बाणों के दुष्कर प्रक्षेप, द्वन्द्व के कठिन हाथ; घोड़ा, हाथी और ऊँटों की उच्छ्श्रंखल प्रवृत्तियों को वश करने की कलाएँ। सब बातें उन्होंने मेरे कानों में कही थीं। चुपचाप ! मौन-भाषा में।
प्रतिदिन प्रात: अपनी कोमल किरणों से असंख्य कलियों के मुँदे पलक खोलते हुए वे मुझसे कहते थे, “कर्ण, तुझको भी ऐसा ही बनना चाहिए। अपना सर्वस्व मुक्त-हस्त से जो कोई माँगे उसको देकर अपने सम्पर्क में आने वाले सभी लोगों का जीवन तुमको ऐसे ही खिलाना चाहिए।“
कितने श्रेष्ठ थे मेरे गुरु ! संसार के किसी गुरु ने अपने शिष्य को इतनी छोटी-छोटी बातों से इतना उदात्त उपदेश कभी क्या दिया है ? अब एक बार चम्पानगरी में जाकर उन गुरु के चरण गंगा के स्वच्छ जल से अवश्य धोने चाहिए। अब मैं गंगामाता नहीं कहता हूँ, गंगा कहता हूँ। क्योंकि शैशवावस्था की श्रद्धा व्यावहारिकता के पाषाण से भोंथरी हो गयी थी। माँ एक ही होती है। जो जन्म देती है और पालन-पोषण करती है वह। नदी तो नदी है। वह माता कैसे हो सकती है ? मेरी माता एक ही थी – राधामाता ! उससे मिले भी बहुत दिन हो गये थे। वह अब मुझको देखेगी तो क्या सोचेगी, मुझको पूरा विश्वास था कि मेरे जाने पर वह सबसे पहले मुझसे यही पूछेगी, “कितना लट गया है रे वसु तू ? और तू गंगा के पानी में तो नहीं गया न कभी ?” क्योंकि पुत्र कितना भी बड़ा क्यों न हो जाये, माता की दृष्टि में वह सदैव बालक ही रहता है। माता ही विश्व में एकमात्र ऐसा व्यक्ति है, जिसके प्रेम को व्यवहार की तुला का बिलकुल ज्ञान ही नहीं होता। वह जानती है अपने पुत्र पर केवल वास्तविक प्रेम करना।
मैंने शोण को बुलाकर कहा, “शोण ! यात्रा की तैयारी करो। कल चम्पानगरी चलना है।“ उसका चेहरा प्रसन्नता से खिल उठा। शाल वृक्ष की तरह लम्बे-तड़ंगे होकर अनेक वर्षों के बाद, पहली बार हम चम्पानगरी की ओर जा रहे थे। अपनी जन्मभूमि की ओर ।
| प्रतिक्रिया : |
Monday, December 28, 2009
चीते के सिगरेट, हाथी की अफ़ीम, शेर की व्हिस्की और चूहे की दौड़…
एक चीता सिगरेट का सुट्टा लगाने ही वाला था कि अचानक एक चूहा वहाँ आया और बोला - “मेरे भाई छोड़ दो नशा, आओ मेरे साथ भागो, देखो ये जंगल कितना खूबसूरत है, आप मेरे साथ दुनिया देखो”
चीते ने एक लम्हा सोचा फ़िर चूहे के साथ दौड़ने लगा।
आगे एक हाथी अफ़ीम पी रहा था, चूहा फ़िर बोला - “हाथी मेरे भाई छोड़ दो नशा, आओ मेरे साथ भागो, देखो ये जंगल कितना खूबसूरत है, आओ मेरे साथ दुनिया देखो”
हाथी भी साथ दौड़ने लगा।
आगे शेर व्हिस्की पीने की तैयारी कर रहा था, चूहे ने उसे भी वही कहा।
शेर ने ग्लास साईड पर रखा और चूहे को ५-६ थप्पड़ मारे, हाथी बोला, “अरे ये तो तुम्हें जिंदगी की तरफ़ ले जा रहा था, क्यों मार रहे हो इस बेचारे को ?”
शेर बोला, “यह कमीना पिछली बार भी कोकीन पी कर मुझे ३ घंटे जंगल में घुमाता रहा”।
माँ-बाप को एक ही बेटे या बेटी से ज्यादा लगाव क्यों होता है…. क्यों ? यह प्रश्न है, जिसका उत्तर मैं ढूँढ़ रहा हूँ……..?
| प्रतिक्रिया : |
सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – ४० [यज्ञ के लिए गुरु द्रोणाचार्य द्वारा मेरे लाये गये चीते को यज्ञ के लिए निषिद्ध बताना….]
वह झपटकर दूर हट गया। अब मैंने उसपर भयंकर आक्रमण करना प्रारम्भ किया। एक के बाद एक। बँधी हुई मुट्ठी के सशक्त प्रहार उसकी पीठ पर, पेट पर, गरदन पर, जहाँ स्थान मिला वहीं पर करने लगा। वह अब पहले से अधिक बौखलाया हुआ-सा मुझपर आक्रमण करने लगा। लगभग दो घड़ी तक हम दोनों में द्वन्द्व होता रहा। अन्त में वह थक गया। मेरे रक्त की एक बूँद तक उसकी जीभ को प्राप्त नहीं हो सकी थी। थोड़ी देर पहले गरजनेवाला वह चीता अब भीतर ही भीतर गुर्राने लगा। भय से उसने अपनी पूँछ दोनों पैरों के बीच कर ली थी। मैं उसकी छाती पर बैठ गया। आस-पास पन्द्रह-बीस हाथ के घेरे में घास बुरी तरह कुचल गयी थी। पास की झाड़ी से एक वन्य लता मेरे पैरों तक आ गयी थी। एक हाथ से मैंने उसको खींच लिया। जोर से एक झटका मारते ही पन्द्रह-बीस हाथ लम्बी वह दृढ़ लता जड़ से उखड़कर मेरे हाथ में आ गयी। उस लता से मैंने उस चीते के दो-दो पैर एक जगह कसकर बाँध दिये। हाड़-मांस की सफ़ेद-काली एक भारी गठरी तैयार हो गयी।
अन्धकार घिरने लगा था। उस विशाल प्राणी को कन्धे पर रखकर चन्द्रकला के धूमिल प्रकाश में मैं नगर की ओर मुड़ा । नगर में मैं जिस समय पहुँचा उस समय अर्धरात्रि हो गयी थी। अत्यन्त शीतल पवन शरीर को सुन्न किये दे रहा था। अपने उत्तरीय को मैं बहुदा नदी के पानी में भूल आया था। देह पर भीगे वस्त्र धूल से लथपथ हो गये थे। सम्पूर्ण नगर निद्राधीन था। केवल बादलों की गड़गड़ाहट-सी चीते के गुर्राने की आवाज ही आ रही थी। मैं युद्धशाला में आया। अन्य समस्त शिष्य वन-वन भटककर जिन प्राणियों को लाये थे, वे सब लकड़ी के एक घर में बन्द कर दिये गये थे। उन्हीं में मैंने अपने कन्धे पर रखा हुआ वह चीता फ़ेंक दिया जो अपनी मूँछों के बालों से मेरी गरदन पर अबतक गुदगुदी करता रहा था। उस घर के सभी प्राणी भय से किकियाने लगे। मैं जल्दी-जल्दी अपने कक्ष में गया और वस्त्र बदलकर सोने चला गया।
प्रात:काल विधिवत यज्ञ प्रारम्भ हुआ। अन्त में वेदी पर बलि देने का अवसर आया। बलि लाने के लिए सभी लकड़ी के घर की ओर दौड़े । उनमें से एक शिष्य भीतर जाकर घबराकर, उलटे पैरों लौटकर यज्ञकुण्ड के पास आया। उसने गुरु द्रोण से कहा, “गुरुदेव, बलि के लिए कोई चीता ले आया है।“
“चीता ! चलो देखें ।“ आश्चर्य से उनकी सफ़ेद भौंहें तन गयीं। गुरु द्रोणाचार्य के साथ हम सब लोग उस घर के पास आये। मुझको आशा थी कि उस चीते को देखते ही गुरुदेव पूछताछ करेंगे और मेरी पीठ ठोकेंगे। परन्तु मस्तक को अत्यधिक संकुचित करते हुए वे बोले, “इस चीते को कोई क्यों लाया है ? अरे यज्ञ तो शान्ति के लिये किया जाता है। यज्ञ में चीते की बलि देना निषिद्ध माना गया है। छोड़ दो इस चीते को।“
परन्तु उसको छोड़ने के लिए कोई आगे ही नहीं बढ़ रहा था। अन्त में अकेला भीम आगे आया। मेरी बाँधी हुई बेलें उसने खोलीं। जो कुछ हुआ था, उससे वह चीता अत्यन्त भयभीत हो गया था। अपने प्राणों के डर से वह लकड़ी के घर की चहारदीवारी पर बहुत ऊँची छलाँग लगाकर क्षण-भर में अदृश्य हो गया।
मेरी आशा खण्ड-खण्ड हो गयी। उसक दुख तो मुझको हुआ ही। परन्तु सच पूछो तो मुझे गुरुदेव द्रोण के उस निकम्मे जीवन-दर्शन से चिढ़-सी लगी। यज्ञ में क्रूर और हिंसक पशुओं की बलि क्यों न दी जाये ? निरपराध बकरे की अपेक्षा वास्तव में चीते-जैसे पशुओं की बलि ही दी जानी चाहिए।
| प्रतिक्रिया : |
Sunday, December 27, 2009
प्यार पहली नजर का – एक कार्टून - (Love at 1st Sight….)
सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – ३९ [यज्ञ के लिए गुरु द्रोणाचार्य की एक विचित्र प्रथा और मेरा बाघ को लाने का प्रण.. ]
प्रत्येक वर्ष के अन्त में युद्धशाला में एक विशाल यज्ञ हुआ करता था। उस यज्ञ के लिए गुरु द्रोणाचार्य ने एक विचित्र प्रथा चला रखी थी। युद्धशाला के प्रत्येक शिष्य को यज्ञ में बलो देने के लिए एक-एक जीवित प्राणी अरण्य से पकड़कर लाकर अर्पण करना पड़ता था। किसी ने उनसे उस प्रथा के सम्बन्ध में पूछा था। उसका उत्तर देते हुए उन्होंने कहा था कि इससे विद्यार्थी स्वावलम्बी और साहसी बनता है।
एक बार वार्षिक यज्ञ के समय एक अविस्मरणीय घटना घटी। हम सभी लोग जीवित प्राणी लाने के लिए राजनगर से अरण्य की ओर चले। अरण्य प्रारम्भ होते ही सभी लोग भिन्न-भिन्न दिशाओं में फ़ैल गये। मैंने पूर्व दिशा को पकड़ा। चलते-चलते मन में विचार आया कि इससे पहले हरिण, साँभर, वन्य शूकर आदि प्राणी मैं अर्पण कर चुका हूँ। इस वर्ष इनसे बलवान कोई प्राणी मुझको अर्पण करना चाहिए। इनसे अधिक बलवान प्राणी कौन-सा है ? हाथी ? छि:, लकड़ियाँ तोड़नेवाला भारी-भरकम और कुडौल प्राणी है वह तो ! अश्व ? नहीं जी, अश्व को पड़ा तो जा सकेगा। फ़िर कौन-सा प्राणी ? चित्रमृग, वृक, तरस ? छि: सबसे अधिक सामर्थ्यवान प्राणी कौन-सा है? बाघ ! बस, इस वर्ष में बाघ ही अर्पण करुँगा। उसके लिए घोर अरण्य में जाना पड़ेगा। कोई चिन्ता नहीं। अवश्य जाऊँगा। सीमा पार करते हुए ही मैंने निश्चय किया।
लम्बे-लम्बे डग भरता हुआ, चौकन्नी दृष्टि से चारों ओर देखता हुआ मैं आगे बढ़ने लगा। दिन-भर घनघोर अरण्य में भटका। अनेक प्राणी मिले, प्रन्तु बाघ दिखाई ही नहीं दिया। दिन-भर भटकने के कारण प्यास बड़ी जोर की लग रही थी। सन्ध्या घिरती जा रही थी। विहग नीड़ों की ओर लौट रहे थे। मुँह का पसीना पोंछता हुआ मैं बहुदा नदी के किनारे पर आया। वहाँ खड़े होकर मैंने सूर्यदेव को वन्दन किया और मन ही मन कहा, “आज आपके शिष्य का संकल्प व्यर्थ हो रहा है।“
एक काले पत्थर पर बैठकर मैंने अंजलि में पानी लिया। उस पानी को मुँह से लगाने ही जा रहा था कि एक प्रचण्ड भारी-भरकम पशु पीछे से मेरे ऊपर आ गिरा। मेरा सन्तुलन बिगड़ गया और मैं आगे बहुदा नदी के पानी में गिर पड़ा। मेरे साथ ही वह पशु भी पानी में आ गिरा। बहुदा का जल खबीला हो गया। मैंने उस पशु की ओर देखा। श्वेत और काले धब्बोंवाला वह एक चीता था। सन्ध्या होने के कारण वह पानी पीने के लिए घाट पर आया था। उसका मुख कुम्हड़ा-जैसा गोलमटोल था। उसकी आँखें गुंजा की तरह लाल थीं।
मेरी आँखें आनन्द से चमकने लगीं। मैं पानी में हूँ, मेरे वस्त्र भीग गये हैं – इन बातों का मुझको बिलकुल भान नहीं रहा। मुझको मारने के लिए उसने अपना पंजा उठाया, उसे मैंने अपने हाथ से ऊपर का ऊपर ही पकड़ लिया और उसको खींचता हुआ एकदम पानी के बाहर ले आया। परन्तु पानी के बाहर आते ही चीते की और अधिक आवेश आ गया। मेरे हाथ से झटका देकर उसने अपना पंजा छुड़ा लिया। जल के स्पर्श से तथा मेरे विरोध से वह बौखला गया था। उसकी क्रुद्ध आँखों से आग बरसने लगी। जोर-जोर से गर्जना करता हुआ वह बार-बार मुझपर भयानक आक्रमण करने लगा। कभी-कभी वह पाँच-छह हाथ ऊँची छलाँग लगाता। उसकी रक्तवर्ण जीभ मेरा रक्त पीने के लिए निरन्तर लपलपाने लगी। जबड़ा फ़ाड़कर वह मेरे ऊपर झपटा। मैं उसके आक्रमणों का प्रत्युत्तर देने लगा। आधी घड़ी तक मैं अपनी रक्षा करने का प्रयत्न करता रहा। लेकिन मैं उसको रोक नहीं पा रहा था। मैंने अपनी देह की ओर देखा। उस क्रूर वन्य पशु ने सैकड़ों बार झपट्टे मारे होंगे, परंतु फ़िर भी उसके तीक्ष्ण दाँतों की अथवा नाखूनों की जरा-सी नोंक भी मेरी देह में घुसी नहीं थी। मेरी त्वचा अभेद्य है। यह अकेला ही क्या, ऐसे दस चीते मुझको नींद में भी नहीं खा सकते। विद्युत की एक तरंग-सी मेरी देह में सनसनाती चली गयी। क्षण-भर में ही मेरा शरीर रथ की तप्त हाल की तरह जलने लगा। मेरी सम्पूर्ण त्वचा अभेद्य है – केवल इस प्रतीति मात्र से ही मेरा शरीर अंगारे की तरह फ़ूल उठा। अकस्मात मैंने उस क्रूर पशु के मुँह पर कसकर तमाचा मारा।
| प्रतिक्रिया : |
Saturday, December 26, 2009
सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – ३८ [कर्ण और भीम के बीच का रोचक प्रसंग..]
एक बार मैं और अश्वतथामा दोनों खड़ग के अखाड़े के पास खड़े थे। उस अखाड़े के चारों ओर सब्बल-जैसी मोटी-मोटी लोहे की छड़ों की चहारदीवारी थी। उस चहारदीवारी की एक छड़ की नोक को किसी ने झुकाकर धरती पर टेक दिया था। वह उसी स्थिती में थी। वही एकमात्र छड़ उस चहारदीवारी से बाहर निकली होने के कारण अच्छी नहीं लग रही थी। उसको सीधी करने के विचार से मैंने उसको हाथ लगाया। उस समय बड़ी शीघ्रता से अश्वत्थामा बोला, “रहने दो कर्ण ! सभी इस पर प्रयोग कर चुके हैं। एक दिन क्रोध के आवेश में भीम ने इसको झुका दिया था। अन्य कोई इसको सीधी कर ही नहीं सका। वही कभी क्सको सीधी करेगा।“
“अच्छा ! तो फ़िर मैं इसको सीधी करूँ क्या ?” मैंने उसकी आँखों में झाँकते हुए कहा।
“यह तुमसे नहीं हो सकेगा।“
“अच्छा ?” मैंने पैरों से पदत्राण उतारकर अलग रख दिये। उत्तरीय कटि से लपेटा और उससे बोला, “इस छड़ को बायें हाथ से सीधी कर, जैसी यह थी वैसी ही इसको चहारदीवारी में लगा दूँगा। तुम देखते रहो।“
मैं उस छड़ के पास गया। एक बार आकाश की ओर देखा। गुरुदेव चमक रहे थे। बायें गाथ में सारी शक्ति एकत्रित की । आँख मींचकर पूरी शक्ति से मैंने वह छड़ हाथ से झटके के साथ ऊपर खींची। पहले झटके में ही वह कमर के बराबर ऊँची हो गयी। उसका ऊपर आया युआ सिरा कन्धे पर लेकर बायें हाथ के पंजे से धीरे-धीरे मैंने उसको चहारदीवारी के घेरे में वैसे ही लगा दिया, जैसे वह लगी हुई थी। अश्वत्थामा अवाक हो गया। मेरी पीठ पर थाप मारने के लिये उसने अपना हाथ मेरी पीठ पर रखा। पर फ़िर तुरन्त ही उसने ऊपर ही ऊपर से अपना हाथ उठा लिया।
“क्या हुआ अश्वत्थामन ?” मैंने आश्चर्य से उससे पूछा।
“अरे, तुम्हारी देह तो अग्नि की तरह जल रही है !” भेदक दृष्टि से मेरी ओर देखते हुए उसने उत्तर दिया।
उसके बाद भीम ने वह सीधी की हुई छड़ कभी देखी होगी। वह प्रतिदिन एक छड़ टेढ़ी कर जाता था। मैं प्रतिदिन रात में उसकी टेढ़ी की हुई छड़ को बायें हाथ से सीधी कर दिया करता।
| प्रतिक्रिया : |
Friday, December 25, 2009
सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – ३७ [अश्वत्थामा द्वारा कर्ण को कर्ण का सौंदर्य वर्णन.. ]
अश्वत्थामा पर मेरा जो प्रेम था, उसका रुपान्तर अब प्रगाढ़ स्नेह में हो गया था। समस्त हस्तिनापुर में वही एकमात्र मेरा प्राणप्रिय मित्र बन गया था।
एक बार हम दोनों गंगा के किनारे बैठे बातें कर रहे थे। अकस्मात सहज रुप में उसने कहा, “कर्ण, तुम मुझको अच्छे लगते हो, इसका कारण केवल तुम्हारा स्वभाव ही नहीं है, बल्कि तुम्हारा सुन्दर शरीर भी उसका एक कारण है।“
“तो क्या मैं इतना सुन्दर दिखाई देता हूँ ?”
“हाँ। तुमने यह स्वप्न में भी न सोचा होगा, लेकिन प्रतिदिन तुम जिस समय स्नान करके धूप चढ़ने पर गंगा से लौटा करते हो, उस समय सारे समाज के बन्धनों को ताक पर रखकर इस नगर की स्त्रियाँ कुछ न कुछ कारण निकालकर भवनों के गवाक्ष खोलती हैं। केवल तुमको देखने के लिए।“
“तुम यह क्या कह रहे हो अश्वत्थामा ? यदि यह सच है तो फ़िर आज से मुझको गंगा का मार्ग बदलना पड़ेगा।“
“यह सच है कर्ण! वृषभ-जैसे तुरे पुष्ट कन्धे, गुड़हल के फ़ूल-जैसे लाल गाल, उन गालों पर तेरे कानों के कुण्डलों के पड़नेवाले नीले-से दीप्त-वलय, खड़्ग की धार की तरह सरल और नोकदार नासिका, धनुष के दण्ड की तरह वक्र और सुन्दर भौंहें, कटेरी के फ़ूल-जैसे नीलवर्ण नयन, थाली-जैसा भव्य कपाल, गरदन पर होते हुए कन्धे पर झूलनेवाले, महाराजों के मुकुट के स्वर्ण को भी लजानेवाले तुम्हारे सुनहले घने घुँघराले बाल और रथ के खम्भे-जैसे शरीर के कसे हुए सबल स्नायु – यह समस्त स्वर्गीय वैभव होने के कारण तुम भला किसे अच्छे नहीं लगोगे ?”
“अश्वत्थामन, मुझको विश्वास है कि सच बात कहने पर तुम क्रुद्ध नहीं होगे।“
“कहो, कर्ण !”
“तुम्हारे पिताजी को क्यों इनमें से कोई बात कभी अच्छी नहीं लगी ? इन छह वर्षों में उनको और उनके लाड़ले अर्जुन को क्या यह मालूम है कि कर्ण कौन है, कहाँ है ?”
“यह सत्य है, कर्ण ! लेकिन ऐसे तुम अकेले ही नहीं हो। शस्त्र-विद्या सीखने के उद्देश्य से निषध पर्वत पर से सैकड़ों योजन पार करके आये हुए निषादराज हिरण्यधनु के पुत्र का – एकलव्य का – भी दुख यही है। तुम्हारे मन की बात सुनने के लिये कम से कम मैं तो हूँ यहाँ। परन्तु उस एकलव्य की मेरे पिताजी के बारे में क्या धारणा होगी, मैं सोच भी नहीं सकता। पिताजी ने क्यों ऐसा व्यवहार किया, यह मैं कैसे बताऊँ ? सभी पुत्र अपने पिता के अन्तरतम को नहीं जान सकते, वसु !”
उसका उत्तर सहज सत्य था और इसीलिए वह मुझको अत्यन्त अच्छा लगा। अधिरथ पिताजी के मन में क्या-क्या कल्पनाएँ हैं, यह बात क्या मैं कभी जान सकता था ? अश्वत्थामा ने मुझको एकलव्य का समरण करा दिया, इससे कभी न देखे हुए लेकिन एक समदुखी के रुप में एकलव्य के प्रति मेरे मन में अनजाने ही एक प्रकार का अननुभूत आदर उत्पन्न हो गया।
| प्रतिक्रिया : |
Thursday, December 24, 2009
क्या आपने गूगल की इस अनुवाद सेवा के बारे में सुना है, देखिये….
क्या आपने इस के बारे में सुना है.? सच में एक बहुत अच्छा तरीका दुनिया के अन्य हिस्से के लोगों से बातचीत की सुविधा, वो भी उन्हीं की भाषा में, मैं इसे अक्सर उपयोग में लाता हूँ।
एक भाषा में संदेश भेजकर पाईये तुरन्त दूसरी भाषा में अनुवाद । बस एक अनुवाद bot अपने संपर्कों में जोड़े निम्न प्रारूप में [भाषा जिसे अनुवाद करना है] से [भाषा जिसमें अनुवाद करना है] @bot.talk.google.com. जैसे मैंने अंग्रेजी से जर्मन भाषा में अनुवाद के लिये en2de@bot.talk.google.com bot जोड़ा हुआ है। यहाँ 24 bots उपलब्ध हैं:
(ar = Arabic, de = German, el = Greek, en = English, es = Spanish, fr = French, it = Italian, ja = Japanese, ko = Korean, nl = Dutch, ru = Russian, zh = Chinese)
| ar2en | en2el | en2nl | it2en |
| de2en | en2es | en2ru | ja2en |
| de2fr | en2fr | en2zh | ko2en |
| el2en | en2it | es2en | nl2en |
| en2ar | en2ja | fr2de | ru2en |
| en2de | en2ko | fr2en | zh2en |
| प्रतिक्रिया : |
सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – ३६ [कर्ण का तारुण्य… यौवन के रथ के पाँच घोड़े.… पुरुषार्थ, महत्वाकांक्षा, निर्भयता, अभिमान और औदार्य ]
तारुण्य ! जवलन्त धमनियों का अविरत स्पन्दन । प्रकृति द्वारा मानव को प्रदत्त सबसे श्रेष्ठ वरदान। जीचन के नगर का एकमात्र राजपथ। प्रकृति के साम्राज्य का वसन्त, मन-मयूर के पूर्ण फ़ैले हुए पंख, विकसित शरीर-भुजंग का सुन्दर चितकबरा फ़न, भावनाओं के उद्यान का सुगन्धित केवड़ा, विश्वकर्ता के अविरत दौड़नेवाले रथ में सबसे शानदार घोड़ा, मनुष्य का गर्व से सिर उठाकर चलने का समय, कुछ न कुछ अर्जन करने का समय, शक्ति का और स्फ़ूर्ति का काल, कुछ न कुछ करना चाहिए, इस भावना को सच्चे अर्थों में प्रतीत कराने वाला काल।
बचपन की सभी वस्तुओं का रंग हरा होता है। युवावस्था की सभी वस्तुओं का रंग गुलाबी और केसरिया होता है। युवक की दृष्टि की उडान क्षितिज को छूनवाले आकाश को भी पार कर जाती है। प्रत्येक गतिअमान और प्रकाशवान वस्तु की ओर उसका सहज सुन्दर खिंचाव होता है। जहाँ-जहाँ जो कुछ असम्भव होता है उसको सम्भव करने की अंगभूत तरंग उसमॆं होती है।
आजकल मुझको अपनी ही, बचपन की और किशोरावस्था की, कुछ बातों पर हँसी आती थी। गंगा को गंगामाता कहनेवाला कर्ण, उसके किनारे पर उत्तरीय में सीपियाँ इकट्ठी करनेवाला कर्ण, गरुड़ की तरह आकाश में उड़ने की बात करनेवाला कर्ण, बालकों के आग्रह को स्वीकार कर राजा के रुप में पत्थर के सिंहासन पर बैठनेवाला कर्ण, अपने कुण्डल कैसे चमकते हैं – यह गंगा के पानी में निहारनेवाला कर्ण ! – कितनी प्रवंचना थी उस समय के आन्न्द में ! कितनी अन्धी थी उस समय की श्रद्धा ! कितना सन्देह ! कितना अज्ञान !
यह सब धुँधला होता गया। काल के प्रहार ने सब कुछ ध्वस्त कर दिया। जीवन के रथ की वल्गाएँ युवावस्था के सारथी ने अपने हाथ में ले लीं। इस रथ में पाँच घोड़े होते हैं। पुरुषार्थ, महत्वाकांक्षा, निर्भयता, अभिमान और औदार्य।
जो सामर्थ्यशाली होता है, वही है यौवन। प्रकाश कभी काला होता है क्या ? ऐसा सामर्थ्यशाली यौवन ही अपने साथ औरों का मान बड़ाता है।
महत्वाकांक्षा तो युवक का स्थायी भाव है। मैं महान बनूँगा। परिस्थिति के मस्तक पर पैर रखकर मैं उसको झुका दूँगा, यह विचारधारा ही तरुण को ऊँचा उठाती है।
निर्भयता तरुण के जीवन-संगीत का सबसे ऊँचा स्वर है। इस स्वर की भग्न और बिखरी हुई ध्वनि है भय। फ़टे बाँस की-सी ध्वनि भी कभी-कभी किसी को अच्छी लाती है। जग ऊँचे स्वर की तान सुनने को उत्सुक होता है, फ़टी हुई आवाज नहीं।
अभिमान है युवावस्था का आत्मा। जिस मनुष्य में श्रद्धा नहीं है, वह मनुष्य नहीं है। और जिस तरुण में अभिमान नहीं है, वह तरुण नहीं है। तरुण मनुष्य अपनी श्रद्धाओं पर सदैव अभिमान करता है। समय आने पर उनके लिए प्राण तक देने को वह तैयार रहा करता है।
और उदारता है यौवन का अलंकार। अपनी शक्ति का अन्य दुर्बलों के संरक्षण के लिये किया गया उपयोग। स्वयं जीवित रहकर दूसरों को जीने देने का अमूल्य साधन।
ऐसी होती है तरुणाई। जहाँ यह होती है वहाँ अपमान से व्यक्ति चिढ़ता है। जहाँ यह होती है वहाँ अपने न्यायपूर्ण अधिकार पर किसी के आक्रमण से व्यक्ति क्रुद्ध हो उठता है। जहाँ यह होती है वहाँ यह अन्याय के पक्ष का उन्मूलन कर देती है। जहाँ यह होती है वहीं वास्तव में विजय होती है, वहीं प्रकाश होता है। प्रकाश न हो तो फ़िर अन्धकार ! अपमान का आलिंगन करने वाला अन्धकार ! पराजय के विष को अमृत समझकर पचा जानेवाला अन्धकार ! अन्याय का समर्थन करनेवाला अन्धकार ! आक्रमण से भयभीत होनेवाला अन्धकार !!
| प्रतिक्रिया : |
Wednesday, December 23, 2009
आज नेट पर तफ़री करते हुए गूगल वाली साड़ी दिखाई दी…. देखिये….
आज नेट पर तफ़री करते हुए सत्यापाल की डिजाईन की हुई गूगल वाली साड़ी पहने हुए अदिति गोवित्रिकर दिखाई दी, साड़ी की खास बात साड़ी के किनार पर ऐड्रेस बार है फ़िर गूगल और फ़िर गूगल के सर्च के परिणाम..
| प्रतिक्रिया : |
बचत खाते में औसत राशि का क्या मतलब होता है और इसकी गणना कैसे की जाती है ?? (What is Average Balance in Saving Account.. and calculations )
आजकल लगभग सभी बैंकों के बचत खातों में औसत राशि रखना होती है।
पहले यह न्यूनतम राशि होती थी। पर बैंकें यह औसत राशि की गणना कैसे करती हैं, आपको यह पता है, आईये देखते हैं -
औसत राशि - एक तिमाही में आपने रोज जो भी बैलेन्स अपने बचत खाते में रखा है, उस तिमाही के बैलेन्स का औसत औसत राशि होती है।
आईये एक उदाहरण द्वारा इसे देखते हैं -
मान लीजिये कि किसी बैंक में औसत राशि बचत खाते के लिये ५००० रुपये है एक तिमाही के लिये -
जनवरी माह में -
१ जनवरी को खाते में बैलेन्स है ५००० रुपये।
५ जनवरी को सैलेरी जमा हुई २५००० रुपये तो बैलेन्स हुआ ३०००० रुपये।
१० जनवरी को खाते में से आपने २०००० रुपये निकाल लिये तो बैलेन्स हुआ १०००० रुपये।
१५ जनवरी को खाते में से फ़िर १०००० रुपये निकाल लिये तो बैलेन्स हुआ ० रुपये।
और अगर आप स्वीप इन खाते में क्या सुविधा होती है और इसे कैसे उपयोग करें देखें ।
सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – ३५ [युवराजों के कारनामे बताता कर्ण…]
शाला के अन्य युवराज-शिष्यों की स्थिति इसके विपरीत थी। कृपाचार्य और द्रोणाचार्य दोनों का अत्यन्त लाड़ला था युवराज अर्जुन। वह अकेला ही क्यों प्रिय है, इसलिए युवराज दुर्योधन जान-बूझकर कोई अन्य कारण ढूँढ़कर अपना पक्ष प्रस्तुत करने का प्रयत्न करता। उसक पर्यावसान झगड़े में होता। अपने भाई को छेड़ने के कारण भीम को क्रोध आता। अपने क्रोध को वह कभी नहीं रोक पाता था। क्रोध से होंठ चबाता हुआ वह जो मिलता उसी पर टूट पड़ता। द्रोणाचार्य के भय से झगड़े की शिकायत कोई उन तक नहीं पहुँचाता था।
एक बार तो यह सुना गया कि वे सब लोग मिलकर वनविहार के लिए नहर के बाहर गये थे। वहाँ जब भीम सो रहा था, तब दुर्योधन ने दु:शासन की सहायता से वनलताओम से उसके हाथ-पैर कसकर बाँधे और फ़िर उसको एक सरोवर में फ़ेंक दिया था। परन्तु भीम को कुछ नहीं हुआ। कहा जाता है कि उसको जल-देवताओं ने मुक्त कर दिया था।
मुझको इस बात पर कभी विश्वास नहीं हुआ। क्योंकि एक तो भीम को उन्होंने यदि इस प्रकार सरोवर में फ़ेंक दिया होता, तो निश्चय ही वह जीवित न रहा होता; क्योंकि सरोवर में जलदेवता नहीं होते हैं, वहाँ विशाल जबड़ोंवाले मत्स्य और क्रूर मगर होते हैं। और दूसरी बात यह कि सरोवर से बाहर आने पर तो भीम को यह पता चल ही जाता कि उसको जान से मारने का षड़यन्त्र रचा गया है। यह कार्य दुर्योधन के अतिरिक्त अन्य किसी का नहीं हो सकता है, यह जानकर उसने बाहर आते ही सबसे पहले अपनी गदा से उसका काम तमाम कर दिया होता। वह इसलिए कि भीम अपने क्रोध को कभी वश में नहीं कर पाता था। कोई कितना भी समझाता, वह उसको नहीं मानता और कोई कितनी ही सान्त्वना देता, उससे वह सन्तुष्ट नहीं हो सकता था।
युवराजों के झगड़े निपटाते समय और उनके पुरुषार्थ का वर्णन करने में आकाश-पाताल एक करते समय भला सारथी के दो लड़कों की ओर ध्यान देने के लिए किसके पास अवकाश होता ! इस प्रकार ये छह वर्ष बीत गये। सोलह वर्ष के किशोर का बाईस वर्ष के तरुण में रुपान्तर हो गया। इच्छा होने लगी कि साहस-भरे और चुनौती देनेवाले प्रत्येक कार्य को स्वीकार किया जाये।
| प्रतिक्रिया : |
Tuesday, December 22, 2009
सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – ३४ [कर्ण की अपने गुरु के प्रति श्रद्धा…..]
काल के वायु के साथ ही ऐसे दिन और रात के अनेक सूखे-हरे पत्ते उड़ गये। प्रतिदिन प्रत्युषा में उठना, गंगा में जी भरकर डुबकियाँ लगाना, प्रात:काल से दोपहर तक, जबतक पीठ अच्छी तरह गरम न हो जाये, गंगा में रहकर ही सूर्यदेव की आराधना करना, दिन-भर युद्धशाला में शूल, तोमर, शतघ्नी, प्रास, भुशुण्डी, खड़्ग, गदा, पट्टिश आदि भिन्न-भिन्न प्रका के शस्त्र फ़िराना, समय अपर्याप्त लगने पर रात में शोण को लेकर पलीते के धूमिल प्रकाश में अचूक लक्ष्य-भेद करना और अन्त में सारे दिन की घटनाओं का चिन्तन करते हुए, कभी-कभी चम्पानगरी की स्मृतियाँ मन ही मन दुहराते हुए, सो जाना। इसी लीक पर चलते हुए छह वर्ष बीत गये।
बचपन का वसु अब मन के प्रांगण में दौड़ नहीं लगाता था। चम्पानगरी का स्थान अब हस्तिनापुर ने ले लिया था। चम्पानगरी में गंगा के किनारे बालू में अंकित होनेवाले छोटे-छोटे पैर अब हस्तिनापुर की भूमि पर दृढ़ता से पड़ने लगे थे। काल का अजगर छह वर्ष निगल चुका था। छह बर्ष ! इन छह वर्षों में क्या हुआ और क्या नहीं हुआ, यह सब कहा जाये तो वह अलग ही कहानी बन जायेगी। इन छह वर्षों में मैं तो युद्धशाला का एक शिष्य मात्र था। यहाँ कभी किसी ने मेरे साथ शिष्य का-सा व्यवहार नहीं किया। द्रोणाचार्य की देख-रेख में कृपाचार्य के पथक में मेरा नाम था। उस पथक में हस्तिनापुर के सभी साधारण शिष्य थे। उन साधारण शिष्यों में मैं सबसे अधिक साधारण था। शिष्यों की भीड़ में कृपाचार्य अथवा द्रोणाचार्य ने कभी मुझसे पूछताछ नहीं की थी। और सच पूछो तो वे मुझसे कुछ पूछें, मेरी पीठ पर अपना हाथ फ़ेरें, यह इच्छा मेरे मन में भी कभी नहीं हुई। जब-जब शास्त्र का कोई कठिन दाँव मेरी समझ में न आता, तब तब मैं क्षण-भर आँखें बन्द कर अपने गुरु का – सूर्यदेव का – स्मरण करता और पल-भर में उस दाँव को समझकर अलग हट जाता, जैसे यक्षिणी ने जादू की छड़ी घुमा दी हो। श्रद्धा में बड़ी शक्ति होती है। किसी न किसी पर श्रद्धा रखे बिना मनुष्य जीवित ही नहीं रह सकता।
शिष्यावस्था में मेरी सारी श्रद्धा अपने गुरु पर थी। भय से तो मेरा लेशमात्र भी परिचय नहीं था। परन्तु कभी-कभी मेरा मन केवल इसी बात के लिए विद्रोह कर उठता था कि शाला के ये दोनों गुरुदेव कभी मुझसे बात क्यों नहीं करते ? कर्ण को वे पत्थर का एक पुतला समझते हैं क्या ? प्यासे व्यक्ति को समुद्र में रहते हुए भी एक बूँद पानी पीने को नहीं मिले, मेरी दशा भी ऐसी ही हो जाती। अपने इन विचारों को मैं यदि किसी से प्रकट भी करता तो शोण के अतिरिक्त और था ही कौन मेरे पास ! मेर मन घुटता जा रहा था। बड़े लोग छोटों को अपने पास बुलाकर उनके दोष दिखायें तब तो ठीक है। लेकिन यदि उनकी उपेक्षा करें तो ?...तो उनके मन का अंकुर घुटने लगता है। फ़िर जहाँ उसको रास्ता मिलता है वहीं से वह बाहर निकलता है। इन छह वर्षों में मुझको क्या प्राप्त हुआ था ? घोर असह्य उपेक्षा। ज्वलन्त तिरस्कार। कर्ण नामक कोई एक शिष्य इस युद्धशाला में भी अपने आप ही बनय गया। कृपाचार्य और द्रोणाचार्य के प्रति आदर होने के बजाय शंका आ पैठी। मुझे ऐसा लगता कि वे मेरे नाममात्र के लिये गुरु हैं। जो शिष्यों के मन नहीं जानते हैं, वे कैसे गुरु ? जो प्रेम की फ़ूँक से शिष्यों के मन की कली प्रफ़ुल्लित नहीं करते, वे कैसे गुरु ? मेरा मन गुरु-प्रेम के लिए तरसता था। इसीलिए मैं प्रतिदिन अपने गुरु का हाथ अपनी पीठ पर तब तक फ़िरवाता था, जबतक कि पीठ गर्म नहीं हो जाती थी। हाँ तब तक सूर्यदेव को अर्ध्य देता रहता। नित्य इसी प्रकार तप्त होने के कारण मेरी पीठ प्रखर हो गयी थी।
| प्रतिक्रिया : |
Monday, December 21, 2009
सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – ३३ [द्वन्द्वयुद्ध के दाँव….]
छह वर्षों का समय तो ऐसे उड़ गया जैसे पक्षियों का झुण्ड उड़ जाता है। उसका पता भी न चला। युद्धशास्त्र में कुछ भी सीखना शेष नहीं बचा। बल्कि मैंने और शोण ने रात में जो अतिरिक्त अभ्यास किया था, उसके कारण हमने प्रत्येक शास्त्र के कुछ ऐसे विशिष्ट कौशल सीख लिये थे जो केवल हम ही जानते थे। कुश्ती के अखाड़े में मैंने केवल लगातार परिश्रम ही नहीं किया, बल्कि एक ही समय चार-चार मल्लयुवकों के साथ मैंने कुश्ती भी लड़ी थी। न जाने क्यों व्यायाम करते समय मुझको थकावट कभी नहीं मालूम पड़ती थी। इसके विपरीत जैसे-जैसे मैं व्यायाम करता जाता वैसे ही वैसे मेरा शरीर तप्त होता जाता। कभी-कभी वह इतना तप्त हो जाता था कि मेरे साथ कुश्ती लड़नेवाले जोड़ीदार कहते, “कर्ण, सीधा जा और दो-चार घड़ी गंगा के पानी में अच्छी तरह डुबकी लगाकर पहले अपना शरीर थोड़ा ठण्डा कर उसके बाद ही हमको अपने साथ कुश्ती लड़ने के लिये बुला। यह तेरा शरीर है या रथ की प्रखर तप्त हाल ?”
मेरे बाहुकण्टक दाँव से तो वे इतने घबराते कि उस दाँव को चलाने के लिए मैं जैसे ही चपलतापूर्वक अपने शरीर्को सक्रिय करने लगता, वे अपने-आप एकदम चित्त हो जाते । इस दाँव की एक विशेषता थी। प्रतिद्वन्द्वी की गरदन इस दाँव में जकड़ ली जाती थी। शरीर की सारी शक्ति हाथ में एकत्रित कर उसका दबाब धीरे-धीरे बढ़ाते जाने पर प्रतिद्वन्द्वी का दम घुटने लगता था और वह मर जाता था। उस समय उसके हाथ और पैर पीठ पर गट्ठर की तरह ऐसे बँध जाते थे कि गरदन पर रखे हाथ को हटाने की शक्ति उसमें होने पर भी वह उसको हटा नहीं पाता था। यह मेरा विशेष सुरक्षित दाँव था। और युद्धशास्त्र के नियम के अनुसार वह केवल द्वन्द्वयुद्ध के समय ही इतनी क्रूरता से प्रयोग में लया जा सकता था। द्वन्द्व का अर्थ एक ही था। उसमें दो योद्धाओं में से एक ही बचता था। इस युद्ध जब मरने के डर से शरण में आ ही जाता था, तो उसको जीवनदान मिलता था। परन्तु वह जीवनदान विधवा स्त्री के जीवन की तरह होता था। योद्धाओं के राज्य में इस प्रकार जीवनदान माँगनेवाले का मूल्य तिनके के बराबर भी नहीं होता है। ऐसे द्वन्द्वयुद्ध में काम आनेवाले सभी दाँव मैंने सीख लिये थे। परन्तु मेरा सबसे अधिक विश्वास एक ही दाँव पर था – बाहुकण्टक पर।
| प्रतिक्रिया : |
Sunday, December 20, 2009
कविता की दो लाईनें जो मेरे परम मित्र ने मुझे सुझाई …. आईये इस कविता को पूरी करने में मेरी मदद करें…
हमारे एक परम मित्र हैं जो अब हमारे सहकर्मी भी हैं, एक दिन हम ऐसे ही अंगड़ाई ले रहे थे, तो उन्होंने कुछ इस प्रकार से कह डाला -
मत लो अंगड़ाईयाँ
वरना हम पर भी असर हो जायेगा
हमने झट से ये लाईनें नोट कर लीं और कहा कि इसे पूरी कविता का रुप देते हैं परंतु हम यह कार्य न कर सके…. या सोच न सके… तो आज सोचा कि अपने हिन्दी ब्लॉग मंच पर ही कविता पूरी करने के लिये देते हैं शायद इन दो अच्छी लाईनों को कुछ अच्छे या बहुत अच्छे शब्द मिल जायें।
क्या नारी ही गृहिणी हो सकती है पुरुष हाऊस हसबैंड नहीं… क्या पुरुष को नारी का स्थान ले लेना चाहिये..
सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – ३२ [कर्ण का अन्तर्द्वन्द….]
विचारों के घोड़े मेरे मन के रथ को खींचने लगे। मनुष्य भी इस राजहंस की तरह ही नहीं होता है क्या ? उसको जिसकी आवश्यकता होती है, उसको ही ग्रहण करता है और शेष छोड़ देता है। मैंने भी ऐसा ही नहीं किया था क्या ? युवराज दुर्योधन और अश्वत्थामा इन दो को छोड़कर उस विशाल राजनगरी के अन्य किस व्यक्ति को मैं अपने निकट लाया था ? औरों के प्रति मेरे मन में अपनत्व क्यों नहीं था ? इसका उत्तर कैसे दिया जा सकता था ! वह राजहंस क्या कभी यह बता सकेगा कि उसने पानी छोड़कर ठीक दूध ही कैसे चुन लिया ? लेकिन इसमें मेरा भी क्या दोष है ! युवराज दुर्योधन ने स्नेह से मेरी पूछ-ताछ की इसलिए मैं भी उससे प्रेम करता हूँ ? मनुष्य का प्रेम धरती की तरह होता है। पहले एक दाना बोना पड़ता है। तभी धरती अनेक दानों से भरी हुई बालियाँ देती है। मनुष्य भी ऐसा ही होता है। प्रेम का एक शब्द मिलने पर वह उसके लिये मुक्त मन से प्रेम की शब्दगंगा बहाने को तैयार रहता है। इसीलिए दुर्योधन के प्रति मेरे मन में प्रेम था। अश्वत्थामा तो बड़ा भोला-भाला और निश्छल था। उसमें और शोण में मुझको कभी कोई अन्तर ही नहीं प्रतीत हुआ। अन्य किसी से मेरा परिचय ही नहीं था। सबसे परिचय करना सम्भव भी नहीं था, क्योंकि उतना समय मेरे पास कहाँ !
वह भीम तो हमेशा अपनी शक्ति के घमण्ड में चूर हुआ उस अखाड़े की मिट्टी में ही लोट मारता रहता था। जब वह अखाड़े के बाहर होता, तब कुछ न कुछ खाता ही रहता। उसके स्वर कितने भोंडे थे। उसके आँखें बड़ी-बड़ी टपकोड़े-सी थीं और जब वह सोता था तब आँधी की तरह खर्राटे भरता था। वह युवराज युधिष्ठिर तो घण्टों तक अश्वत्थामा से युद्ध, नीति, कर्तव्य आदि गूढ़ विषयों पर बातें करता रहता। नकुल और सहदेव केबारे में तो मुझको यह भी मालूम नहीं था कि ये कैसे हैं तथा क्या करते हैं ? युवराज दुर्योधन और दु:शासन को छोड़कर और सब व्यक्ति तो मुझको व्यर्थ ही फ़ैली हुई अमरबेल-जैसे लगते थे। क्या करना था उनसे परिचय करके! मनुष्य को उस राजहंस की तरह होना चाहिए। जो अपने मन को अच्छा लगे, वही लेना चाहिये, शेष छोड़ देना चाहिए। मुझको अबतक ऐसा ही लगता आया था।
मैं और अश्वत्थामा दोनों राजभवन से लौटे। आते समय अश्वत्थामा को कोई बात याद आ गयी। वह बीच में ही बोला, “कर्ण, मैंने मामा से तुम्हारे बारे में कुछ नहीं कहा।“
“उन्होंने तुमसे राजकुमारों की तैयारी पूछी थी। युद्धशाला के सभी शिष्यों की नहीं।“
“लेकिन फ़िर भी तुम्हारे बारे में मैं बहुत कुछ कह सकता था।“
“क्या-क्या कहते तुम मेरे बारे में ? इन कुण्डलों और कवच के बारे में ही न ? इनके विषय में अब नगर के सभी लोग जान गये हैं।“
“नहीं। मैंने कहा होता कि अर्जुन धनुष में, दुर्योधन गदा में, भीम मल्लविद्या में, नकुल खड़्ग में, दु:शासन मुष्टियुद्ध में, सहदेव चक्र में, युधिष्टिर युद्धनीति में और…और कर्ण इन सबके सब प्रकारों मे अत्यन्त प्रवीण हो गया है।“
वह मेरी स्तुति कर रहा था या सत्य कह रहा था – वह जानना कठिन था। क्योंकि प्रेम मनुष्य को अन्धा कर देता है। मैं उसका मित्र था। उसका मित्र – प्रेम क्या उसको अन्धा नहीं कर सकता था ? इसलिए मैंने कुछ भी न कहा।
| प्रतिक्रिया : |
Saturday, December 19, 2009
सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – ३१ [अश्वत्थामा के साथ मेरी मामा शकुनि से मुलाकात और राजहंस का किस्सा….]
| आज से मैं वापस मृत्युंजय की कड़ियों की शुरुआत कर रहा हूँ, कोशिश करुँगा कि अब अंतराल न हो। |
"अर्जुन धनुष में, दुर्योधन गदा में, भीम मल्लविद्या में, नकुल खड्ग में, दु:शासन मुष्टियुद्ध में, सहदेव चक्र में और युधिष्ठिर युद्धनीति में अत्यन्त निपुण हो गये हैं।" अश्वत्थामा ने उत्तर दिया।
| प्रतिक्रिया : |
Friday, December 18, 2009
फ़्रीडाउनलोडएडे.कॉम रोज एक अच्छा सॉफ़्टवेयर डाउनलोड कीजिये फ़्री में… (freedownloadaday.com One great programme every day, whether you need it or not..)
फ़्रीडाउनलोडएडे.कॉम रोज एक अच्छा सॉफ़्टवेयर यहाँ उपलब्ध है वह भी फ़्री बहुत सारी काम के औजार और उपयोगिताएँ आप उतार (download) सकते हैं|
यहाँ पर सभी प्रकार के ऑपरेटिंग सिस्टम के औजार और उपयोगिताएँ उपलब्ध हैं, विन्डोज, लाईनिक्स और मैक।
यहाँ शिक्षा, मनोरंजन, गेम्स, ग्राफ़िक्स, अंतरजाल और भी तरह की श्रेणियाँ उपलब्ध हैं।
| प्रतिक्रिया : |
बचत खाते से ज्यादा ब्याज कैसे प्राप्त करें, स्वीप इन जमा खाता एक बेहद उम्दा रास्ता...
पर अगर आपको ऐसी सुविधा वाला बचत खाता दे दिया जाये कि आप जो भी रकम सावधि जमा खाते में है, वह आप अपने बचत खाते के माध्यम से निकाल सकते हैं तो.... आपको ज्यादा रकम अपने बचत खाते में रखना भी नही पड़ेगी और ब्याज का नुकसान भी नहीं होगा। अगर बचत खाते में रकम रखते हैं तो ३.५% ब्याज मिलता है, वो भी उस न्यूनतम शेष राशि पर जो कि महीने की ११ से ३० तारीख के मध्य आपके बचत खाते में होगी।
इस तरह की सुविधा क्या सभी बैंकों में उपलब्ध है, जी हाँ ……
पूरा पढ़ने के लिये यहाँ चटका लगाईये।
Thursday, December 17, 2009
कमजोर ह्रदय वाले न देखें अगले साल (२०१०) की छुट्टियों का कैलेन्डर देखकर सदमा लग सकता है…..
आज सुबह हम अगले साल की छुट्टियों का जायजा ले रहे थे, वह भी राज्यवार क्योंकि हमें हर राज्य की छुट्टियों पर और बैंकों के अवकाश और हड़ताल की तारीखों का ध्यान रखना होता है, तो हमने पाया कि अगले साल २०१० में तकरीबन ७-८ छुट्टियाँ ऐसी हैं जो सप्ताहांत पर आ रही हैं, तो इतनी छुट्टियाँ तो कम हो गईं साल २०१० में, और हमें भी बहुत सदमा लगा क्योंकि हमारा ह्रदय भी बहुत कमजोर है।
पर हाँ कुछ छुट्टियाँ ऐसी भी हैं जो लंबा सप्ताहांत देंगी जैसे कि होली, दीपावली पर केवल कुछ से हमें कहाँ संतोष होने वाला है। :)
अब बात करें २००९ की तो यह साल छुट्टिधारियों के लिये बहुत अच्छा रहा है, क्योंकि लगभग हर त्यौहार या तो सोमवार या शुक्रवार को पड़ा था तो एक लंबा सप्ताहांत मिल गया था, जैसे कि अब आने वाली २५ दिसंबर की छुट्टियों को ही ले लीजिये । केवल तीन छुट्टियाँ लीजिये और २५ दिसंबर से ३ जनवरी तक मौज करिये – २५ दिसंबर क्रिसमस, २६,२७ दिसंबर सप्ताहांत, २८ दिसंबर मौहर्रम, २९,३०,३१ की छुट्टी लेना पड़ेगी, १ जनवरी नववर्ष, २,३ जनवरी फ़िर सप्ताहांत, तो पूरे दस दिन के मजे। ले लीजिये इस साल मजे अगले साल तो कोई छुट्टी नहीं है इस तरह की -
एक नजर २०१० के कुछ मुख्य अवकाशों की ओर जो सप्ताहांत पर पड़ रहे हैं -
| त्यौहार | दिनांक | दिन |
| मिलाद उन नबी | २७ फ़रवरी २०१० | शनिवार |
| मई दिवस | १ मई २०१० | शनिवार |
| स्वतंत्रता दिवस | १५ अगस्त २०१० | रविवार |
| गणेश चतुर्थी | ११ सितंबर २०१० | शनिवार |
| गांधी जयंती | २ अक्टूबर २०१० | शनिवार |
| दशहरा | १७ अक्टूबर २०१० | रविवार |
| गुरुनानक जयंती | २१ नवंबर २०१० | रविवार |
| क्रिसमस | २५ दिसंबर २०१० | शनिवार |
| प्रतिक्रिया : |
Wednesday, December 16, 2009
अमेरिका में गंगा माता को बीमारी कहा गया फ़ॉक्स न्यूज चैनल द्वारा…. हिन्दू समुदाय का कड़ा विरोध..
कल फ़ॉक्स न्यूज चैनल पर उनके वरिष्ठ एंकर ग्लेन बेक द्वारा गंगा माता का अपमान किया गया। कहा गया कि गंगा जो कि भारत की सबसे लंबी नदी है वह एक बीमारी की तरह है। कम से कम मीडिया को किसी भी तरह की टिप्पणी करने से पहले यह तय कर लेना चाहिये कि इससे किसी की भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचे।
हमारे हिन्दूवादी संगठनों ने प्रतिक्रिया दिखाई और इसका विरोध किया पर फ़ॉक्स न्यूज के ग्लेन बेक माफ़ी मांगने को तैयार नहीं हैं, क्यों, क्योंकि उनकी विचारधारा में भारत एक पिछड़ा देश है और पिछड़े देश को अमेरिका जैसे अगड़े देश कुछ भी बोल सकते हैं, उसका ताजा उदाहरण है – कोपेहगन जलवायु परिवर्तन सम्मेलन।
बाबा रामदेव ने तो यहाँ तक कहा कि फ़ॉक्स न्यूज को जब पता नहीं है कि गंगा को हिन्दू समाज माता का दर्जा देता है तो क्यों कुछ भी ऐसा बोला गया। ग्लेन बेक खुद यहाँ कुंभ के दौरान आयें और यहाँ आकर देखें कि हम भारतीय और विश्व के हिन्दुओं के श्रद्धा का केन्द्र है गंगा नदी। और उसमें स्नान कर उन्होंने जो अभद्र टिप्पणी की है गंगा माता पर, और जो पाप किया है, उस पाप को धोना चाहिये।
वाकई गंभीर मुद्दा है ये अमीर देश हमें अभी भी पिछड़ा ही समझता है और हम भी उससे दबकर रहते हैं, क्यों नहीं दबंगता दिखाते, भारत उनके लिये बड़ा बाजार है और नुकसान तो उन्हें भी होगा, हमें ये दिखाना पड़ेगा।
Tuesday, December 15, 2009
मोबाईल लेना है पर बहुत भ्रम है कि कौन सा लेना चाहिये... आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार है…..।
१ जनवरी से मोबाईल के क्षैत्र में क्रान्ति आने वाली है, क्योंकि १ जनवरी से नंबर पोर्टेबिलिटी शुरु होने जा रही है।
अभी हमारे पास टाटा इंडिकोम का मोबाईल और नंबर है पर अब हम एमटीएनएल की सर्विसेस लेना चाहते हैं, क्योंकि उनकी बात करने की दरें अभी सबसे कम है और इंटरनेट उपयोग करने के लिये भी।
अब सीडीएमए से जीएसएम में हमारा नंबर तो बदल जायेगा परंतु मोबाईल तो हमें नया खरीदना ही होगा, क्योकि अभी जो मोबाईल हमारे पास है वह केवल सीडीएमए टेक्नोलॉजी का है और जीएसएम का समर्थन नही करता है।
बजट - कम से कम, क्योंकि अपनी ही जेब हल्की होने वाली है :)
अब नया मोबाईल खरीदना है तो सोचा कि इसमे क्या क्या सुविधाएँ होनी चाहिये -
१. मोबाईल जीएसएम होना चाहिये
२. बैटरी बैक अप अच्छा होना चाहिये
३. इंटरनेट एकसेस कर सकते हों
४. ईमेल क्लाईंट संस्थापित कर सकते हों
५. कैमरा कम से कम २ मेगा पिक्सल होना चाहिये
६. लेपटॉप् से कनेक्ट करके इंटरनेट एक्सेस कर सकते हों
७. एफ़.एम. रेडियो
८. गाने सुन सकते हों
९. वोईस रिकोर्डर भी हो
१०. हिन्दी सपोर्ट कर सकता हो, अगर ब्लॉग उस पर लिख सकते हों तो सोने पे सुहागा, फ़िर तो मोबाईल से ही ब्लॉग ठेल दिया करेंगे :)
अगर ये चीजें हों तो अतिउत्तम -
१. ३जी तकनीक
२. वाई फ़ाई तकनीक
३. फ़ुल कीबोर्ड
अगर आप ऐसा कोई मोबाईल उपयोग करते हों या ऐसे मोबाईल के बारे में जानते हों तो कृप्या मार्गदर्शन करें। आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार है।
कुछ अच्छे वाक्य (Nice Sentences..) एक बुद्धिमान आदमी कहता है कि आप तब बहुत खूबसूरत लगती हैं जब आपके होंठ बंद रहते हैं।…
3 आसान तरीके मरने के लिए:
रोज एक सिगार लो - तुम 10 साल पहले मर जाओगे
रोज रम पियो - तुम 30 साल पहले मर जाओगे.
किसी से सच्चा प्यार करो - तुम रोज हरपल मरोगे
1. एक बेवकूफ़ आदमी एक औरत को बोलने से रोकने के लिये सीधे मना करता है परंतु एक बुद्धिमान आदमी कहता है कि आप तब बहुत खूबसूरत लगती हैं जब आपके होंठ बंद रहते हैं।
2. शराब को कम करने का अच्छा तरीका -
शादी के पहले – जब भी तुम दुखी हो तो पी लो।
शादी के बाद – जब भी तुम खुश हो तो पी लो।
3. तीन सबसे तेज संचार के साधन:
1. टेली फोन
2. टेली विजन
3. औरत को कहो
और तेज - उसे कह दो कि किसी को बताने की जरूरत नहीं, किसी को बताना मत..
4 .. प्यार अपने दोस्तों से करो उनकी बहनों से नहीं, प्यार अपनी बहन से करो उसकी सहेलियों से नहीं।
6 .. हमें इतना उदार होना चाहिये : चार चींटी एक जंगल में जा रही हैं
तभी उन्हें एक हाथी अपनी ओर आ रहा दिखाई देता है -
पहली चींटी कहते हैं: हमें उसे मार देना चाहिए।
दूसरी चींटी कहते हैं: नहीं, हमें केवल उसका एक पैर तोड़ देना चाहिए।
तीसरी चींटी कहते हैं: नहीं, हमें बस उसे हमारे रास्ते से दूर फेंक देना चाहिए ।
चौथी चींटी कहते हैं: नहीं, हमें उसे छोड़ देना चाहिए, क्योंकि वह अकेला है और हम चार हैं।
7.. अगर तुम्हारी कोई गर्लफ़्रेन्ड नहीं है – तो तुम्हारे जीवन में कुछ ऐसा है जो छूट रहा है ।
अगर तुम्हारी गर्लफ़्रेन्ड है – तो तुम अपने जीवन में सब कुछ छोड़ रहे हो।
8 .. प्रश्न: आप कब किसी को गलती करने पर बधाई देते हैं ?
जवाब: उसकी शादी पर !!
9.. जब आपका जीवन अंधकारमय हो गया हो, भगवान से प्रार्थना करो कि कि तुम्हें इस अंधकार से मुक्ति मिल जाये, प्रार्थना करने के बाद भी अगर तुम अंधकार में ही हो - “तो कृप्या बिजली बिल का भुगतान करें”।
10. सरकार एक आदमी को दो महिलाओं के साथ शादी करने की अनुमति क्यों नहीं देती ?
क्योंकि संविधान के अनुसार, किसी एक गलती के लिये दो बार एक ही गलती के लिये सजा नहीं मिल सकती ।
Sunday, December 13, 2009
विज्ञापन देखिये पैसे कमाईये…
क्या गजब के चोर हैं जो रुपये नहीं रुपये निकालने की मशीन ही ले उड़े…
Saturday, December 12, 2009
ये तो हम पतियों के साथ ज्यादती है वहाँ पत्नी मारे मोबाईल से, यहाँ बेलन से….
अभी अखबार में खबर थी कि प्रसिद्ध गोल्फ़र टाईगर वुड्स को उनकी पत्नी एलीना ने मोबाईल फ़ेंक कर मारा, और वुड़्स का दांत टूट गया। ये तो हम पतियों के साथ बहुत ज्यादती है कि वहाँ पत्नी मारे मोबाईल से और यहाँ बेलन से।
विवाहेतर संबंध पकड़े जाने के बाद टाईगर वुड्स के ऊपर उनकी पत्नी ने मोबाईल से हमला कर दिया। यहाँ अगर ऐसे संबंध पकड़ में आ जायें तो बेलन, लाठी, कटोरी, चम्मच, थाली, झाड़ू तक से पिटाई की जाती है और वहाँ मोबाईल से, अरे हमारा भी कोई स्तर है या नहीं।
हम भी तो मोबाईल का हमला सहन कर सकते हैं, वैसे ये सोचने की बात है कि मोबाईल के हमले से दांत टूट गया, कितना मजबूत होगा वो मोबाईल और इतरा रहा होगा कि देखो आज मैंने सारी मोबाईल प्रजाति का नाम रोशन कर दिया। अब पत्नियाँ मोबाईल टेस्टिंग करके खरीदा करेंगी कि इसके फ़ेंकने से क्या क्या हो सकता है। ये तो ब्रह्मास्त्र जैसा कोई अस्त्र बन सकता है। मोबाईल ही फ़ेंक कर मार दो, किसी अस्त्र की जरुरत ही नहीं है।
इधर बेचारा यहाँ का पति सोच रहा है कि ऐसी हमारी किस्मत कहाँ कि मोबाईल हम पर फ़ेंका जाये और हमारा दांत टूट जाये कि हम भी मुँह छिपाते फ़िरें। हमारा स्तर बेलन और झाड़ू से ऊपर कभी उठ ही नहीं पाया है। कहाँ मोबाईल और कहाँ हम। इतना मजबूत मोबाईल महंगा भी होगा, अब सस्ता वाला तो प्लास्टिक का होगा उसे फ़ेंककर मारा तो मुँह तो नहीं पर मोबाईल जरुर टूट जायेगा। इसके लिये तो मैटल का मोबाईल होना चाहिये, तभी तो वह मजबूत होगा और दांत तोड़ सकता है।
ऐसा मोबाईल तो बहुत महंगा आता है, अखबारों की सुर्खियों में आने के लिये सस्ता मोबाईल तो हम अफ़ोर्ड कर सकते हैं पर महंगा नहीं। अगर ऐसा हुआ तो महंगे मोबाईल की ही डिमांड होगी तो सरकार अखबारों में इस तरह की खबरें प्रतिबन्धित कर देगी, इससे देश की अर्थव्यवस्था पर भार आयेगा। क्योंकि फ़िर पति मिलकर अपनी तन्खवाह बड़ाने की मांग करेंगे।
सब देख लिया सोच लिया पर आखिरकार निष्कर्ष यही है कि यहाँ के पति की किस्मत में केवल बेलन और झाड़ू ही है।
Thursday, December 10, 2009
हैकर्स ने गूगल क्रोम बनाकर लांच भी कर दिया और डाउनलोड के लिये भी उपलब्ध है.. (Download Google ChromiumOS Free)
गूगल का क्रोम का वर्किंग एडीशन भी डाऊनलोड के लिये उपलब्ध है। यहाँ चटका लगाकर आप डाऊनलोड कर सकते हैं।
Wednesday, December 09, 2009
बड़ी फ़ाईलें कैसे भेजें या ज्यादा डाटा नेट पर थोड़े समय तक कैसे सुरक्षित रखें..
अगर कोई फ़ाईल बहुत बड़ी है जो कि जिप करने के बाद भी ईमेल पर अटैच नहीं कर पाते हैं पर जल्दी ही जरुरी में कहीं भेजनी है, क्योंकि ईमेल पर ज्यादा से ज्यादा १० एम.बी या २० एम.बी. की फ़ाईलें ही भेजी जा सकती हैं।
इस प्रकार की सर्विसेस देनेवाली बहुत सारी साईटें हैं पर कुछ विश्वसनीय और तेज साईटें हैं जिनका उपयोग किया जा सकता है, इन साईटों पर बिना किसी लोगिन के आप फ़ाईल अपलोड कर सकते हैं और इसकी दो लिंक आपके बताये हुए ईमेल पते पर आ जाती हैं, एक तो डाउनलोड करने के लिये और दूसरी इस फ़ाईल को डिलीट करने के लिये (जब आपका काम हो जाये तो आप इस लिंक से डिलीट कर सकते हैं।) | निम्न साईटों पर बिना लोगिन फ़्री में आप कितना अपलोड कर सकते हैं वो आप देख सकते हैं -
४.वीट्रांसफ़र – 2 gb आपको इसका पार्श्व भी अच्छा लगेगा जो समय समय पर अपने आप बदलता रहता है।
अपलोड और डाउनलोड आपकी ब्राडबेन्ड की स्पीड पर निर्भर करता है जैसे कि मेरे पास २५६ केबीपीएस से १०० एमबी अपलोड करने में लगभग १ घंटा लगता है। अगर आपके पास इससे कम स्पीड है तो और ज्यादा समय लगेगा व और ज्यादा स्पीड वाला होगा तो कम समय लगेगा।
पर जहाँ हम अपनी फ़ाईलें अपलोड कर रहे हैं वह भी सुरक्षित जगह होना चाहिये, इसके लिये हम कुछ उपाय कर सकते हैं कि जब फ़ाईल को जिप करें तो उसे एनक्रिप्टेड पासवर्ड से सुरक्षित कर दें। क्योंकि जब आप इन सर्विसेस वाली साईटों पर फ़ाईल अपलोड करेंगे तो ये सर्च इंजिन की नजर में भी आ जाता है। इसलिये इन फ़ाईलों को कुछ अजीब नाम दें जिससे आपकी फ़ाईल में क्या है वह फ़ाईल के नाम से पता न चले।
अगर ये लिंक किसी को पता न हो तो कोई फ़ाईल डाउनलोड नहीं कर सकता है, और ये बिल्कुल यूनिक की (unique key) होती है।
अब अगली बार जब आप अपना कम्पयूटर फ़ार्मेट कर रहे हों या फ़िर कहीं आपको फ़ाईल ले जानी हो पर साधन न हो या कुछ और बस अपनी फ़ाईल अपलोड कीजिये और बाद में डाउनलोड कर लीजिये, हो गया न आपका काम।
Tuesday, December 08, 2009
कोई आपके कार के शीशे पर अंडों से हमला कर दे तो ……
अभी आज ही एक ईमेल आया था कि अगर आप रात को कहीं जा रहे हों और कोई आपके कार के शीशे पर अंडों से हमला कर दे तो अंडे को साफ़ करने के लिये वाईपर न चलायें और न ही वाईपर चलाने के पहले पानी छिड़कें, ऐसा करने पर आपकी विंड स्क्रीन दूधिया हो जायेगी और आप ९२.५% तक देख नहीं पायेंगे। और मजबूरी में आपको अपनी कार रोकनी होगी जिससे आप लूट के शिकार हो सकते हैं।
यह नई तकनीकी लुटेरों द्वारा आजकल बहुत हो रही हैं सावधान रहें।
इस तरह की कई लूट की वारदातें राजस्थान, दिल्ली और हरियाणा में हो चुकी हैं।
ब्लॉगर मीट में शामिल ब्लॉगरों ने फ़िर मिलने के वादे के साथ शाम को अलविदा कहा - मुंबई ब्लॉगर मीट – रपट – २
| प्रतिक्रिया : |
Monday, December 07, 2009
मुंबई ब्लॉगर्स मीट – रपट - १
| प्रतिक्रिया : |
मुंबई ब्लॉगर मीट - पहली रपट
| प्रतिक्रिया : |
Sunday, December 06, 2009
मुंबई ब्लॉगर मीट
निम्न ब्लॉगरों ने भाग लिया -
अविनाश वाचस्पति | http://avinashvachaspati.blogspot.com |
| विवेक रस्तोगी | http://kalptaru.blogspot.com |
| महावीर बी सेमलानी | http://ctup.bhikshu.blogspot.com |
| शशि सिंह | www.shashisingh.in |
| रश्मि रविजा | http://www.mankapakhi.blogspot.com |
| शमा | http://shamasansmaran.blogspot.com/ |
| अजय कुमार | http://gatharee.blogspot.com |
| विमल वर्मा | http://thumri.blogspot.com |
| सूरज प्रकाश | http://kathaakar.blogspot.com/ |
| आलोक नंदन | |
| राजकुमार सिंह | http://rajsinhasan.blogspot.com |
| ’श्रीमती आशा अनिल आचरेकर | |
| सतीश पंचम | http://safedghar.blogspot.com |
| डॉ. रुपेश श्रीवास्तव | http://bharhaas.blogspot.com/ |
| फ़रहीन | http://bharhaas.blogspot.com/ |
बाकी की रिपोर्ट कल सुबह…
जाते जाते अविनाश जी का स्वागत करते हुए फ़ोटो..
| प्रतिक्रिया : |
Saturday, December 05, 2009
मुंबई हिन्दी ब्लॉगर मीट त्रिमूर्ती जैन मंदिर, संजय गांधी नेशनल पार्क, बोरीवली में सायं ३.३० बजे रविवार ६ दिसंबर को आयोजित की गई है
मुंबई ब्लॉगर मीट के लिये मेरी बहुत से ब्लॉगरों से बात हुई पर ऐसा लगा ही नहीं कि मैं उनसे पहली बार बात कर रहा हूँ ऐसा लगा कि हम लोग जाने कब से एक दूसरे को जानते हैं और बहुत अच्छी तरह से जानते हैं।
कुछ ब्लॉगर्स को मैंने फ़ोन लगाये कुछ ने मुझे फ़ोन किये कुछ ब्लॉगर्स से चेटिंग हुई। सबको अपने बेहद करीब पाया।
मुंबई ब्लॉगर्स मीट त्रिमूर्ती जैन मंदिर, संजय गांधी नेशनल पार्क बोरीवली में सायं ३.३० बजे रविवार ६ दिसंबर को आयोजित की गई है, जो कि वेस्टर्न एक्सप्रेस हाईवे पर बोरिवली ईस्ट में है। आप यहाँ सीधे लोकल रेल्वे स्टेशन से २९९ नंबर बस से टाटा स्टील से भी सीधे आ सकते हैं नहीं तो मुख्य द्वार जो कि वेस्टर्न एक्सप्रेस हाईवे पर है वहाँ से सीधे आ सकते हैं, प्रति व्यक्ति नेशनल पार्क का टिकिट २० रुपये है।
लगभग १४ ब्लॉगर्स की मंजूरी मिल चुकी है। अविनाश जी दिल्ली वाले मुंबई पहुंच चुके हैं और उनका भी ब्लॉगर्स से मिलने का बहुत व्यस्त कार्यक्रम है।
इस मीट का उद्देश्य एक दूसरे को जानना और वास्तविक दुनिया में मिलना है, हम सब एक दूसरे को आभासी दुनिया में बहुत अच्छी तरह से परिचित हैं, जब वास्तविकता में मिलेंगे तो बात ही कुछ ओर होगी। इस मीट में सभी ब्लॉगर्स के मानस मंथन से जो भी मुद्दे निकलेंगे वही अगली ब्लॉगर्स मीट का उद्देश्य होगा। यह मीट केवल एक गेट टुगेदर है जिसमें सब एक दूसरे को जान पायेंगे।
इस मीट के लिये ताऊ जी और समीर लाल जी ने विशेष सहयोग दिया है, और मुंबई टाईगर महावीर जी सेमलानी जी का भी विशेष सहयोग है। अविनाश वाचस्पति जी जो कि हमारे दिल्ली से आये हुए मुख्य अतिथि हैं, उनका भी भरपूर सहयोग है, कृप्या अपने आने की स्वीकृती दें जिससे व्यवस्था में सहयोग मिलेगा।
| प्रतिक्रिया : |
ग्लोबल वार्मिंग पर केवल नेपाल चिंतित है क्या… कुछ हमारा कर्त्तव्य है या नहीं… क्या हम अकेले कुछ कर सकते है….?
| प्रतिक्रिया : |
Friday, December 04, 2009
उत्तर भारतीय पत्नी Vs दक्षिण भारतीय पत्नी
इस पोस्ट को केवल और केवल मनोरंजन के रुप में लिया जाये यदि किसी भाई बहन को चोट लग जाये तो कृप्या बुरा न माने।
**** पत्नी के रुप में उत्तर भारतीय लड़की होनी चाहिये ****
१. शादी की उम्र के समय उत्तर भारतीय लड़की के बॉय फ़्रेंड उसकी उमर से ज्यादा होंगे।
२. शादी के पहले, वह लगभग बॉलीवुड की नायिका की तरह लगती है और् शादी के बाद उसे बाहों मै लेने के लिये उसके चारों और दो बार घूमना पड़ता है।
३. वह तुम्हें बहुत सारा प्यार करेगी, और तुम कंगाल हो चुके होगे लम्बे समय से उसके आने वाले दहेज दे इंतजार में क्योंकि तब तक तुम उसे कितनी ही बार फ़िल्में दिखा चुके होगे और बाहर होटलों में खाना खिला चुके होगे।
४. वो केवल पनीर बटर मसाला, आलू सब्जी, आलू गोभी सब्जी, आलू मटर, आलू पनीर व्यंजनों को ही बनाने का सोच सकती है, जिसे खाने से तुम बिस्तर पकड़ लोगे या तो ज्यादा केलोस्ट्रल से या फ़िर अजीर्ण और् गैस विकार से।
५.विकास केवल आपको अपने कैरियर में बाद में बढ़ता हुआ दिखेगा, आपके मासिक फ़ोन का बिल.
६. तुम उसके प्यार में अंधे हो चुके होगे क्योंकि उसकी जुल्फ़ें सुनहरी हैं, पर बाद में आपको पता चलता है कि अरे इसकी वजह तो मेंहदी है, जो उसने अपने सफ़ेद बालों को छुपाने के लिये लगायी है।
७. जब तुम ऑफ़िस से अपने घर पहुंचोगे तो वो "क्योंकि सास भी कभी बहु थी" देखने में व्यस्त होगी, आप या तो बाहर ही खाना खा के आ जाओ या फ़िर खुद ही खाना पकाओ।
८. आप उसके लिये एक् बहुत ही "विशिष्ट" इंसान हें.
९. आपसे मिलने से पहले वह हमेशा से यह् सोचती है कि मद्रास एक राज्य है जो कि पूरे दक्षिण भारत को समाहित करता है.
१०.जब वह कहे कि वो "वर्क आऊट" (work out) पर् जा रही है, उसका मतलब होता है "वॉक आऊट" (walk out)
११. उसके रिश्तेदारों की संख्या तुम्हारे शहर में रहने वाले लोगों से ज्यादा होगी।
१२.अंग्रेजी के केवल दो वाक्य जानती होगी “Thank you” और "How are you"
१. उसकी माँ तुम्हें हमेशा नीचा दिखायेगी क्योंकि तुम आईआईटी से नही पढ़े हो या मद्रास / अन्ना यूनिवर्सिटी से नहीं पढ़े हो।
२. उसके पिताजी अपनी किसी भी बात को शुरु करते वक्त या खत्म करते वक्त "... I Say..." जरुर कहेंगे|
३. अगर तुमने उसके सामने हिन्दी के चार या उससे ज्यादा अक्षर के शब्द बोले तो उसको कंपकपी आने लगेगी।
४. उसके लंबे बाल होंगे, बड़े करीने से तेल से तरबतर (दुबई की तेल वाली कंपनी उसके बालों से नारियल का तेल निकालने के लिये २५ साल के लिये करार पर बातचीत कर सकती है।)
५. वह “सुपर” शब्द का उपयोग केवल अपने लिये करेगी जब वह अपने उच्चतम शिखर पर होगी।
६. उसका नाम किसी देवी या फ़ूल के नाम पर होगा।
७. उसका पहला नाम आपके प्रथम नाम से बड़ा होगा, मध्यनाम और उपनाम संयुक्त होगा (अगर आप आंध्र से हैं)।
८. जब वह दूध/ दही और चावल मिला रही होगी आप कभी भी सुनिश्चित नहीं कर सकते कि ये कुत्ते के लिये है या उसके खुद के लिये।
९. शादी के लिये, उसे सिर पर चमेली का छोटा सा उद्यान होगा और मद्रास की गर्मी में भी असहज भाव से रेशमी साड़ियाँ पहने हुए पहनेगी। जबकि आप अपने एक कपड़े में गर्मी से परेशान हैं।
१०. उसके पसंदीदा क्रिकेटर कृष्णमचारी श्रीकांत है।
११. उसका पसंदीदा भोजन डोसा है, हालांकि उसने उत्तर भारतीय स्नैक्स जैसे कि चाट खाकर देखी है।
१२. वह हर गाने में कौन सा राग है बार बार बताकर तुमको बोर कर देगी।
१३. तुमको उसे गहने ही देना है, हालांकि उसके पास पहले से ही बहुत सारे हैं..
१४. उसके मंगलसूत्र का वजन WWF चेम्पियन की बेल्ट से भी ज्यादा होगा।
१५. उसके पिताजी हमेशा यही सोचेंगे कि उनकी बेटी तुमसे ज्यादा होशियार है।
Thursday, December 03, 2009
मुंबई ब्लॉगर्स मीट रविवार ६ दिसंबर को आयोजित की जा रही है…
मुंबई ब्लॉगर्स मीट रविवार शाम के समय संजय गांधी पार्क में आयोजित की जा रही है, समय रहेगा शाम ४ बजे का।
अजय कुमार जी, सतीश पंचम जी, रश्मि रविजा जी, आभा जी, महावीर सेमलानी जी से बात हो चुकी है और उनकी सहमति भी मिल चुकी है।
जो ब्लॉगर बंधु मीट में आना चाहते हैं वे कृप्या मुझे ईमेल पर अपना मोबाईल नंबर उपलब्ध करवायें।
मेरा ईमेल पता है rastogi.v@gmail.com
| प्रतिक्रिया : |


