कल्पतरु: November 2009

Monday, November 30, 2009

मुंबई के ब्लॉगर बंधु ध्यान दें – ब्लॉग मीटिंग के लिये आज मेरी बात अविनाश वाचस्पति जी से हुई …

आज मेरी बात अविनाश वाचस्पति जी से हुई, वे शनिवार ५ दिसंबर को मुंबई पहुँच रहे हैं। मुझे हालांकि लगभग ४ वर्ष मुंबई में रहते हुए हो गये हैं परंतु किसी भी मुंबई के ब्लॉगर से मुलाकात नहीं हुई है या यह कह सकते हैं कि कभी कोशिश नहीं की, पर अब अविनाश जी आ रहे हैं यही कड़ी जोड़ने के लिये। हमारी भी कोशिश है कि अधिक से अधिक ब्लॉगर मिलें और भौतिक रुप से उपस्थिती दर्ज करवाकर ब्लॉगर परिवार को परिचित करवाना है।

कृप्या बतायें कि कहाँ मिलना अच्छा रहेगा, मैं कांदिवली में रहता हूँ, सभी ब्लॉगर्स अलग अलग जगह पर रहते होंगे, इसलिये किसी ऐसी केन्द्रीय जगह का चुनाव कर लिया जाये जहाँ सबको आने जाने में सुविधा हो। जैसे कि दादर का शिवाजी पार्क, चर्च गेट, फ़ोर्ट में किसी बगीचे या कैफ़े में, मरीन ड्राईव कहीं भी बस ज्यादा से ज्यादा ब्लॉगर्स आ पायें यही कोशिश है।

ऐसे ही समय भी पक्का कर लिया जाये अभी हमारे पास ४ दिन हैं और हम कार्यक्रम निश्चित तौर पर अच्छी तरह से कर पायेंगे।

उम्मीद है सभी से सहयोग की।

मुझे आप ईमेल कर सकते हैं और अपना व्यक्तिगत मोबाईल नंबर भी, संपर्क करने का उचित समय भी दें तो बहुत ही अच्छा होगा तो हम आपस मैं बात कर सकते हैं।

विवेक रस्तोगी

मेरी तस्वीर जो केवल मेरे मन के आईने में नजर आती है….मेरी कविता ….. विवेक

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मेरी तस्वीर जो केवल,

मेरे मन के आईने में नजर आती है,

दुनिया को कुछ ओर दिखता है,

पर अंदर कुछ ओर छिपा होता है,

मेरा स्वरुप पारदर्शी है,

पर आईने को सब पता होता है,

जैसा मैं हूँ वैसा मैं ,

तत्व दुनिया को दिखाता नहीं हूँ,

आईना आईना होता है,

पर वो अंतरतम में कहीं होता है,

तस्वीर चमकती रहती है,

जिसे दुनिया तका करती है।

Sunday, November 29, 2009

आज मन धीर है, गंभीर है…… मेरी कविता…..विवेक

आज मन धीर है,

गंभीर है,

भविष्य के गर्भ में,

क्या है,

वो जानने के लिये,

अधीर है,

कोई चिंता नहीं है,

फ़िर भी,

बहुत ही बैचेन है,

जाने क्यों,

जिंदगी की धार में,

बहते हुए,

जिंदगी की धार पर,

चलते हुए,

आज मन धीर है,

गंभीर है।

Saturday, November 28, 2009

क्या आपने कभी गूगल की ट्रांसलेटेड सर्च(अनुवादित खोज, 翻译搜索) का उपयोग किया है, दूसरी भाषाओं में लिखा गया अपनी भाषा में पढ़ें…

     मैं अक्सर गूगल की ट्रांसलेटेड सर्च का उपयोग करता हूँ। बहुत ही काम की चीज है यह, आप लोग शायद गूगल ट्रांसलेट के बारे में तो जानते ही होंगे जिसमें आप कोई भी टेक्सट को कापी करके वहाँ मनचाही भाषा में उसका ट्रांसलेशन देख सकते हैं, पहले इसके लिये ट्रांसलेट का बटन दबाना होता था, पर आजकल बस आप टाईप करते जाईये गूगल एकदम उसका ट्रांसलेशन करके नीचे दिखाता जायेगा।

    इसमें ट्रांसलेट फ़्राम लेंग्वेज से ट्रांसलेट इनटू लेंग्वेज चुन लीजिये। जैसे कि अगर आप अंग्रेजी से हिन्दी में कुछ ट्रांसलेट करना चाहते हैं तो आप दिये गये बॉक्स में अंग्रेजी में लिख दीजिये या फ़िर कापी कर दीजिये और देखिये फ़टाफ़ट गूगल महाराज उसका ट्रांसलेट आपको हिन्दी में कर देंगे।

अब आते हैं ट्रांसलेटेड सर्च पर याने कि अनुवादित खोज, कई बार इच्छा होती है कि ये चीन भारत के बारे में बहुत कुछ कह रहा है पर हमारे पास कोई खबर नहीं आती है, जिसके बहुत सारे कारण होते हैं या फ़िर खबर गलत है या सही, इसके लिये आप सीधे अपनी हिन्दी भाषा में लिखकर चाईनीज भाषा के वेबपेजों पर उससे संबंधित क्या लिखा है, ढूँढ़ सकते हैं जब आप ट्रांसलेट वेबपेज पर होते हैं वहीं पर एक ओर लिंक होता है, ट्रांसलेटेड सर्च। उपयोग करके देखें, हालांकि अनुवाद का स्तर बहुत अच्छा नहीं है हाँ पर आप लेख की मूल भावना तक जा सकते हैं,  कि लेखक क्या कहना चाहते हैं, और फ़िर आप अगर टिप्पणी देना चाहें तो वो भी दे सकते हैं, वो भी उसी की चीनी भाषा में, अरे ट्रांसलेट सुविधा से।

अनुवादित भाषा में लेख पहले देख सकते हैं और मूल भाषा में लिखा गया लेख उसके सामने ही देख सकते हैं।

كيف حصلت على وظيفة

你怎样得到我的职务

बताईये ये मैंने क्या लिखा है और कौन सी भाषा है। अरे ट्रांसलेट पेज पर जाईये न। और आकर टिप्पणी कीजिये।

हाँ तुमने आकर, मेरी जिंदगी सँवार दी है …

तुमने मेरे अंदर,
प्रेम पल्लवित किया है,
तुमने मेरे अंदर्,
ऊष्मा भर दी है
तुमने जिंदगी को नये,
तरीके से जीना सिखाया है
हाँ तुमने आकर,
मेरी जिंदगी सँवार दी है

अब तुम,
मुझसे अलग नहीं हो,
तुम मुझमें इस तरह,
सम्मिलित हो गयी हो
इसलिये तुम्हरा,
अहसास ही नहीं होता
अहसास तो उसका होता,
है जो अपने मैं नहीं होता
हाँ तुमने आकर,
मेरी जिंदगी सँवार दी है ।

Friday, November 27, 2009

खबरों का जिक्र जिसमें २६/११, गूगल, सुखोई, हार्मोन हैं सफ़ल शेयर ट्रेडर बनने का राज और एक महिला मलेशिया में मुस्लिम से हिन्दु धर्म परिवर्तन करना चाहती है पर बहुत मुश्किल राहें हैं..

     आज सुबह सोच रहा था कि क्या लिखूँ, फ़िर बिस्तर से उठने के पहले ही एक अभिव्यक्ति आ गई जो कि मैंने कविता के रुप में अभिव्यक्त कर दी। फ़िर अखबार पढ़ रहा था, तो वही कल का टाईम्स ऑफ़ इंडिया देखा, तो पाया कि इन्होंने प्रिंट मीडिया से २६/११ का अनूठा विरोध किया था, कि पूरा अखबार श्वेत-श्याम था, रंग गायब थे। जैसे २६/११ को हमारी जिंदगी से इन राक्षसों ने हमारी जिंदगी के रंग उड़ा दिये थे। कल हमने जगह जगह २६/११ के श्रद्धांजलि कार्यक्रम देखे, सुबह ऑफ़िस जाते समय हीरो हांडा की टीशर्ट पहने हुए कुछ तख्ती लिये हुए करीबन २०-२५ बाईक्स पर लड़कों को, देखा तख्तियां थी श्रद्धांजलि की। दो बसों में बच्चे २६/११ पर शान्ति का संदेश दे रहे थे। कुछ लोगों ने टीशर्ट पहन रखीं थीं “पीस इंडिया, वन मुंबई” ऐसा ही कुछ था अब स्लोगन कुछ याद नहीं आ रहा है।

    ३१ करोड़ का खर्चा कर चुकी है सरकार कसाब को जिंदा रखने में, हम सोचते हैं कि वाकई सरकार जहाँ खर्चा करना चाहिये वहाँ नहीं करती है। जहाँ से नहीं कमाना चाहिये वहाँ से कमायेंगे, वो तो बस ये समझ लो कि बांद्रा वर्ली सी लिंक बन गया नहीं तो हमें खुशदीप सहगल जी की पोस्ट बरबस याद आ जाती है ठाठ-बाट का राज़...

   राष्ट्रपति महोदया प्रतिभा पाटिल ने फ़ाईटर प्लेन सुखोई में उड़ान भरकर इतिहास रच दिया। उन्होंने बता दिया कि इच्छाशक्ति होनी चाहिये फ़िर भले ही वह नारी हो वह कुछ भी कर सकती है। सलाम है मेरा उनको… और उनकी भावनाओं को… जो कि नारी की भावनाओं से ऊपर उठकर हैं… देश के लिये.. All set for Prez's Sukhoi sortie

   भारत में गूगल  गाँव मिला कर्नाटक के रायचूर जिले में पर आप उसे गूगल पर नहीं ढूँढ़ पायेंगे। गूगल रायचूर से लगभग ५१० किलोमीटर दूर है, पूरी खबर आप यहाँ पढ़ सकते हैं - Google search ends in Raichur‎  ।

   सही हार्मोनों का मिश्रण ही सफ़ल शेयर ट्रेडर बनाता है, प्रॉफ़िट की भूख भी इसमें सहभागी होती है, पूरा समाचार आप यहाँ देख सकते हैं Perfect trader a mix of hormones & drive‎  ।

   मलेशिया कुआलालंपुर से एक खबर है कि एक महिला मुस्लिम से हिन्दु धर्म परिवर्तन करना चाहती है परंतु वहाँ के दोगुला कानून के कारण उन्हें अड़चनों का सामना करना पड़ रहा है। २७ वर्षीय महिला  ७ वर्ष की उम्र में मुस्लिम बना दी गई थी पर उसने नहीं अपना मुस्लिम धर्म, खबर पढ़ें Malaysian woman tries to reverse Muslim conversion

लगभग १० साल बाद वापिस से कविता लिखी है, “इंतजार है उस दिन का”… इंतजार है आपकी प्रतिक्रियाओं का

इंतजार है उस दिन का

जब तुम अपनी बाँहों मॆं

भरकर मुझे गर्मजोशी से

प्यार से दिल से मन से

मुझे अलसुबह उनींदे बिस्तर से

उठाओगी, और हल्के से कहोगी

प्रिये सुप्रभात, तुम्हारे लिये

मैंने नई दुनिया गढ़ी है

वो तुम्हारा इंतजार कर रही है…

Thursday, November 26, 2009

क्या आप रोज दाढ़ी बनाते हैं या फ़िर कभी कभी.. ये आपके व्यक्तित्व को प्रभावित करती है..

   जो व्यक्ति रोज दाढ़ी बनाते हैं उनमें दूसरे को प्रभावित करने की क्षमता ज्यादा होती है बनस्बत उनके जो कि कभी कभी दाढ़ी बनाते हैं। एक तो क्लीन शेव होने से व्यक्ति अच्छा साफ़ सुथरा दिखने लगता है मतलब क्लीन शेव। जब भी वह आईना देखता है तो उसे अपने आप पर अभिमान होता है कि वाह मैं कितना अच्छा लग रहा हूँ।

    जब कभी किसी व्यक्ति से आप मिलेंगे तो क्लीन शेव का भी बहुत फ़र्क पड़ता है कि हाँ यह व्यक्ति साफ़ सुथरा है और नियम से रहता है क्योंकि जो लोग क्लीन शेव रखते हैं वे या तो रोज शेविंग करते हैं या फ़िर एक दिन छोड़कर ये अपनी अपनी शेविंग पर निर्भर करता है।

   क्लीन शेव होने से व्यक्ति अपनी उम्र से छोटा भी लगता है और उसकी उम्र पता लगाना मुश्किल होता है, जबकि मूँछ रखने से उम्र ज्यादा लगने लगती है, दाढ़ी रखने वाले व्यक्ति को दाढ़ी संभालना भी एक चैलेन्ज होता है। बाल सफ़ेद होने पर क्लीन शेव वाले व्यक्ति को तो कोई समस्या नहीं क्योंकि उसके सफ़ेद बाल शेव हो गये परंतु मूँछ और दाढ़ी रखने वाले के साथ समस्या है या तो वह अपने बाल सफ़ेद ही रखे या फ़िर नियमित अंतराल पर रंगता रहे।

    कल ही एक सर्वे की रिपोर्ट प्रकाशित हुई है चाहिए स्मूच? उड़ा दीजिए दाढ़ी, मूंछ! | जहाँ बताया गया है कि क्लीन शेव पुरुषों को महिलाएँ ज्यादा पसंद करती हैं और जिनकी हल्की दाढ़ी होती है उनमें महिलाओं को ज्यादा सेक्स अपील दिखती है। ये बात तो शायद सही है कि पुरुष हल्की दाढ़ी में अच्छे लगते हैं और खुद भी अपने आप को सेक्सी लुक देने से नहीं रोक पाते हैं, हल्की दाढ़ी क्लीन शेव मैन से ज्यादा सेक्सी होता है। पर यह अपने अपने सोच पर निर्भर करता है।

आप भी बताईये कि आप इस बारे में क्या सोचते हैं…

Wednesday, November 25, 2009

IRCTC.CO.IN के साथ आज सुबह का हमारा बहुत बुरा अनुभव – किसे शिकायत करें इनके पास इन्फ़्रास्ट्रक्चर ना होने की…

     आज सुबह सात पचपन से ही हम irctc पर हम तत्काल का रिजर्वेशन करवाने के लिये बैठ गये और क्विक बुक विकल्प से हम जाते हैं क्योंकि वहाँ से सीधे पेमेन्ट गेटवे पर जा सकते हैं। पर जैसे ही आठ बजे  irctc  की साईट Service Unavailable का बोर्ड दिखाने लगी, हम परेशान कि हमें पता ही नहीं चल पा रहा था कि हमें टिकिट मिल पायेगा या नहीं  और irctc की साईट को कई बार रिफ़्रेश किया परंतु नतीजा वही। आखिरकार हमें सफ़लता मिली ८.२८ मिनिट पर और हमारा टिकिट बुक हो गया तब मात्र ११ सीटें उपलब्ध थीं। वो तो हमारी किस्मत अच्छी थी कि हमें टिकिट मिल गई नहीं तो मात्र ५ मिनिट में ही सारी टिकिट साफ़ हो जाती हैं।

इस विषय पर हम पहले भी लिख चुके हैं -

irctc.co.in रेल्वे का मिला जुला खेल या इस सरकारी तंत्र के पास संसाधनों Infrastructure की कमी

     अब आज हमने सोचा कि इनका क्या किया जाये कहाँ शिकायत की जाये तो हमें पता चला कि इनका कोई नियामक ही नहीं है, जैसे बैंक, टेलीकॉम, इंश्योरेन्स आदि संस्थाओं के लिये नियामक हैं पर रेल्वे  का कोई नियामक नहीं है।

     क्या इनके पास infrastructure की वाकई कमी है या उसे लागू करने की इच्छाशक्ति की कमी है, अगर ये लोग बोलते हैं कि हमारे पास ट्रान्जेक्शन बहुत ज्यादा होते हैं तो यह गलत है क्योंकि अगर बड़े बैंकों से बराबरी की जाये तो कहीं न कहीं उसमें भी समानता मिल जायेगी। पर बैंकों के Infrastructure में कभी समस्या नहीं आती, क्योंकि वे लोग अपने को समय के अनुरुप अपडेट रखते हैं या फ़िर सब कुछ आऊटसोर्स कर देते हैं। भारतीय रेल्वे को भी इस पर कुछ ऐसा ही कदम उठाना चाहिये।

     हम अब ये बात रेल्वे के उच्चाधिकारियों तक कैसे पहुंचायें अब यह जानने की कोशिश करते हैं और उन तक अपनी बात पहुंचाते हैं। अगर कोई इस बारे में हमारी सहायता कर सकता है तो जरुर बताये।

Tuesday, November 24, 2009

ब्लॉगिंग के कीड़े के कारण अपने सारे कमिटमेंन्ट्स की वाट लग गई…

     ब्लॉगिंग के कीड़े ने ऐसा काटा है कि अपने सारे कमिटमेंन्ट्स की वाट लग गई है। कुछ दिन पहले जिम शुरु किया था मतलब दिवाली के एक महीने पहले तक तो हम सुबह या शाम कभी भी समय निकालकर चले जाया करते थे,  फ़िर एक महीने के लिये बीबी बच्चे उज्जैन चले गये तो हम भी आराम से बेचलर लाईफ़ जीने लगे और मजे में रहने लगे। अब तो न बीबी के ताने का डर था और न ही जिम न जाने पर किसी से नजरें भी नहीं चुरानी थी, बस जितना समय मिलता अपनी किताबें पढ़ने के शौक में निकल जाता या ब्लॉगिंग में।

   पर जबसे हमने जिम शुरु किया था तो हमारा ब्लॉगिंग का प्राईम टाईम उसी में निकल जाता था और हम हमारा ब्लॉग लिखने का शौक पूरा नहीं कर पा रहे थे। फ़िर बेशर्म होकर हमने जिम न जाने फ़ैसला कर लिया, थोड़े दिन बीबी ने भी ताने मारे फ़िर चिकना घड़ा समझकर बोलना छोड़ दिया कि बोलने का कुछ फ़ायदा नहीं। हाँ खर्चा जरुर ज्यादा हो गया, शौक में हम २-३ हजार की एसेसरीज ले आये और कभी कभी उनकी नजरों से तानों का एहसास होता है, क्योंकि अब वो हमारी आदत से परिचित हो गई हैं।

   हमने हमारे स्वास्थ्य के लिये अपने से कमिटमेन्ट किया था कि अब कुछ वजन कम करेंगे और नियमित व्यायाम करेंगे। पर ब्लॉगिंग के कीड़े ने ऐसा काटा कि अपने सारे कमिटमेंन्ट्स की वाट लग गई।

   और जब से हमारे घर में नया इंटरनेट कनेक्शन लगा है तो हमारी श्रीमती जी के तेवर भी बदल गये हैं कि आ गई मेरी सौत। अब हैं तो हम चिकने घड़े ही…. देखते हैं कि भविष्य में हम कैसे अपने कमिटमेन्ट्स पूरे कर पायेंगे।

फ़ोरेनरों को उनके देश से पढ़ा के भेजा जाता है कि “भारतीय चोर होते हैं”, और वे खुद…

    क्या आपने कभी सुना है कि भारत का वीसा मिलने के बाद फ़ोरेनरों के लिये उनका दूतावास एक मोडरेशन क्लास लेता है और उसमें भारत में बरती जाने वाली सावधानियों के बारे में बताया जाता है और लगभग यह वाक्य हर बार दोहराया जाता है “कि भारतीय चोर होते हैं..”, और वे खुद..

    हम कल का टाईम्स ऑफ़ इंडिया आज सुबह पखाने में पढ़ रहे थे क्योंकि हमारा समाचार पत्र थोड़ा लेट आता है और हमको सुबह उठकर एकदम प्रेशर बन जाता है, तो कुछ समाचार वहीं पर इत्मिनान से पढ़ लेते हैं।

    तो उसमें एक खबर थी कि वकील अपना फ़ोन एटीएम में भूल गया और फ़ोरेनर ने उसे उठा लिया।

   हाईकोर्ट वकील एटीएम में पैसे निकालने गया और अपना कीमती ब्लैकबैरी मोबाईल एटीएम के ऊपर ही भूल गया, जब १५ मिनिट बाद उसे ध्यान आया कि मोबाईल तो एटीएम में ही भूल गया हूँ, लेकिन वापिस आने पर मोबाईल वहाँ नहीं मिला। उन्होंने पहले पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई और फ़िर एचडीएफ़सी बैंक के वीडियो क्लिप देखने पर पता चला कि उनके बाद तीन फ़ोरेनरों ने एटीएम का उपयोग किया था और उसमें से एक उनका मोबाईल उठा कर ले गया मतलब कि चोरी की। वकील ने एचडीएफ़सी बैंक के चैन्नई ऑफ़िस से जानकारी निकाली तो पता चला कि चोर आस्ट्रेलिया का है। वहीं से उनको उसका नाम और बैंक एकाऊँट नंबर भी मिल गया जब मोबाईल को ट्रेस किया गया तो पता चला कि अभी वह दिल्ली में है, उससे ईमेल पर अपील भी की है कि मोबाईल वापिस दे दे और आस्ट्रेलियन दूतावास को भी ईमेल कर शिकायत कर दी गई है, पर अभी तक कुछ नहीं हुआ है, कोलाबा पुलिस मामले की छानबीन कर रही है।

    तो इस बात से ये तो साबित हो गया कि मुफ़्त की चीज सभी को अच्छी लगती है, चोरी के कीटाणु सभी में होते हैं बस किसी के एक्टीवेट होते हैं किसी के नहीं।

पूरा समाचार आप यहाँ पढ़ सकते हैं।

Monday, November 23, 2009

हमारी पिछली पोस्ट “हमने अपना फ़्लैट शिफ़्ट किया और मुंबई में लोगों को बहुत करीब से देखा देखिये और बताईये कि आपका नजरिया क्या है…. उत्तर भारतीय और मराठी मानुष” …. पर आई टिप्पणियों पर हमारे विचार…

 
राज भाटिय़ा जी ने लिखा है -

आप ने बहुत गुस्से मै यह पोस्ट लिखी है, ओर आप की बात से सहमत हुं, लेकिन फ़िर भी हमे ऎसा नही करना चाहिये, अगर हम सब ऎसा करने लग गये तो भारत के टुकडे टुकडे हो जायेगे,चारो तरफ़ खुन खरावा होगा, बल्कि हमे इन राजनीति करने वालो को घेरना चाहिये, लोगो को जागरुक करन चाहिये कि इन की बातो मै ना आये, वोट उसे दे जो साफ़ हो गुंडो मवालियो ओर चोर उच्चाको को मत दे अपना वोट चाहे बेकार चला जाये, जो धर्म भाषा, जात पात ओर राज्य की बात करे, अपनी ताकत की बात करे , जिस का चरित्र सब को पता हो, जो झुठे वादे करे मत दो उस कमीने को वोट, ओर बिरोध करे सब मिल कर.
अगर यह ठाकरे इअतन ही बलवान था तो क्यो नही उस समय अपनी बिल से निकला जब आतंकवादियो ने अपना भायंकर खेल खेला, कुछ बेवकुफ़ लोगो के लिये सब को बुरा मत कहो.

हाँ मैंने यह पोस्ट बहुत गुस्से में लिखी क्योंकि मैंने ये सब बहुत करीब से देखा है, और रोज ही देखता हूँ, ऐसा नहीं है कि सारे मराठी मानुष वैसे ही हैं, मेरे बहुत सारे अभिन्न मित्र मराठी हैं और बहुत मेहनत करते हैं मेरी पोस्ट उन लोगों के लिये हैं जो बात उछालकर राजनैतिक फ़ायदा ले रहे हैं और कहीं न कहीं वे लोग भी हैं जो मूक रहकर उन लोगों का समर्थन कर रहे हैं।

 
venus kesari जी ने लिखा है -

वाह वाह क्या बात है इलाहाबाद का नाम खूब रोशन हो रहा है :)

वीनस जी यह तो संयोग है कि सारे इलाहाबाद के मिले नहीं तो हमें तो रोज ही बिहार, उत्तरप्रदेश और भी अन्य राज्यों के लोग मिलते ही रहते हैं। वैसे इलाहाबादियों की भाषा में बहुत मिठास होती है।

बी एस पाबला जी ने लिखा है -

किसी भी क्षेत्र के स्थानीय निवासियों की बनिस्बत बाहरी व्यक्ति अपना स्थान व आजीविका सुरक्षित कर ही लेता है। फिर चाहे वह पंजाब हो या कनाडा, अमेरिका या फिर महाराष्ट्र!

क्योंकि बाहरी व्यक्ति अपना सर्वस्व छोड़कर कुछ कर दिखाने की तमन्ना से आया होता है इसलिये उसका परफ़ार्मेन्स हमेशा स्थानीय निवासियों से अच्छा होता है।

 
Udan Tashtari जी ने लिखा है -

बड़े गुस्से में हैं भाई!! खैर, है तो बात सरासर गलत. विरोध होना ही चाहिये।

समीर जी गुस्से में तो हैं पर इस गलत बात का विरोध तो करना ही होगा नहीं तो हम भी उस मूक भीड़ का हिस्सा हो जायेंगे जिनके विरोध के लिये हम मुखर हुए हैं।

 
Arvind Mishra जी ने लिखा है -

"अगर ये लोग उत्तर भारत के लोगों को मार रहे हैं तो उत्तर भारत के लोगों को मराठी लोगों को मारना चाहिये जो वहाँ रह रहे हैं और उनको महाराष्ट्र भेज देना चाहिये।"
1. आपकी पीड़ा समझी जा सकती है मगर यह कोई हल नहीं है !
2. यह मामला राज सरकार /केंद्र सरकार का है वह सख्ती से निपटे

पर इस राज सरकार पर केंद्र सरकार भी तो कोई कदम नहीं उठा रही है, क्योंकि इनके गुर्गे वहाँ पर भी हैं और गहरी पेठ जमा रखी है। इनके दिखाने के मुँह और ओर बोलने के कुछ ओर हैं।

 
संगीता पुरी जी ने लिखा है -

आपकी सोंच सही है .. मेरे ख्‍याल से भारत के सभी महानगर पूरे भारत के हैं .. जो भी उसे अपने प्रदेश का समझते हैं .. वो महानगर छोडकर उस प्रदेश के गांवों में चले जाएं .. इससे समस्‍या समाप्‍त हो सकती है !!

बिल्कुल सही है भारत के सभी महानगर पूरे भारत के हैं, पर ये लोग जो सवाल उठा रहे हैं ये लोग भी मराठी प्रदेश के किसी हिस्से से आये हैं और अब खुद को मुंबई का कर्ता धर्ता बताने में लगे हैं।

 
Suresh Chiplunkar जी ने लिखा है -

पहले भी मराठियों को "गोड़से" होने की वजह से 50 साल पहले मार-मार कर भगाया गया था, अब फ़िर से हिन्दी प्रदेशों से "ठाकरे" होने की वजह से मार-मार कर भगा दो भाई… कौन रोक सकता है… मूल समस्या को समझने की बजाय किसी एक व्यक्ति के कर्मों की सजा पूरे समुदाय को दे दो…।
नोट - "सरकारी कार्यालयों" में काम करने वाले सचमुच के "हरामखोरों" में से कितने प्रतिशत मराठी हैं यह भी पता करना पड़ेगा अब तो

सुरेश जी का दर्द उभर कर आया है मराठियों के लिये, पर सुरेशजी ये सभी मराठियों के लिये नहीं है आप देखें मैंने सबसे आखिरी में एक वाक्य लिखा है - “थू है मेरी ऐसे लोगों पर जो ये सब कर रहे हैं और जो इनको समर्थन कर रहे हैं। मैं अपना विरोध दर्ज करवाता हूँ।”

केवल एक या दो लोगों के कारण पूरे समुदाय को बिल्कुल सजा नहीं मिलनी चाहिये.. बिल्कुल सही कहा है, पर समुदाय के लोगों को खुलकर विरोध भी तो दर्ज करवाना चाहिये कि तुम लोग हमारे पूरे समुदाय को बदनाम कर रहे हो।

“अरे दम है तो रोको प्राईवेट बैंको को, व्यावसायिक संस्थाओं को, सॉफ़्टवेयर कंपनियों को जिनमें बाहर के लोग याने कि अधिकतर उत्तर भारतीय या दक्षिण भारतीय लोग चला रहे हैं, वहाँ मराठियों का प्रतिशत देखो  तो इनको अपनी औकात पता चल जायेगी। ये वहाँ टिक नहीं पायेंगे क्योंकि इन लोगों को काम नहीं करना है केवल हरामखोरी करना है सरकारी कार्यालयों में।”

यहाँ प्रतिशत निकालने की जरुरत नहीं है क्योंकि हरेक प्रदेश में प्रदेशवासियों के लिये अपना कोटा फ़िक्स होता है, ये जो मारा मारी हो रही है वो हो रही है केन्द्र की नौकरियों के लिये। प्राईवेट में इनका प्रतिशत देखिये सब बात साफ़ हो जायेगी। आप कभी कार्पोरेट्स में सर्वे करवाईये तो सब पता चल जायेगा।

वन्दना जी और डॉ टी एस दराल जी की बातों से भी सहमत हैं

 
निशाचर जी ने लिखा है -

हरामखोरी तो भाई इधर यू0 पी० और बिहार में भी कम नहीं है. यही लौंडे जो मुंबई, दिल्ली, अहमदाबाद, सूरत में जाकर ठेला-रिक्शा खींचते हैं, मजदूरी करते हैं, सब्जी- दूध बेचते हैं, यहाँ अपने खेतों में काम करते इनकी नानी मरती है. गाँव में मजदूर ढूंढें नहीं मिल रहे और यह जूता -गाली खाने चले जाते हैं मुंबई-दिल्ली. यहाँ अपने खेतों में काम करते शर्म आती है. खेत दे दिया है बटाई पर और बम्बई जाकर कलक्टरी कर रहें हैं.जिस कारण से पिट रहे हैं वो गलत है लेकिन हैं पिटने के काबिल ही।

निशाचर जी हरामखोरी तो कहीं भी कम नहीं है क्योंकि उसकी तुलना नहीं की जा सकती है, अब एक बात आप ही बताईये कि अगर वह अपने खेतों में काम भी करेगा तो वह कितना कमा लेगा, उसकी भी बहुत सी मजबूरियां होती हैं, जिसके कारण वह अपने परिवार से दूर रहकर ये सब काम करता है, अगर वहाँ कमायेगा तो कितना १५०० या ज्यादा से ज्यादा २००० पर यहाँ उतनी ही मेहनत करके वो १० से १२ हजार कमा लेता है, और आधे से ज्यादा पैसे अपने घर पर भेजकर अपना घर परिवार को सुकून देता है। हाँ ये लोग मुम्बई में आकर कलक्टरी नहीं कर रहे हैं पर अपने परिवार को वो सब दे पा रहे हैं जो वे वहाँ रहकर नहीं दे सकते थे। मैं रोज ही इन चीजों को बहुत करीब से देखता हूँ और उनका दर्द भी समझता हूँ। ये पिटने के काबिल हैं या नहीं ये तो समाज बता सकता है, और इस पर सार्थक बहस हो सकती है।

 
प्रवीण शाह जी लिखते हैं -

ऊपर जो कुछ उद्धरित किया है आपके आलेख से, अत्यंत आपत्तिजनक और निंदनीय है। आप पूरे मराठी समाज का ऐसा जनरलाइजेशन कैसे कर सकते है वह भी उस मराठी ट्रक ड्राईवर के बहाने। एक और बात आपके संज्ञान मेंलाना चाहूंगा कि ड्राईवर पुरे हिन्दुस्तान यहां तक कि फौज के भी एक मामले में एकमत हैं कि हम सामान उतारने चढ़ाने में हाथ नहीं बंटायेंगे।

मैंने केवल मराठी ट्रक ड्राईवर के बहाने मराठियों का जनरलाईजेशन नहीं किया है आपसे विनती है कि आप एक बार फ़िर पोस्ट को पढ़ लें, मैंने लिखा है उनके लिये जो ये कर रहे हैं और जो इस चीज का समर्थन कर रहे हैं और जो मूक रहकर भी इनका समर्थन कर रहे हैं।

 
Dr. Mahesh Sinha जी ने लिखा है -

कुछ गिने चुने स्वार्थी तत्वों के कारण सबको गाली देना कितना उचित है . यह देश की विडंबना है कि अपने प्रदेश में काम नहीं करना चाहते लेकिन बाहर जाकर सब करने को तैयार हैं. अपने क्षेत्र में लोगों को सिर्फ बरगलाना ही धंदा है।

महेश जी मैंने उन स्वार्थी तत्वों की ही भर्त्सना की है और उनके समर्थकों की, मैंने सभी मराठियों को बुरा नहीं कहा है।

 
रंजन जी ने लिखा है -

कुछ दिन बाद जब आप फिर से ये पोस्ट पढेगे तो लगेगा कि शायद आप गलत है... अच्छे बुरे हर प्रदेश/समाज/देश/जाती में होते है.. आप सामान्यकरण नहीं कर सकते…

रंजन जी मैंने कहीं भी सामान्यकरण नहीं किया है और अगर आप उससे जोड़कर देख रहे हैं तो कृप्या पोस्ट का मेरा आख्रिरी वाक्य भी पढ़ लीजिये।

कार्यालय में प्रवेश करने से पहले प्रार्थना (Prayer before Entering Office…)

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Sunday, November 22, 2009

हमने अपना फ़्लैट शिफ़्ट किया और मुंबई में लोगों को बहुत करीब से देखा देखिये और बताईये कि आपका नजरिया क्या है…. उत्तर भारतीय और मराठी मानुष ….

   हमने अभी अपना फ़्लैट अपने बेटे के स्कूल के पास ले लिया है और घर बदलना मतलब बहुत माथाफ़ोड़ी का काम ।

   अब अपन तो कितनी भी दूरी तय कर लो ऑफ़िस के लिये पर बच्चे को ज्यादा दूर नहीं होना चाहिये इसलिये हमने आखिरकार अपना फ़्लैट बदल लिया और स्कूल के नजदीक ही फ़्लैट ले लिया। अब मेरे बेटे को स्कूल जाने में केवल पाँच मिनिट लगते हैं, और आने में भी, हम निश्चिंत हैं।

   जब अपना फ़्लैट शिफ़्ट किया तो तरह तरह के लोगों से सामना हुआ, सबसे पहले अपने फ़्लैट के ब्रोकर का (इस पर अलग से पोस्ट लिखेंगे) जो कि पंजाबी निकले और बहुत ही प्रेमी लोग हैं, एक अंकल और एक आंटी हैं पर स्वभाव से बहुत ही अच्छे। फ़िर हमारे फ़्लैट के मालिक वो निकले इलाहाबाद के मतलब हमारे ससुराल के। फ़िर हमारे एक आल इन वन मैन हैं जो कि सब काम कर देते हैं प्लंबिंग, कारपेन्टर, इलेक्ट्रीशियन और भी बहुत कुछ वो भी उत्तरप्रदेश से। (ऐसे आदमी को ढूँढ़ना मुंबई में बहुत मुश्किल है।) फ़िर हमारे अलमारी को खोलने और लगाने वाला @होम से जो शख्स आया वो भी इलाहाबाद से। जो मजदूर था हमारा समान को जिसने शिफ़्ट किया और हमने उसके साथ बराबार हाथ बंटाया वो भी इलाहाबाद से। ट्रक ड्रायवर मुंबई का ही था खालिस मराठी।

    अब हमने सबकी तुलना की उनके व्यक्त्तिव की तो हमने पाया जो मुंबई के बाहर के हैं उनमें काम करने की आग है और काम को अपने जिम्मेदारी से करते हैं और जो मुंबई के हैं वे काम को अहसान बताकर कर रहे हैं।

   बाहर का आदमी यहाँ पैसा कमाने आया है मजबूरी में आया है पर इनकी कोई मजबूरी नहीं है, इनकी मजबूरी है कि इन्हें केवल बिना काम के दारु मिलना चाहिये और अगर कोई उस काम को करे तो उसका विरोध करें। सीधी सी बात है न काम करेंगे न करने देंगे। भाव ऐसे खायेंगे कि पैसे लेकर काम करने पर भी अहसान कर रहे हैं, और कोई थोड़ा सा कुछ बोल दो तो बस इनकी त्यौरियाँ चढ़ जायेंगी।

    अरे दम है तो रोको प्राईवेट बैंको को, व्यावसायिक संस्थाओं को, सॉफ़्टवेयर कंपनियों को जिनमें बाहर के लोग याने कि अधिकतर उत्तर भारतीय या दक्षिण भारतीय लोग चला रहे हैं, वहाँ मराठियों का प्रतिशत देखो  तो इनको अपनी औकात पता चल जायेगी। ये वहाँ टिक नहीं पायेंगे क्योंकि इन लोगों को काम नहीं करना है केवल हरामखोरी करना है सरकारी कार्यालयों में।

    मैं इस विवादास्पद मुद्दे पर लिखने से बच रहा था पर क्या करुँ जो कसैलापन मन में भर गया है उसे दूर करना बहुत मुश्किल है। अगर ये लोग उत्तर भारत के लोगों को मार रहे हैं तो उत्तर भारत के लोगों को मराठी लोगों को मारना चाहिये जो वहाँ रह रहे हैं और उनको महाराष्ट्र भेज देना चाहिये। ऐसा लगता है कि राजनीति में ये लोग देश को भूल गये हैं और पाकिस्तान और हिन्दुस्तान की लड़ाई बना रहे हैं।

   थू है मेरी ऐसे लोगों पर जो ये सब कर रहे हैं और जो इनको समर्थन कर रहे हैं। मैं अपना विरोध दर्ज करवाता हूँ।

अगर आप भारतीय रेल में यात्रा करते हुए चाय पान कर रहे हैं तो सावधान… (IRCTC’s Worst…..)

अगर आप भारतीय रेल में यात्रा करते हुए चाय पान कर रहे हैं तो सावधान…

भारतीय रेल (आईआरसीटीसी द्वारा प्रदत्त चाय) में चाय पीने के पहले सोचिये फ़िर पीने की हिम्मत कीजिये।

१. केटर्स चाय बनाने के लिये शौचालय के नल का पानी उपयोग में लेते हैं।

२. चाय शौचालय के पास की जगह पर बनायी जाती है।

३. Bath हीटर को दूध गरम करने के लिये उपयोग में लाया जाता है, चाय बनाने के लिये।

ये चित्र हमारे एक मित्र के मित्र द्वारा जनशताब्दी एक्सप्रेस में यात्रा करते समय लिये गये हैं, देखिये…

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Saturday, November 21, 2009

मैं तो मर ही जाता अगर मुझे हनुमान चालीसा न याद होती…!!

पत्नी – शादी की रात तुमने जब मेरा घूँघट उठाया तो कैसी लगी थी…

पति – मैं तो मर ही जाता अगर मुझे हनुमान चालीसा न याद होती…!!

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क्यों प्रेमविवाह ज्यादा अच्छा है ????

क्योंकि “जाना हुए शैतान” अच्छा है एक “अज्ञात भूत” से।

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पत्नी – मैं तुम्हारी याद में बीस दिन में ही आधी हो गयी हूँ,

मुझे लेने कब आ रहे हो ?

पति – बीस दिन और रुक जाओ..

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पति होटल मैनेजर से - “जल्दी चलो ! मेरी बीबी  खिड़की से कूदकर जान देना चाहती है”

मैनेजर - “तो मैं क्या करुँ ?”

पति - “कमीने, खिड़की नहीं खुल रही है”

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हरेक आदमी “स्वतंत्रता सेनानी” होता है…. शादी के बाद !!

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वो कहते हैं कि तुम्हारी बीबी स्वर्ग की अप्सरा है,

हमने कहा खुशनसीब हो भाई, हमारी तो अभी जिंदा है….

Friday, November 20, 2009

सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – ३० [कर्ण का धनुर्विद्या का गुप्त अभ्यास…]

      उस दिन सन्ध्या समय मैं नगर में गया। मरे हुए पक्षियों में भूस भरकर बेचनेवाले एक व्यक्ति से भुस भरा हुआ एक पक्षी लिया और लौट आया। रात को चारों ओर स्तब्धता होते ही मैंने शोण को जगाया। हम दोनों अपने कक्ष से बाहर निकले। मेरे हाथ में वह पक्षी था। सम्पूर्ण युद्धशाला शान्त थी। दिन-भर शस्त्रों की झनकार से कम्पित रहनेवाला वह स्थान इस समय निस्तब्ध था। स्थान-स्थान पर इंगुदी के पलीते जलते हुए उस भव्य क्रीड़ांगण को धैर्य बँधा रहे थे। उनमें से एक पलीता मैंने हाथ में ले लिया और बीच के धनुर्वेद के पत्थर के चबूतरे पर चढ़ गया। सामने ही वह विशाल अशोक वृक्ष था। उसकी ओर अँगुलि से संकेत कर अपने हाथ में लगा पक्षी शोण के हाथ में देता हुआ मैं बोला, “इस पक्षी को उस वृक्ष पर किसी ऊँचे स्थान पर बाँध दो और तुम पलीता लेकर वहीं रुके रहो।“

   “किसलिए ?” उसने आश्चर्य से पूछा।

“वह बाद में बताऊँगा। जल्दी जाओ।“

      मेरे हाथ से पलीता और पक्षी लेकर वह वृक्ष की ओर गया। सरसर गिलहरी की तरह सरकता हुआ वह क्षण-भर में ही ऊपर चढ़ गया। थोड़ी देर बाद वह बोला, “भैया, यहाँ एक शाखा से एक धागा बँधा हुआ दिखाई देता है। यहीं बाँध दूँ क्या ?”

“जितना सम्भव हो सके उतना ऊँचा जाओ अभी।“ मैं नीचे से चिल्लाया।

      वह वहाँ से और ऊँचा गया। इससे अधिक ऊँचाई पर वह अब जा ही नहीं सकता था। उसने हाथ में पकड़ा पक्षी एक डाल से बाँध दिया। वह एक अन्य शाखा पर बैठ गया। मैंने चिल्लाकर उससे कहा, “उस पलीते को इस तरह पकड़ो कि वह पक्षी मुझको दिखाई दे। तनिक भी हिलो-डुलो मत।“ उसने पलीता अच्छी तरह पकड़ लिया। मैंने धनुष उठाया और वीरासन लगाया। उस चबूतरे पर खड़े होकर ही मैंने सूर्यदेव को शिष्यत्व स्वीकार किया था। मेरा मन मुझसे कह रहा था, “याद रख, युवराज अर्जुन ने लक्ष्य की दिखाई देनेवाली एक आँख फ़ोड़ी थी। तुझको दोनों आँखें फ़ोड़नी हैं। दिखाई देनेवाली और दिखाई न देनेवाली। कैसे ? पहला बाण लगते ही वह पक्षी घूमेगा। उसका दूसरी ओर का हिस्सा सामने आ जायेगा। इतने में ही दूसरा बाण उसकी दूसरी आँख में घुसना चाहिए। ये दोनों बाण एक ही समय छोड़ने हैं और वे भी पलीते के धूमिल प्रकाश में।“

    मैंने वृक्ष की ओर देखा। पलीते की फ़ड़फ़ड़ाती हुई ज्योति से हवा का अनुमान किया। समीप रखे तरकश में से दो सूची बाण झट से खींचकर हाथ में लिये। धनुष को सन्तुलित किया और वे दोनों बाण उस पर चढ़ा दिये। प्रत्यंचा खींची। अब मैं….मैं नहीं रहा था। मेरा शरीर, मन, दृष्टि, श्वास, बाणों की दोनों नोक और पक्षी की दोनों आँखें – सब एक हो गये। खींची हुई प्रत्यंचा पर दोनों ऊँगलियाँ स्थिर हो गयीं। दोनों अँगुलियों पर दो भिन्न-भिन्न प्रभाव थे। उनमें से एक बाण थोड़ा-सा आगे जाना चाहिए था और दूसरा तुरन्त ही उसके पीछे। क्षण-भर स्थिरता रही और फ़िर दोनों बाण सूँऽऽऽऽ करते हुए एक के बाद एक धनुष से छूटे । पहला आघाता लगा और वह पक्षी एकदम घूमा। इतने में ही दूसरे बाण का एक और आघात उसको लगा और गड़बड़ी में शोण द्वारा जैसे-तैसे बाँधा गया वह पक्षी धागा टूट जाने के कारण धड़ाम से नीचे गिर पड़ा। हाथ में लगा धनुष फ़ेंककर, चबूतरे की चार-चार सीढ़ियाँ एकदम उतरकर मैं दौड़ता हुआ उस वृक्ष के नीचे गया। पक्षी हाथ में लेकर एक ओर लगे पलीते के पास ले जाकर मैंने देखा। उसकी दोनों आँखों की पुतलियों में दो बाण घुसे हुए थे। सफ़लता के आनन्द से मेरी आँखें चमकने लगीं। शोण वृक्ष से उतरकर नीचे आया। दूर कहीं रात में पहरा देनेवाले पहरेदार ने मध्यरात्रि की घटकाओं के टोले लौहपट्टिका पर मारे।

हम लौटकर कक्ष में सोने चले गये।

     उस दिन से लक्ष्य-भेद के कठिन-कठिन प्रकारों को हम दोनों गुप्तरुप से रात में करने लगे, जब अखाड़े में कोई नहीं होता था। क्योंकि नीरव निस्तब्ध रात में मन को बड़ी अच्छी तरह एकाग्र किया जा सकता था, कोई व्याघात नहीं डाल सकता था।

    इसी प्रकार अभ्यास करते हुए एक के बाद एक अनेक वर्ष कैसे बीत गये, इसका न मुझको पता चला, न शोण को। मल्लविद्या के हाथ सीखने के कारण मेरा शरीर सुदृढ़ हो गया। भुजदण्ड के स्नायुओं पर जोर से मुष्टि-प्रहार करता हुआ अश्वत्थामा मुझसे कहता, “कर्ण, यह मांस है या लोहा ?”

थोड़ी देर के लिये टेन्शन भगायें… [Tension Relievers.....] हँसे और हँसायें….

अपनी बीबी को अपनी १००% कमाई देने से १०% सुख मिलता है।

किसी दूसरी को अपनी कमाई का १०% देने पे १००% सुख मिलता है।

पैसा आपका … फ़ैसला आपका…

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अजीब बात है लेकिन सच है ये तथ्य..

औरत अपने भविष्य के लिये केवल तब तक ही सोचती है जब तक उसे पति नहीं मिल जाता,

आदमी अपने भविष्य के लिये कभी नहीं सोचता जब तक कि उसे पत्नी नहीं मिल जाती !!

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शादी के पहले – स्पाईडरमैन

शादी के बाद – जैन्टलमेन

५ साल बाद – वॉचमेन

१० साल बाद – अपने ही जाल में फ़ँस हुआ स्पाईडरमैन

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जिंदगी में हमेशा हँसते रहो, मुसकराते रहो, गाते रहो, गुनगुनाते रहो…

ताकि तुम्हें देख कर ही लोग समझ जायें कि …….

तुम … “कुँवारे” हो….

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पत्नी – अगर मैं खो गयी तो तुम क्या करोगे ?

पति – मैं टीवी और अखबार में विज्ञापन दूँगा कि जहाँ कहीं भी हो… खुश रहो

Thursday, November 19, 2009

सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – २९ [गुरु द्रोण की परीक्षा और पक्षी की आँख..]

    बीच में एक बार मैं माता से मिलने के लिए चम्पानगरी गया था। आठ दिन बाद जब लौटा तब अश्वत्थामा से पता चला कि गुरु द्रोण ने अपने सभी शिष्यों की परीक्षा ली थी। उन्होंने एक अशोक वृक्ष की ऊँची डाल पर एक मरा हुआ पक्षी, जिसमें भूसा भरा हुआ था, टँगवा दिया था। उस पक्षी की बायीं आँख को ही अचूक भेदनेवाले को उनका प्रशंसात्मक साधुवाद मिलना था। उन्होंने सभी शिष्यों को एकत्र किया और एक-एक करके प्रत्येक को उस पत्थर के चबूतरे पर बुलाकर, उसके हाथ में धनुष देकर उससे निशाना लगाने को कहा। प्रत्येक व्यक्ति आता, धनुष उठाता, प्रत्यंचा चढ़ाता, इतने में ही गुरुवर्य उससे पूछते, “बाण छोड़ने से पहले तुझको क्या-क्या दिखाई दे रहा है ?”

     अनेक जनों ने अनेक प्रकार के उत्तर दिये। उस मूर्ख भीम ने तो यह कहा कि, “मुझे परली ओर के हरे पहाड़ दिखाई पड़ रहे हैं।“ कोई कहता कि बादल दिखाई पड़ रहे हैं, कोई कहता कि पेड़ के हरे पत्ते दिखाई दे रहे हैं, कोई कहता कि वह पक्षी दिखाई दे रहा है।

    इससे गुरुदेव को सन्तोष नहीं होता । वे उस व्यक्ति को धनुष नीचे रखकर वापस जाने को कहते। सबके अन्त में अर्जुन आया। गुरुवर्य ने उससे पूछा, “अर्जुन, तुझे क्या-क्या दिखाई दे रहा है ?”

अर्जुन बोला, “मुझे केवल उस पक्षी की आँख ही दिखाई दे रही है।“

     गुरुवर्य प्रसन्न हो गये। उन्होंने पीठ पर थाप मारी और कहा, “बहुत अच्छे ! तो कर उस आँख का भेदन !” उसने तत्क्षण बाण छोड़कर उस आँख को भेद दिया। गुरुवर्य ने फ़िर उसकी पीठ पर थाप मारी।

    यह समस्त घटना मुझको अश्वत्थामा ने, अपनी बड़ी-बड़ी आँखों को बीच-बीच में और बड़ी करते हुए, बतायी। अन्त में उसने मुझसे सहसा ही पूछा, “ कर्ण, यदि तू उस समय उपस्थित होता, तो तू पिताजी को क्या उत्तर देता ?”

    मैं थोड़ी देर चुप रहा। मन ही मन मैंने स्वयं को उस पत्थर के चबूतरे पर समझकर वीरासन लगाया और आँखों के सामने उस पक्षी की आँख पर दृष्टि स्थिर कर दी तथा उससे कहा, “अश्वत्थामा ! यदि मैं होता तो मैंने कहा होता, “मुझको कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा है। क्योंकि लक्ष्य सामने होने पर कर्ण फ़िर कर्ण रहता ही नहीं है। उसका सम्पूर्ण शरीर बाण बन जाता है। केवल बाण ही नहीं, बल्कि बाण की नोक और लक्ष्य-भेद का बिन्दु । मैंने कहा होता, मेरे नुकीले शरीर को एक तिल की जितनी जगह सामने दिखाई दे रही है।“

    मेरे इस उत्तर से आनन्दित होकर अश्वत्थामा ने मुझको अंक में भर लिया । वह बोला, “कर्ण, तू सबमें श्रेष्ठ धनुर्धर होगा।“ उसके बन्धन से अपने को छुड़ाता हुआ मैं मन ही मन निश्चय कर रहा था कि जिस युवराज अर्जुन की, उस पक्षी की आँख का भेद करने के कारण, गुरुवर्य ने इतनी प्रशंसा की थी; वही लक्ष्यभेद आज मैं करुँगा। यह करने पर गुरु द्रोण फ़िर कभी न कभी मुझको भी अपने निकट कर लेंगे। मेरी भी पीठ थपथपायेंगे।

Sunday, November 15, 2009

सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – २८ [अश्वत्थामा से मेरी निकटता और कुछ असंयमित बातें पाण्डवो से ….]

     राजप्रसाद से युद्धशाला बहुत दूर थी, इसलिए हम कुछ दिन बाद युद्धशाला में ही रहने लगे। अब राजप्रासाद से हमारा सम्बन्ध टूट गया था। वर्ष में एक बार शारदोत्सव के लिए हम राजभवन जाया करते। वह भी युवराज दुर्योधन के आग्रह के कारण। उसने और अमात्य वृषवर्मा ने हमारी अत्यधिक सहायता की थी। उसके निन्यानबे भाई थे, लेकिन अकेले दुर्योधन को छोड़कर और किसी ने कभी मेरा हालचाल नहीं पूछा था। मुझको भी औरों के प्रति कोई आकर्षण नहीं था। उन सबके नाम कितने विचित्र थे! दुर्मर्ष, दुर्मुख, अन्त्यनार । यों तो मुझको एक और व्यक्ति भी अच्छा लगा था । वह था अश्वत्थामा। गुरु द्रोण का पुत्र । कितना सरल और ऋजु स्वभाव था उसका ! इतनी छोटी-सी अवस्था में ही धर्म, आत्मा, पराक्रम, प्रेम आदि विषयों पर वह कितने अधिकार से बोलता था ! अपन असमस्त अतिरिक्त समय मैं उसके साथ चर्चा करने में बिताता था। उसको मेरा केवल कर्ण नाम ही विदित था। मैं कौन हूँ, कहाँ का हूँ, यहाँ किस लिए आया हूँ, इस सम्बन्ध में उसने मुझसे कभी पूछ्ताछ नहीं की थी। इसीलिए वह मुझको सबसे अधिक अच्छा लगा था।

     एक दिन मैंने सहज ही उससे पूछा, “तुम्हारा नाम अश्वत्थामा तनिक विचित्र-सा है, तुमको नहीं लगता ?”

    छोटे बालक की तरह खिलखिलाकर हँसता हुआ वह बोला, “तुम ठीक कह रहे हो। यह नाम मुझे भी खटकता है। लेकिन जब मैं अपने नाम के सम्बन्ध में लोगों से पूछता हूँ, तब वे क्या कहते हैं, जानते हो ?”

   “और क्या कहेंगे ? तुम घोड़े की तरह रोबीले दिखाई पड़ते हो, ऐसा ही कुछ कहते होंगे ।“

    “नहीं। ये लोग कहते हैं कि जन्म लेते ही मैं घोड़े की तरह हिनहिनाया था। और इसीलिए मेरा नाम अश्वत्थामा रखा गया है। लेकिन मुझे नहीं जँचती यह बात। कोई छोटा शिशु घोड़े की तरह हिनहिनाये – यह कभी सम्भव है क्या ? परन्तु सच बात तो यह है कि मुझको अपना नाम अच्छा लगता है। क्योंकि मेरे पिताजी मुझको ’अशू’ कहते हैं। लेकिन जब मैं अकेला होता हूँ तभी कहते हैं। सबके सामने तो वे मुझको अश्वत्थामा ही कहते हैं।“

    उसकी संगति में मेरे दिन बड़े मजे में बीत रहे थे। वह मेरे कानों के कुण्डलों को छूकर कहता, “कर्ण, तुम्हारे ये कुण्डल दिन-ब-दिन और अधिक सुनहले रंग के होते जा रहे हैं। नगर के किस सुवर्णकार के पास जाकर इनपर यह सुनहला वर्क चढ़वाते हो ?”

    “मेरे इन कुण्डलों को रँगनेवाला सुवर्णकार कौन है, यह मुझे भी भला कहाँ मालूम है ! नहीं तो मैं उससे अवश्य कहता कि मेरे मित्र अश्वत्थामा को भी सुनहले कुण्डलों की एक जोड़ी दे दो। बड़ा अच्छा है यह ।“

    वह हँसकर कहता, “नहीं भाई, अपने कुण्डलों को तुम अपने ही पास रखो। कानों में सुनहले कुण्डल देखकर कोई चोर मुझ-जैसे पर्णकुटी में सोने वाले ऋषिकुमार का कान ही काटकर ले जायेगा। फ़िर तो न कुण्डल रहेंगे न कान।“ हम दोनों खिलखिलाकर हँस पड़ते और अपने-आपको भूल जाते। मैं सदैव मन में सोचा करता कि गुरु द्रोण का यह पुत्र कितना निष्पाप और निराग है। परन्तु उसके पिता कितने गम्भीर और शान्त हैं। उनके मन की थाह ही नहीं मिलती है। या कि उत्तरदायित्व मनुष्य को प्रौढ़ बना देता है ? य कि कुल लोग जन्म से ही प्रौढ़ होते हैं ? वह युधिष्ठिर नहीं है क्या – सदैव गम्भीर। क्या मजाल जो कभी भूलकर भी हँसे ? परन्तु इस शाला के सभी शिष्य उसका कितना सम्मान करते हैं ! और उसका भाई अर्जुन तो जैसे सबका प्राण ही है। जहाँ देखो वहाँ अर्जुन। इस अश्वत्थामा पर भी उतना प्रेम नहीं होगा जितना कि गुरु द्रोण उस अर्जुन पर करते हैं। अर्जुन को वे इतना क्यों मानते हैं ? वैसे देखा जाये तो अश्वत्थामा के बराबर श्रेष्ठ युवक युद्धशाला में कोई और नहीं था। लेकिन उस अर्जुन के अतिरिक्त यहाँ और किसी का सम्मान नहीं था। किसी व्यक्ति का इतना महत्व बढ़ा देना कहाँ तक उचित है ! इससे वह व्यक्ति क्या उन्मत्त नहीं हो जायेगा ? वह कौन-सी कसौटी है, जिसपर खरा उतरने के कारण अर्जुन को गुरुदेव ने अपने इतने समीप कर लिया है ? अनेक बार मेरे मन में यह इच्छा हुई थी कि अश्वत्थामा से यह प्रश्न पूछूँ, लेकिन बड़े संयम से मैंने वह बात टाल दी थी। कहीं इसमें वह अपने पिता का अपमान न समझ ले। इसलिए वह प्रश्न मैं इससे कभी नहीं पूछ सकता था।

Saturday, November 14, 2009

एक मोटर साईकिल जो सालों पहले खड़ी की थी अब उसकी हालत देखिये….

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आगे ४-५ दिन ब्लॉगिंग में अनियमित हो सकते हैं…

हम अपना फ़्लेट आज शिफ़्ट कर रहे हैं, और इंटरनेट कनेक्शन आने में ४-५ दिन लग सकते हैं, क्योंकि उसमॆं एग्रीमेंट के कागज चाहिये जो कि ३-४ दिन बाद आयेंगे।

मृत्युंजय के अंश भी अनियमित होंगे पर जैसे ही हमारे पास इंटरनेट कनेक्शन आ जाता है वैसे ही हम नियमित हो जायेंगे।

सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – २७ [राजमाता कुन्तीदेवी का पाँच घोड़ों का रथा….]

    एक दिन मैं और शोण यों ही नगर घूमने गये थे। सदैव की भाँति घूमघामकर हम लौटने लगे। राजप्रासाद के समीप हम आ चुके थे। इतने में ही सामने से आता हुआ एक राजरथ हमको दिखाई दिया। उस रथ के चारों और झिलमिलाते हुए वस्त्रों के परदे लगे हुए थे। रथ के घोड़े श्वेत-शुभ्र थे। मुझको उनका रंग बहुत ही अच्छा लगा।

    इतने में ही शोण अकस्मात मेरे हाथ में से अपना हाथ छुड़ाकर उस रथ की ओर ही दौड़ने लगा। मैं समझ ही नहीं पा रहा था कि वह पागलों की तरह रथ की ओर क्यों दौड़ रहा था ? और वह रथ के सामने कूद पड़ा और बड़ी फ़ुर्ती से कोई काली सी चीज उठायी। शोण को देखकर सारथी ने अत्यन्त कुशलता से सभी घोड़ों को रोका। मैं हांफ़ता हुआ उसके पास गया मुझे देखते ही बोला “भैया यह देखो । यह अभी रथ के नीचे आ जाता !” मैंने देखा वह एक बिल्ली का बच्चा था। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि शोण से अब कहूँ तो क्या कहूँ ? उस पर क्रोध भी नहीं किया जा सकता था। मैं कुछ आश्चर्य से उसकी ओर देखने लगा। यह क्या वही शोण है जो हमारे रथ के पीछे रोता हुआ दौड़ता आया था ?

    इतने में ही उस राजरथ के रथनीड़ पर बैठे हुए सारथी ने कहा, “जल्दी कीजिए, झटपट अलग हटिए । रथ में राजमाता कुन्तीदेवी हैं !”

“राजमाता कुन्तीदेवी !”

   मैंने शोण की बाँह पकड़कर उसको झट से एक ओर खींच लिया। मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ । उस रथ में छह घोड़े जोड़ने की भली-भाँति व्यवस्था होने पर भी केवल पाँच ही घोड़े जोड़े गये थे। एक घोड़े का स्थान यों ही रिक्त छोड़ दिया गया था।

   “राजप्रासाद में घोड़े नहीं रहे हैं क्या ?” मैंने मन ही मन कहा।

Friday, November 13, 2009

बस उसने मुझसे लड़ाई शुरु कर दी …. अरे मेरी बीबी ने…

जब मैं कल रात घर पर पहुँचा तो मेरी पत्नी ने मुझसे मांग की कि मैं उसे किसी महंगी जगह पर ले जाऊँ…

तो मैं उसे पेट्रोल पंप ले गया..

बस उसने मुझसे लड़ाई शुरु कर दी……

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मैंने मेरी पत्नी को कहा “ तुम हमारी शादी की सालगिरह पर कहाँ जाना चाहती हो ?”

उसका भावुक चेहरा देखकर मेरा दिल पिघल गया ।

“कहीं ऐसी जगह जहाँ मैं बहुत लम्बे समय से नहीं गयीं हूँ !” पत्नी ने कहा

तो मैंने बोला “फ़िर रसोईघर कैसा रहेगा ?”

बस उसने मुझसे लड़ाई शुरु कर दी…

सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – २६ [संजय द्वारा कर्ण को सारथ्य के गुण सिखाना और घोड़ों की जानकारी….]

     महाराज के रथ का सारथ्य बाबा ने अनेक वर्षों तक बड़े उत्तम ढंग से किया था। परन्तु आजकल वृद्धावस्था के कारण उनमें पहले-जैसी स्फ़ूर्ति नहीं रही थी। उनकी सहायता के लिये महाराज ने गवल्गण नामक सारथी के एक निपुण पुत्र को भी अपनी निजी सेवा के लिये नियुक्त कर रखा था। कभी-कभी महाराज उनको पुकारते थे, उसको सुनकर हम भी यह जान गये थे कि उनका नाम संजय है।

    रथाशाला में वे और पिताजी उत्तम जाति के घोड़े, रथ का सबसे अधिक उपयोगी आँगने का तेल चक्र के लिए कौन-सी लकड़ी टिकाऊ रहती है, रथचक्रों के आरों की संख्या कम होनी चाहिए या अधिक, उनका गति पर क्या परिणाम होता है – आदि-आदि अनेक मनोरंजक विषयों पर चर्चा किया करते थे। मुझसे तो वे सदैव कहते, “कर्ण, तू सूतपुत्र है । तू सदैव यह ध्यान रखना कि उत्तम जाति का घोड़ा कभी धरती पर नहीं बैठता है रात में नींद के लिए भी । और कुलीन सारथी कभी रथनीड़ नहीं छोड़ता है प्राण जाने पर भी। एक बार जिस जगह पर बैठ गये, वहाँ से फ़िर हटना नहीं !”

    “क्या कहते हैं काका ! घोड़ा कभी धरती पर नहीं बैठता है ?” मैं आश्चर्य से पूछता।

   “हाँ । इतना ही नहीं, बल्कि खड़े-खड़े नींद लेनेवाला घोड़ा जब चार खुरों में से एक खुर उठाकर नींद लेने का प्रयत्न करे, तब यह समझ लेना चाहिए कि दीर्घ यात्रा के लिए वह निकम्मा हो चुका है? ध्यान रखो, घोड़ा सब प्राणियों में उत्तम प्राणी है ।“

   “उत्तम !” मैं यों ही पूछता, क्योंकि मेरी इच्छा होती थी कि वे निरन्तर बोलते ही रहें। भारद्वाज पक्षी-जैसी उनकी वाणी भी ऐसी मधुर थी, उनको सतत सुनते रहने की इच्छा होती।

    “केवल उत्तम ही नहीं, प्रयुत बुद्धिमान भी । कर्ण, घोड़े पर बैठकर कभी घने जंगल में जाना पड़े और फ़िर बाहर आने के लिए मार्ग न मिले तो निश्चिन्त होकर हाथ से वल्गा छोड़ दो। यह बुद्धिमान प्राणी तुझको ठीक उसी स्थान पर वापस ले आयेगा, जहाँ से तू चला होगा।“ घोड़ों की प्रकृति की ऐसी बहुत-सी बातें काका बातें करते समय बता जाते।

    उनके मुख से घोड़ों की विविध प्रकृतियाँ, व्याधियाँ और चालें – इस सब बातों का वर्णन सुनते हुए हमारा समय आनन्द से व्यतीत होने लगा। सारथियों के कर्तव्य-कर्म, धार्मिक विधियाँ, सभागृह के नियम आदि की भी वे हमको सूक्ष्म जानकारी देने लगे।

संजय काका सारथ्य-कर्म की निपुणता की बारीकियाँ बताया करते थे।

Thursday, November 12, 2009

और ऐसे लड़ाई शुरू की जा सकती है ..... लड़ाई शुरु करने के नये गणित……

मेरी पत्नी ने शयनकक्ष में घुसते ही पूछा “टीवी पर क्या है ?”

मैंने जबाब दिया  “धूल…”

और ऐसे लड़ाई शुरू की जा सकती है .....

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एक साल, एक पति ने अपनी सास के लिये  क्रिसमस के उपहार के रूप में एक कब्रिस्तान में भूखंड खरीद कर दिया।
अगले साल, वह उसने कोई उपहार नहीं खरीदा ।
जब सास ने   उससे पूछा कि क्यों तुमने मुझे कोई उपहार नहीं दिया, उस ने कहा, "क्योंकि तुमने अभी तक मेरे पिछले दिये गये उपहार का उपयोग नहीं किया है !"
और ऐसे लड़ाई शुरू की जा सकती है .....

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मेरी पत्नी ने शादी की सालगिरह पर उपहार के लिये इशारा किया कि उसे क्या चाहिये “मैं ऐसी चीज चाहती हूँ, जो कि चमकदार हो और मात्र ३ सेकंड में ० से २०० हो जाती हो…”

मैंने उसे एक स्केल खरीद कर दे दिया।

और ऐसे लड़ाई शुरू की जा सकती है .....

सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – २५ [युद्धशाला में कर्ण के अस्त्र और बाणों के प्रकार….]

     मेरा युद्धशाला का कार्यक्रम निश्चित हो गया था। एक महीने की भीतर ही मैंने शूल, तोमर, परिघ, प्रास, शतघ्नी, खड्ग, पट्टिश, भुशुण्डि, गदा, चक्र आदि अनेक शस्त्रों का परिचय प्राप्त कर लिया । धनुष की ओर मेरी विशेष रुचि होने के कारण धनुर्विद्या से सम्बन्धित सभी शस्त्रों का मैंने ध्यानपूर्वक अभ्यास किया। केवल बाण ही अनेक प्रकार के थे।

     कर्णी बाण में दो शूलाग्र होते थे। वह जब पेट में घुस जाता था, तब बाहर निकलते समय आँतें भी बाहर निकल आती थीं। नालीक बाण का फ़लक मोटा होता था तथा उसमें टेढ़े दाँते होते थे, इसलिए शरीर में घुसने पर जब वह बाण बाहर निकाला जाता था तब अपने आस-पास की शिराओं को तोड़कर ही वह बाहर निकलता था। लिप्त बाण के अग्रभाग में विषैली वनस्पति का रस लगा होने के कारण वह बड़ा दाहक होता था। बस्तिक बण शरीर में घुस जाता था। लेकिन बाहर खींचने पर उसका केवल द्ण्ड ही हाथ में आता था और समस्त फ़लक ज्यों का त्यों लक्ष्य के शरीर में रह जाता था। सूची बाण का अग्रभाग सूच्याकार और नुकीला होने के कारण अत्यन्त सूक्ष्म लक्ष्य भी उससे अचूक भेदा जा सकता था। विशेष रुप से आँख की पुतलि को इस बाण से अचूक भेदा जा सकता था। जिह्मा बाण जाता तो टेढ़ा-मेढ़ा था, लेकिन लक्ष्य में बिलकुल ठीक घुसता था। इसके अतिरिक्त गवास्थी अर्थात बैल के हाड़ का, गजास्थी अर्थात हाथी के हाड़ का, कपिश अर्थात काले रंग का, पूती अर्थात उग्र गन्धवाला, कंकमुख, सुवर्णपंख, नाराच, अश्वास्थी, आंजलिक, सन्न्तपर्व, सर्पमुखी आदि बाणों के अनेक प्रकार थे। इन सब बाणों को लक्ष्य पर छोड़ने की शिक्षा मैं मनोयोग से ग्रहण करने वाला था।

     अपनी शिष्यावस्था का एक-एक क्षण मुझको इसी कार्य में लगाना था। पहले तीन वस्तुओं पर मेरा प्रेम था। गंगामाता, सूर्यदेव और माता ने – राधामाता ने --- अत्यन्त प्रेम से जो दी थी वह चाँदी की पेटिका; परन्तु युद्धशाला में आने के बाद उसमें एक वस्तु और सम्मिलित हो गयी। वह वस्तु थी धनुष और बाण!

Wednesday, November 11, 2009

गोले का ठेला गूगल की स्टाईल में… पूना में….

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सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – २४ [गुरु द्रोण का अर्जुन पर कर्ण के मन की कशमकश]

       पहले पन्द्रह दिन तक मैं युद्धशाला के शास्त्रों का केवल परिचय प्राप्त करता रहा। क्योंकि मैं कुछ सीखने की स्थिति में ही नहीं था। गुरुवर्य द्रोण के विचित्र व्यवहार के कारण मेरा मन कहीं रम नहीं रहा था। कभी मन में आता कि युवराजों के इस कबाड़खाने में केवल सूतपुत्र के रुप में अपेक्षित होने से तो अच्छा है कि एकदम चम्पानगरी का मार्ग पकड़ लिया जाये। युद्ध-विद्या की शिक्षा लेकर आखिर मुझे क्या करना है ? अब कौन सा महायुद्ध होने वाला है ? और हो भी तो उसमें मेरा उपयोग ही क्या है ? केवल एक सारथी के रुप में न ? तो फ़िर सारथी को इस युद्ध-विद्या की शिक्षा की क्या आवश्यकता है ? उसको तो घोड़ों की परीक्षा करनी चाहिए और उसकी उच्छश्रंखल प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाना सीखना चाहिए। क्या यह काम में चम्पानगरी में रहकर नहीं कर सकता ? दूसरे ही क्षण फ़िर यह विचार आता कि ऐसा करने से कैसे काम चलेगा ? युद्ध-विद्या क्या केवल युद्ध के लिये ही सीखी जाती है ? जिसकी भुजाओं में शक्ति होती है, वह सदैव श्रेष्ठ माना जाता है ? इस युद्धशाला में मैं शक्तिशाली बन सकूँगा ।

     इस युवराज अर्जुन को भी दिखा दूँगा कि संसार में वही अकेला धनुर्धर नहीं है। लेकिन इस बेचारे अर्जुन ने मेरा क्या बिगाड़ा है ! उससे यह स्पर्धा क्यों करुँ ! स्पर्धा सदैव व्यक्ति को अन्धा कर देती है। गुरुवर्य उससे स्नेह करते हैं तो इसमें उसका क्या दोष है ! गुरु प्रेम करें – यह कौन शिष्य नहीं चाहेगा ! और कौन ऐसा गुरु है जो भली-भाँति परीक्षा लिये बिना शिष्य को इतने समीप कर लेगा ! यदि यही बात है, तो गुरुदेव ! मैं भी आपकी कसौटी पर खरा उतरुँगा । केवल एक धनुर्धर होने के कारण ही यदि आप उस अर्जुन को इतना स्नेह करते हैं, तो मैं उससे भी श्रेष्ठ धनुर्धर बनूँगा। परन्तु मैं यदि धनुर्धर हो भी जाऊँ तो उसका क्या उपयोग ! आप तो मुझको कभी अपना शिष्य मानेंगे ही नहीं।

     यदि युवराज अर्जुन गुरुवर्य का इतना लाड़ला था, तो इसका बुरा उसके भाई मान सकते थे, बात मुझको क्यों लगती है ? मेरी और युवराज अर्जुन का ऐसा क्या सम्बन्ध है ? कुछ भी तो नहीं है । मैं एक सूतपुत्र हूँ । वह एक युवराज हैं । उसका मार्ग दूसरा है और मेरा दूसरा । जीवन के मार्ग पर चलने वाले हम दोनों ऐसे यात्री हैं जो एक-दूसरे से एकदम भिन्न हैं। जाओ, युवराज अर्जुन ! खूब बड़े बनो । अजेय धनुर्धर बनो, यदि कभी अवसर आया तो यह सूतपुत्र कर्ण तुम्हारे रथ के घोड़ों को सँभालने के लिये सारथ्य करेगा।

मैंने मन ही मन निश्चय कर लिया कि अर्जुन हो या कोई और हो, मैं किसी के प्रति भी विद्वेष नहीं रखूँगा। यहाँ के सभी युवराजों के और मेरे मार्ग भिन्न-भिन्न हैं। जन्म ने ही उनका निर्धारण कर दिया है। चूँकि मेरी बड़ी इच्छा है, केवल इसीलिए मैं धनुर्विद्या सीखूँगा। मेरी भी इच्छा होती है कि केवल ध्वनि की दिशा में कहीं भी बाण छोडूँ, एक ही समय असंख्य बाण दसों दिशाओं में छोडूँ। गुरु कौन है, इस बात का महत्व ही क्या है ? महत्व की बात तो वास्तव में यह है कि विद्या के प्रति शिष्य में कितनी लगन है ! मैं तन-मन एक कर दूँगा । विद्या के लिए विद्या ग्रहण करुँगा। मैंने पक्का निश्चय कर लिया।

Tuesday, November 10, 2009

कोई भी अच्छा मौका मिले, छोड़े नहीं…… [When opportunity knocks!!!! Don't miss it]

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सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – २३ [कर्ण, कृपाचार्य, दु:शासन…]

    चबूतरे की सीढ़ियाँ उतरने लगे। मेरा मन अब शान्त हो गया था। सामने गुरुदेव द्रोण और युवराज अर्जुन चबूतरे की ओर आ रहे थे। अर्जुन मेरी ओर देखकर हँसा, लेकिन मुझको हँसी नहीं आयी। मुझको ऐसा लगा जैसे उसके हँसने में भी एक प्रकार का व्यंग्य है।

    मुझको पितामह भीष्म की याद आयी। इस अर्जुन के पितामह थे वे। लेकिन दोनों में कहीं समानता नहीं थी। दोनों के स्वभाव और व्यवहार में कितना अन्तर था। जाते-जाते कुछ पूछने के विचार से अर्जुन ने मुझसे पूछा, “यह कौन है ?”

“मेरा छोटा भाई !” मैंने अभिमानपूर्वक कहा।

“यह भी इस शाला में आयेगा क्या ?” गुरुदेव द्रोण ने पूछा।

“जी हाँ ।“ मैंने उत्तर दिया।

“जाओ उस ओर कृप हैं, उनके पथक में सम्मिलित हो जाओ।“

     मैंने कुछ भी न कहा। उनको नमस्कार करने की भी मेरी इच्छा न हुई। जाते-जाते मैंने अर्जुन की ओर मुड़कर देखा। वह तो आश्चर्य से मेरे कानों के कुण्डलों की ओर एकटक देख रहा था।

    हम कृपाचार्य के पथक में आये। कृपाचार्य द्रोणाचार्य जी के साले थे। उनकी देख-रेख में अनेक युवक धनुर्विद्या की शिक्षा प्राप्त कर रहे थे। क्षण-भर के लिए मेरे मन में यह विचार आया कि ये ढ़ेर सारे राजकुमार क्यों जहाँ-तहाँ अपनी अकड़ दिखा रहे हैं ? उस दुर्योधन का सा रोब एक में भी है क्या ? एक भी ऐसा है क्या, जिसकी चाल दुर्योधन की चाल की तरह शानदार हो ? है कोई ऐसा माई का लाल जिसकी दृष्टि उसकी दृष्टि की तरह भेदक हो ?

    इतने में युवराज दुर्योधन ही सामने से आता हुआ मुझको दिखाई दिया। उसके पास जायेंगे तो निश्चय ही हमारी कुशल-क्षेम पूछेगा – यह सोचकर मैं उसकी ओर चलने लगा। उसके पास भी गया, लेकिन युवराज दुर्योधन नहीं था। उसमें और दुर्योधन में अद्भुत समता थी। उसकी देह पर जो वस्त्र थे उससे यह तो निश्चित था कि वह युवराज था। लेकिन युवराज किनमें से था कौरवों में से या पाण्डवों में से, चूँकि दुर्योधन में और इसमें बड़ी समता है, इसलिए यह कौरवों में से ही होगा, लेकिन कौरवों मे से यह कौन है ? इतने में ही कृपाचार्य ने उसको पुकारा, “दु:शासन !” वह भी जल्दी-जल्दी उनकी ओर चला गया। तो वह दु:शासन था ? अहा, दुर्योधन में और उसमें कितनी समानता थी। एक को छिपाइये और दूसरे को दिखाइए। युवराज दुर्योधन और युवराज दु:शासन। दोनों की चाल में वही शान थी। दोनों की दृष्टि में वही भेदकता थी। कहीं दु:शासन दुर्योधन की प्रतिच्छाया ही तो नहीं था ?

Monday, November 09, 2009

अवसर… मौका… जो पहला मिले छोड़ो मत…

एक जवान आदमी किसान की खूबसूरत लड़की से शादी करना चाहता था, वह किसान के पास शादी की अनुमति लेने गया।

किसान ने उस जवान की ओर देखा और बोला जाओ उस खेत में खड़े हो जाओ। मैं एक एक करके तीन सांडों को छोडूँगा। अगर तुमने एक भी सांड की पूँछ पकड़ ली तो तुम मेरी बेटी से शादी कर सकते हो।

जवान आदमी खेत में जाकर खड़ा हो गया और पहले सांड के आने का इंतजार करने लगा। खलिहान का दरवाजा खोला गया पहला सांड बाहर आया, बहुत ही भीमकाय शरीर वाला उसने पहली बार इतना बड़ा सांड देखा था। उसने सोचा कि अगला सांड इससे बेहतर विकल्प होगा, इसलिए वह एक ओर भाग लिया और वह सांड उसके सामने से निकल गया।

खलिहान का दरवाजा वापिस से खोला गया, देखकर यकीन नहीं हुआ। इतना बड़ा और भयंकर सांड उसने पहली बाद देखा था, उसे देखकर तो वह जड़ हो गया। उसने सोचा कि  अच्छा है कि मेरा  अगले सांड का इंतजार करना ठीक रहेगा और अगला सांड एक बेहतर विकल्प होगा। इसलिए वह एक ओर भाग लिया और वह सांड उसके सामने से निकल गया।

खलिहान का दरवाजा तीसरी बार खोला गया, उसके चेहरे पर मुस्कान आ गयी, यह सबसे कमजोर सांड था, इससे कमजोर सांड उसने आज तक नहीं देखा था। उसने अपने आप से कहा यही तो मेरा सांड है, जिसका मैं इंतजार कर रहा था। वह सांड दौड़ा चला आ रहा था और इस जवान ने अपनी स्थिती ठीक की और सांड की पूँछ पकड़ने के लिये तैयार हो गया, और कूद पड़ा, लेकिन यह क्या उस सांड की तो पूँछ ही नहीं थी।

नैतिक शिक्षा – जीवन अवसरों से भरा पड़ा है, जो भी अवसर पहले मिले उसे ले लो, छोड़ो मत।

परिवर्तन के बिना प्रगति असंभव है, और जो अपना मन नहीं बदल सकते, वे कुछ नहीं बदल सकते।

सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – २२ [कर्ण के नये गुरु, जो खुद कर्ण ने बनाये..]

     जैसे ही मैं राजभवन पहुँचा, पिताजी ने मुझको तैयार रहने को कहा। क्योंकि युद्धशाला में जाना था, इसलिए मैं तुरन्त ही तैयार हो गया। माँ ने जो पेटिका दी थी, वह मैंने एक आले में सँभालकर रख दी थी । उस पर पारिजात के चार पुष्प चढ़ाये। उसको वन्दन कर मैं धीरे से बोला, “माँ ! मुझको आशीर्वाद दो । तुम्हारा वसु जीवन के मार्ग पर एक महत्वपूर्ण मोड़ आज ले रहा है । युद्धशाला में जाने का आज पहल दिन है ।“

पिताजी ने बाहर से ही पुकारा, “कर्ण ! शोण ! जल्दी चलो।“

    हम तीनों युद्धशाला में आये । कल की अपेक्षा आज तो वहाँ बहुत अधिक युवक एकत्रित थे। वे सभी मध्य में स्थित उस चबूतरे के चारों ओर शान्तिपूर्वक बैठे हुए थे। सबके सम्मिलित शान्त और गम्भीर स्वर सुनाई पड़ रहे थे। शायद प्रात:काल की प्रार्थना हो रही थी।

    “ऊँ ईशावास्यम इदम सर्वम…” । प्रार्थना बहुत देर तक चलती रही। मैंने पिताजी को वापस जाने को कहा।

“अनुशासन रखना।“ यह कहकर वे लौट गये।

    बीच में बैठे हुए गुरुदेव द्रोण शान्तिपूर्वक उठकर खड़े हो गये। उन्होंने अपने दोनों हाथ उठाकर अपने सभी शिष्यों को आशीर्वाद दिया। मैं शोण को लेकर आगे बढ़ा । हम दोनों ने झुककर गुरुदेव को प्रणाम किया। मुझको आशा थी कि अपना हाथ उठाकर वे हमको भी आशीर्वाद देंगे। लेकिन इतने में ही अर्जुन उनके सामने आ गया और वे अर्जुन के कन्धे पर हाथ रखकर उससे कुछ बातें करते हुए वहाँ से चले गये।

     मैंने सदैव की तरह पूर्व दिशा में आकाश की ओर देखा । तप्त लाल लोहे के गोले की तरह सूर्यदेव आकाश की नीली छत को जला रहे थे। मेरी निराशा क्षण-भर में नौ-दो ग्यारह हो गयी। बस, महासामर्थ्यशाली उस तेज के अतिरिक्त अधिक योग्य गुरु इस त्रिभुवन में दूसरा कौन होगा ? किसी अन्य के आशीर्वाद की भीख माँगने की आवश्यकता ही क्या है ? आज से मेरे वास्तविक गुरु ये ही हैं। आज से बस इन्हीं की पूजा, आज से इन्हीं की आज्ञा। तत्क्षण मैं पत्थर के उस चबूतरे पर चढ़ गया। वहाँ पुष्पों से सजा हुआ धनुष रखा था। वह मैंने हाथ में उठा लिया और जितना ऊँचा उठा सकता था, उतना ऊँचा उठाकर मैं बोला, “संसार के समस्त अन्धकार को नष्ट करने वाले सूर्यदेव ! आज से मैं तुम्हारा शिष्य हूँ। मुझको आशीर्वाद दो। मुझको मार्ग दिखाओ।“ उस धनुष को मस्तक से लगाकर मैंने झुककर उस तेज को प्रणाम किया।

Sunday, November 08, 2009

विश्वास रखो, दोस्तों, भगवान सजा देगा इन पापियों को, धैर्य रखो….

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दारु………….

वेस्ट कर दी सालों ने…….

माँ कसमम्म्म्म्म्म्म्म्म्म………….

एक एक को चुन चुन के मारुँगा……….

सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – २१, भीष्म पितामह से संवाद और कर्ण के विचार ।

    एक विशाल वटवृक्ष के सम्मुख घास के छोटे-से तृण की तरह मैं खड़ा था। क्या करुँ, यही मेरी समझ में नहीं आ रहा था। तुरन्त ही जैसे-तैसे अपने को सँभालकर मैंने झुककर उनको अभिवादन किया। उन्होंने तत्क्षण मुझको ऊपर उठाया। अत्यन्त मृदु स्वर में बोले, “तुम अपनी पूजा में लीन थे। मैंने तुमको जगा दिया, इसलिए तुम क्षुब्ध तो नहीं हो गये ?”

“नहीं ।” मैं बोला।

“सचमुच वत्स, तुमको जगाने की इच्छा मैं रोक नहीं सका।“

    मैं आश्चर्य से उनकी ओर देखने लगा। थोड़ी देर बाद वे बोले, “आज तीन दशाब्दियाँ हो गयीं। प्रतिदिन नियमित रुप से मैं इस समय गंगा के घाट पर आता हूँ, लेकिन इस हस्तिनापुर का एक भी व्यक्ति कभी मुझसे पहले यहाँ नहीं आया, मैंने किसी को नहीं देखा। तुम वह पहले वयक्ति हो, जिसको मैं आज देख रहा हूँ।“

“मैं ?” मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि आगे क्या कहूँ।

    “हाँ ! और इसीलिए बहुत देर तक प्रतीक्षा करने के बाद अन्त में तुमको जगाया ।“ मेरे कानों के कुण्डलों की ओर देखते हुए वे बोले, “इन कुण्डलों के कारण तुम बहुत ही अच्छे लग रहे हो।“

“ये जन्मजात हैं।“ मैंने कहा ।

     “इनका सदैव ध्यान रखना ।” धीरे धीरे पैर रखते हुए वे घाट की सीढ़ियों पर उतरने लगे। पर्वत की तरह भव्य दिखने वाला उनका वह लम्बा शरीर ओझल होने लगा। गले तक पानी में जाकर वे खड़े हो गये। उनके सिर के बाल पानी के साथ तैरने लगे। मैं जहाँ खड़ा था, वहीं से मैंने उनको वन्दन किया। आर्द्र उत्तरीय कन्धे पर डालकर मैं राजभवन की ओर लौटा।

    उस विचित्र संयोग पर मुझे आश्वर्य हुआ। जिन पितामह भीष्म को देखने के लिए मैं कल दिन-भर विचार करता रहा था, वे स्वयं ही आज मुझको मिल गये थे – वे भी अकेले, गंगा के तट पर और प्रात:काल की इस रमणीय बेला में। कितने मधुर हैं उनके स्वर ! मन्दिर के गर्भगृह की तरह उनकी मुखाकृति कितनी शान्त और पवित्र है ! मुझ जैसे एक साधारण सूतपुत्र की कोई बात उनको अच्छी लगती है ! कौरवों के ज्येष्ठ महाराज मुझ-जैसे सूतपुत्र के कन्धे पर हाथ रखकर स्नेह से पूछताछ करते हैं ! सचमुच ही वीर पुरुष यदि अभिमानरहित हो, तो वह कितना महान लगने लगता है ! जिस कुरुकुल में पितामह जैसे वीर और गर्वरहित श्रेष्ठ पुरुष ने जन्म लिया है, वह कुल निश्चय ही धन्य है। मैं भी कितना भाग्यशाली हूँ, जो ऐसे राजभवन में रहने का सौभाग्य मुझको प्राप्त हुआ है। अब तो बार-बार इन पुरुष-श्रेष्ठ के दर्शन मुझको हुआ ही करेंगे। वे दो शान्त और तेजस्वी आँखें मुझपर भी कृपा-दृष्टि रखेंगी। अपने जीवन में जिन तीन व्यक्तियों पर मेरा प्रेम था, उनमें एक व्यक्ति और बढ़ गया था ! पितामह भीष्म !

Saturday, November 07, 2009

सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – २० [गंगा तट पर भीष्म पितामह से मुलाकात]

     संसार के तीन व्यक्तियों से मुझको अत्यन्त प्रेम था। एक अपनी माँ से, दूसरा पिताजी से और तीसरा शोण से। उसी तरह तीन बातों के प्रति मुझमें आकर्षण था। एक थी अपनी असंख्य लहरों के असंख्य मुखों से मुझसे घंटों तक बात करने वाली गंगामाता, दूसरे थे मेरे लिए सदैव उत्साह का प्रचण्ड प्रवाह लेकर आनेवाले आदित्यनारायण और तीसरी यह माँ की दी हुई एक छोटी-सी निशानी चाँदी की पेटिका। इस पेटिका के कारण मुझको चम्पानगरी की याद आयी। मेरे मन का बछड़ा मातृभूमि के थनों पर आघात करने लगा। उनसे स्मृतियों की अनेक मधुर दुग्धधाराएँ बहने लगीं उनकी मधुरता चखते-चखते मैं न जाने कब सो गया।

    प्रत्युषा में पक्षियों की चहचहाहट से मैं जागा। क्षितिज की रेखाओं से अन्धकार हटने लगा था। समस्त हस्तिनापुर धीरे-धीरे जागृत हो रहा था। दूसरा एक सूखा उत्तरीय लेकर मैं कक्ष से बाहर निकला। इस समय वहाँ कोई न होगा, अत: गंगा के पानी में जी भर स्नान कर आऊँ, यह सोचकर मैं घाट की ओर चलने लगा। विचारों में डूबा मैं गंगा के घाट पर आ पहुँचा। मैंने उस अथाह पात्र को आदरपूर्वक नमस्कार किया और फ़िर दोनों हाथ आगे कर सिर के बल मैं पानी में कूद पड़ा। लगभग घण्टा-भर तक मैं उस पानी में मनमानी डुबकियाँ लगाता रहा। मैं पानी में से घाट की ओर पानी काटता हुआ आया। भीगा हुआ अधरीय बदला। भीगा वस्त्र पानी में डूबाकर, फ़िर निचोड़कर मैंने सीढ़ी पर रख दिया। दूर आकाश में सूर्यदेव धीरे-धीरे ऊपर उठ रहे थे। उनकी कोमल किरणें गंगा के पानी को गुदगुदाकर जगा रही थीं। अंजलि में पानी भरकर भक्तिभाव से उसका अर्ध्य मैंने सूर्यदेव को दिया।

    शायद किसी ने मेरे कन्धों को स्पर्श किया। मेरे कन्धों को जोर से हिला रहा था। मैंने धीरे से आँख खोलीं और मुड़कर देखा। अत्यन्त शांत मुखाकृतिवाले एक वृद्ध मेरी ओर देख रहे थे। उनकी दाढ़ी के, सिर के और भौंहों के सभी केश सफ़ेद बादल की तरह श्वेत-शुभ्र थे। भव्य मस्तक पर भस्म की लम्बी रेखाएँ थीं। उनका हाथ मेरे कन्धे पर अब भी ज्यों का त्यों था। कौन है यह वृद्ध ? तत्क्षण मैं प्रश्नों के बाण मन के धनुष पर चढ़ाने लगा। लेकिन नहीं, मैंने इनको कहीं नहीं देखा।

अत्यन्त स्नेहासिक्त, स्वर में उन्होंने मुझसे पूछा, “वत्स, तुम कौन हो ?”

“मैं सूतपुत्र कर्ण ।“

“सूतपुत्र ! कौन-से सूत के पुत्र हो तुम ?”

“चम्पानगरी के अधिरथजी का ।“

“अधिरथ का ?”

“जी । लेकिन आप ?” मैंने बड़ी उत्सुकता से पूछा।

“मैं भीष्म हूँ ।“ उनकी दाढ़ी के बाल हवा के झोंकों से लहरा रहे थे।

भीष्म ! पितामह भीष्म ! कौरव-पाण्डवों के वन्दनीय भीष्म ! गंगा-पुत्र भीष्म ! कुरुवंश के मन्दिर के कलश भीष्म ! योद्धाओं के राज्य के ध्वज भीष्म ! क्षण-भर मेरा मन विमूढ़ हो गया। कुरुवंश का साक्षात पराक्रम मेरे सामने गंगा के किनारे खड़ा था।

Friday, November 06, 2009

दिखने वाली शायरी फ़ोकटियों के लिये (Visual Shayari Fokatiyo ke liye)

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सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – १९, कुछ अनसुलझे प्रश्न !!

      मैं उस भीड़ के बाहर हो आया । चारों ओर अखाड़े को ध्यान से देखने लगा। क्योंकि कल से मुझको यहाँ शिक्षा प्राप्त करनी थी। लेकिन एक ही प्रश्न बार-बार मेरे मन में चक्कर काट रहा था। मैं युवराजों के साथ क्यों नहीं शिक्षा प्राप्त कर सकता ? थोड़ी देर पहले गुरुदेव ने कहा था कि युद्धविद्या केवल क्षत्रियों का कर्तव्य है। क्षत्रिय का अर्थ आखिर क्या है ? मैं क्या क्षत्रिय नहीं हूँ ? और यदि नहीं हूँ तो क्या हो नहीं सकता हूँ ?

    अपना नाम शाला में लिखवाकर हम उस भव्य महाद्वार से बाहर आये। मैंने पिताजी से पूछ ही लिया “पिताजी, मैं क्यों नहीं राजकुमारों के साथ शिक्षा प्राप्त कर सकता हूँ ?”

“क्योंकि तुम क्षत्रिय नहीं हो, वत्स !” वो बोले।

“क्षत्रिय ! क्षत्रिय का क्या अर्थ है ?”

“जो राजकुल में जन्म लेता है, वह क्षत्रिय । तुमने एक सूतकुल में जन्म लिया है, वत्स !”

“कुल ! राजकुल में जन्म लेनेवालों के क्या सहस्त्र हाथ होते हैं ? उन्हीं को इतना महत्व क्यों ?”

“यह तुम नहीं समझ पाओगे। कल से नियमित रुप से इस शाला में आया करना । जो-जो शिक्षा दी जाये, वह ग्रहण करना ।“

हम लोग राजप्रसाद लौटे । शोण उसी तरह कक्ष में बैठा हमारी प्रतीक्षा कर रहा था। उसके पास ही अमात्य वृषवर्मा खड़े थे।

“सूतराज क्या हुआ ? तुम्हारे पुत्र का नाम लिख गया न ?” अमात्य ने विश्वास के साथ पूछा।

“हाँ ।“ पिताजी ने इतना ही उत्तर दिया।

“ठीक है । जब किसी वस्तु की आपको आवश्यकता हो, उसकी सूचना बाहर के सेवक को दे दीजियेगा। मैं जाता हूँ अब।“ अमात्य चले गये।

    मेरा मन यों ही अभ्यासवश युवराज दुर्योधन और अर्जुन, महाराज धृतराष्ट्र और गुरुदेव द्रोण, विदुर और युधिष्ठिर – इनकी तुलना करने का प्रयत्न करने लगा। लेकिन उनमें से किसी की भी एक-दूसरे से तुलना नहीं हो पा रही थी। सबों का अपना स्वतन्त्र और एकदम भिन्न अस्तित्त्व दिखा। इस संसार में कितने प्रकार और कैसे-कैसे स्वाभाव के लोग हैं, भगवान जानें ! किसकी कल्पना से उनका निर्माण होता है ? किस लिए उनका निर्माण होता है ? इस जगत का वह चतुर कारीगर अन्तत: है कौन ? उसने इतने सारे नमूने किस उद्देश्य से बनाये हैं ? क्योंकि यहाँ एक-जैसा दूसरा दिखाई नहीं देता है, और दिखाई दे भी जाये तो वह उस-जैसा होता नहीं है। छि:, इन प्रश्नों का तर्कसंगत उत्तर शायद कोई कभी नहीं दे पायेगा।

Thursday, November 05, 2009

दिखने वाली शायरी बिगड़ैलों के लिये (Visual Shayari Bigdaulo ke liye)

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सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – १८

“यह मेरा पुत्र कर्ण है ।“ पिता जी ने गुरुवर्य द्रोण से निवेदन किया।

मुझको पूरा विश्वास था कि अब वे मुझसे मेरे कानों के कुण्डलों के सम्बन्ध में कुछ अवश्य पूछेंगे, लेकिन निर्विकार भाव से उन्होंने केवल इतना ही कहा, “तुम्हारा पुत्र, अधिरथ ? फ़िर इसको आज युद्धशाला में कैसे लाये हो ?”

“आपके चरणों में डालने के लिए ।“

“मेरे चरणों में किसलिए ?”

“युवराजों के साथ यदि इसको भी थोड़ी-सी युद्धविद्या की शिक्षा मिल जाये तो …”

“युवराजों के साथ ? अधिरथ, युद्धविद्या केवल क्षत्रियों का कर्तव्य है। तुम चाहो तो अपने पुत्र को युद्धशाला में भरती कर दो, लेकिन वह युवराजों के साथ शिक्षा कैसे पा सकता है ?”

      पिताजी का चेहरा क्षण-भर को निस्तेज हो गया। क्या कहें, यह थोड़ी देर तक उनकी समझ में नहीं आया, अन्त में वे जैसे-तैसे बोले, “गुरुदेव की जैसी आज्ञा ।“

      गुरुदेव को पुन: अभिवादन कर हम लोग लौटने लगे। मार्ग में युवराज अर्जुन लक्ष्य में से बाण निकालकर लौटता हुआ हमें मिला। मैंने उसको ध्यान से देखा। उसका बर्ण आकाश की तरह नीला था। हनु भाले की नोक की तरह सिकुड़्ती हुई थी। उस्की तेजस्वी आँखें दोनों कनपटियों की ओर संकुचित होती गयी थीं। उसकी नाक ऋजु और तीक्ष्ण थी। मस्तक थाल की तरह भव्य था। भौंहें सुन्दर थीं । उसका पूरा चेहरा ही विलक्षण सुन्दर था। घण्टे की तरह मधुर ध्वनि में उसने पिताजी से पूछा, “क्यों काका, चम्पानगरी से आज ही आये हो क्या ?”

“हाँ । अपने इस पुत्र कर्ण को लेकर आया हूँ।“

      अर्जुन ने मेरी ओर देखा। मेरी आँखों की अपेक्षा वह शायद मेरे कानों के कुण्डल को ही अधिक आश्चर्य से देख रहा था । वह मुझसे कुछ पूछने ही जा रहा था कि इतने में ही आकाश से एक कुण्डली-सी हम दोनों के बीच में आकर सर्र से गिरी। आकाश से गिरने के कारण सुन्न होकर वह सर्प थोड़ी देर तक वैसा ही पड़ा रहा और फ़िर जिधर अवसर मिला उधर ही दौड़ने लगा। विद्युत गति से युवराज अर्जुन ने हाथ में लगा बाण धनुष पर चढ़ा लिया और वह द्रुतगति से दौड़ते हुए सर्प पर निशाना लगाने लगा। इतने में ही चबूतरे से कोई चिल्लाया, “अर्जुन ! हाथ नीचे कर !” उस आवाज में अद्भुत शक्ति थी। युवराज अर्जुन ने एकदम हाथ नीचे कर लिया, मानो अग्नि का चटका लग गया हो। तीर की गति से भागता हुआ वह सर्प क्षण-भर में ही अखाड़े के पाषाण-प्राचीर में कहीं अदृश्य हो गया। चबूतरे पर से पुन: आवाज गूँजी, “युवराज, उस तुच्छ सर्प को मारने से पहले अपने भीतर के सर्प को मार डालो। क्रोध का सर्प बड़ा भयानक होता है। दुर्बल पर हाथ मत उठाओ।“

     उस चबूतरे पर गुरुदेव द्रोण थे । एक युवक शीघ्रता से अर्जुन के पास आया और अर्जुन की पीठ पर हाथ रखकर उसने अत्यन्त मधुर स्वर में पूछा, “एकदम ही धनुष कैसे उठा लिया, पार्थ ?”

ये थे युवराज युधिष्ठिर ।

Wednesday, November 04, 2009

दिखने वाली शायरी दोस्तों के लिये (Visual Shayari Dosto ke liye)

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सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – १७

      उस अखाड़े में एक ऊँचा और लम्बा-चौड़ा लक्ष्यभेद करने का चबूतरा था। वह चबूतरा ऐसा था कि उसको कहीं से भी देखो, वह अखाड़े के ठीक बीच में दिखाई देता था। उस चबूतरे पर पुष्पों से सज्जित भिन्न-भिन्न आकारों के धनुष रखे हुए थे। एक ओर बाणों के असंख्य तूणीर रखे हुए थे। सामने की ओर अनेक लक्ष्य रखे हुए थे। उस चबूतरे पर साँवले रंग का एक युवक वीरासन लगाकर दायें पैर के पंजे पर शरीर का जोर दिय हुए बैठा था। हाथ में लगे धनुष की प्रत्यंचा उसने कान तक खींच ली थी। एक आँख बन्द कर दूसरी आँख की पुतली उसने बाण की नोंक की सीध में स्थिर कर रखी थी। उसके पास ही ढीले-ढाले वस्त्र पहने हुए, शुभ्र दाढ़ीवाले, सिर के बालों एकत्र बाँधे हुए एक लम्बे वृद्ध खड़े थे। उनकी मुद्रा नदी की तह की तरह शान्त थी। उस साँवले युवक के प्रत्यंचा पर रखे हाथ को उन्होंने सीधा किया। वे उसको कुछ समझाने लगे। युवक ध्यानपूर्वक उनकी बातें सुन रहा था।

    पिताजी ने उस युवक की ओर उँगली से संकेत कर कहा, “वत्स, यही है वह पाण्डुपुत्र धनुर्धर अर्जुन ! और उसको जो सूचनाएँ दे रहे हैं, वे ही हैं पूजनीय गुरुदेव द्रोण !”

    धनुर्धर अर्जुन ! भले ही जो हो – लेकिन क्या वह इससे अधिक प्रभावशाली वीरासन नहीं कर सकता है ? – यह विचार मेरे मेन में कौंध गया ।

    गुरुदेव द्रो़ण वास्तव में अशोक वृक्ष की तरह भव्य लग रहे थे। उनकी देह पर शुभ्र वस्त्र उनके लम्बे शरीर के अनुरुप ही शोभीत हो रहे थे।

    हम अखाड़े के रास्ते चबूतरे की ओर चलने लगे। मुझको ऐसा अनुभव होने लगा जैसे आस-पास की क्रीड़ाक्षेत्रों को देखकर मेरे शरीर की उष्णता यों ही अपने-आप बढ़ने लगी हो। मेरी इच्छाअ हुई कि मैं भी भीतर उतरुँ और चक्कर काटता हुआ तेजी से गदा और खड़्ग के प्रहार प्रतिपक्षी पर करुँ। इन उच्छ्श्रंखल घोड़ों को झुकाकर इअतना पिदाऊँ कि ये मुँह से झाग निकाल पड़ें। हाथी की सूँड पकड़कर उसे नचाऊँ और फ़िर उसको थकाकर अन्त में उसकी पीठ पर चढ़ जाऊँ। चबूतरे पर बैठे उस युवक को उसकी भुजा पकड़कर उठाऊँ और प्रभावशाली वीरासन कैसे लगाया जाता है, यह एक बार अच्छी तरह उसको बता दूँ। कुश्ती के अखाड़े में जंगली भैंसे की तरह यों ही चक्कर काटनेवाले उस उद्द्ण्ड भीम से कुश्ती लड़कर उसका मद भी दूर कर दूँ।

    हम धनुर्विद्या के उस ऊँचे चबूतरे के पास आये। ऊपर बैठे हुए युवराज अर्जुन ने एक बाण छोड़ा। सामने दूरस्थित लकड़ी के लक्ष्य में वह सर्र से घुस गया। गुरुवर्य द्रोण ने उसकी पीठ पर एकदम थाप मारी और वे आनन्द से गरज उठे, “साधुवाद अर्जुन ! लेकिन पास जाकर यह देखो कि तुम्हारा वह सूचीपर्ण बाण लक्ष्य में कितना घुसा है ?” युवराज अर्जुन आज्ञाकारी की भाँति उठा और दृढ़ता से पैर रखता हुआ लक्ष्य की दिशा में चला गया। इतने में पिताजी आगे बढ़े । चबूतरे के नीचे ही खड़े रहकर उन्होंने अभिवादन किया। बड़े आदर से झुककर मैंने उनको अभिवादन किया। पिताजी की इच्छा थी कि उन गुरुवर्य की देखरेख में ही मेरा युद्ध-शास्त्र का अध्ययन हो।

Tuesday, November 03, 2009

दिखने वाली शायरी आलसियों के लिये (Visual Shayari Aaalasiyo ke liye)

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सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – १६

     अन्धे राजा को इतना वैभव दिया पर देखने की शक्ति छीन ली – यह क्रूर व्यवस्था करनेवाला दैव अन्धा नहीं था क्या ? सौ पुत्र और इस अमित राज्य-वैभव के स्वामी इस राजा को भाग्यवान कहा जाये या .…. क्योंकि यह सब देखने के लिये आँखें नहीं हैं – इसलिये उसे अभागा कहा जाये ? अपने सौ पुत्रों को यह अन्धा पिता कैसे पहचानता होगा ? और सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह थी कि आँखें ने होने पर भी इतने विशाल साम्राज्य पर ये शासन कैसे करते होंगे ? छि:, कुछ प्रश्न ऐसे होते हैं कि उनका उत्तर ही नहीं दिया जा सकता ।

     बहुत देर चलने के बाद हम एक विशाल लौह-महाद्वार के पास आये। उसके दोनों ओर काले रंग के पाषाणों के प्राचीर दूर तक संकुचित होते चले गये थे। महाद्वार की भव्य कमान पर त्रिकोणी भगवा ध्वज फ़ड़फ़ड़ा रहा था। द्वारपालों ने हमको देखते ही अभिवादन किया। हम झुककर भीतर गये। वह कुरुओं की युद्धशाला थी।

     भीतर चारों ओर बड़े-बड़े कक्ष थे और बीचोंबीच एक योजन घेरे का एक विशाल अखाड़ा था। उसके अनेक खण्ड कर दिये गये थे। एक ओर मल्ली के लिए अखाड़ा था। यहाँ लाल रंग की बारीक मिट्टी गोलाकार फ़ैली हुई थी। उसमें अनेक मल्ल-युवकों की जोड़ियाँ एक-दूसरे पर दाँव-प्रति-दाँव चलाती हुई लड़ रही थीं। उस अखाड़े के मध्य भाग में हष्ट-पुष्ट गौरवर्णी युवक ताल ठोंकता हुआ गोलाकार नाचता दिखाई दिया उसके पास जाने का साहस किसी में नहीं था। हाथ उठाकर वह सारे अखाड़े में थय-थय नाच रहा था।

      “कर्ण उस युवराज भीम को देख ! वह अखाड़े में सबको चुनौती देता हुआ घूम रहा है ।“ उसकी ओर उँगली से संकेत करते हुए पिताजी बोले।

      दूसरी ओर अश्वारोहण के लिए स्थान रिक्त छोड़ दिया गया था। घोड़े पंक्ति में दौड़ सकें, इसलिए उस स्थान में रेखाएँ खींची हुई थीं। दौड़ते समय बार-बार रुकावट डालने के लिये स्थान-स्थान पर खन्दकें खुदी हुई थीं। कुछ खन्दकें पानी से भरी हुई थीं। स्थान-स्थान पर ऊँची दीवारें खड़ी की गयीं थीं। अनेक युवक उन सब रुकावटों को खेल-खेल में पार करके अश्वों को अभ्यास कराते हुए दिखाई दिये।

     पूर्व की ओर खड्गों का अभ्यास करने के लिए एक क्रीड़ा-क्षेत्र बनाया गया था। उसके किनारे पर छड़ें लगी थीं। उस छड़ों पर विविध आकार के कवच और छोटी-बड़ी ढालें टँगी हुई थीं। अनेक योद्धा खड्गों से अभ्यास कर रहे थे। क्रोध से तमतमाते हुए एक-दूसरे पर टूट रहे थे। खड्गों की झनझनाहट गूँज रही थी।

     पश्चिम की ओर चैसे ही आकार का एक गोलाकर क्रीड़ांगण था। उसमॆं कुछ युवक गदाएँ घुमाकर उनका अभ्यास कर रहे थे। गर्जना करते हुए चक्कर काट रहे थे। उस विशाल स्थान पर शूल, तोमर, शतघ्री आदि के लिए छोटे बड़े बहुत से क्रीड़ा-क्षेत्र बनाये गये थे। चारों ओर पाषाण-निर्मित कक्ष अनेक प्रकार के शस्त्रास्तों से ठसाठस भरे हुए थे।

Monday, November 02, 2009

दिखने वाली शायरी प्रेमियों के लिये (Visual Shayari Premiyo ke liye)

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सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – १५

हम नगर से युद्धशाला की ओर चले। मैंने पिताजी से पूछा, “महाराज की आँखों को क्या हो गया है ?”

“वे अन्धे हैं, वत्स । और इसीलिए उनकी पत्नी राजमाता गान्धारी देवी भी समदु:खी होने के लिए आँखों पर पट्टी बाँधकर रहती हैं, जिससे कि यह संसार दिखाई न दे।“

“राजमाता गान्धारी देवी ?”

“हाँ ! युवराज दुर्योधन की माता। उनके निन्यानबे पुत्र और हैं । युद्धशाला में उन सबको तुम अभी देखोगे ही। महाराज पाण्डु के पुत्र पाण्डव भी तुमको इस समय देखने को मिलेंगे।“

“पाण्डव ?”

“हाँ ! इस राज्य के वास्तविक उत्तराधिकारी करुअवराज महाराज पाण्डु थे लेकिन उनकी अकाल-मृत्यु हो जाने के कारण यह राज्य उनके भाई महाराज धृतराष्ट्र को मिला। उन महाराज पाण्डु के पाँच पुत्र हैं, उन्हीं को नगरजन पाण्डव कहते हैं।“

“इसका अर्थ यह है कि कुरुवंश में कुल एक सौ पाँच युवराज हैं। पाँच पाण्डव और सौ धार्तराष्ट्र।“ मेरे मन में यह उत्सुकता जाग्रत हुई कि इतने युवराज आपस में कैसा व्यवहार करते होंगे !

“और दो महाराज और एक पितामह – पितामह भीष्म ।“ पिताजी बोले ।

“दो महाराज ? कौन-से ?”

“एक महाराज धृतराष्ट्र और दूसरे विदुर ।“

“विदुर महाराज कैसे हुए ? थोड़ी देर पहले तो आपने उनसे गुरुदेव कहा था ?”

“हाँ वत्स, गुरुदेव विदुर महाराज धृतराष्ट्र के भाई हैं, लेकिन उन्होंने राजसंन्यास ग्रहण कर लिया है ।“

“संन्यास ! संन्यास क्या होता है ?”

“संन्यास का अर्थ यह है कि इन्होंने सबका त्याग कर दिया है। यह राज्य, यह राजप्रासाद, यह वैभव- किसी पर भी उन्होंने अपना अधिकार नहीं जताया।“

“फ़िर वे यहाँ क्यों रहते हैं ?”

“अपने अन्धे भाई की राज्य-व्यव्स्था लँगड़ी न हो जाये, इसलिए । उनके प्रत्येक शब्द का यहाँ सम्मान होता है। उसी प्रकार पाण्डवों की माता-राजमाता कुन्तीदेवी का भी मान है।“

“राजमाता कुन्तीदेवी !” मैं कुछ प्रश्न करने जा ही रहा था कि इतने में ही पास के कुंज से एक कोकिल जोर से कुहू-कुहू करता हुआ अशोक के वृक्ष पर से सर्र से उड़ा और हमारे सिर के ऊपर से गुजर गया। मैंने उसकी ओर देखा। मुझको भगदत्त की याद आयी। उसने एक बार कहा था कि, “सप्तस्वरों में तान लेनेवाला कोकिल मादा कौआ के घोंसले में पलता रहता है, क्योंकि उसकी माँ ही उसको जन्म देकर मादा कौआ के घोंसले में रख आती है।“ कितना पागल है भगदत्त ! अरे, कोकिल कहाँ पलता है, यह जानकर क्या करना है ? उचित समय आते ही चतुर्दिक वातावरण को मुग्ध कर देनेवाली उसकी आवाज सुनाई देती है, यही पर्याप्त है ।

Sunday, November 01, 2009

दिखने वाली शायरी नाकाम मोहब्बत के लिये (Visual Shayari Naakam Mohabbat ke liye)

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सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – १४, महाराज धृतराष्ट्र से मुलाकात और युद्धशाला में शिक्षण का प्रयोजन

       एक-एक प्रासाद को पीछे छोड़्ते हुए हम चलने लगे । हम महाराज के प्रासाद में आये। विशाल वक्ष:स्थलवाले महाराज घनी लम्बी श्वेत दाढ़ी के काराण बड़े प्रभावशाली लग रहे थे, लेकिन उनकी आँखों के चारों ओर काले घेरे थे। उनकी आँखें बंद प्रतीत होती थीं।

    अत्यन्त आदर से झुककर पिताजी ने महाराज को अभिवादन किया। उन्होंने संकेत से मुझे भी वैसा ही करने को कहा। मैंने भी झुककर प्रणाम किया।

    “मैं आपका सेवक सूतराज अधिरथ आपको वन्दन कर रहा हूँ, सम्राट ! मेरा पुत्र यह कर्ण भी अत्यन्त आदरपूर्वक आपको वन्दन कर रहा है, महाराज !” पिताजी ने झुके हुए ही कहा ।

     “आओ ! सूतराज अधिरथ, तुम्हारी चम्पानगरी के क्या हाल-चाल हैं ? और तुम्हारे साथ तुम्हारा वही पुत्र है क्या, जो कवच-कुण्डलों से युक्त है ? उसके उन कवच-कुण्डलों के विषय में हमने बहुत कुछ सुना है ।“

“हाँ, महाराज ! वही कर्ण है यह ।“

      पिताजी ने मुझको पास जाने का संकेत किया। मैं तत्क्षण आगे बढ़ा । महाराज ने टटोलकर मेरा हाथ अपने हाथ में लिया। मैंने उनके मुख की ओर देखा। उनकी दोनों सुकोमल और कुछ-कुछ लाल-सी आँखों के किनारे आर्द्र हो गये थे। पलको के पास के स्नायु पलकों को खोलने के लिए बड़े अधीर होकर हरकत करने लगे। परन्तु पलकों के खुलने के बजाय आँखों के छोरों पर जो जल एकत्रित हो गया था, वह ररकता हुआ गालों पर शुभ्र दाढ़ी में मिल रहा था। मैंने झुककर उनके चरणों को स्पर्श किया । उन्होंने बाँह पकड़कर मुझको तुरन्त ऊपर उठाया। अपने काँपते हुए दोनों हाथों से उनहोंने मेरे मुख को पकड़ लिया। ऊँगलियों से कान के कुण्डल टटोलकर देखे। उनके उस थर-थर कम्पित स्पर्श में एक अद्भुत आकर्षण था। भौहों को ऊँची कर, दायीं ओर मुड़कर बोले, “विदुर सचमुच ही आश्चर्य की बात है। उसके ये मांसल कुण्डल तो एक असाधारण घटना है ।“

     “हाँ महाराज ! और इसकी देह पर हिरण्यवर्ण का कवच भी है।“ विदुर ने पिताजी की ओर देखते हुए पूछा, “अधिरथ, तुम तो श्यामवर्णी हो, फ़िर तुम्हारा यह पुत्र हिरण्यवर्णी कैसे है ?”

    “वह मातृवर्णी है गुरुदेव !” पिताजी ने हाथ जोड़कर महाराज से कहा, “एक प्रार्थना है महाराज !”

“कहो अधिरथ ! क्या चाहते हो ?”

“राजकुमारों के साथ मेरे इस पुत्र को भी यदि युद्ध-शास्त्र का कुछ शिक्षण मिल सके तो…”

“अवश्य । अधिरथ, अभी जाओ और गुरु द्रोणजी से मिलकर इसका नाम उनकी युद्धशाला में आज ही लिखवा दो ।“

महाराज का अभिवादन कर हम लोग बाहर आये।