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Saturday, October 31, 2009

दिखने वाली शायरी प्यार के लिये (Visual Shayari Pyaar ke liye)

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सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – १३

        झंझावत की तरह वह जैसे आया था, वैसे ही मुड़ा और बिजली की तेजी से राजप्रासाद की सीढ़ियों पर चढ़ने लगा। केवल एक सीढ़ी शेष रही थी। लेकिन वहीं रुककर वह पुन: पीछे मुड़ा और वर्षा की धारा की तरह क्षण-भर में उन समस्त सीढ़ियों को उतरकर वह फ़िर हमारे पास आया। मेरे पास आकर मेरे कुण्डलों की ओर एकटक देखते हुए वह बोला, “तुम्हारे ये कुण्डल जन्मजात हैं क्या ?”

“हाँ ।“ मैंने उसकी कंजी आँखों में गहराई से झाँकते हुए उत्तर दिया।

      “इन कुण्डलों के कारण तू बहुत ही सुन्दर लगता है। इतना सुन्दर कि ’तू इन चाचाजी का पुत्र है’ इस बात पर किसी को भी विश्वास नहीं होगा। क्यों चाचाजी ?” मेरे कन्धे पर हाथ रखकर उसने मुड़कर खिलखिलाकर हँसते हुए पिताजी से प्रश्न किया । वे असमंजस में कोई उत्तर न देकर ज्यों के त्यों खड़े रहे।

     युवराज दुर्योधन जैसे आया था, वैसे फ़िर तेजी से पैर रखता हुआ चला गया।

      सीढ़ियों को चढ़ने का कष्ट न हो इसलिए शोण को वे अपने कक्ष में पहुँचा आये। महाराज धृतराष्ट्र से मिलने के लिए हम उस भव्य राजाप्रासाद की सीढ़ियाँ चढ़ने लगे। उन सीढ़ियों पर चढ़ते समय मेरे मन-मन्दिर में स्मृतियों का घण्टा घनघनाने लगा। किसी समय पिताजी ने यों ही कुरुवंश के पराक्रमी पूर्वजों की कहानियाँ सुनायीं थीं, वे कहानियाँ मन की अथाह गहराई से अचानक उफ़नकर ऊपर आने लगीं। मेरा मन भय, कौतूहल, आदर, संकोच, श्रद्धा आदि अनेक विचित्र भावों से भर आया।

       सूर्यवंश के पराक्रमी महाराज हस्ती ने ही यह नगर, यहाँ गंगा का विपुल और स्वच्छ जल देखकर बहुत बरसों पहले बसाया था। उनके प्रपौत्र महाराज कुरु इतने पराक्रमी निकले कि प्रजाजन उनके नाम से ही पहले के सूर्यवंश को कुरुवंश के रुप में जानने लगे। उनके वंशजों को वे कौरव कहने लगे। महापराक्रमी उन महाराज कुरु ने ही ये प्रासाद बनवाया था।

        जिस सूर्यवंश में बुद्धिमान मनु, पुरुषश्रेष्ठ पुरुरवा, इन्द्र को भी शरण में आने को विवश करनेवाले नहुष, अपनी दिग्विजय से समस्त आर्यावर्त को कँपा देने वाले ययाति, उनके पराक्रमी पुत्र यदु और पुरु, जनमेजय, अहंयाती, देवातिथि, दुष्यन्त, भरत, हस्ति और अजमीढ़-जैसे प्रतापी महाराज हो गये थे, उस सूर्यवंश को अपने कर्तृव्य से प्रजाजनों से विस्मृत करा देने वाले महाराज कुरु भला कितने पराक्रमी और गुणसम्पन्न होंगे ! कैसे थे वे महाराज कुरु ? लेकिन महाराज कुरु ही क्यों ? उनके पश्चात भी इस राजप्रासाद में क्या कम पराक्रमी लोग रहे थे ? विदूरथ, अन्श्वन, परीक्षित, भीमसेन, परिश्रवस आदि एक से एक बढ़कर पराक्रमी महाराजाओं की एक माला ही इस ’कुरु’ वंश में तैयार हो गयी थी। महाराज परीक्षित तो सचमुच ही कुरुकुलावतंस थे। एक मत्स्य-कन्या से विवाह करने वाले परिश्रवस महाराज के पुत्र शान्तनु ने तो कुरुवंश में एक नया ही आदर्श स्थापित कर दिया था। इतने विशाल राज्यवैभव को तृण के समान त्याग देने वाले उनके भाई महाराज देवापी तो कुरुवंश-परम्परा के साक्षात चरम उत्कर्ष ही थे।

Friday, October 30, 2009

दिखने वाली शायरी मजनूँ के लिये (Visual Shayari Majanu ke liye)

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सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – १२

      हमारा रथ राजाप्रसाद के महाद्वार से भीतर प्रविष्ट हुआ। द्वारपालों ने आदर से झुककर पिताजी को अभिवादन किया। रथ अश्वशाला के पास रुका। सामने ही राजाप्रसाद में जाने के लिये ऊपर चढ़ती हुई असंख्य सीढ़ियाँ थीं| यों ही मेरे मन में आया और मैं उनको गिनने लगा । एक सौ पाँच थीं वे ! एकाध सीढ़ी कहीं छूट तो नहीं गयी, इस सन्देहवश मैं उनको पुन: गिनने लगा। अरे ! पिछली बार जब गिनीं थी, तब एक सौ पाँच थीं । अब एक सौ छ: कैसे हो गयीं ? मैं विचार करने लगा । पर मुझे क्या करना है ! यह सोचता हुआ अपना उत्तरीय सँभालता मैं हस्तिनापुर की उस वैभवशाली और पवित्र भूमि पर पैर रखने ही वाला था कि इतने में ही सात काले घोड़ों का रथ एकदम वायु की गति से, घड़-घड़ की ध्वनि करता हुआ महाद्वार से भीतर प्रविष्ट हुआ। किसी प्रतिहारी ने पुकार लगा दी, “हस्तिनापुराधिपति महाराज धृतराष्ट्रपुत्र युवराज शिरोमणी दुर्योधनऽऽ !” समस्त सेवक और द्वारपाल एकदम सावधान होकर खड़े हो गये। पिताजी ने भी रथ की ओर झुककर अभिवादन किया।

     “कहिए चाचाजी, चम्पानगरी से कब आये ?” युवराज ने रथ से उतरते हुए हँसकर पूछा ।

     “अभी-अभी ही आया हूँ, युवराज !” पिताजी ने सविनय उत्तर दिया।

        मैं रथ से उतरते ही युवराज दुर्योधन को देखने लगा । वह चौदह-पन्द्रह वर्ष का होगा। उसने वीर-भेष धारण कर रखा था। उस वेष में वह विष्णु की तरह सुशोभित हो रहा था। हाथ में गुम्बदवाली गदा के कारण तो वह बहुत ही प्रभावशाली दिखाई पड़ रहा था। एक ही झटके में कीदकर वह नीचे उतर आया और पिताजी के पास आया। उसकी गति ऐसी गर्वीली और मोहक थी, जो अन्यत्र दुर्लभ होती है। उसका प्रत्येक चरण मत्त हाथी के चरण की तरह दृढ़ता से पृथ्वी पर पड़ रहा था। भुजदण्ड पर से बार-बार फ़िसलते उत्तरीय को सँभालते हुए वह अपने हाथों को सगर्व झटके दे रहा था। उसकी कंजी आँखें बड़ी भेदक और पानीदार थीं। नाक भाले के फ़लक की तरह सीधी और पैनी थी। लेकिन न जाने क्यों, उसकी केवल एक बात अच्छी नहीं लगी, वह यह कि सारे संसार को किसी अजगर की तरह अपनी कुण्डली में कस लेने की इच्छा करनेवाली उसकी भौहें बड़ी ही मोटी और कुटिल थीं ।

मेरी ओर देखते हुए उसने पिताजी से पूछा, “चाचाजी ! यह कौन है ?”

“यह मेरा पुत्र कर्ण है, युवराज !” पिताजी ने उत्तर दिया।

“कर्ण ! बहुत अच्छा । लेकिन इसको आज किसलिए लाये हैं ?”

“आपकी राजनगरी दिखाने के लिए ।“

“ठीक है, अमात्य से मिल लीजिए । वे इसको सारा नगर दिखा देंगे ।“

Thursday, October 29, 2009

दिखने वाली शायरी यादों के लिये (Visual Shayari Yadoon ke liye)

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सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – ११

    शोण हाथ उठाकर “भैया रुक जा ! भैया रुक जा ऽऽऽ - “ कहता हुआ रथ के पीछे दौड़ने लगा। माँ ने आगे बड़कर तत्क्षण उसको पकड़ लिया । मैंने सन्तोष की साँस ली। रथ आगे दौड़ने लगा । लेकिन शोण फ़िर माँ के हाथों से छूट गया था। दूर अन्तर पर उसकी छोटी-सी आकृति आगे बढ़ती हुई दिखाई दे रही थी। उत्तरीय सँवारता हुआ एक हाथ उठाये वह अब भी दौड़ रहा था।

    हम लोग नगरी की सीमा तक आ पहुँचे। मैंने सोचा था कि शोण हारकर अन्त में वापस लौट जायेगा। लेकिन हाथ उठाकर वह अब भी दौड़ रहा था। मैंने पिताजी को रथ रोकने को कहा। हमको रुकते देख वह और जोर से दौड़ने लगा। परन्तु भोले-भाले बालक-जैसे लगने वाले शोण में भी कितना बड़ा साहस था ! वह मेरे साथ आना चाहता था, इसलिए वह सब कुछ भूलकर दौड़ लगा रहा था। कितना हठी था वह ! हठी क्यों, कितना स्वाभाविक और निश्छल प्रेम था उसका मुझपर ! थोड़ी देर में ही वह हाँफ़ता हुआ हमारे पास आ गया।

    उसकी किशोर मुखाकृति स्वेद से तर हो गयी थी। वह बहुत थक गया था, लेकिन उस स्थिति में भी तत्क्षण आगे बढ़कर वह तेजी से उछलकर रथ में कूद पड़ा। रुआँसा होकर, हाँफ़ने के कारण टूटे-फ़ूटे शब्दों में, वह बोला, “मुझको छोड़कर जा रहा है ? क्यों रे भैया ? तू जायेगा तो…तो मैं भी तेरे साथ ही चलूँगा; वापस नहीं जाऊँगा मैं? मुझको शोण जैसा स्नेही भाई मिला था।

    नगरी के आस-पास के परिचित स्थल पीछे छूटने लगे। अगल-बगल की घनी वनराजि में चम्पानगरी अदृश्य होने लगी। मेरा बचपन भी अदृश्य होने लगा। आस-पास की वह हरियाली, जिस पर मेरे बचपन के चिह्न अंकित थे, क्षण-प्रतिक्षण मेरी आँखों से ओझल होने लगी।

    दो दिन पहले जिस पठार पर हमने राजसभा का खेल रचा था, नगरी के बाहर का वह पठार सामने आया। उस पर मध्य भाग में वह काल पाषाण एकाकी खड़ा-खड़ा तप रहा था। मुझको राजा के रुप में मान देनेवाला पाषाण का वह कल्पित सिंहासन – महाराज वसुसेन का वह सिंहासन – मुझको मौन भाषा में विदा करने लगा। हाथ उठाकर मैंने उसको और चम्पानगरी को वन्दन किया। मेरा जीवन बचपन की हरियाली छोड़कर दौड़ने लगा – चम्पानगरी से हस्तिनापुर की ओर ।

Wednesday, October 28, 2009

दिखने वाली शायरी ताऊ के लिये (Visual Shayari Taau ke liye)

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सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – १०

     दूसरे दिन पिताजी ने मुझको हस्तिनापुर चलने के लिए तैयार रहने को कहा। मैं उनकी आज्ञानुसार आवश्यक एक-एक वस्तु एकत्रित करने लगा। मन में अनेक विचारों का जमघट लगा हुआ था। अब चम्पानगर छोड़ना पड़ेगा। यहाँ के आकाश से स्पर्धा करनेवाले किंशुक, सप्तपर्ण, डण्डणी, मधूक, पाटल और खादिर के वृक्ष अब मुझसे अलग होनेवाले थे। यहाँ के पत्ररथ, श्येन, कोकिल, क्रौंच, कपोत आदि पक्षियों से अब मैं बहुत दूर जानेवाला था।

    ऐसी बहुत सी बातें कर्ण सोचने लगा और हस्तिनापुर के बारे में सोचने लगा कि वह कैसा होगा –

    कैसा होगा वह हस्तिनापुर ! सुनते हैं, वहाँ बड़े-बड़े प्रासाद हैं। प्रचण्ड व्यायामशालाएँ, अनेक प्रकार के शस्त्रास्त्रों से ठसाठस भरी हुई शस्त्रशालाएँ, हिनहिनाते हुए विशालकाय घोड़ों की पंक्तियों से भरी हुई अश्वशालाएँ, सप्तवर्ण बृक्ष की तरह आकाश के गर्भ में जिनके कलश विराजमान हैं, ऐसे भव्य मन्दिर वहाँ हैं। और द्वार की किवाड़ों की तरह जिनके वक्षस्थल हैं, जिनकी भुजाएँऔर जंघाएँ शक्तिशाली हैं, ऐसे असंख्य योद्धाओं से वह हस्तिनापुर भरा हुआ है। सुनते हैं कि वह कुरुकुल के राजाओं की राजधानी है ! किस दिशा मॆं होगी वह ?

     विचारों में लीन मैं, अपना समान रथ में रखता जा रहा था, शोण भी मेरी मदद कर रहा था, परंतु उसे अब भी यह पता नहीं था कि आज मैं भी जा रहा हूँ। “आज मैं तुझको छोड़कर जाऊँगा” यह बात उससे कैसे कहूँ, यही मेरी समझ में नहीं आ रहा था। जब जाने की तैयारी हो गई तो द्वार पर खड़ी राधामाता को झुककर वन्दन किया उसने मुझे ऊपर उठाते हुए मेरे मस्तक को आघ्राण किया। मुझको ह्र्दय से लगाकर शोक से अवसन्न हो बोली, “एक बात ध्यान रखना वसु ! गंगा के पानी में कभी गहराई में मत जाना !” उसकी आँखों से आँसुओं की झड़ी लग गयी । मेरे रक्त की एक-एक बूँद उन आँसुओं से अत्यन्त प्रेम से कह रही थी, “मात ! तुम्हारे इस उपदेश का मूल्य मैं कैसे सँभालकर रखूँ ? केवल इतना ही कहता हूँ कि साक्षात मृतु के आने पर भी तेरा वसु सत्य से तिल-भर भी कभी विचलित नहीं होगा !”

    उसे कुछ याद आ गया, पुन: पर्णकुटी में गय़ी, और मेरे हाथ पर एक चाँदी की एक छोटी-सी पेटी रख दी। अत्यन्त दुख-भरे स्वर में वह बोली, “वसु, जब-जब तुझको मेरी याद आये, तब-तब तू इस पेटी का दर्शन किया करना । मेरे स्थान पर इसी को देखना ! यह तुम्हारी माँ ही है, यह समझकर इसको सँभालकर रखना !”

     मैंने पेटी उत्तरीय में अच्छी तरह बाँध ली। माता को फ़िर एक बार वन्दन किया। उसने काँपते हाथ से दही की कुछ बूँदे मेरी हथेली पर डालीं। मैंने उनको ग्रहण किया। एकबार उस सम्पूर्ण पर्णकुटी पर दृष्टि डालकर मैंने उसको आँखों में भर लिया। पिताजी ने मुझसे रथ में बैठने को कहा।

     जैसे ही रथ में मैं बैठा, शोण ने पिताजी से पूछा, “भैया कहाँ जा रहा है ?” अब तक उसकी आँखों में आकुलता थी। वे अब रुआँसी हो गयी थीं।

    “मेरे साथ हस्तिनापुर जा रहा है। तू भीतर जा ।” पिताजी ने घोड़ों की वल्गाएँ अपने हाथ में लेकर एकदम उनकी पीठ पर जोर से कशाघात करते हुए कहा । घोड़े एकदम तेजी से उछले और तेजी से दौड़ने लगे।

Tuesday, October 27, 2009

दिखने वाली शायरी गर्लफ़्रेंड के लिये (Visual Shayari Girlfrnd ke liye)

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सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – ९

       जो कुछ हुआ था, उसका पूरा हाल शाम को शोण ने मुझे सुनाया कि उस वृषभ ने मुझको परास्त करने का बहुत प्रयास किये थे, लेकिन मेरे आगे उसकी एक न चली। लगभग दो घण्टों तक वह उछल-उछलकर अपने सिर को झटकता रहा था। उसने अपने शरीर को बहुत-से विचित्र झटके दिये। बीच-बीच में वह जोर से कूदता, पैरों के खुरों से जमीन कुरेदता; लेकिन अन्त में वह थक गया और चुपचाप खड़ा हो गया। उसके मुँह से झाग निकलने लगा। वह लगातार ’फ़ूँ-फ़ँ’ कर रहा था। इतने में शोण भागते हुए गया और पिताजी को बुला लाया। उन्होंने ही उसके नाथ डाली, लेकिन मेरे हाथों की पकड़ छुड़ाते समय उन्हें बहुत ही परेशानी हुई। सुनते हैं कि मेरी देह के हाथ लगाते ही ऐसी जलन होती थी, जैसे कि आग को छू लिया हो।

      मैं विचारम्ग्न हो गया। दो घंटे तक एक जंगली पशु से जूझते रहने पर भी मेरे शरीर पर कोई खरोंच तक नहीं आयी। क्यों ? मेरा शरीर इतना कैसे तप्त हो गया कि छूते ही छाला पड़ जाता था ?

     मैंने उत्सुकतावश शोण से पूछा, “शोण, खेलते समय कभी तुझे चोट लगी है क्या ?”

वह बोला, “अनेक बार”।

      शोण को चोट लगती है। उसकी देह से रक्त बहता है। तो फ़िर मेरी देह से भी वह बहना ही चाहिए। मैं झटपट उठा और सीधा पर्णकुटी में गया। वहाँ अनेक धनुष-बाण पंक्ति-बद्ध रखे हुए थे। सर्र से उनमें से एक बाण मैंने खींच लिया । निश्चय कर हाथ से उस बाण को मैंने सिर से ऊँचा उठाया कि अब उसकी तीक्ष्ण नोक ठीक पैर के पंजे पर आयेगी, और उस बाण को हाथ से छोड़ दिया। अब वह कच से मेरे पैर में घुस जायेगा, यह सोच सिहरकर मैंने तत्क्षण आँखें मीच लीं। बाण पैर पर पड़ा, लेकिन मुझको केवल इतना ही लगा जैसे कि घास की सींक-सी चुभ गयी हो ! बाण की नोक मेरे पैर की खाल में घुसी नहीं थी। मुझे लगा कि मैंने बाण छोड़ने में ही भूल कर दी है, इसलिये बार-बार मैंने वो बाण अपने पैरों पर गिराया। लेकिन एक बार भी उसकी नोक मेरे पैर की त्वचा में नहीं घुस पायी। मैंने गौर से अपने पैर की ओर देखा। वहाँ छोटा सा घाव तक नहीं हुआ था।

        उत्सुकता और संदेह का राक्षस मेरे सामने अनेक प्रश्नों की लटें बिखारकर नाचने लगा। मैं अपने हाथ में लगे बाण को नोक को विक्षिप्त की तरह जंघा में, बाँहों में, छाती में, पेट में – जहाँ जगह मिली वहीं पूरी शक्ति से घुसाने का प्रयत्न करने लगा। लेकिन कहीं भी वह शरीर के भीतर तिल-भर भी नहीं घुस सका। क्यों नहीं घुस सका वह ? क्या मेरे शरीर की त्वचा अभेद्य है ? मन के आकाश में सन्देह की एक बिजली इस ओर से उस छोर तक चमक गयी। हाँ ! निश्चय ही मेरी सम्पूर्ण देह पर किसी से भी न टूट सकनेवाला अभेद्य कवच होना चाहिये। अभेद्य कवच ! वाह, दौड़ते हुए रथ में से भी यदि मैं कूद पड़ूँ तो मुझको कभी चोट नहीं लगेगी ! पत्थर, कंकड़ या किसी शस्त्र से भी मैं कभी घायल नहीं हो सकूँगा। घायल नहीं हो सकूँगा मतलब – मैं कभी मरुँगा नहीं। कभी नहीं मरुँगा। मेरी यह सुवर्ण रंगी त्वचा सदैव इसी तरह चमकती रहेगी। मैं अमर रहूँगा। मुझे कवच मिला है, मेरे कानों मे जगमगाते हुए कुण्डल हैं। अकेले मुझे ही क्यों मिले हैं ? मैं कौन हूँ ?

      सन्देह की टिटहरी मेरे मन के आकाश में कर्कश स्वर में किकियाने लगी। ऐसा प्रतीत होने लगा कि मैं इन सबसे अलग कोई हूँ, इनमें और मुझमें बहुत बड़ा अन्तर है। लेकिन इन विचारों से स्वयं मुझको बहुत दुख होने लगा । जिस राधामाता का मैंने दूध पिया था, जिसके रक्त-मांस का उत्तराधिकार पाकर मैं बड़ा हुआ था, जिसने मेरे लिए कठिन परिश्रम के पर्वत को धारण किया, उसके प्रेम से – उपर्युक्त विचारों द्वारा क्या मैं कृतघ्न नहीं हो रहा था ? मेरा मन विद्रोह कर उठा और कठोर शब्दों में मुझको चेतावनी देने लगा, “मैं कौन हूँ ? मैं कौन हूँ ? – यह पागलों की तरह मत चिल्ला ! ध्यान रख कि तू तात अधिरथ और राधामाता का पुत्र है ! सूतपुत्र कर्ण है ! शोण का बड़ा भाई कर्ण है ! सारथियों के कुल का एक सारथी है ! एक सारथी !”

Monday, October 26, 2009

हमारे एक मित्र का जीमेल पर स्टेटस …. प्रबंधन पर खरी खरी

हमारे एक मित्र नीरज आनंद के जीमेल स्टेटस से ये पंक्तियां ली गई हैं -

A team of Lion lead by donkey can be defeated by a team of donkies lead by a Lion...

एक शेर के समूह का नेतृत्व अगर गधा करता है तो वो अवश्य हारेगा, उस गधों के समूह से जिनका नेतृत्व एक शेर कर रहा है….

सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – ८

      इस प्रकार हमारी बातें हो ही रही थीं कि एक विशालकाय वृषभ जय-जयकार की चिल्लाहट से बिदक गया। अपनी झब्बेदार पूँछ एकदम खड़ी कर ली। आवाज जिस ओर से आ रही थी, उस ओर कान लगाये, फ़ुफ़कारते हुए, नथुने फ़ुलाये और सींगों को आगे किये हुए वह कान उठाकर सीधा उस और दौड़ने लगा, जिस ओर हम सब बैठे हुए थे। ब्रह्मदत्त ने उसका वह भयंकर रुप देखा और जान बचाकर जिधर अवसर मिला उधर भागता हुआ, वह हाथ ऊँचा कर चिल्लाया, “सेनापति…. महाराज… भागिए-भागिए … राज्य पर … संकट…..”

      वर्षा का पानी धरती पर पड़ते ही जैसे क्षण भर में ही, सब और फ़ैल जाता है, वैसे ही सबके सब क्षण-भर में नौ-दो ग्यारह हो गये। शोण मेरे पास आकर भाग जाने के लिये मेरा हाथ पकड़कर खींचने लगा। मैं झटपट उसी पाषाण पर तनकर खड़ा हो गया। शोण को ऊपर चढ़ाकर उसको अपने पीछे खड़ा कर लिया। झंझावत की तरह वह वृषभ हमारी और आने लगा। उसकी आँखें आग उगल रही थीं। सामने जो कोई वस्तु दिखाई दे, उसी को ठोकर मारकर उसकी धज्जी उडाने के लिये उसके मस्तक की नस-नस शायद व्याकुल हो उठी थी। उसके मुख से निरन्तर लार टपक रही थी। सिंहासन के सम्मुख आते ही वह क्षण-भर रुका। अगले पैरों के खुरों से उसने खर-खर मिट्टी खोदी और सींग गड़ाकर वह सूची बाण की तरह एकदम उछला। मैंने क्षण-भर आकाश की ओर देखा।

       सूर्यदेव अपने रथ के असंख्य घोड़ों को केवल अपने दो हाथों से ही सरलता से सँभाल रहे थे। कुछ समझ में आये, इसके पहले ही मैंने शोण को पीछे धकेल दिया और दूसरे ही क्षण मेरे हाथों की दृढ़ पकड़ वृषभ के सींगों के चारों ओर कस गयी। शोण ने “भै‍ऽयाऽऽ“ कहकर जो चीत्कार किया वह मुझको अस्पष्ट-सा सुनाई दिया। इसके बाद क्या हुआ, यह मुझको अच्छी तरह याद नहीं रहा। लेकिन मुझको उठाकर फ़ेंकने के लिए उसकी सींगों के चारों ओर कसकर लिपटते गये थे। मुझको ऐसा लगा, जैसे कि मेरा शरीर रथचक्र की तप्त लौह-हाल की तरह प्रखर हो गया हो। इसके बाद वसु कौन था, कहाँ था, इसका कुछ भी पता मुझको नहीं चला।

       जिस समय मेरी आँख खुली, मैं उसी पठार पर था, लेकिन मेरा सिर माँ की गोद में था। समीप ही पिताजी खड़े थे। उन्होंने हाथ में उस वृषभ की नाथ पकड़ रखी थी। थोड़ी देर पहले आँखें लाल किये उछलनेवाला वृषभ अब थककर हाँफ़ता हुआ खड़ा था। उसके मुँह से शायद झाग निकल रहा था। मैंने जैसे ही आँखें खोली शोण के मुँह पर एक हँसी आ गई जो कि पहले से मेरे सिर के पास खड़ा था। सब बच्चे मुझे घेरकर खड़े थे, फ़िर मैं अपनी सारी शक्ति एकत्रित करके खड़ा हुआ ये देखने के लिये कि मुझे चोट आ गई होगी क्योंकि मुझे थकान का अनुभव हो रहा था। देह पर कहीं भी जरा-सी खरोंच तक नहीं आयी थी। पिताजी से उस वृषभ की नाथ अपने हाथ में ले ली और हाँफ़ते हुए वृषभ की पीठ पर कसकर थाप मारी। उसकी त्वचा भय से क्षण-भर को सिहर उठी। अपनी पूँछ अन्दर की ओर करता हुआ वह तत्क्षण मुझसे दूर हट गया। पास ही उस वृषभ का गोपाल खड़ा था, मैंने उस वृषभ की नाथ उसके हाथ में दे दी। वह गोपाल आँखें फ़ाड़कर मेरी ओर देखता हुआ अपना वृषभ लेकर चला गया। राजसभा भी समाप्त हो गई।

Sunday, October 25, 2009

बापू ने बोला है कि कभी दोस्ती मत तोड़ो.. (Netver Break Dosti…. ) :)

यह कटु सत्य है

कि दोस्ती कैसे टूटती है ?

ATT000131 

दोनों दोस्त सोचते हैं कि दूसरा कार्य में व्यस्त हैं
ATT000102 ATT000083

और बात नहीं करते हैं ATT000054 ये सोचकर कि शायद वो उन्हें परेशान कर देंगे..


जबकि दोनों ही टाईम पास कर रहे होते हैं
ATT000215 

दोनों सोचते रहते हैं कि दूसरे को पहले बात करने दो
ATT000166 

उसके बाद दोनों सोचते हैं कि पहले मैं क्यों बात करुँ ?
ATT000068ATT000037 

आखिरकार बिना बात करे यादें कमजोर हो जाती हैं

ATT000099 

और फ़िर एक दूसरे को भूल जाते हैं।

ATT0000210

तो सबसे बात करते रहो और ये बात सभी दोस्तों को भॆज दो..

ATT0000411, ATT0001912  

मैं इस तरह का नहीं होना चाहता हूँ।
ATT0001713 

इसलिये मैं सभी को ईमेल भेज रहा हूँ
ATT0000114


कहने के लिये ATT0001415


ATT0001516
प्रिय,

मैं यहाँ ठीक हूँ

ATT0002217


हमेशा अपना ख्याल रखना और अपने बारे में बताते रहना
ATT0002018

बापू ने बोला है

’अगर कोई तुमको ईमेल न करे, सुप्रभात/ शुभरात्रि न बोले,'

काल/ एस.एम.एस. न करे …. तो कोई बात नहीं, तुम ईमेल/ चेट करते रहो ......

सुप्रभात / शुभरात्रि बोलते रहो ….....


काल / एस.एम.एस. भी करते रहो….....

देखना उसकी आत्मा एक दिन जरुर जागेगी

और वो भी तुम्हें ईमेल/काल/एस.एम.एस./चेट जरुर करेगा / करेगी
ATT0000719
और अगर फ़िर भी कोई ईमेल/काल/एस.एम.एस. नहीं आये

तो उसके पास जाना, उसे एक गुलदस्ता देना…. और कहना……

'GET WELL SOON MAAMU'
ATT0001220

टिप्पणी दे दो मामू

ATT0001121

सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – ७

              एक दिन नगर के सभी बालक इकट्ठे होकर नगर के बाहर पठार पर खेल रहे थे। किसी ने राजसभा का खेल खेलने की कल्पना निकाली थी। राजसभा का चित्र गढ़ रखा था। पिताजी हस्तिनापुर से आये थे और मैं शोण को बुलाने गया था, वो सेनापति बना था। आते ही पिताजी ने एक बड़ी आनन्ददायक बात बतायी कि हस्तिनापुर वापिस जाते समय वे मुझको भी अपने साथ ले जाने वाले थे वहाँ द्रोण नामक अत्यन्त युद्ध-कुशल और विद्वान गुरुदेव हैं, पिताजी मुझको युद्ध-विद्या की शिक्षा प्राप्त करने के लिये उनकी देख-रेख में रखना चाहते थे। इसलिये मैं एकदम शोण को ढूँढ़ता हुआ आया कि मैं उसे समझा बुझाकर यह समाचार बताऊँगा। क्योंकि भय था कि समाचार सुनकर कहीं वह भी हस्तिनापुर चलने की हठ न कर बैठे ! उसको समझाना हम सबके लिये टेढ़ी खीर था।

         पठार के पास जैसे ही मैं पहुँचा शोण ने जोर से पुकारा “वसु भैया, जल्दी आ।“ मैं झटपट उनके पास गया। जैसे ही वहाँ पहुँचा, सब मुझको घेर कर खड़े हो गये। सबके सब बहुत जोर-जोर से चिल्लाने लगे, इसलिए मैं तत्क्षण यह समझ ही नहीं पाया कि वे क्या कह रहे हैं ?

        “राजा…वसु…कुण्डल…सेनापति” आदि विचित्र शब्द गूँजते हुए कानों से टकराने लगे। अन्त में मैं ही जोर से चिल्लाया , “पहले सब चुप तो हो जाओ !”

      “हम सबने राजसभा तैयार की है। केवल योग्य राजा ही हमको नहीं मिल रहा था। तेरे कुण्डलों के कारण हमने तुझी को राजा बनाने का निश्चय किया है।“ सबकी और से ब्रह्मदत्त बोला और सबने एक साथ चिल्लाकर उसका समर्थन किया।

“अरे मैं तो शोण को बुलाने के लिये आया हूँ”। मैं बोला।

       “ऊँहूँ, शोण नहीं, सेनापति ! और सेनापति को बुलाने के लिये महाराज नहीं जाया करते हैं। हम जैसे सेवकों को आज्ञा दी जाती है ।“ नटखट ब्रह्मदत्त धूर्तता से बोला।

     “और आप हैं सेनापति ! आपको महाराज को इस प्रकार नाम लेकर बुलाना उचित है क्या ? कह रहे थे, ’अरे वसु इधर आ !’ सेनापति ही अनुशासन भंग करने लगेंगे तो फ़िर सेना क्या करेगी ?” अमात्य बने हुए ब्रह्मदत्त ने शोण को चेतावनी दी।

     मुझे जबरदस्ती एकदम उस काले पत्थर के सिंहासन पर बैठा दिया और अत्यन्त आदर से झुकता हुआ ब्रह्मदत्त बोला, “चम्पानगराधिपति वसुसेन महाराज की……”

      सबने अत्यन्त आनन्द से उसके प्रत्युत्तर में कहा, “जय हो !” सब नीचे बैठ गये। अब मेरा छुटकारा होना असम्भव था, इसलिये मैं भी राज की शान से बोला, “अमात्य, सभा का काम-काज सभा के सम्मुख प्रस्तुत करने की अनुज्ञा दी जाती है।“

Saturday, October 24, 2009

मेरे सभी दोस्तों को (To All my friends…)

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Friendship is not about “I m sorry”  its about “अबे तेरी गलती है "

Friendship is not about “I m there for u” or “I missed u “  it’s about “कहाँ मर गया साले”

Friendship is not about “I understand “  its about “सब तेरी वजह से हुआ मनहूस”

Friendship is not about “I care for u  “  its about “कमीनों तुम्हें छोड़ के कहाँ जाऊँगा”

Friendship is not about “I m happy for ur success “its about “चल पार्टी दे साले

Friendship is not about “I love that girl“  its about “सालों इज्जत से देखो तुम्हारी भाभी है”

Friendship is not about “R u coming for outing tomorrow “ its about “ नौटंकी नहीं, हम कल बाहर जा रहे हैं”

Friendship is not about “Get well soon “ its about “ इतना पियेगा तो यही होगा साले”

Friendship is not about “All the best for ur career“ its about “ बहुत हुआ, अभी तो स्विच मार साले”

सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – ६

    हमारी पर्णकुटी के सामने एक बड़ा वट वृक्ष था। वृक्ष क्या, अनेक रंगों के और अनेक प्रकार की बोली बोलने वाले पक्षी जिस पर रहते थे, ऐसा छोटा-सा एक पक्षि-नगर ही था।

    मैं उस वृक्ष की ओर देख रहा था। उसका आकार गदा की तरह था। ऊपर शाखाओं का गोलाकार घेरा और नीचे सुदृढ़ तना। इतने में अजीब-सी ’खाड़’ आवाज हुई, इसलिए मैंने उस ओर देखा। हमारे पड़ोस में रहनेवाला भगदत्त नामक सारथी अपने हाथ में लगे हुए प्रतोद को फ़टकार रहा था। मैंने आश्चर्य से उसकी ओर देखा। हाथ में लगे प्रतोद को गरदन के चारों ओर लपेटता हुआ वह बोला, “क्यों वसु, क्या देख रहे हो?”

“कुछ नहीं, वह पक्षी देख रहा हूँ।“ मैंने उत्तर दिया।

     “इस वटवृक्ष पर क्या पक्षी देखते हो, पक्षी देखने हों तो अरण्य में अशोक-वृक्ष के पास जाकर देखो। इस वटवृक्ष पर अधिकतर कौए ही रहते हैं। सड़े पके फ़लों को खाने के लिए वे ही आते हैं।“ हाथ में लगे प्रतोद के डण्डे से नीचे पड़े हुए फ़लों को फ़ेंकता हुआ वह बोला।

“कौए ?”

“हाँ ! भारद्वाज, श्येन, कोकिल आदि पक्षी भूले-भटके भले ही आ जायें यहाँ। एकाध कोकिल आ जाता है, वह भी कोकिल की धूर्तता से।“

“धूर्तता कैसी ?” मैंने उत्सुकता से उससे पूछा।

     “अरे, कोकिला अपना अण्डा मादा कौआ की अनुपस्थिती में चुपचाप उसके घोंसले में लाकर रख देती है। अण्डे का रंग और आकार बिल्कुल मादा कौए के अण्डे जैसा ही होता है। इसलिए मादा कौआ को यह सन्देह ही नहीं होता कि अपने घर में किसी और का अण्डा रखा है। फ़िर मादा कौआ कोकिला के अण्डे को सेती है। उसके बाद सप्तस्वर में तान लेकर आस-पास के वातावरण को मुग्ध कर देने वाली कोकिल मादा कौआ के नीड़ में बड़ा होने लगता है।“ उसने प्रतोद को कण्ठ के चारों ओर लपेट लिया।

     “कोकिल और वह मादा कौआ के घोंसले में ?” मैं विचार करने लगा। यह कैसे सम्भव हो सकता है ? भगदत्त की बात असत्य न होगी, इसका क्या प्रमाण है ? और थोड़ी देर के लिए यदि यह सत्य मान भी लिया जाये तो क्या हानि है। हो सकता है मादा कौआ के घर में कोकिल पलता हो। लेकिन वह कौआ बनकर थोड़े ही पलता है। वसन्त ऋतु का अवसर आते ही उसकी सप्तस्वरों की तान पक्षियों से स्पष्ट कह ही देती है कि, “मैं कोकिल हूँ। मैं कोकिल हूँ।“

Friday, October 23, 2009

एक मुलाकात ताऊ और सुरेश चिपलूनकर से

अभी हम दीवाली की छुट्टियों पर अपने घर उज्जैन गये थे, जिसमें हमारा इंदौर जाने का एक दिन के लिये पहले से प्लान था । इंदौर में हमारे बड़े चाचाजी सपरिवार रहते हैं, तो बस घर की साफ़ सफ़ाई के बाद वह दिन भी आ गया। एक दिन पहले शाम को टेक्सी के लिये फ़ोन कर दिया क्योंकि इंदौर मात्र ५५ कि.मी. है। और चाचीजी से फ़रमाईश भी कर दी कि स्पेशल हमारे लिये दाल बाफ़ले बनाये जायें, ताऊ से पहले ही बात कर ली थी कि हम इंदौर आने वाले हैं तो उन्होंने एकदम कहा कि मिलने जरुर आईयेगा, बहुत ही आत्मीय निमंत्रण था।

कुछ फ़ोटो इंदौर पहुंचने के पहले के -

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उज्जैन से इंदौर का फ़ोरलेन का कार्य प्रगति पर है।

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सांवेर में नरम और मीठे दाने के भुट्टे और बीच में ऊँटों का कारवां।

हम इंदौर पहुंच गये सुबह ही घर पर परिवार के साथ समय कैसे जाता है पता ही नहीं चला फ़िर हमने ताऊ से बात की तो वे बोले कि कभी भी आ जाइये कोई समस्या नहीं है, हमने ये सोचा था कि वे अपने कार्य में व्यस्त होंगे तो हमें टाइम दे पायेंगे या नहीं।

हम पहुंच गये ताऊ के यहाँ उन्होंने बहुत ही सरल तरीके से हमें अपना घर का पता बता दिया था तो हम बिना पूछताछ के ही सीधे उनके घर पहुंच गये। साथ में थीं हमारी धर्मपत्नीजी भी। ताऊ बोले कि ताई अभी दीवाली की खरीदी करने बाजार गई हैं नहीं तो आपको उनसे भी मिलवाते।

ताऊ ने घर पर ही अपना ओफ़िस बना रखा है, बिल्कुल जैसा सोचा था ताऊ वैसा ही निकला। फ़िर आपस में पहले परिचय हुआ (वो तो पहले से ही था) पर ठीक तरीके से, अपने अपने इतिहास को बताया कि पहले क्या करते थे अब क्या करते हैं।

ब्लोगजगत के बारे में बहुत सी चर्चा हुईं, हाँ उनकी बातों से ये जरुर लगा कि वे ब्लोग के लिये बहुत ही गंभीर रहते हैं और अपनी वरिष्ठता होने के साथ वे बहुत गंभीर भी हैं, अधिकतर ब्लोगर्स के सम्पर्क में रहते हैं और वे अपना सेलिब्रिटी स्टॆटस समझते हैं।

उन दिनों हमने ७ दिन का पोस्ट न लिखने का विरोध करा था, उस पर भी काफ़ी बात हुई वे भी बहुत दुखी थे, बहुत सारे ब्लोगर्स के बारे में बात हुई पर खुशी की बात यह है कि ताऊ केवल हिन्दी ब्लोग की तरक्की चाहते हैं और इसके लिये उनके कुछ सपने भी हैं, जो आने वाले दिनों में साकर करेंगे, सफ़लता के लिये हम कामना करते हैं। ताऊ से अल्प समय के इस मिलन में हमने ताऊ से बहुत सारे गुर सीखे।

इंदौर के ब्लोगर्स के बारे में बात हुई तो ताऊ बोले कि केवल दिलीप कवठेकर जी ही हैं और तो किसी को जानता नहीं। फ़िर दो दिन पहले ही कीर्तिश भट्ट जी से बात हुई “बामुलाहिजा” वाले, वे बोले कि अगर हमें पहले से पता होता तो वे भी मिल लेते क्योंकि वे भी इंदौर में ही रहते हैं।

बस फ़ोटो खींचने का बिल्कुल याद ही नहीं रहा। कुछ दिन पहले अविनाश वाचस्पति जी से बात हुई थी तब उन्होंने याद दिलाया था कि किसी भी ब्लोगर से मिलें एक फ़ोटो जरुर खींच लें भले ही अपने मोबाईल से हो।

ये गलती हमने सुरेश चिपलूनकरजी से मिलने गये तो नहीं दोहराई।

हम सुरेशजी से मिलने पहुंचे तो हमने गॉगल लगा रखा था तो वे हमें पहचान ही नहीं पाये पर गॉगल उतारने पर एकदम पहिचान लिये। गले मिलकर दीवाली की हार्दिक शुभाकामनाएँ दी फ़िर बातचीत का सिलसिला शुरु हुआ।

Suresh Chiplunkar and Vivek Rastogi

सुरेश चिपलूनकर जी और मैं विवेक रस्तोगी उनकी कर्मस्थली पर

बात शुरु हुई तो पता चला हमारे बहुत से कॉमन दोस्त और पारिवारिक मित्र हैं । फ़िर बात लेखन के ऊपर हुई तो यही कि प्रिंट मीडिया को तो छापने के लिये कुछ चाहिये और वे चोरी से भी परहेज नहीं करते, और अगर लेखक को कुछ दे भी दिया तो ये समझते हैं कि वे कंगाल हो जायेंगे। हमने बताया कि हम भी पहले ऐसे ही लिखते थे परंतु हालात अच्छॆ न देखकर लिखना ही बंद कर दिया।

फ़िर बात शुरु हुई  हमारे ७ दिन के पोस्ट न लिखने के ऊपर तो उनके विचार थे कि ये लोग कभी सुधर ही नहीं सकते इन सबसे अपना मन मत दुखाईये पर हम भी क्या करें हैं तो हम भी हाड़ मास के पुतले ही ना, कोई तो बात दिल को लगेगी ही ना।

सुरेश जी से भी बहुत सारे मुद्दों पर चर्चा हुई, तो उन्होंने कहा कि ब्लोग को एक विचारधारा पर रखकर ही आगे बड़ा जा सकता है, उनकी ये बात सौ फ़ीसदी सत्य है।

ब्लोग की व्यवहारिक कठिनाईयों के बारे में भी बात हुई वे बोले कि कुछ ब्लोगर्स मित्र हैं जो कि तकनीकी मदद करते हैं, क्योंकि हम तकनीकी रुप से उतने सक्षम नहीं हैं।

एग्रीगेटर के बारे में भी बात हुई कि कोई भी फ़्री की चीज पचा नहीं पा रहा है और हमले किये जा रहे हैं।

हमने उन्हें बताया कि हमें उनकी लेखन की कट्टरवादी शैली बहुत पसंद है जो कि राष्ट्रवाद और हिन्दुत्व की अलख हर दिल में जलाती है।

बहुत सारी बातें की फ़िर हमने उनसे विदा ली, बताईये कैसी लगी मुलाकात ताऊ और सुरेश चिपलूनकर से।

सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – ५

    पर्णकुटी में पिताजी के लाये हुए अनेक प्रकार के और अनेक आकारों के धनुष थे। पता नहीं क्यों, लेकिन जब मैंने पहली-पहली बार उनमें से एक धनुष देखा था, और उसके प्रति मुझको जो आकर्षण लगा था, वह अद्भुत था। उसकी कपोत की ग्रीवा की तरह मुड़ी हुई कमान और नखमात्र से छे़ड़ देने पर ही टंकार करनेवाली प्रत्यंचा मुझको बहुत अच्छी लगी थी। पिताजी के हाथ से वह छीनकर उछलते हुए आँगन में घोड़े की पूँछ के बाल से क्रीड़ा करते हुए शोण के पास आया तो वह घोड़े की पूँछ के बाल निकालने में व्यस्त था, ये उसका प्रिय खेल था, मैं उसे बोला कि छोड़ अब इस खेल को, और धनुष दिखाते हुए बोला कि “देख ये है अपना नया खिलौना”।

    उत्सुकता से नाचता हुआ मेरे पास आकर मेरे हाथ से धनुष लेकर बड़ी बड़ी आँखें बनाकर बोलता है “यह तो बड़ा भारी है रे ?”

    और कर्ण के मन में यहीं से धनुर्विद्या के प्रति प्रेम और लगाव हुआ। वह पहले वट वृक्ष पर फ़िर हिलने वाली आम की डालियों के डण्ठल और एक साथ दो बाणों को भिन्न भिन्न लक्ष्यों का वेध करना। कर्ण सीखना चाहता था लक्ष्य को न देखते हुए आवाज की दिशा में बाण चलाना, जैसे साही नामक जन्तु रक्षा के लिये अपनी देह से सौ-दो सौ नलिकाएँ एक साथ छोड़ सकता है, उसी तरह से एक साथ असंख्य बाण छोड़ना सीखना चाहता था।

     कर्ण अकसर अपने कान के मांसल कुंडलों को हाथ लगाकर कुछ महसूस करने की कोशिश करता था। वैसे कुण्डलों के संबंध में कभी भी माँ से कोई भी सन्तोषप्रद उत्तर नहीं मिल सका था। एक बार तो उसने साफ़ साफ़ पूछा था “शोण और मैं – दोनों सगे भाई हैं न, फ़िर उसके क्यों नहीं है कुण्डल ?” भयभीत सी घबराहट में मेरे कुण्डलों की तरफ़ देखती और सचेत होकर कहती “मुझसे मत पूछो यह ! अपने पिताजी से पूछो।“

      मैं (कर्ण) उसी समय पिताजी के पास जाकर वही प्रश्न किया तो उन्होंने बड़ा ही विचित्र उत्तर दिया बोले “गंगामाता से पूछ इसका कारण ! कभी दिया तो इस प्रश्न का उत्तर वही तुझको देगी !” विचारमग्न सा चला गंगामाता भला कैसे उत्तर दे देगी ! क्या नदी कभी बोल सकेगी ? ओह, ये बड़े लोग कैसा व्यवहार करते हैं। छोटों से इस तरह की बातें क्यों करते हैं।

     उसी सायं सबकी दृष्टि से बचकर मैं अकेला ही गंगामाता के तट पर जाकर बैठ गया। उसकी लहर-लहर से मैंने प्रश्न पूछा, परन्तु एक भी लहर मेरे इस प्रश्न का उत्तर न दे सकी। उस दिन मुझको संसार के सभी बड़े लोग कपटी लगे। छोटों को अज्ञान के अन्धकार में रखने का काम वे ही करते हैं, नहीं तो फ़िर इतनी बड़ी गंगामाता चुप क्यों रही ?

      फ़िर वही प्रश्न अगले दिन खेलते समय मैंने शोण से किया, उसके उत्तर को सुनकर मेरे आश्चर्य का ठिकाना न रहा। वह बोला “मैं भी यह बात नहीं जानता हूँ । लेकिन इतना अवश्य है कि तुम्हारे कुण्डल मुझको बहुत ही अच्छे लगते हैं। रात को जब तुम सो जाते हो, ये तारों की तरह अविरत जगमगाते रहते हैं। उनका नीला-सा प्रकाश तुम्हारे लाल गालों पर बिखरा रहता है।“

     मेरे मन में एकदम अनेक प्रश्न उमड़ आये। जो अन्य किसी के पास नहीं थे, ऐसे दो मांसल कुण्डल मेरे कानों में थे। इतना ही नहीं वे चमकते भी थे। मुझको यों ही क्यों मिले ? कौन हूँ मैं ? शोण के दोनों कन्धों को झकझोरते हुए मैंने तड़पकर उससे पूछा, “शोण मैं कौन हूँ ?”

Thursday, October 22, 2009

यूनिसेफ़ के पदक विजेता कुछ विज्ञापन – अच्छे संदेश चित्रों से…

 

चित्र को बड़ा देखने के लिये फ़ोटो के ऊपर चटका लगाईये।image001

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सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – ४

    लौटते समय सन्ध्या हो जाने के कारण श्येन, कोकिल, कपोत, भारद्वाज, पत्ररथ, क्रौंच आदि अनेक पक्षियों के झुण्ड चित्र-विचित्र आवाजें करते हुए, धूम मचाते नीड़ों की ओर लौटते हुए हमको दिखाई देते। उस समय सूर्यदेव पश्चिम की ओर स्थित दो अत्युच्च पर्वतों के पीछे प्रवेश कर रहे होते थे। दिन भर अविरत दौड़ने के बाद भी उनके रथ के घोड़े जरा भी थके हुए नहीं होते थे। वे दो पर्वत मुझको उनके प्रासाद के विशाल द्वार पर खड़े हुए दो द्वारपाल से लगते थे। क्षण-भर में ही वह तेजपुंज हमारी दृष्टि की ओट में हो जायेगा, इस कल्पना से ही वियोग की एक प्रचण्ड लहर अकारण ही मेरी नस-नस में फ़ैल जाती । मैं एकटक उस बिम्ब की ओर देखता रहता। शोण मुझको जोर से झकझोरकर आकाश में शोर मचाता हुआ गरुड़ पक्षियों का झुण्ड दिखाता। अन्य समस्त पक्षियों की अपेक्षा ये बहुत अधिक ऊँचाई पर उड़ते हुए जाते थे। शोण पूछता, “भैया, ये कौन से पक्षी हैं रे ?”

“गरुड़ ! सभी पक्षियों का राजा !”

“भैया, तू जायेगा क्या रे इन गरुड़ों की तरह …. खूब-खूब ऊँचा ?” वह अनर्गल प्रश्न पूछता ।

“पगले ! मैं क्या पक्षी हूँ जो ऊँचा जाऊँगा ?”

“अच्छा भाई, मैं जाऊँगा गरुड़ की तरह खूब ऊँचा। इतना ऊँचा कि तू कभी देख नहीं पायेगा। बस, अब ठीक है न ?”

    पश्चिमीय क्षितिज की ओर देखने लगता और अन्त में मैं ही उससे एक प्रश्न पूछता, “शोण, वह सूर्य-बिम्ब देख रहे हो ? उस बिम्ब की ओर देखने पर क्या अनुभव कर रहे हो तुम ?”

     मुझे लगता कि वह सूर्य बिम्ब की ओर देखकर जैसा मुझे लगता है उसी तरह की कोई बात अपने शब्दों में कहेगा। लेकिन सूर्य बिम्ब की ओर देखकर उसकी नन्ही आँखें उसके तेज से मिंच जातीं और फ़िर थोड़ी देर बाद आँखें मीड़ता हुआ मेरे कानों की ओर देखकर वह जल्दी कहता, “तेरे चेहरे जैसा लगता है वह, वसु भैया !”

मैं अपने कानों से हाथ लगाता। दो मांसल कुण्डल हाथ में आ जाते। कहते हैं कि ये मेरे जन्म से ही हैं !

     शोण की शिकायत शुरु हो जाती , “तुझपर ही माँ का प्यार अधिक है, भैया ! देख ले, इसीलिए उसने तुझको ही ये कुण्डल दिये हैं ! मेरे पास कहाँ है कुण्डल ?”

     आवेश में मैं हाथ में लगे प्रतोद का प्रहार घोड़ों की पीठ पर करने लगता। अपने खुर उछालकर रास्ते पर धूल उड़ाते हुए वे हिनहिनाते हुए वायुवेग से दौड़ने लगते । पास बैठा हुआ, शोण, दौड़ते हुए घोड़े, पीछे छूटते जाते अशोक, ताल, किंशुक, मधूक, पाटल, तमाल, कदम्ब, शाल, सप्तपर्ण आदि के ऊँचे घने पत्तोंवाले वृक्ष – इनमें से किसी का भी मुझको भान नहीं रहता। केवल सामने का पीछे भागता हुआ मार्ग और उसके मोड़ – बस यही दिखाई देते। मेरे मन में एक विचार कौंध जाता ---- “ पीछे छूटते हुए इस रास्ते के साथ साथ मैं प्रकाश के साम्राज्य से किसी अन्धकारमय भयानक समुद्र की ओर खिंचा चला जा रहा हूँ ।“

Wednesday, October 21, 2009

पाँच मीटर दूरी से इस फ़ोटो को देखिये, पास से कुछ और ओर दूर से कुछ और

इस फ़ोटो को ध्यान से देखिये पास से यह अलबर्ट आइन्सटीन दिखाई देंगे परंतु अगर ५ मीटर दूरी से देखेंगे तो यह मार्लिन मुनरो दिखाई देगी।

अब कुर्सी से उठने का कष्ट तो करना ही पड़ेगा। एक बार देखिये तो सही -

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सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – ३

        मेरे पिता कौरवराज धृतराष्ट्र के रथ के राजसारथी थे। वे अधिकतर कौरवों की राजधानी हस्तिनापुर में रहा करते थे। वह नगर तो बहुत दूर था। कभी कभी वे वहाँ से एक बड़ा रथ लेकर चम्पानगरी में आते थे। उस समय मेरे और शोण के उत्साह का रुप कुछ और ही होता था। जैसे ही पर्णकुटी के द्वार पर रथ खड़ा होता था, शोण उसमें कूद पड़ता और घोड़ों की वल्गाएँ पिताजी के हाथों से हठात़् अपने हाथों में लेकर जोर से मुझको पुकारता, “वसु भैया, अरे जल्दी आ । चलो, हम गंगा के किनारे से सीप ले आयें।“ उसकी पुकार सुनकर मैं अपूप खाना वैस ही छोड़कर पर्णकुटी से बाहर आता।

         फ़िर हम दोनों मिलकर पिताजी के रथ में बैठकर वायुवेग से नगर के बाहर गंगा के किनारे की ओर जाते। हलके पीले रंग के वे पाँच घोड़े अपने पुष्ट पूँछों के बालों को फ़ुलाकर, कान खड़े कर स्वच्छन्द उछलते जाते। जब वह वल्गाओं से घोड़ो को नियन्त्रित करने की कोशिश करता तो उसे देखते ही बनता और मुझे बुलाता, तो मुझको उससे विलक्षण प्रेम होने लगता। वल्गाएँ मैं अपने हाथ में ले लेता और वह प्रतोद का दण्ड उलटा कर घोड़ों के अयाल तितर बितर कर देता। ’हा ऽऽ हा ऽऽ’ कहकर उनको दौड़ाने के लिये प्रतोद के डण्डे से जब वह मारता तब घोड़े चेतकर पहले की अपेक्षा और अधिक तेज दौड़ने लगते। फ़िर हम दोनों लगभग आधा योजन की दूरी पार कर गंगामाता के किनारे रुकते। लेकिन मेरे हाथ पैर सुन्न हो जाते, अकारण ही मुझे लगता कि अवश्य ही इस पानी से मेरा कुछ संबंध है, उसी क्षण दूसरा विचार आता । छि:, भला पानी से मनुष्य का क्या नाता हो सकता है ? वह तो प्यास से व्याकुल प्राणी को तृप्ती प्रदान करने वाला एक साधन मात्र है वह ! अपनी छोटी-छोटी आँखों से मैं उस पात्र को गटागट पी लेता। उस समय मेरी इच्छा होती कि यदि मेरे सम्पूर्ण शरीर में आँखें होतीं, तो कितना अच्छा होता !

       शोण के बालप्रश्नों की बौछारें होने लगती – “भैया, ये सीपियाँ क्या पानी से ही बनती हैं रे ?”

“हाँ”

“फ़िर तो इनपर ये सारे रंग पानी ने ही किये होंगे ?”

“हाँ”

“तो फ़िर पानी में ये रंग क्यों नहीं देखाई पड़ते ?”

        और मैं उसके प्रश्नों का उत्तर देना कभी कभी टाल देता था। क्योंकि मैं जानता था कि एक प्रश्न के बाद दूसरा प्रश्न उसके पास अवश्य तैयार होगा। और सच पूछो तो कभी-कभी उसके प्रश्न का उत्तर मुझे भी ज्ञात नहीं होता था। उसके प्रश्नों को दूर करने का प्रयत्न करने के लिये मैं कहता “चल, हम लोगों को बहुत देर हो गयी है।“

Tuesday, October 20, 2009

भारतीय आसानी से क्यों पहचाने जाते हैं (WHY ARE INDIANS EASY TO IDENTIFY) एक पोस्ट आंग्लभाषा में

डिसक्लेमर – कृप्या कोई भी पाठक कही हुई बात का बुरा न माने, पोस्ट को किसी के ऊपर भी हमला न माना जाये केवल मनोरंजन मात्र माना जाय।

एक ईमेल आयी है WHY ARE INDIANS EASY TO IDENTIFY देखिये कुछ तथ्य, कुछ मुझे बुरे लगे पर फ़िर भी कहीं न कहीं इनमें से बहुत सारी चीजें अपने में पायीं, आप भी देखिये और बताईये कि आपमें कितने गुण हैं -

WHY ARE INDIANS EASY TO IDENTIFY
We are like this only so true, so very true..........


1. Everything you eat is savored in garlic, onion and tomatoes.

2.. You try and reuse gift wrappers, gift boxes, and of course aluminum foil.

3. You are always standing next to the two largest size suitcases at the Airport.

4. You arrive one or two hours late to a party - and think it's normal.

5. You peel the stamps off letters that the Postal Service missed to stamp.

6. You recycle Wedding Gifts, Birthday Gifts and Anniversary Gifts.

7. You name your children in rhythms (example, Sita & Gita, Ram & Shyam, Kamini & Shamini..)

8. All your children have pet names, which sound nowhere, close to their real names.

9. You take Indian snacks anywhere it says 'No Food Allowed.'


10. You talk for an hour at the front door when leaving someone's house.

11. You load up the family car with as many people as possible.

12. HIGH PRIORITY ***** You use plastic to cover anything new in your house
whether it's the remote control, VCR, carpet or new couch. *****

13. Your parents tell you not to care what your friends think, but they won't let you do certain things because of what the other 'Uncles and Aunties' will think.

14. You buy and display crockery, which is never used, as it is for special occasions, which never happen.

15. You have a vinyl tablecloth on your kitchen table.

16.. You use grocery bags to hold garbage.

17. You keep leftover food in your fridge in as many numbers of bowls as possible.

18. Your kitchen shelf is full of jars, varieties of bowls and plastic utensils (got free with purchase of other stuff)

19. You carry a stash of your own food whenever you travel (and travel means any car ride longer than 15 minutes).

20. You own a rice cooker or a pressure cooker.

21. You fight over who pays the dinner bill.

22. You live with your parents and you are 40 years old. (And they prefer it that way).

23. You don't use measuring cups when cooking.

24. You never learnt how to stand in a queue.

25. You can only travel if there are 5 persons at least to see you off or receive you whether you are traveling by bus, train or plane.

26. If she is NOT your daughter, you always take interest in knowing whose daughter has run with whose son and feel proud to spread it at the velocity of more than the speed of light.

27. You only make long distance calls after

11p.m.

28. If you don't live at home, when your parents call, they ask if you've eaten, even if it'smidnight.

29. You call an older person you never met before Uncle or Aunty.

30. When your parents meet strangers and talk for a few minutes, you discover you're talking to a distant cousin.

31. Your parents don't realize phone connections to foreign countries have improved in the last two decades, and still scream at the top of their lungs when making foreign calls.

32. You have bed sheets on your sofas so as to keep them
from getting dirty.

33. Its embarrassing if you're wedding has less than 600 people.

34. All your Tupperware is stained with food color.

35. You have drinking glasses made of steel.

36. You have mastered the art of bargaining in shopping.

37. You have really enjoyed reading this post - forward it
to as many Indians as possible.

I STILL LOVE TO BE AN INDIAN

सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – २

         चम्पानगर। मैं कर्ण और मेरा छोटा भाई श्रोण – हमारा वह छोटा सा संसार ! शोण ! हाँ शोण ही ! उसका मूल नाम था शत्रुन्तप। लेकिन सब उसे शोण ही कहते थे। शोण मेरा छोटा भाई था। यों तो वृकरथ नामक मेरा एक और भी भाई था, लेकिन वह बचपन में ही विकटों के राज्य में अपनी मौसी के पास चला गया था। शोण और मैं – हम दो ही रह गये थे। मेरे बचपन का संसार मेरे और उसकी स्मृतियों से ही भरा हुआ था। चम्पानगरी की विशुद्ध हवा में पलनेवाले दो भोले-भाले प्राणों का अद्भुत कल्पनाओं से भरा हुआ छोटा सा संसार था वह। वहाँ झूठी प्रतिष्ठा के बनावटी दिखावे नहीं थे या अपने स्वार्थ के लिये एक-दूसरे को फ़ूटी आँख से भी न देख सकनेवाली असूया नहीं थी। वह केवल दो भाईयों का नि:स्वार्थ विश्व था और उस विश्व के केवल दो ही द्वारपाल थे। एक हमारी माता --- राधा और दूसरे हमारे पिता ---- अधिरथ। आज भी उन दोनों की स्मृतियाँ मेरे हृदय के एक अत्यन्त कोमल तार को झंकृत कर देती हैं और अनजाने ही कृतज्ञता से कुछ बोझिल से तथा ममता से कुछ रससिक्त से दो अश्रुबिन्दु तत्क्षण मेरी आँखों में छलक आते हैं। लेकिन क्षणभर के लिये ही ! तुरन्त ही मैं उनको पोंछ लेता हूँ । क्योंकि मैं जानता हूँ कि आँसू दुर्बल मन का प्रतीक है। संसार के किसी भी दुख की आग अश्रु के जल से कभी बुझा नहीं करती। लेकिन फ़िर भी, जबतक आँसू की ये दो बूँदें छलक नहीं पड़तीं, तबतक मुझको यह प्रतीत ही नहीं होता कि मेरा मन हल्का हो गया है ! क्योंकि आँसू की इन दो बूँदों के अतिरिक्त, अपने जीवन में मैं उनको ऐसा कुछ भी दे नहीं सका, जो बहुत अधिक मूल्यवान हो ! और इनकी अपेक्षा अधिक मूल्यवान कोई अन्य वस्तु है, जो माता-पिता के प्रति प्रेम के प्रतीकस्वरुप दी जा सकती है – ऐसा मैं समझता भी नहीं। मेरे माता-पिता ने कभी किसी प्रकार की आशा मुझसे नहीं की थी। उन्होंने मुझको जो कुछ दिया था, वह निरा प्रेम ही था।

          मेरी माँ तो ममता का विशाल समुद्र ही थी। मुझको बचपन में सभी नगरजन वसुसेन कहते थे। मेरा छोटा भाई शोण, मुझको सदैव ’वसुभैया’ कहते था। माँ तो मुझको दिन में सैकड़ों बार ’वसु-वसु’ कहकर बुलाती थी। उसने मुझको केवल अपना दूध ही नहीं पिलाया था, बल्कि उसके विशुद्ध प्रेम का अमृत भी मैं अब तक जी भरकर पीता आया था। सबको समान भाव से प्रेम करने के लिये ही मानो उसका जन्म हुआ था। सारा चम्पानगर उसको ’राधामाता’ कहता था। मेरे कानों में दो जन्मजात कुण्डल थे। उनकी चर्चा वह नगर के लोगों से प्राय: करती ही रहती थी। मैं क्षण भर के लिए भी आँखों से ओझल हो जाता था, वह घबरा जाती थी। बार बार मेरे सिर पर हाथ फ़िराकर वह प्रेम से मुझसे कहती, “वसु! गंगा की ओर भूलकर भी मत जाना, अच्छा ऽ !”

“क्यों नहीं जाऊँ ?” मैं पूछता ।

“देखो, बड़े लोगों का कहना मानते हैं। जब जाने को मना किया जाये, तो नहीं जाना चाहिए !”

“तू सचमुच बहुत डरपोक है, माँ ! अरी, चले जायेंगे तो क्या हो जायेगा ?”

“नहीं रे वसु !” मुझको एकदम पास खींचकर मेरे बालों में अपनी लम्बी ऊँगलियाँ फ़िराती हुई वह मुझसे पूछती, “वसु, मैं तुझको अच्छी लगती हूँ या नहीं ?”

“आँ हाँ !” कहकर मैं सिर हिलाता। मेरे कानों में लय के साथ हिलनेवाले कुण्डलों की ओर विस्मय से देखती हुई वह कहती, “तो फ़िर मेरा आदेश समझकर कभी गंगा की ओर मत जाना।“ वह मुझको कसकर जकड़ती हुई कहती और एक अजाना भय उसकी आँखों में होता।

उसका मन रखने के लिये मैं कहता, “तू कहती है तो नहीं जाऊँगा। बस अब तो ठीक ?”

और उसका वात्सल्य उमड़ पड़ता मुझे अलिंगन में कसकर मेरे सिर और कानों को पटापट चूमती। उस समय मेरी इच्छा होती कि मैं इसी तरह गोद में समा जाऊँ।

Monday, October 19, 2009

सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ अंश – १

        आज मैं कुछ कहना चाहता हूँ ! मेरी बात को सुनकर कुछ लोग चौकेंगे ! कहेंगे, जो काल के मुख में जा चुके, वे कैसे बोलने लगे ? लेकिन एक समय ऐसा भी आता है, जब ऐसे लोगों को भी बोलना पड़ता है ! जब जब हाड़-मांस के जीवित पुतले मृतकों की तरह आचरण करने लगते हैं, तब-तब मृतकों को जीवित होकर बोलना ही पड़ता है ! आह, आज मैं औरों के लिये कुछ कहने नहीं जा रहा हूँ, क्योंकि मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि इस तरह की बात करने वाला मैं कोई बहुत बड़ा दार्शनिक नहीं हूँ ! संसार मेरे सामने एक युद्ध-क्षेत्र में बाणों का केवल एक तरकश ! अनेक प्रकार की, अनेक आकारों की विविध घटानाओं के बाण जिसमें ठसाठस भरे हुए हैं – बस ऐसा ही केवल एक तरकश !!

        आज अपने जीवन के उस तरकश को मैं सबके सामने अच्छी तरह खोलकर दिखा देना चाहता हूँ ! उसमें रखे हुए विविध घटनाओं के बाणों को – बिल्कुल एक-सी सभी घटानाओं के बाणों को – मैं मुक्त मन से अपने ही हाथों से सबको दिखा देना चाहता हूँ। अपने दिव्य फ़लकों से चमचमाते हुए, अपने पुरुष और आकर्षक आकार के कारण तत्क्षण मन को मोह लेने वाले, साथ ही टूटे हुए पुच्छ के कारण दयनीय दिखाई देने वाले तथा जहाँ-तहाँ टूटे हुए फ़लकों के कारण अटपटे और अजीब से प्रतीत होने वाले इन सभी बाणों को – और वे भी जैसे हैं वैसा ही – मैं आज सबको दिखाना चाहता हूँ !

        विश्व की श्रेष्ठ वीरता की तुला पर मैं उनकी अच्छी तरह परख कराना चाहता हूँ। धरणीतल के समस्त मातृत्व के द्वारा आज मैं उनका वास्तविक मूल्य निश्चित कराना चाहता हूँ। पृथ्वीतल के एक-एक की गुरुता द्वारा मैं उनका वास्तविक मूल्य निश्चित करना चाहता हूँ। प्राणों की बाजी लगा देनेवाली मित्रता के द्वारा मैं आज उनकी परीक्षा कराना चाहता हूँ। हार्दिक फ़ुहारों से भीग जाने वाले बन्धुत्व के द्वारा मैं उनका वास्तविक मूल्यांकन कराना चाहता हूँ।

        भीतर से – मेरे मन के एकदम गहन-गम्भीर अन्तरतम से एक आवाज बार-बार मुझको सुनाई देने लगी है। दृढ़ निश्चय के साथ जैसे-जैसे मैं मन ही मन उस आवाज को रोकने का प्रयत्न करता हूँ, वैसे-ही-वैसे हवा के तीव्र झोंकों से अग्नि की ज्वाला जैसे बुझने के बजाये पहले की अपेक्षा और अधिक जोर से भड़क उठती है, वैसे ही वह बार-बार गरजकर मुझसे कहती है, “कहो कर्ण ! अपनी जीवन गाथा आज सबको बता दो। वह कथा तुम ऐसी भाषा में कहो कि सब समझ सकें, क्योंकि आज परिस्थिति ही ऐसी है। सारा संसार कह रहा है, ’कर्ण, तेरा जीवन तो चिथड़े के समान था !’ कहो, गरजकर सबसे कहो कि वह चिथड़ा नहीं था, बल्कि वह तो गोटा किनारवाला एक अतलसी राजवस्त्र था। केवल – परिस्थितियों के निर्दय कँटीले बाड़े से उलझने से ही उसके सहस्त्रों चिथड़े हो गये थे। जिस किसी के हाथ में वे पड़े, उसने मनमाने ढंग से उनका प्रचार किया। और फ़िर भी तुमको उस राजवस्त्र पर इतना अभिमान क्यों है ?”

Sunday, October 18, 2009

सूर्यपुत्र महारथी दानवीर कर्ण की अद्भुत जीवन गाथा “मृत्युंजय” शिवाजी सावन्त का कालजयी उपन्यास से कुछ तथ्य

    मृत्युंजय मतलब होता है मृत्यु पर विजय। मैंने अपना स्नातक हिन्दी साहित्य में किया इसलिये हिन्दी साहित्य पढ़ने में बहुत ज्यादा रुचि है। चूँकि साहित्यिक किताबें बाजार में बहुत ही दुर्लभ हैं और उस समय हमारी किताबें खरीदने की इच्छाशक्ति भी नहीं थी। हमारे पिताजी को शुरु से ही साहित्यिक किताबें पढ़ने का शौक था तो हर जिला मुख्यालय में शासकीय वाचनालय एवं पुस्तकालय होता है, बस वो लाते थे और हम भी पढ़ते थे, एक बार पढ़ने का सफ़र शुरु किया तो वो आज तक रुका नहीं है, हिन्दी के लगभग सभी साहित्यकारों को पढ़ा जिनकी किताबें पुस्तकालय में उपलब्ध होती थीं। कुछ किताबें ऐसी होती थीं जिसके लिये रोज चक्कर लगाने पड़ते थे।

    हमें ऐसी दो किताबों के नाम याद हैं पहली थी मृत्युंजय, दूसरी है लोकमान्य तिलक रचित “गीता”। जिसमें हमने मृत्युंजय को पढ़ लिया है और वाकई मृत्युंजय को पढ़़ना जीवन के सर्वोच्च आनंद की अनुभूति लगा। ऐसा लगा कि कुछ चीज जीवन में अपूर्ण थी और कहीं न कहीं मेरे अंदर कमी थी वह पूरी हो गई।

       “मृत्युंजय” में हमने सीखा, देखा कर्ण की सहनशीलता, उदारता, कर्त्तव्यनिष्ठा, निश्चल प्रेम, दान के लिये तत्परता और भी बहुत कुछ जिसका शब्दों में उल्लेख करना मेरे लिये असंभव है। बहुत से ऐसे तथ्य उन पात्रों के बारे में जो महाभारत से जुड़े हुए हैं, सबसे ज्यादा कर्ण और दुर्योधन और पांडवों के बारे में। वाकई इसके लेखक शिवाजी सावन्त की कर्ण के रहस्यों को जानने की इच्छाशक्ति के कारण ही यह सर्व सुलभ है। उनको मेरा प्रणाम है।
    
     मेरी अगली पोस्टों पर मृत्युंजय से मिले तथ्यों को पढ़ेंगे, जिसके बारे में आम दुनिया सर्वथा अनभिज्ञ है और आप लोगों को भी जानकर आश्चर्य होगा। हर जगह केवल कर्ण का जिक्र होता है कर्ण के परिवार से सर्वथा अनभिज्ञ हैं, इसमें कर्ण के परिवार का भी पूर्ण विवरण दिया गया है और बताया गया है कि किसी भी व्यक्ति के सफ़ल और असफ़ल जीवन के पीछे परिवार भी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हालांकि कर्ण को शुरु से ही इस दुविधा में दिखाया गया है कि एक आम आदमी के घर में रहते हुए भी मेरे पास इतना ओज और बल कैसे आया क्या मुझे जन्म देने वाले माँ बाप यहीं हैं, जिनके घर पर मैं रह रहा हूँ। और भी बहुत कुछ।

     शिवाजी सावन्त ने मूलत: इस उपन्यास की रचना मराठी भाषा में किया है और इस कालजयी उपन्यास की रचना कई भाषाओं में हो चुकी है, हिन्दी अनुवाद ओम शिवराज ने किया है।

Saturday, October 17, 2009

निवेश के लिये सोने के सिक्के या गहने की जगह गोल्ड ईटीएफ़ खरीदें।

       निवेश के लिये सोने के सिक्के  खरीदने से अच्छा है कि इसका ईटीएफ़ खरीदें जो कि सोने के बाजार भाव में ही मिलता है जैसे कि कोटक गोल्ड, रिलायंस गोल्ड और जब भी निवेश का रिटर्न चाहिये उसे बेच सकते हैं, और यह आपके डीमैट अकाऊँट में रहता है, इससे आपके मेकिंग चार्जेस बचते हैं जो कि १५० रुपये प्रति ग्राम रहते हैं।

       जैसे कि २ ग्राम सोने का सिक्का निवेश के लिये खरीदते हैं तो वह ३५०० रुपये का मिलता है और कोटक गोल्ड खरीदते हैं तो वह ३१५० रुपये का मिलेगा और जो भी ब्रोकरेज होगा जो कि लगभग ५० रुपये होगा। अब जब आपको सोने का रिटर्न चाहिये तो जब आप वह सिक्का बेचेंगे तो लगभग १५० रुपये प्रति ग्राम या इससे ज्यादा भी वापसी के समय ज्वैलर काटा लेगा परंतु अगर कोटक गोल्ड बेचेंगे तो केवल ब्रोकरेज ही देना होगा। फ़िर आप चाहें तो वह धन अपने उपयोग में लें या फ़िर उससे सोना खरीदकर गहने बनवा लें।

      गोल्ड ईटीएफ़ आप हर महीने एक शेयर भी खरीद सकते हैं जो कि सोने के एक ग्राम मूल्य के बराबर होता है। और चाहे तो बाद में बेच दें जब गहने बनवाने लायक सोना आपके पास हो जाये।

“कालिदास और मेघदूतम के बारे में” श्रंखला खत्म, आपके विचार बतायें

                   यह कड़ी कालिदास और मेघदूतम के बारे में की आखिरी कड़ी थी। कृप्या बतायें क्या आगे भी इसी तरह की कुछ और किताबों पर कड़ियां पढ़ना पसंद करेंगे तो मैं उस की तैयारी करता हूँ। अभी पढ़ी गई किताबों में है त्रिविक्रमभट्ट रचित “नलचम्पू” और शिवाजी सामंत की “मृत्युंजय”। पढ़ना जारी है - “Rich Dad Poor Dad”, पढ़ने के इंतजार में हैं “The Alchemist”|

दीपों के त्यौहार दीपावली पर आप सब को बहुत बहुत शुभकामनाएँ।

Friday, October 16, 2009

शेयर बाजार का विश्लेषण - पिछली दीपावली से इस दीपावली तक, और इस दीपावली से अगली दीपावली तक.. आगे भविष्य में बाजार जगमग होगा।

      पिछली दीपावली पर शेयर बाजार और इस दीपावली पर शेयर बाजार में बहुत अंतर है, पिछली दीपावली पर निवेशक बाजार में बहुत कुछ गँवा चुके थे और शेयर बाजार अपने लगभग न्यूनतम स्तर पर था। इस बार बाजार में चारों तरफ़ रौनक ही रौनक है, मंदी के दिन छट चुके हैं, बाजार अच्छे तरह के संकेत दे रहा है। सोना चांदी भी अपने उच्चतम स्तर पर हैं।

      ई फ़र्स्ट ग्लोबल के शंकर शर्मा (हम इनके बहुत बड़े पंखे (फ़ैन) हैं) के मुताबिक  पिछले साल रियलिटी सेक्टर ने अच्छा किया जितना कि उम्मीद नहीं थी। FMCG सेक्टर ने भी अच्छा किया है। और इस साल FMCG, ऑटो सेक्टर से बहुत उम्मीद है । बाजार को नई ऊँचाई पर जाने के लिए रिलायंस ग्रुप का झगड़ा निपटना बहुत जरुरी है, रिलायंस इंडस्ट्रीज जल्दी ही अपने नये नवीनतम स्तर पर पहुँचते हुए देख सकते हैं जो कि ३५०० रुपये हो सकता है, तो कुछ शेयरों के लिये उनका कहना है कि बाजार को अपने उच्चतम स्तर पर जाने के लिये उनको भी अपने नये स्तरों को छूना होगा जैसे कि TCS १२०० रुपये, इन्फ़ोसिस ३५०० रुपये, विप्रो ९०० रुपये।

      इस दीपावली से अगली दीपावली तक FMCG,  ऑटो और एयरलाईन्स सेक्टर को बहुत अच्छा बताया है साथ ही हीरो होंडा और बजाज ऑटो को सबसे अच्छा निवेश बताया है।

        टेलीकॉम सेक्टर में हाथ न डालने की सलाह दी गई है, इस सेक्टर की स्थिती को डॉटकाम के बूम जैसा बताया गया है कि टेलीकॉम में वही हालत होने वाली है उससे दूर रहें।

      अगले सालों में २०% का चक्रवर्ती रिटर्न मिलने का भरोसा है। फ़ेयर वैल्यू इंडेक्स १३००० माना है। फ़िर भी बाजार को अच्छा बताया है।

       दलाल स्ट्रीट जनरल मैग्जीन ने पिछले साल दीपावली पर जो पोर्टफ़ोलियो खरीदने के लिये सलाह दी थी इस दीपावली पर लगभग ६७% रिटर्न मिला है। जिसमें मारुति, एल एन्ड टी, इमामी, हनीवैल ऑटो, अरेवा टी एन्ड डी, क्रिसिल, नेस्ले इंडिया, स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया, एचडीएफ़सी, ऐशियन पेन्टस, सन फ़ार्मा थे।

        इस बार दीपावली के पोर्टफ़ोलियो में सीईएससी, एचसीसी, एल एन्ड टी, एम्फ़ेसिस, ओरिंयंट पेपर, रेनबेक्सी, एस आर एफ़, स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया, सिन्डिकेट बैंक, ट्यूलिप टेलिकॉम और कोलगेट पामोलिव में निवेश करने की सलाह दी गई है।

     सभी तरह से भविष्य में बाजार के प्रति अच्छी संभावनाएँ बतायी जा रही हैं, मंदी की स्थिती से बाजार निकल रहा है।

    सोने ने १५% का रिटर्न दिया है आगे उम्मीद इससे भी अच्छी है। चाँदी १७००० से २७००० हो गई है और भविष्य में भी लोग चाँदी अच्छे से काटेंगे।

कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – ४१

परिणतशरच्चन्द्रिकासु – भारतवर्ष में छ: ऋतुओं होती हैं। उसमें शरद का समय अश्विन और कार्तिक मास होता है, जैसा कि स्पष्ट किया गया है कि यक्ष के शाप का अन्त कार्तिक शुक्ल एकादशी को होगा तभी उसका अपनी प्रिया से मिलना सम्भव होगा, तब शरद ऋतु का ढलना स्वाभाविक ही है। क्योंकि कार्तिक की समाप्ति पर शरद़् भी समाप्त हो जाती है इसलिए कवि का कथन कि “ढली हुई शरद़् ऋतु
की चाँदनी वाली रातें” इसमें कोई असंगति नहीं बैठती।


सान्तर्हासम़् – यक्षिणी ने किसी रात सोते समय स्वप्न में यक्ष को किसी अन्य रमणी के साथ रमण करते देखा, तो वह एक दम जाग जाती है और यह देखकर कि उसे वह अपने गले लगाये हुए है तो कुछ लज्जित-सी होती है और अपनी गलती पर मन ही मन हँसी भी आती है।


कितव – जो नायक किसी अन्य में अनुरक्त हो और प्रकृत नायिका में भी बाहरी तौर पर अनुराग दिखलाये और गुप्तरुपेण उसका अप्रिय करे वह शठ कहलाता है। यहाँ यक्षिणी  स्वप्न में यक्ष को किसी अन्य स्त्री के साथ देखकर उसे कितव (शठ) कहकर सम्बोधित करती है।


अभिज्ञानदानात़् – अभीज्ञान कहते हैं पहिचान का चिह्न अथवा निशानी। यक्ष मेघ को अभिज्ञान के रुप में एक ऐसा रहस्य बताता है जो यक्ष और यक्षिणी को ही पता है, उस रहस्य को सुनकर यक्षिणी जान जायेगी कि इस मेघ को यक्ष ने ही भेजा है।


उपचितरसा: प्रेमराशीभवन्ति – वियोग में अभिलाषा के बढ़ जाने पर स्नेह प्रेम के रुप में परिणत हो जाता है। रसरत्नाकार में संयोग की दर्शन, अभिलाषा, राग, स्नेह, प्रेम, रति और श्रृंगार ये सात अवस्थाएँ पृथक पृथक स्पष्ट की हैं -
प्रेक्षा दिदृक्षा रम्येषु तच्चिन्ता त्वभीलाषक:।
रागस्तासड़्गबुद्धि: स्यात्स्नेहस्तत्प्रवणाक्रिया॥
तद्वियोगऽसहं प्रेम, रतिस्तत्सहवर्तनम़्।
श्रृड़्गारस्तत्समं क्रीड़ा संयोग: सप्तधा क्रमात़्॥
अर्थात सुन्दर पदार्थ को देखने की इच्छा को प्रेक्षा, सुन्दर पदार्थ को पाने की चिन्ता को अभिलाष, सुन्दर पदार्थ के साथ संसर्ग की बुद्धि को राग, उसके लिए कार्य करने को स्नेह, उस पदार्थ के साथ होने वाले वियोग को न सहने को प्रेम, अभीष्ट पदार्थ के साथ रहने को रति और उसके साथ क्रीड़ा को श्रृंगार कहते हैं।



कुन्दप्रसवशिथिलम़् – कुन्द पुष्प चमेली के पुष्प को कहते हैं, यह पुष्प शाम को खिलता है और प्रात:काल मुरझा जाता है; अत: महाकवि ने विरह पीड़ित प्राणों को प्रात:कालीन चमेली के पुष्पों के समान कहा है।


ते विद्युता विप्रयोग: मा भूत़् – विद्युत को मेघ की पत्नी बताया गया है। श्लोकार्द्ध में मेघ के प्रति मंगल कामना की गयी है कि वह अपनी प्रिया से क्षण भर के लिए भी वियुक्त न हो। वास्तव में यक्ष ने अपनी प्रिया से वियोग सहा है और वह जानता है कि वियोग कितना कष्टकारक होता है। इस प्रकार मेघदूत मार्मिक मंगल-वाक्य के साथ समाप्त होता है।

Thursday, October 08, 2009

धर्म प्रचार पर हंगामा हो रहा है हमारी ब्लॉग दुनिया में, इसे दूर करें !!!!! विरोध में सात दिन ब्लॉग पर पोस्ट पब्लिश नहीं करुँगा…

             सब जगह बस यही हंगामा हो रहा है क्या हो गया है हमारी ब्लॉग दुनिया को । अरे भई इन सबको नजरअंदाज कर दो और अपने काम पर लगे रहो, जब कोई इन्हें पढ़ेगा ही नहीं तो ये कैसी भी धार्मिक, घटिया, असहिष्णुता या सांप्रदायिक बातें कर लें कोई फ़र्क नहीं पड़ता है। टिप्पणी में मोडरेशन का अधिकार प्रयोग करें, उसके लिये मोडरेशन लागू करने की जरुरत नहीं जहाँ धार्मिक विज्ञापनबाजी देखो वहीं उसका उपयोग कर लें। और जो मानसिक बीमार है उन्हें कितना भी ज्ञान दे दो, बेईज्जती कर दो उन्हें कोई फ़र्क नहीं पड़ता है। केवल इसका एक मात्र इलाज यह है कि इन लोगों के ब्लॉग पर न जायें, टिप्पणी देकर इनका और हौंसला न बढ़ायें। इनके ऊपर पोस्ट न लिखी जाये, और जहाँ भी इनकी टिप्पणी देखें उसकी भर्त्सना करें। जय हिंद

कुछ पोस्ट मैंने देखीं जिससे मन विचलित हो गया।

सलीम खान मै मुस्लिम धर्म अपनाना चाहती हूँ बशर्ते

मेरा ब्लॉग न हुआ कूड़ा घर हो गया हो उन्होंने चेलेंज के साथ १३ बार मेरे ब्लॉग पर गंदगी फैलाई

ये क्या हो रहा है?
हम तुम्हें गाली दें, तुम हमारे मुँह पे थूको
इस्लाम में महात्मा गाँधी जैसा कोई व्यक्तित्व क्यों नहीं होता

मन बहुत दुखी है और दुखते हुए मन से यह पोस्ट ठेल रहा हूँ इसके विरोध में सात दिन ब्लॉग पर पोस्ट पब्लिश नहीं करुँगा।

कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – ४०

दीर्घयामा – यद्यपि यक्ष ने मेघ को सन्देश ग्रीष्म ऋतु के आषाढ़ मास में दिया है जबकि रात्रियाँ छोटी होती हैं, किन्तु विरहावस्था में जागरण व चिन्ता के कारण रात्रियाँ लम्बी प्रतीत होती हैं। इसलिए यक्ष की यह इच्छा कि रात्रि किसी तरह छोटी हो जाये, स्वाभाविक थी।


त्रियामा – रात्रि के तीन प्रहर माने हैं। एक प्रहर तीन घंटे का होता है। दिन और रात में आठ प्रहर माने जाते हैं। इस कारण दिन और रात्रि दोनों में चार

Wednesday, October 07, 2009

कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – ३९

धातुरागै: शिलायाम़् – अपनी प्रिया का चित्र बनाने के लिये विरही यक्ष के पास कोई सामग्री जैसे कागज, पैंसिल, रंग आदि नहीं थी। इसलिये वहाँ सुलभ गेरु को रंग के स्थान पर तथा पत्थर को कागज के स्थान पर प्रयुक्त करके अपनी प्रिया का चित्र बनाया।


दृष्टिरालुप्यते – यक्ष विरह की अग्नि में अत्याधिक पीड़ित है, इसलिये वह अपनी प्रिया का चित्र बनाता है और अपने आप को भी उसके पैरों में गिरकर उसे मनाता हुआ चित्रित करना चाहता है, किन्तु आँसुओं की अविरल धारा के कारण वह ऐसा नहीं कर पाता, आँसुओं से उसकी दृष्टि लुप्त

Tuesday, October 06, 2009

कुत्ता, शेर और बन्दर (कुत्ते का प्रबंधन Management)

एक दिन एक कुत्ता जंगल में रास्ता खो गया। तभी उसने देखा एक शेर उसकी तरह आ रहा है। कुत्ते की साँस रुक गय़ी। “आज तो काम तमाम मेरा!” उसने सोचा, फ़िर उसने सामने कुछ सूखी हड्डियाँ पड़ी देखीं, और आते हुए शेर की तरफ़ पीठ करके बैठ गया और एक सूखी हड्डी को चूसने लगा और जोर जोर से बोलने लगा “वाह ! शेर को खाने का मजा ही कुछ और है, एक और मिल जाये तो पूरी दावत हो जायेगी !”।

और उसने जोर से डकार मारी, इस बार शेर सोच में पड़ गया उसने सोचा “ये कुत्ता तो शेर का शिकार करता है! जान बचा कर भागो !”

और शेर वहाँ से जान बचा के भागा।

पेड़ पर बैठा एक बन्दर यह सब तमाशा देख रहा था, उसने सोचा यह मौका अच्छा है शेर को सारी कहानी बता देता  हूँ – शेर से दोस्ती हो जायेगी और उससे जिन्दगी भर के लिये जान का खतरा दूर हो जायेगा.. वो फ़टाफ़ट शेर के पीछे भागा।

कुत्ते ने बन्दर को जाते हुए देख लिया और समझ गया कि कोई लोचा है।उधर बन्दर ने शेर को सब बता दिया कि कैसे कुत्ते ने उसे बेवकूफ़ बनाया है। शेर जोर से दहाड़ा, “चल मेरे साथ अभी उसकी लीला खत्म करता हूँ” और बन्दर को अपनी पीठ पर बैठा कर शेर कुत्ते की तरफ़ लपका।

क्या आप सोच सकते हैं कि कुत्ते ने क्या आपदा प्रबंधन किया होगा!!!



कुत्ते ने शेर को आते देखा तो एक बार फ़िर उसकी तरफ़ पीठ करके बैठ गया और जोर जोर से बोलने लगा, “इस बन्दर को भेज के एक घंटा हो गया, साला एक शेर फ़ाँस के नहीं ला सका !”।


नैतिक शिक्षा -
ऐसे बहुत सारे बन्दर हमारे आसपास मौजूद हैं उन्हें पहचानने की कोशिश कीजिये।

कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – ३८

पवनतनयम़् – हनुमान के पिता का नाम पवन तथा माता का नाम अञ्जना था; इसलिए हनुमान को पवनपुत्र, वायुपुत्र, मारुति, आञ्जनेय भी कहते हैं। उन्होंने सौ योजन समुद्र को लाँघकर सीता का पता  लगाकर उन्हें राम की अँगूठी दी। जैसा व्यवहार हनुमान को देखकर सीता जी ने किया वैसा ही तुम्हें देखकर मेरी पत्नी करेगी। सीता और हनुमान को उपमान के रुप में प्रस्तुत करने से यक्ष-पत्नी का पातिव्रत्य और मेघ के दूत के गुण अभिव्यक्त होते हैं।


आयुष्मान – यक्ष ने मेघ को छोटा भाई माना है; इसलिये मेघ को आयुष्मान संबोधित करता है। छोटों के लिये आयुष्मान का प्रयोग दीर्घजीवी

Monday, October 05, 2009

नई पीढ़ी की भारतीय पुत्रवधु (आज की प्रगतिशील भारतीय महिला)

यह तो कटु सत्य है कि जब घर में लड़के की शादी होती है और नई बहू आती है, सब कुछ बदल जाता है।

नई बहू (आज की प्रगतिशील भारतीय महिला), का पति के घर में परंपरागत भारतीय तरीके से स्वागत किया जाता है।

जैसी कि उम्मीद थी, नई बहू ने भाषण दिया, "मेरे प्रिय परिवार, मैं आप सब का धन्यवाद देती हूँ कि मेरे नये घर और नये परिवार में आपने मेरा स्वागत किया, अब मेरे यहाँ आ जाने से आप यह मत समझियेगा कि मैं आपके जिन्दगी जीने के तरीके को, या आपकी दिनचर्या बदलूँगी।

"नहीं मैं ऐसा कभी नही करुँगी, लाखों सालों में भी नहीं"।

"बेटी इसका क्या मतलब है ?" ससुर जी ने पूछा ।

ससुर जी की और देखते हुए बोली "मेरा मतलब है कि...

जो भी अभी तक बर्तन धोता था वो उन्हे धोता रहे।


जो भी कपड़े धोता था वो ही धोता रहे।


जो भी खना पकाता था कृपया मेरे लिये रुके नहीं, और जो भी सफ़ाई करते है वे अपना काम करते रहें।

"तो बहुरानी फ़िर तुम यहाँ क्या करोगी ?" सास ने पूछा ।

“जहा तक मेरी बात है, मैं यहाँ आपके बेटे का मनोरंजन करने आयी हूँ !!!"

कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – ३७

याममात्रम़् – एक याम (प्रहर) तीन घण्टे के बराबर होता है। यक्ष ने यहाँ मेघ को एक याम तक प्रतीक्षा करने को कहा है; क्योंकि लक्षणों से यक्षिणी “पद्मिनी” मानी गयी है और पद्मिनी के सोने का समय एक या

Sunday, October 04, 2009

कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – ३६

संन्यस्ताभरणम़् – विरहिणी स्त्रियों के लिए आभूषण पहनना निषिद्ध था; अत: यक्षिणी ने भी आभूषणों का त्याग कर दिया था।


पेशलम़् – इसमें पेलवं तथा कोमल यह पाठान्तर भी मिलते हैं। तीनों का ही अर्थ कोमल है। यक्ष मेघ से कहता है कि उसकी पत्नी अत्यधिक कोमल है, विरह की ज्वाला उसे जला

Saturday, October 03, 2009

सेन्सेक्स चार्ट पर आधारित प्रवेश शर्मा जी का एक बेहतरीन ब्लॉग

              एक दिन में किसी ब्लॉग के सहारे या गूगल की खोज के सहारे इस ब्लॉग पर पहुँचा और मुझे बहुत अच्छा लगा। प्रवेश जी का विश्लेषण चार्ट पर आधारित है और मैं उनके ब्लॉग को बहुत समय से देख रहा हूँ, उनके इस विश्लेषण का आप भी लाभ उठा सकते हैं।

चटका लगाईये ।

http://sensexcharts.blogspot.com

सभी ब्लॉगर्स बंधुओं से अनुरोध….

सभी ब्लॉगर्स बंधुओं से अनुरोध है कि “यथार्थ” को वोट दें, आपके सहयोग से वह सारेगामापा लिटिल चैम्प जीत सकता है।

आप एक लोगिन से दो बार अपने वोट ऑनलाईन दे सकते हैं,  आप भी देखिये इस जूनियर मास्टर को और सहयोग करें जीतने में। टेलेन्ट तो उसमें बहुत है परंतु वोटिंग का भी उतना ही महत्व है। ज्यादा से ज्यादा वोटिंग करने की अपील करता हूँ।


यहाँ से अपना यूजर आईडी रजिस्टर करें और वोट करें “यथार्थ” के लिये। वोटिंग शुरु हो चुकी है और आप सोमवार याने कि ५ अक्टूबर सुबह १० बजे तक वोट दे सकते हैं।


सभी ब्लॉगर बंधुओं से सहयोग अपेक्षित है।

आपके एक वोट से वह नन्ही प्रतिभा जीत सकती है बस आप सबका आशीर्वाद चाहिये। आपके आशीर्वाद के इंतजार में लगे हैं।

कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – ३५

प्राचीमूले तनुमिव कलामात्रशेषां हिमांशो: – इस पर महिमसिंह गणी का कथन है कि - “कृष्णपक्षे चतुर्दश्यां रात्रौ शेषकलामात्रस्य चन्द्रस्य दिड़्मुखे संभव:।” अर्थात कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को चन्द्रमा पूर्व क्षितिज में एक ही कला के रुप में रह जाता है। यहाँ यक्ष-पत्नी की सेज की पूर्व दिशा के क्षितिज

व्यापार करने का भारतीय तरीका (The Indian way of doing Business)

व्हाईट हाऊस की फ़ेन्स वायर को जोड़ने के ठेके के लिये तीन ठेकेदार आये, जिसमें एक जापान से, दूसरा भारत से और तीसरा चीन से था।

तीनों व्हाईट हाऊस की टूटी हुई फ़ेन्स वायर को देखने गये।

whitehouse

जापानी ठेकेदार ने अपना नाप लेने वाले फ़ीता निकाला और उससे कुछ नाप लेने लगा, उसके बाद पेन्सिल लेकर कुछ गणित करने लगा। फ़िर बोला “ठीक है” मैं इस काम को $900 में कर दूँगा। ($400 लगने वाले सामान के, $400 कारीगरों के, $100 मेरा लाभ)

फ़िर चीन के ठेकेदार ने भी उसी तरह से सब नापजोख किया और बोला कि मैं यह काम $700 में कर दूँगा। ($300 लगने वाले सामान के, $300 कारीगरों के, $100 मेरा लाभ)

भारतीय ठेकेदार ने बिना नापजोख किये फ़िर व्हाईट हाऊस के अधिकारी की तरफ़ देखकर बोला “$2700”।

उस अधिकारी को बहुत आश़्चर्य हुआ और बोला कि तुमने इन लोगों की तरह कुछ नापा भी नहीं और कुछ गणित भी नहीं किया फ़िर तुमने ये हिसाब कैसे किया ?

भारतीय ठेकेदार ने चहककर बोला “$1000 मेरे, $1000 आपके, और इस चीन वाले को हम लोग फ़ेन्स वायर जोड़ने के लिये दे देंगे।”

सरकारी अधिकारी का जबाब था “ठीक है, ये ठेका आपका”।

Friday, October 02, 2009

कृपया सभी ब्लॉगर बंधु ऑनलाईन वोट करें “यथार्थ” जी लिटिल चेम्प प्रतियोगी के लिये

बनारस से यथार्थ रस्तोगी जी लिटिल चेम्प में भाग ले रहा है और जो लोग इस प्रोग्राम को देखते होंगे वे तो उसके हुनर से परिचित होंगे ही। इतनी सी उम्र में उसके गले का कमाल, उसकी सुरीली आवाज। आज और कल रात “जी लिटिल चेम्प” पर इसका प्रसारण है रात को ९.३० बजे। आप एक लोगिन से दो बार अपने वोट ऑनलाईन दे सकते हैं,  आप भी देखिये इस जूनियर मास्टर को और सहयोग करें जीतने में। टेलेन्ट तो उसमें बहुत है परंतु वोटिंग का भी उतना ही महत्व है। ज्यादा से ज्यादा वोटिंग करने की अपील करता हूँ।


यहाँ से अपना यूजर आईडी रजिस्टर करें और वोट करें “यथार्थ” के लिये। वोटिंग शुरु होगी आज रात याने २ अक्टूबर, १० बजे से सोमवार याने कि ५ अक्टूबर सुबह १० बजे तक।




सभी ब्लॉगर बंधुओं से सहयोग अपेक्षित है।

रस्तोगी समाज का होने के नाते मैं “यथार्थ” को वोटिंग करने के लिये सबसे जोरदार अपील करता हूँ। आपके एक वोट से वह नन्ही प्रतिभा जीत सकती है बस आप सबका आशीर्वाद चाहिये। आपके आशीर्वाद के इंतजार में लगे हैं।


कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – ३४

ह्रदयनिहितारम्भम़् – यक्षिणी अकेले में बैठकर प्रिय के काल्पनिक सहवास से मन बहलाती थी। आचार्य मल्लिनाथ ने यहाँ आरम्भ का अर्थ कार्य किया है, जिसका अर्थ है कि यक्षिणी पति के साथ चुम्बन, अलि़ड़्गन आदि कार्य वाले रति सुख का आन्नद

गरीब परिवार पर एक निबंध (An Essay on Gareeb Parivar)

आज एक ईमेल मिला गरीब परिवार पर निबंध -

garibparivar

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Thursday, October 01, 2009

स्वाइन फ़्लू पर एक मस्त कार्टून

आज ही ईमेल से स्वाइन फ़्लू पर एक मस्त कार्टून प्राप्त हुआ है आप भी देखिये -

swineflu

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कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – ३३

भावगम्यम़् – यक्षिणी पत्नी-विरह से युक्त अपने पति की कृशता देख तो नहीं सकती थी, परन्तु अनुमान के द्वारा ही चित्र खींचा करती थी। संस्कृत साहित्य में विरह से पीड़ित के लिए विनोद के चार साधन वर्णित किये गये हैं – १. सदृश वस्तु का अनुभव, २. चित्रकर्म ३. स्वप्न

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