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Monday, August 31, 2009

कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बार में – 3 (महाकवि कालिदास की सात रचनाएँ भाग १)

कालिदास ने कितने ग्रन्थों की रचना की, यह भी एक विवादित प्रश़्न है। इस विवाद का कारण है संस्कृत साहित्याकाश में एक से अधिक कालिदासों का होना। राजशेखर (१० भीं शताब्दी ई.) तक कम से कम तीन

Sunday, August 30, 2009

कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बार में – २

          महाकवि कालिदास के बारे में और भी किवदंतियां प्रचलित हैं-
          एक किंवदन्ती के अनुसार इनकी मृत्यु वेश्या के हाथों हुई। कहते हैं कि जिस विद्योत्तमा के तिरस्कार के कारण ये महामूर्ख से इतने बड़े विद्वान बने, उसकी ये माता और गुरु के समान पूजा करने लगे। ये देखकर उसे बहुत दु:ख हुआ और उसने शाप

Saturday, August 29, 2009

कुछ बातें कवि कालिदास और मेघदूतम़ के बारे में – १

मैंने महाकवि कालिदास का खण्डकाव्य ’मेघदूतम’ पढ़ा, और बहुत सारी ऐसी जानकारियाँ मिली जो हमारी संस्कृति से जुड़ी हुई हैं, जो कि मुझे लगा कि वह पढ़ने को सबके लिये उपलब्ध

Sunday, August 23, 2009

चम्पू की कविता CHAMPU KI KAVITA

एक ईमेल में यह कविता आई थी, अच्छी लगी आप भी देखिये -

        Pareshaan thi Champu ki wife

        Non-happening thi jo uski life

        Champu ko na milta tha aaram

        Office main karta kaam hi kaam

       

        Champu ke boss bhi the bade cool

        Promotion ko har baar jate the bhul

        Par bhulte nahi the wo deadline

        Kaam to karwate the roz till nine

       

        Champu bhi banna chata tha best

        Isliye to wo nahi karta tha rest

        Din raat karta wo boss ki gulami

        Onsite ke ummid main deta salami

       

        Din guzre aur guzre fir saal

        Bura hota gaya Champu ka haal

        Champu ko ab kuch yaad na rehta tha

        Galti se Biwi ko Behenji kehta tha

       

        Aakhir ek din Champu ko samjh aaya

        Aur chod di usne Onsite ki moh maya

        Boss se bola, "Tum kyon satate ho ?"

        "Onsite ke laddu se buddu banate ho"

       

        "Promotion do warna chala jaunga"

        "Onsite dene par bhi wapis na aunga"

        Boss haans ke bola "Nahi koi baat"

        "Abhi aur bhi Champus hai mere paas"

       

         "Yeh duniya Champuon se bhari hai"

        "Sabko bas aage badhne ki padi hai"

        "Tum na karoge to kisi aur se karunga"

        "Tumhari tarah Ek aur Champu banaunga"

      

         (WAKE UP CHAMPU)

उज्जैन यात्रा, महाकाल बाबा की शाही सवारी के दर्शन… भाग – २

१७ अगस्त बाबा महाकाल की शाही सवारी का दिन, इस बार सवारी का अगला सिरा और पिछला सिरा लगभग ७ किलोमीटर लंबा था, पहले शासकीय पूजा होती है फ़िर राजा महाकाल अपनी यात्रा मंदिर से लगभग शाम ४ बजे शुरु करते हैं, वहाँ से सवारी रामघाट पहुँचती है क्षिप्रा नदी के किनारे, वहाँ पूजन कर फ़िर सवारी अपने निर्धारित मार्ग से गोपाल मंदिर और फ़िर वापिस महाकाल लगभग शाम १०.४५ बजे पहुँच जाती है।

राजा महाकाल की शाही सवारी में उनके सारे मुखौटे साथ में चलते हैं जो कि वे अपनी पिछली सवारी में धारण कर चुके होते हैं, शाही सवारी में सबसे आगे पुलिस बैंड, घुड़सवार पुलिस, हाथी, अखाड़े, मलखम्ब, स्थानीय लोग, स्थानीय भक्त मंडल, गणमान्य नागरिक फ़िर राजा महाकाल की पालकी होती है। सवारी मार्ग के दोनों तरफ़ स्थानीय लोगों द्वारा स्वागत मंच भी बनाये गये थे, जहाँ से माईक से उदघोषणा भी की जा रही थी और राजा महाकाल की आगवानी भी की जा रही थी।

राजा महाकाल की शाही सवारी का वीडियो देखिये -


video


हमारे बेटेलाल को तो बड़ा मजा आया, उन्हें सवारी मार्ग में हमने अपना हाथ पकड़कर खड़ा कर दिया, इसके पहले उन्हें हम अपनी गोद और कंधे की सवारी करवा चुके थे। किसी मंडल ने अपनी झांकी बहुत अच्छे से सजायी थी तो किसी के समूह में भगवान के भेष धारण कर लोग चल रहे थे, बिल्कुल सजीव लग रहे थे, एक मंडल ने तो भगवान कृष्ण का इतना सुंदर भेषप्रबंधन किया था कि वो तो सजीव ही लग रहे थे। पूरा सवारी मार्ग फ़ूलों से पटा पड़ा था, सब सवारी में शामिल लोगों और राजा महाकाल का स्वागत फ़ूलों से कर रहे थे।

इस बार तो रिकार्डतोड़ भीड़ थी, सवारी मार्ग में तो प्रशासन का भीड़ प्रबंधन लगभग नहीं के बराबर था जबकि उज्जैन प्रशासन को सिंहस्थ के कारण भीड़ प्रबंधन का बहुत अच्छा अनुभव है, फ़िर भी आम आदमी को धक्के खाने के लिये छोड़ दिया गया था।सवारी मार्ग में पैर रखने की जगह नहीं थी, मार्ग के दोनों ओर के भवनों के छज्जे पर भी लोग टकटकी लगाये खड़े थे, कोई जगह ऐसी नहीं थी कि जहाँ जगह खाली छूट गयी हो, हर जगह मानव ही मानव। गाँव वाले केवल राजा महाकाल की शाही सवारी के दर्शन के लिये आये थे तो उनके पास उनकी गठरी या नया प्रचलन बैग था, और वे उसे लेकर ही राजा महाकाल के दर्शन की आस लिये थे।

हमने भी अपने बेटेलाल को अपने घर का पता याद करवाया और आपात स्थिती से निपटने के लिये उनकी जेब में अपने घर का पता और फ़ोन नं रख दिया और समझा दिया कि अगर हमसे अलग हो भी जाओ तो घबराना मत किसी भी पुलिस अंकल को पकड़ लेना और अपना पता बता देना नहीं तो उनको बोल देना कि मेरी जेब में मेरा पता है, मुझे घर पहुँचवा दीजिये। हमारे बेटेलाल भी खुश कि आज उनकी इतनी चिंता हो रही है। सवारी में पहुँचने के बाद भी बेटेलाल पता याद कर रहे थे अगर कहीं कोई कन्फ़यूजन होता तो झट हमसे वापिस पता पूछ लेते।

राजा महाकाल की सवारी के दर्शन करने के बाद हम वापिस अपने घर को लौट चले तो भी अद्भुत जनसैलाब था। शाही सवारी में आज से कुछ सालों पहले मतलब सिंहस्थ के पहले इतनी भीड़ नहीं आती थी। बहुत आराम से राजा महाकाल के दर्शन होते थे और हम भी अपनी मित्र मंडली के साथ राजा महाकाल की यात्रा में शामिल हुआ करते थे, पर धीरे धीरे आस्था का सैलाब उमड़ने लगा और अब यह यहाँ उज्जैन के लिये लोकोत्सव हो गया है। जिसमें शामिल होकर हरेक जन अपने को धन्य मानता है।

“राजाधिराज महाकाल महाराज की जय”

संबंधित पोस्ट -

भाग – १ के लिये यहाँ चटका लगाईये।

राजा महाकाल की सवारी के ज्यादा जानकारी के लिये यहाँ चटका लगाईये।


Friday, August 21, 2009

उज्जैन यात्रा, महाकाल बाबा की शाही सवारी के दर्शन… भाग - १

      हम उज्जैन गये थे 5 दिन की छुट्टियों पर, और खासकर गये थे महाकाल बाबा की शाही सवारी के दर्शन करने के लिये। पहले ही दिन १४ अगस्त को जन्माष्टमी थी, हम अपनी धर्मपत्नी के साथ निकले भ्रमण पर, दर्शन किये गये गोपाल मंदिर के जहां गिरधर गोपाल की बहुत ही सुन्दर, मनभावन रुप के दर्शन हुए, और पूरा गोपाल मंदिर जगमगा रहा था, भव्य लाईटिंग की गई थी। गोपाल मंदिर सिंधिया परिवार ने बनवाया था और आज भी यह ट्रस्ट उन्हीं के पास है, शाही सवारी वाले दिन और बैकुण्ठ चतुर्दशी “हरिहर मिलन” वाले दिन आज भी सिंधिया परिवार से आकर महाकाल बाबा की आगवानी और पूजन करते हैं। इस बार शाही सवारी पर ज्योतिरादित्य सिंधिया आगवानी के लिये आये थे।

mahakaleshwar

       फ़िर चले हम महाकाल बाबा के दर्शन करने के लिये थोड़ी सी भीड़ थी, फ़िर भी बहुत जल्दी दर्शन हो लिये, और फ़िर वही क्रम साक्षी गोपाल, बाल विजय मस्त हनुमान के दर्शन और फ़िर क्षिप्रा नदी का किनारा। परम आनंद की अनुभूति होती है।

        फ़िर १६ अगस्त को हम गये क्षिप्राजी की आरती में । क्षिप्रा नदी बहुत प्राचीन नदी है, महाकवि कालिदास के मेघदूतम में भी इसका वर्णन मिलता है, क्षिप्रा का मतलब होता है “ब्रह्मांड में सबसे तेज बहने वाली नदी”। फ़िर वहाँ से सम्राट विक्रमादित्य की आराध्य देवी और शक्तिपीठ माँ हरसिद्धी की आरती में, माँ हरसिद्धी की सवारी सिंह मंदिर के बाहर शोभायमान था और माँ हरसिद्धी के दर्शन करके आत्मा तृप्त हो गई, हम आरती के समय गये थे और भव्य आरती में शामिल होकर आनंद में भक्तिभाव से सारोबार हो गये। कहते हैं कि ये जागृत शक्तिपीठ है और आप इसका अहसास यहाँ संध्याकालीन आरती में शामिल होकर कर सकते हैं। फ़िर चल दिये घर की ओर महाकाल बाबा के शिखर दर्शन करके। कहते हैं कि महाकाल बाबा के दर्शन से जितना पुण्य मिलता है, शिखर दर्शन से उसका आधा पुण्य मिलता है।

        घर जाते समय सवारी मार्ग की रौनक तो देखते ही बनती थी, पूरा सवारी मार्ग दुल्हन की तरह से सजाया गया था, भव्य लाईटिंग थी और भव्य मंच स्वागत के लिये। वहीं बीच में छत्री चौक पर फ़ेमस कुल्फ़ी खाई जो कि बहुत फ़ेमस है, और हमारे बेटेलाल को बहुत पसंद है।

महाकाल की शाही सवारी का वर्णन अगले भाग में -

महाकाल की शाही सवारी के बारे में ज्यादा जानकारी के लिये चटका लगायें।

Thursday, August 20, 2009

15 अगस्त पर हम छुट्टी पर थे, इतने बाजू इतने सर गिन ले दुश्मन ध्यान से हारेगा तू हर बाज़ी जब खेलें हम जी जन से

15 अगस्त पर हम छुट्टी पर थे और ये पोस्ट हम छापना ही भूल गये अब पढ़ लीजिये।

इतने बाजू इतने सर गिन ले दुश्मन ध्यान से
हारेगा तू हर बाज़ी जब खेलें हम जी जन से


यह गाना है अमिताभ बच्चन की फिल्म "मैं आजाद हूं" से है जो की सुदेश भौ्सले ने गाया है | यह गाना नौजवानों में एक नया जोश भर देता है|

Wednesday, August 19, 2009

टर्म इंश्योरेंस (Term Insurance) में परिपक्वता पर बीमा किश्तों की वापसी, क्या बहुत जरुरी है और उसकी क्या कीमत है !!

        टर्म इंश्योरेंस बीमे का सर्वोत्तम रुप है, लेकिन क्यों “टर्म इंश्योरेंस की बीमा किश्त वापसी” वाली पॉलिसी न लें, लेकिन अगर आप नहीं मरे तो जमा की गई किश्तें वापिस नहीं मिलेंगी,  एक आम सवाल है, कौन सी पॉलिसी बेहतर है, अब हम एक सरल उदाहरण लेते हैं और उसका खुद ही विश्लेषण करते हैं। अगर आपको थोड़ा बहुत गणित आता है तो आप औरों से बेहतर खुद ही बहुत अच्छे से आत्मविश्लेषण कर सकते हैं। तो अब हमें देखना है कि बेहतर क्या है “साधारण टर्म इंश्योरेंस” या “बीमा किश्त वापसी वाला टर्म इंश्योरेंस”  ??

       यह पता करना बहुत सरल है। बस कोशिश करें एक बेहतर प्लान पता करने की जो “बीमा किश्त वापसी वाला टर्म इंश्योरेंस” से अच्छा हो, अगर आप ढूँढ पाये तो, नहीं तो इससे बेहतर प्लान केवल  “साधारण टर्म इंश्योरेंस” है।

अब हम एक उदाहरण लेते हैं -

       आईएनजी वैश्य में  “बीमा किश्त वापसी वाला टर्म इंश्योरेंस” का एक प्लान है जो कि “ING TERM LIVE PLUS” के नाम से है।

कंपनी दो प्रकार से पेमेन्ट देती है -

अ) मध्यावधि लाभ: जीवन को बीमित करने के बाद पॉलिसी अवधि के मध्य में, कंपनी नियमित प्रीमियम का 40% या फ़िर एकल/सीमित प्रीमियम का 20% वापिस करेगी, पर अगर बीमित व्यक्ति ज्यादा प्रीमियम का भुगतान कर चुका है तो उसे नहीं गिना जायेगा।

ब)  परिपक्वता लाभ: जीवन को बीमित करने के बाद उसकी परिपक्वता पर, जितनी भी प्रीमियम का भुगतान किया गया है उसे बिना ब्याज के वापिस कर देगी, वह उन प्रीमियम को हटा देगी जिसे बीमित व्यक्ति ने ज्यादा भर दिया है।

तो अब हम आँकड़े देखते हैं -

आयु: 35 वर्ष
कुल अवधि: 20 साल
कवर: 12,00,000 (12 लाख) 
वार्षिक प्रीमियम: 10.653  रुपये
परिपक्वता राशि: 213060 (वह राशि जिसका भुगतान 20 साल के दौरान किया, 10653 * 20)
मृत्यु लाभ: 12 लाख

       हम 10,653 प्रति वर्ष से इतनी या इससे ज्यादा राशि से और  बेहतर क्या प्राप्त कर सकते हैं?

हम एक उदाहरण लेते हैं टर्म इंश्योरेंस + पी.पी.एफ़. का

      35 वर्ष के व्यक्ति के लिये 20 वर्ष की अवधि के लिये 12 लाख का प्रीमियम लगभग 3721 रुपये होती है, टैक्स के बाद।

      तो अगर हम 3721रुपये के भुगतान करते है 10653 रुपये  की जगह तो हमारे पास बचते हैं 6932 रुपये (10,653 - 3721)|

      अब हम अगर यह 6932 रुपये हर वर्ष पी.पी.एफ़. में २० वर्षों तक 8% के हिसाब से निवेश करें तो इसका परिपक्वता मूल्य 3.40 लाख होता है। जो कि आईएनजी वैश्य के 2.1 लाख से बहुत अच्छा है, यह तो हो गया सबसे सुरक्षित तरीका, इसमें तो कोई प्रश्न ही नहीं उठता।

SIP म्युचुअल फंड  के साथ -
      अगर निवेशक SIP  म्युचुअल फ़ंड में निवेश करता है, तो 12% से रकम वापसी गणना की जा सकती है, जो कि 20 वर्ष बाद लगभग 6.9 लाख रुपये होती है

     अब प्रश्न यह है कि “टर्म इंश्योरेंस की बीमा किश्त वापसी” वाली पॉलिसी में क्या लाभ है ?

उत्तर – कोई लाभ नहीं है, लेकिन आजकल बीमा कंपनियों को समझ में आ गया है कि लोगों को टर्म इंश्योरेंस का महत्व समझ में आ गया है, तो उनके विचार कुछ टर्म इंश्योरेंस प्लान में ही कम बढ़ कर देना था। ग्राहकों को महसूस करवायें कि “वे जो प्रीमियम भर रहे हैं वो उन्हें वापिस मिल जायेगी” इस तरह के नये उत्पाद बाजार में ला रहे हैं। लेकिन वो शायद भूल गये हैं कि इस दुनिया में “गणित” जैसे भी कुछ है।

निष्कर्ष: तो अगर आप इंश्योरेंस लेने जा रहे हैं तो, टर्म इंश्योरेंस ही लीजिये, “टर्म इंश्योरेंस की बीमा किश्त वापसी” पॉलिसी पर बिल्कुल मत जाइये, उसकी प्रीमियम बहुत ज्याद है। हमेशा अतिरिक्त धन को किसी अन्य विकल्प में निवेश करें, जो कि सबसे बेहतर है।

       अब आप ऐसे बीमा एजेन्ट से कैसे निपटेंगे जो आपको इस तरह का उत्पाद बेचने की कोशिश करेगा ? या फ़िर आप अपने मित्रों को इन उत्पादों के जाल से कैसे बचायेंगे  ?

     इस दुनिया में सबसे अच्छा उत्पाद अगर कोई है तो वो है "सरल", और मैं टर्म इंश्योरेंस को इस सदी का सबसे अच्छा उत्पाद मानता हूँ !! इससे अच्छा कोई उत्पाद ही नहीं है। इन बेबकूफ़ सोच वाले उत्पादों में अपना थोड़ा सा दिमाग उपयोग कर सोचें। तो आप खुद ही जान जायेंगे कि वह लेने लायक है या नहीं।

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Wednesday, August 12, 2009

टर्म इंश्योरेंस (Term Insurance) बहुत जरुरी है पर ये लोगों को पसंद नहीं है, क्योंकि वो इसे पैसे की बर्बादी मानते हैं, वो सब लोग गलत हैं क्यों ? आइये देखते हैं |

        टर्म इंश्योरेंस में जमा किये हुए धन से वापिस कुछ नहीं मिलता है इस कारण से ज्यादातर लोग इसे पसंद नहीं करते हैं| मेरा मानना है की यह एक मनोवैज्ञानिक कारण है क्योंकि "टर्म इंश्योरेंस की अवधि पूरा होने पर वापिस कुछ नहीं मिलता है"| और तो और अगर अवधि पूर्ण होने के बाद अगर पैसा मिल भी जाए तो कोई ज्यादा फर्क नहीं पड़ता| टर्म इंश्योरेंस न लेना एक बहुत बड़ी बेबकूफी है|

लोगों की समस्या क्या है की वे टर्म इंश्योरेंस लेना ही नहीं चाहते हैं ?

        लोगों को टर्म इंश्योरेंस इसलिए पसंद नहीं है क्योंकि अगर टर्म इंश्योरेंस की पूरी अवधि मे उन्हें कुछ नहीं होता है तो जितना भी बीमे की किश्त उन लोगों ने भरी है वह फालतू ही गई और उसका उन्हें कोई फायदा भी नहीं हुआ| वास्तविकता मे ये लोग टर्म इंश्योरेंस के महत्त्व को नहीं समझते हैं | अब हम इसे दूसरे तरीके से देखते हैं, मान लीजिये की टर्म इंश्योरेंस की जमा  किश्तें अवधि समाप्त होने के बाद मिल जाती हैं। हम एक सामान्य परिवार के मामले का अध्ययन करते हैं।

         तुषार 28 साल का नौजवान है और उसकी बस अभी शादी हुई है। वह लगभग 40,000 रुपये प्रति माह कमाता है। उसके महीने के सारे खर्च लगभग 25,000 रुपयों में हो जाते हैं और वह लगभग 15,000 रुपये प्रतिमाह बचाता है। उसका परिवार भी आर्थिक रुप से उसके ऊपर निर्भर है जिसमें उसके माता व पिता हैं । अभी उसकी सेवानिवृत्ति में ३० वर्ष बाकी हैं। उसने अपनी बीमा की आवश्यकताओं की गणना की जो कि कम से कम लगभग 50-60 लाख होती है। अभी हम 50 लाख गणना के लिये लेकर चलते हैं।

विश्लेषण

           अब मजे की बात, उसके वर्तमान खर्चे लगभग 25 हजार हैं, लेकिन जब वो 30 साल बाद सेवानिवृत्त होगा तब उसके महीने का खर्चा क्या होगा ? जैसे पिछले 30 वर्षों का मुद्रास्फ़ीति दर 6.5 % रहा है (पिछले आंकड़ों पर आधारित), अब मान लें कि अगले 30 वर्षों में भी मुद्रास्फ़ीति की दर औसतन 6.5 % ही रहती है। 30 वर्ष बाद उसका मासिक खर्च लगभग 25,000 x (1.065)^30 = 1,65,359 (1.65 लाख) होगा। यदि वह शुरु से ही टर्म इंश्योरेंस लेता है 50 लाख का, तो उसकी सालाना बीमा किश्त लगभग 12,293 रुपये होती है 30 साल की अवधि के लिये HDFC Standard Life Insurance में। 

बीमा किश्त की गणना व तुलना आप यहाँ कर सकते हैं।

           इसका मतलब कि वह कुल 3.68 लाख रुपये की किश्तें बीमा के रुप में देगा, और अगर यह किश्तों में जमा की गई रकम उसे मिल भी जाती है तो उसे कितना फ़ायदा होगा, वह कितने महीने का खर्चा उससे चला सकता है 2 महीने या ज्यादा से ज्यादा 3 महीने, क्योंकि उस समय उसका मासिक खर्च लगभग 1.65 लाख होगा। बस इतना ही !!

तो शायद अब इन प्रश्नों को करने की आवश्यकता है -

  • आप अपने परिवार को वित्तीय जोखिम में डाल रहे हैं क्योंकि आपको 2 महीने के बराबर के खर्च की रकम  वापिस नहीं मिल रहा है ?
  • एक छोटी सी रकम जो कि आपको अवधि पूर्ण होने के बाद नहीं मिलेगी, उसके लिये अपने परिवार को जोखिम में डालने का बचपना कर रहे हैं।
  • क्या आप यह नहीं सोचते हैं कि आप टर्म इंश्योरेंस को गलत नजरिये से देख रहे हैं ?
  • आप इस पर ध्यान नहीं दे रहे हैं कि “आपको क्या मिल रहा है” बजाय इसके कि “आपको क्या नहीं मिल रहा है”।

      हमारे पास बीमा किश्त वापसी वाले बीमा पहले से ही हैं, पर वे किसी बेबकूफ़ी से कम नहीं, क्योंकि ये बीमा आम आदमी की कमजोरी का फ़ायदा उठाते हुए बनाये गये हैं और उनके लिये जो लोग टर्म इंश्योरेंस को पैसे की बर्बादी मानते हैं क्योंकि उसमें अवधि पूर्ण होने के बाद रकम वापिस नहीं मिलती है।

भारत के लोगों द्वारा टर्म इंश्योरेंस न पसंद करने के कारण

  • अधिकतर लोग केवल स्पष्ट रुप से आँकड़ों पर ध्यान केंद्रित करते हैं, जैसे कि उन्हें बीमा किश्त में जमा रकम वापिस नहीं मिलेगी या अगर उन्हें कुछ नहीं हुआ तो ये पैसे की बर्बादी होगी, लेकिन वे लोग टर्म इंश्योरेंस के आंतरिक फ़ायदों के बारे में सोच ही नहीं पाते हैं।
  • हम धन के साथ बहुत भावुक होते हैं, हम इस बात पर अपना ध्यान लगाते हैं कि हमारा धन बढ़ता रहे और फ़िर बाद में वह वापिस भी मिल जाये जबकि हम यह नहीं सोचते कि वह धन हमारी जिंदगी को कितनी सुरक्षा प्रदान करता है।
  • अधिकांश लोग सोचते हैं कि मरने की संभावनाएँ बहुत कम होती हैं, औसतन लोगों की उम्र लंबी होती है पर यह फ़िर से एक बेबकूफ़ाना सोच है। हम बुरी स्थिति की कल्पना करना ही नहीं चाहते हैं इसलिये हम इस ओर ध्यान ही नहीं देते हैं।

निष्कर्ष

       जिंदगी में हम बहुत सारी बातों पर ध्यान ही नहीं देते हैं जैसे कि स्वास्थ्य, खुशी के पल, प्रकृति, अपनों के साथ बिताया गया समय जो कि सबसे सुन्दर है और जिंदगी की सच्चाई भी है। टर्म इंश्योरेंस व्यक्तिगत वित्त क्षेत्र के समान ही है, बस जरुरत है तो अपना ध्यान “आप क्या खो रहे हैं” से “आप क्या पा रहे हैं” पर केन्द्रित करने की, आप एक बार टर्म इंश्योरेंस ले लेंगे तो आपकी जिंदगी और भी सुन्दर हो जायेगी।

      आप इस बारे में क्या सोचते हैं क्या आप मेरी बातों से सहमत हैं, कृपया टिप्पणी देकर बताये  क्या ऐसी मानसिकता के शिकार हैं आप भी ? क्या आपको मेरी ये श्रंखला पसंद आ रही है, आप और भी इस विषय पर पढ़ना चाहते हैं तो टिप्पणी करके बताईये।

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क्या प्राईवेट बीमा कंपनियों में निवेश करना सुरक्षित है ?

महेश सिन्हा जी ने पिछले चिट्ठे मै पूछा था कि क्या प्राईवेट बीमा क्ंपनियां सुरक्षित है निवेश करने के लिये जो कि तमाम तरह की स्कीमें बेच रहे हैं, रिटायरमेंट प्लान, पेन्शन प्लान, यूलिप इत्यादि । इस तरह की तमाम सवलों को अगर हम देखते हैं तो सबसे पहले हम यह समझते हैं कि कौन से तत्वों से इन कंपनियों में वित्तीय स्थिरता आती है और् ग्राहकों को धन वापस देने के क्षमता आती है।

सोल्वेन्सी मार्जिन बताता है कि कंपनी कितनी सक्षम है  किसी भी अनदेखी परिस्थितियों से निपटने में । सामान्यता: यह मार्जिन कंपनियों को अपने नियोजक आई.आर.डी.ए. (IRDA) को देना होती है| इससे आई.आर.डी.ए. (IRDA) इन कंपनियों के ऊपर नजर रख पाते हैं अगर कोई गड़बड़ी पाई जाती है तो आई.आर.डी.ए. (IRDA) कार्यवाही करती है।

रिस्क तो फ़िर भी हरेक कंपनी के साथ निवेश करने पर रहती हो फ़िर भले ही वह प्राईवेट कंपनियां हों या एल.आई.सी. (LIC)।  पर अगर बड़ी कंपनियों में निवेश करेंगें तो रिस्क कम ही रहती है जैसे AIG ने भारत में TATA के साथ गठजोड़ किया था और AIG वित्तीय समस्याओं का सामना करना पड़ा तो टाटा ने उसके शेयर खरीदकर निवेशकों की रिस्क कम कर दी।

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नारी के आभूषण

नारियाँ वस्तुत: आभूषणों से बहुत प्रेम करती हैं। हमारे शास्त्रों ने भी नारियों के लिये विविध प्रकार के रत़्नाभूषणों आदि की व्यवस्था की है, पर प्रत्येक आभूषण के अन्तर्गत एक गुण, सन्देश छिपा है। प्रत्येक भारतीय नारी को चाहिये कि आभूषण धारण करने के साथ – साथ आभूषण के अन्तर्गत निहित अर्थ संदेश को भी ह्र्दयंगम करे, ताकि उस आभूषण का नाम सार्थक हो सके -

मिस्सी – मिस अर्थात बहाना बनाना छोड़ दें। पान या मेंहदी – लाज की लाली बनायें रखें।

काजल – शील का जल नयनों में रखें।

नथ – मन को नाथे अर्थात नियन्त्रित रखें, जिससे नाक ऊँची रहे।

बेंदी – बदी (बुराई) छोड़ दें।

टीका – ध्यान रखें यश का टीका लगे – कलंक का नहीं।

वंदनी – पति एवं गुरुजनों की वन्दना करें।

पत्ती – अपनी तथा परिवार की पत (लाज) रखें।

कर्णफ़ूल – कानों से दूसरों की प्रशंसा सुनें।

हँसली – हमेशा हँसमुख रहें।

मोहनमाला – सद़्गुणों से सबका मन मोह लें।

कण्ठहार – पति के कण्ठ का हार बनें।

कड़े – किसी से कड़ी बात न बोलें।

छल्ले – किसी से छल न करें।

करघनी या कमरबंद – सत्कर्मों के लिये हमेशा कमर बाँध कर तैयार रहें।

पायल – सभी बड़ी बूढ़ी औरतों के पाँव (चरण) स्पर्श करें।

Tuesday, August 11, 2009

सन्तान के कर्तव्य जो सन्तान को निभाने चाहिये..

मातृ देवो भव: ! पितृ देवो भव: !

आचार्य देवो भव: ! अतिथि देवो भव: !

माता पिता, गुरु और अतिथि – संसार में ये चार प्रत्यक्ष देव हैं । इनकी सेवा करनी चाहिये। इनमें भी माता का स्थान पहला, पिता का दूसरा, गुरु का तीसरा और अतिथि का चौथा है। माता – पिता में परमात्मा प्रत्यक्ष स्वरुप है। माता साक्षात लक्ष्मी होती है तो पिता नारायण। जिनको माता पिता में भगवद्भाव नहीं होते उनको मन्दिर या मूर्ति में भी कभी भगवान के दर्श्न नहीं होते।

माता – पिता में भी माँ का दर्जा अधिक ऊँचा है। शास्त्रों में भी माँ का दर्जा पिता से सौ गुणा अधिक ऊँचा बताया गया है। पिता तो धन – सम्पत्ति आदि से पुत्र का पालन पोषण करता है, पर माँ अपना शरीर देकर पुत्र का पालन पोषण करती है। बच्चे को गर्भ में नौ माह तक धारण करती है, जन्म देते समय प्रसव पीड़ा सहती है, अपना दूध पिलाती है एवं अपनी ममता की छाँव में उसका पालन पोषण करती है। ऐसी ममतामयी जननी का ऋण पुत्र नहीं चुका सकता। ऐसे ही पिता बिना कहे ही पुत्र का भरण पोषण का पूरा प्रबन्ध करता है, विद्याध्ययन करवाकर योग्य बनाता है, उसकी जीविका का प्रबन्ध करता है एवं विवाह कराता है। ऐसे पिता से भी उऋण होना बहुत कठिन है। रामायण में कहा गया है - “बड़े भाग मानुष तन पावा”। इस शरीर के मिलने में प्रारब्ध (कर्म) और भगवत़्कृपा तो निमित्त कारण है और माता पिता उपादान कारण हैं। उनके कारण ही हम इस संसार में आते हैं। इसलिये जीते जी उनकी आज्ञा का पालन करना, उनकी सेवा करना, उनको प्रसन्न रखकर उनका आशीर्वाद लेना और मरने के बाद उनके मोक्ष हेतु पिण्ड दान, श्राद्ध – तर्पण करना आदि पुत्र का विशेष कर्तव्य है। माता पिता की दुआ में दवा से भी हजार गुणा ज्यादा शक्ति होती है।

पुराणों में उल्लेख मिलता है कि जब देवराओं में यह होड़ लगी कि सबसे बड़ा कौन ? जो सबसे बड़ा होगा वही प्रथम पूज्य होगा। तब सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया गया कि जो तीनों लोकों का तीन चक्कर लगा कर सबसे पहले आ जायेगा वही प्रथम पूज्य होगा। सभी देवता अपने अपने वाहनों पर चढ़ कर दौड़ पड़े तब गणेश जी बड़े चक्कर में पड़े कि मेरा वाहन चूहा सबसे छोटा है इस पर चढ़कर में कैसे सबसे पहले पहुंच सकता हूँ। अत: उन्होंने समाधिस्थ पिता शंकर के बगल में माँ पार्वती को बैठा दिया तथा स्वयं अपने वाहन पर चढ़ कर दोनों की तीन बार परिक्रमा की । माता पिता की परिक्रमा करते ही तीनों लोकों की परिक्रमा पूरी हो गई और वे प्रथम पूज्य घोषित हुए। आज भी बुद्धि के देवता के रुप में सर्वत्र प्रथम पूज्य हैं।

पहले की कुछ ओर कड़ियाँ परिवार के संदर्भ में -

चिट्ठाजगत टैग्स: परिवार

Technorati टैग्स: {टैग-समूह}

Sunday, August 09, 2009

Financial Planning वित्तीय आयोजना बहुत जरुरी है हर एक आदमी के लिये .. क्यों देखें

     आजकल हरेक आदमी के लिये Financial Planning यानि कि वित्तीय आयोजना बहुत जरुरी है । हर आदमी आज केवल पैसा कमाने के लिये दौड़ रहा है पर उस पैसे को कैसे भविष्य के लिये बचायें या कहां पर निवेश करें उसके बारे में इस आम आदमी को बिल्कुल जानकारी नहीं होती है और अगर होती भी है तो अधकचरा, जो किसी दोस्त ने बता दिया या कहीं टीवी चैनल पर देख लिया। आम आदमी को अच्छे वित्तीय उत्पाद के बारे में पता ही नहीं होता है या उसे कौन सा उत्पाद उपयोग करना चाहिये उसका पता नहीं होता है। बस वह तो जैसे तैसे कहीं पर भी पैसे जोड़कर खुश होता रहता है। परंतु अपने भविष्य की आवश्यकताओं के बारे में उसकी कोई योजना नहीं होती।

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      भविष्य की योजना बनाना बहुत जरुरी है हरेक आदमी को, क्योंकि सभी के जीवन में भविष्य के कुछ समान लक्ष्य होते हैं जैसे बच्चों का पढाई खर्च, शादी का खर्च, अपने लिये घर, कार इत्यादि। पर ये सब खर्च भी एक साथ नहीं आते हैं सभी खर्चों का समय अलग अलग होता है इसलिये जो खर्चा याने कि पहला लक्ष्य के लिये आपको अभी से ज्यादा बचत करना होगी और उसके बाद के लक्ष्यों के लिये उससे कम बचत करना होगी क्योंकि समय ज्यादा मिलेगा बचत के लिये।

        बचत के समय यह भी देखना चाहिये कि ज्यादा लाभ किस वित्तीय उत्पाद में निवेश करने से होगा और किस वित्तीय उत्पाद  मॆं लंबी अवधि के लिये निवेश करना होगा। कितना बीमा होना चाहिये कितना दुर्घटना बीमा होना चाहिये। ऐसी बहुत सी बातें हैं जो आम आदमी के हित में है और अगर वह अनुशासन बना ले बचत करने का तो इन लक्ष्यों की प्राप्ति बहुत ही आसान है।

         अगर आपके शहर में बजाज कैपिटल की शाखा है तो ये लोग बिना किसी शुल्क के Financial Planning वित्तीय आयोजना करते हैं, आप इनकी सेवा ले सकते हैं और साथ में वित्तीय उत्पादों के बारे में गाईड भी करते हैं। बहुत सारे ओनलाईन टूल्स online tools मिल जायेंगे, और नहीं तो किसी प्रमाणित वित्तीय आयोजक की सहायता लें।

         वैसे मैं भी बहुत सारे वित्तीय उत्पादों के बारे में बहुत अच्छे से जानता हूँ अगर किसी को कठिनाई हो तो टिप्पणी देकर सवाल पूछ सकते हैं, मैं जल्दी ही उत्तर देने की कोशिश करुँगा। आगे के चिट्ठों में मैं वित्तीय उत्पादों की जानकारी देने का प्रयास करुँगा।

पत़्नी के कर्तव्य जो पत़्नी को निभाने चाहिये

पति की तरह ही पत़्नी के भी कुछ कर्तव्य होते हैं, जिनका पालन कर गृहस्थाश्रम का पूर्ण आनन्द लिया जा सकता है। किसी ने ठीक कहा है – ईंट और गारे से मकान बनाये जा सकते हैं, घर नहीं। मकान को घर बनाने में गृहिणी का ही पूरा हाथ होता है। वैसे भी इतिहास साक्षी है कि बहुत से महापुरुषों जैसे तुलसीदास, कालिदास, शिवाजी आदि के उत्थान पतन में स्त्री की ही मुख्य भूमिका रही है। मधुर भाषी स्त्री घर को स्वर्ग बना सकती है तो कर्कशा व जिद्दी स्त्री घर को नर्क बना देती है। पत़्नी को निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिये -

  • पति के माता – पिता एवं परिवार के अन्य सदस्यों का आदर करे तथा उनकी सुविधा का हमेशा ध्यान रखे।
  • कभी भी अपने पीहर में ससुराल वालों की निंदा या बुराई न करे।
  • कभी भी पति पर कटु, तीखे एवं व्यंग्यात्मक शब्दों का प्रयोग न करें। सब समय ध्यान रहे कि तलवार का घाव भर जाता है, बात का नहीं।
  • पति के सामने कभी भी ऐसी मांग न करे जो पति की सामर्थ्य के बाहर हो।
  • कभी भी झूठी शान शौकत के चक्कर में पैसे का अपव्यय न करे। पति से सलाह मशविरा करके ही संतुलित एवं आय के अनुसार ही व्यय की व्यवस्था करें। पति के साथ रिश्ते को पैसे का आधार नहीं बनाकर सहयोग की भावना से गृहस्थी चलानी चाहिये।

सर्वोपरि पति – पत़्नी में एक दूसरे के प्रति दृढ़ निष्ठा एवं विश्वास भी होना चाहिये। दोनों का चरित्र संदेह से ऊपर होना चाहिये। कभी – कभी छोटी – छोटी बातें भी वैवाहिक जीवन में आग लगा देती हैं, हरे भरे गृहस्थ जीवन को वीरान बना देती है। आपसी सामंजस्य, एक दूसरे को समझना, किसी के बहकावे में न आना, बल्कि अपनी बुद्धि से काम लेना ही वैवाहिक जीवन को सुन्दर, प्रेममय व महान बनाता है।

पहले की कुछ ओर कड़ियाँ परिवार के संदर्भ में -

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Saturday, August 08, 2009

“93.5 FM एफ़.एम. बजाते रहो” वाली मलिश्का के कारनामे

कल मैं बहुत दिनों के बाद सडक के रास्ते मुँबई फ़ोर्ट गया था। तो रास्तेभर ९३.५ एफ़ एम वाली मलिश्का के बडे बडे होर्डिंग्स लगे हुये थे। किसी में नौकरानी पोंछा लगा रही है और मालिक अखबार पढ़्ते हुये कनखियों से उसके बाहर झूलते हुये वक्षस्थलों को कामुक निगाहों से देख रहा है, और नीचे मलिश्का का प्रतीकात्मक फ़ोटो लगा था व साथ में लिखा था फ़ोन लगाईये और अपने मन की बात मलिष्का को बताईये जो आपने आज तक किसी से नहीं कही वो मलिश्का को बतायें।

दूसरे होर्डिंग मै एक सभ्य व्यक्ति कार् चला रहा है और् एक लेडी अपने कुत्ते को लेकर घूमने निकली है और अचानक कुत्ता अपनी टाँग उठाकर सूसू कर देता है उस कार के पिछले दरवाजे पर, और कार वाले को बहुत खिन्न मुद्रा में दिखाया है। फ़िर वही मलिष्का नीचे और लिखा था अपने मन की बात बतायें।

इस प्रकार के कई सारे होर्डींग्स वेस्टर्न एक्सप्रेस हाईवे पर और फ़िर एस.वी. रोड सब जगह पटे पड़े हैं। अब आखिर ये मलिश्का सुनना क्या चाहती है अगर आप भी देखेंगे तो इस भौंडेपन और नंगाई को देखकर शायद आपकी भी नजरें झुक जायेंगी। क्या मुँबई वाकई इतनी एडवांस हो गई है, कि ये सब आम बात हो गई है। वैसे तो यहाँ के राजनीतिज्ञ बहुत कुछ बोलते रहते हैं पर इस बात को लेकर कोई बबाल नहीं, आखिर क्यों ?? क्या हमारे समाज में मर्यादा खत्म हो गई है ??

Friday, August 07, 2009

देखिये एक अच्छी पत्नी किस तरह जिंदगी को ठीक रख सकती है ।

पति के कर्तव्य जो पति को निभाने चाहिये ..

उस माँ की ममता को याद रखना जिसने पाल पोस कर तुम्हें इतना बड़ा किया है ।

पति को पत्नी के सामने कभी भी उसके पीहर वालों की बुराई नहीं करनी चाहिये। यह स्त्री स्वाभाव है कि वह सब कुछ सहन कर सकती है, लेकिन अपने माँ – बाप, भाई – बहन की बुराई नहीं सहन कर सकती। क्या पति अपने परिवार वालों की बुराई सुन सकता है? यदि नहीं तो पत्नी से कैसे अपेक्षा करे कि वह अपने सामने अपने परिवार वालों की बुराई सुन सके। वैसे विवाह के बाद पत्नी अपने पति की बुराई भी नहीं सुन सकती।

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पति अगर पत्नी की किसी आवश्यकता को पूरी नहीं कर सकता तो पत्नी को अपनी मजबूरी एवं कारण प्रेमपूर्वक  मीठे शब्दों द्वारा समझाना चाहिये।

पति को कभी भी अपने पुरुष होने का झूठा अभिमान नहीं करना चाहिये। स्त्री के साथ सब समय सहयोग की भावना रखनी चाहिये एवं उसे अर्धांगिनी का दर्जा देकर सम्मान देना चाहिये।

Gametop.com गेमटॉप.कॉम गेम खरीदना बंद करिये Stop paying for games

अभी थोड़े दिनों से हमारे बेटेलाल को कम्प्य़ूटर गेम खेलने में आनंद की आने लगा है, तो उन्होंने हमारे लेपटॉप पर कब्जा कर लिया था और बस हम ब्लॉगिंग के लिये बैठे रह जाते वो मजे में अपना गेम खेलते रहते। अब हमने उन्हें अपना डेस्कटॉप घर से लाकर दे दिया कि अब तुम मजे में गेम खेलते रहो, वो भी होमवर्क करने के बाद में। और उसमें बहुत सारे गेम हमने DOS वाले दे दिये मगर बेटेलाल बोले कि ये बहुत धीमे चलते हैं और ग्राफ़िक्स में मजा नहीं आता है कुछ अच्छे गेम्स दे दीजिये खेलने के लिये। तो हमने दुकानों पर जाकर सीडी छानीं मगर सब बड़े गेम्स थे किसी के भी पास गेम्स का कलेक्शन नहीं था।

 

फ़िर नेट पर सर्च किया गूगल महाराज में तो हमें एक साईट मिली गेमटॉप.कॉम जिसमें बहुत सारे गेम फ़्री डाउनलोड के लिये उपलब्ध हैं और बहुत सारे गेम्स ओनलाईन भी खेल सकते हैं, यहाँ पर गेम्स श्रेणियों में विभक्त हैं जिससे आप को जिस तरह का गेम चाहिये केवल वही मिलेंगे। हमने अभी तक कुल ५-६ गेम डाउनलोड किये हैं सब ठीक चल रहे हैं।

तो गेम खरीदने के लिये अब पैसे खर्च करने की जरुरत नहीं।

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Thursday, August 06, 2009

महाकाल बाबा की शाही सवारी १७ अगस्त को और महाकवि कालिदास का मेघदूतम में महाकाल वर्णन..

श्रावण मास के हर सोमवार और भाद्रपद की अमावस्या तक के सोमवार को महाकाल बाबा की सवारी उज्जैन में भ्रमण के लिये निकलती है, कहते हैं कि साक्षात महाकाल उज्जैन में अपनी जनता का हाल जानने के लिये निकलते हैं, क्योंकि महाकाल उज्जैन के राजा हैं। इस बार महाकाल बाबा की शाही सवारी १७ अगस्त को निकल रही है, राजा महाकाल उज्जैन में भ्रमण के लिये निकलेंगे। अभी विगत कुछ वर्षों से, पिछले सिंहस्थ के बाद से अटाटूट श्रद्धालु उज्जैन में आने लगे हैं। अब तो शाही सवारी पर उज्जैन में यह हाल होता है कि सवारी मार्ग में पैर रखने तक की जगह नहीं होती है।

महाकाल बाबा की सवारी पालकी में निकलती है, सवारी के आगे हाथी, घोड़े, पुलिस बैंण्ड, अखाड़े, गणमान्य व्यक्ति, झाँकियां होती हैं। महाकाल बाबा की सवारी लगभग शाम को चार बजे मंदिर से निकलती है, और रात को १२ बजे के पहले वापस मंदिर पहुँच जाती है। महाकाल बाबा के पालकी में दर्शन कर आँखें अनजाने सुख से भर जाती हैं।

हम इस बार ३ दिन की छुट्टियों पर उज्जैन जा रहे थे और १७ को वापिस आना था, फ़िर बाद में पता चला कि १७ अगस्त की महाकाल बाबा की शाही सवारी है तो सवारी के दौरान महाकाल बाबा के दर्शन करने का आनन्द का मोह हम त्याग नहीं पाये और २ दिन की छुट्टियाँ बड़ाकर उज्जैन जा रहे हैं।

महाकवि कालिदास ने “मेघदूतम” के खण्डकाव्य “पूर्वमेघ” में महाकाल के लिये लिखा है -

यक्ष मेघ से निवेदन करता है कि तुम वहाँ उज्जयिनी के महाकाल मन्दिर में सन्धयाकालीन पूजा में सम्मिलित होकर गर्जन करके पुण्यफ़ल प्राप्त करना

अप्यन्यस्मिञ्जलधर महाकालमासाद्य काले

स्थातव्यं ते नयनविषयं यावदत्येति भानु: ।

कुर्वन्सन्ध्याबलिपटहतां शूलिन: श्लाघनीया-

माम्न्द्राणां फ़लमविकलं लप्स्यसे गर्जितानाम ॥३७॥

अर्थात -

“हे मेघ ! महाकाल मन्दिर में अन्य समय में भी पहुँचकर जब तक सूर्य नेत्रों के विषय को पार करता है (अस्त होता है) तब तक ठहरना चाहिये। शुलधारी शिव की स्न्ध्याकालीन प्रशंसनीय पूजा में नगाड़े का काम करते हुए गम्भीर गर्जनों के पूर्ण फ़ल को प्राप्त करोगे।”

महाकाल बाबा की तस्वीरें देखने के लिये यहाँ चटका लगायें।

जय महाकाल बाबा, राजा महाकाल की जय हो।

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Tuesday, August 04, 2009

पति – पत्नि का संबंध

       पति – पत्नि जीवन रथ के दो पहिये हैं। गृहस्थी की गाड़ी सुचारु रुप से चलाने हेतु दोनों पहियों का ठीक – ठाक रहना बहुत जरुरी है। वे एक दूसरे के पूरक हैं। पति – पत्नि को आपस में सम्बन्धों को सहज एवं सुलभ बनाने के लिये एक दूसरे की भावनाओं को समुचित आदर देना जरुरी है। यदि पति – पत्नि अग्नि को साक्षी मानकर विवाह के समय की गई अपनी प्रतिज्ञाओं को याद रखें एवं उनका पालन करें तो जीवन में आनन्द ही आनन्द होगा।

            पति – पत्नि में आपस में समझबूझ तब और ज्यादा विकसित पाई जाती है जब दोनों जीवन के कठिन मार्ग से साथ में गुजरे हों, फ़िर भले ही वह कुछ भी कठिनता हो चाहे वह पारिवारिक हो या धन की। कठिन समय में एक दूसरे का हौसला बढ़ाकर वे एक दूसरे को बहुत करीब से जानने लगते हैं। कई दंपत्तियों में इस समझबूझ की कमी पाई जाती है क्योंकि उनके पास शुरु से ही सारे सुख होते हैं, जिससे वे एक दूसरे को समझ ही नहीं पाते और हमेशा एक दूसरे से दूरी बनी रहती है।

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Monday, August 03, 2009

और मेरी रगों में खून तेजी से दौड़ने लगा..

         आज अलसुबह हम ऑटो से अपने ऑफ़िस जा रहे थे पहला चौराह पार करते ही क्या देखते हैं कि ऑटो वाले अपने पैसेन्जर के साथ जूतमपैजार कर रहे थे। तो यह सब देखते ही मेरी रगों में खून तेजी से दौड़ने लगा और दिमाग गर्म होने लगा और ऐसा लगा कि इन स्सालों को अभी उतार कर दौड़ा दौड़ा कर मारुँ, जैसा कि कभी अपने कालेज के जमाने में किया करते थे फ़िर अचानक अपनी छठी इंद्रीय ने संकेत दिया कि अब तुम कॉलेज में नहीं पढ़्ते हो, ओर हम चुपचाप दूसरी तरफ़ मुँह करके बैठ गये पर दिमाग गर्म ही था, क्योंकि बहुत दिनों बाद मार पिटाई देखी थी। वापस से अपना ध्यान कालिदास प्रणीतम “मेघदूतम” में लगाया जिसमें यक्ष मेघ को अलकापुरी जाने के रास्ते में उज्जियिनी से जाने को कहता है कि तुम्हारा मार्ग वक्र हो जायेगा परंतु उज्जियिनी की सुंदरता देखकर तुम सब भूल जाओगे।

 

        किसी तरह शाम को जाकर दिमाग की गर्मी खत्म हुई और रगों में खून वापस अपनी पुरानी रफ़्तार पर आ गया।

संयुक्त परिवार कुछ महत्वपूर्ण बातें

       संयुक्त परिवार में रहने का एक अलग ही आनंद है। एकाकी जीवन भी भला कोई जीवन है ? जब तक परिवार संयुक्त रहता है, परिवार का हर सदस्य एक अनुशासन में रहता है। उसको कोई भी गलत कार्य करने के पहले बहुत सोचना समझना पड़ता है, क्योंकि उस पर परिवार की मर्यादा का अंकुश रहता है। यह अंकुश हटने के बाद वह बगैर लगाम के घोड़े की तरह हो जाता है। लेकिन संयुक्त परिवार में अगर सुखी रहना है तो ’लेने’ की प्रवृत्ति का परित्याग कर ’देने’ की प्रवृत्ति रखना पड़ेगी। परिवार के हर सदस्य का नैतिक कर्त्तव्य है कि  वे एक दूसरे की भावानओं का आदर कर आपस में तालमेल रख कर चलें। ऐसा कोई कार्य न करें जिससे कि दूसरे की भावनाओं को ठेस पहुँचे। किसी भी विषय को कृपया अपनी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का प्रश्न न बनायें।

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            गम खाकर और त्याग करके ही संयुक्त परिवार चलाया जा सकता है। इसमें भी सबसे अहम भूमिका परिवार प्रधान की होती है। हमें शंकर भगवान के परिवार से शिक्षा लेनी चाहिये। उनके परिवार के सदस्य हैं – पत्नि उमा (पार्वती), पुत्र गणेश और कार्तिकेय। सदस्य के वाहन हैं – नन्दी (बैल), सिंह, चूहा और मयूर (मोर)। शंकर भगवान के गले में सर्पों की माला रहती है। इनके जितने वाहन हैं – सब एक दूसरे के जन्मजात शत्रु हैं, फ़िर भी शंकर भगवान परिवार के मुखिया की हैसियत से उनको एकता के सूत्र में बाँधे रहते हैं। विभिन्न प्रवृत्तियों वाले भी एक साथ प्रेम से रहते हैं। इसी तरह संयुक्त परिवार में भी विभिन्न स्वाभाव के सदस्यों का होना स्वाभाविक है, लेकिन उनमें सामंजस्य एवं एकता बनाये रखने में परिवार प्रमुख को मुख्य भूमिका निभानी पड़ती है। उसको भगवान की तरह समदर्शी होना पड़ता है।

 

           विभिन्नता में एकता रखना ही तो हमारा भारतीय आदर्श रहा है। इसीलिये कहा गया है – “India offers unity in diversity.” शंकर भगवान के परिवार के वाहन ऐसे जीव हैं, जिनमें सोचने समझने की क्षमता नहीं है। इसके उपरांत भी वे एक साथ प्रेमपूर्वक रहते हैं। फ़िर भला हम मनुष्य योनि में पैदा होकर भी एक साथ प्रेमपूर्वक क्यों नहीं रह सकते ? आज छोटा भाई बड़े भाई से राम बनने की अपेक्षा करता है, किन्तु स्वयं भरत बनने को तैयार नहीं। इसी तरह बड़ा भाई छोटे भाई से अपेक्षा करता है कि वह भरत बने लेकिन स्वयं राम बनने को तैयार नहीं। सास बहू से अपेक्षा करती है कि वह उसको माँ समझे, लेकिन स्वयं बहू को बेटी मानने को तैयार नहीं। बहू चाहती है कि सास मुझको बेटी की तरह माने, लेकिन स्वयं सास को माँ जैसा आदर नहीं देती। पति पत्नि से अपेक्षा करता है कि वह सीता या सावित्री बने पर स्वयं राम बनने को तैयार नहीं। यह परस्पर विरोधाभास ही समस्त परिवार – कलह का मूल कारण होता है। थोड़ी सी स्वार्थ भावना का त्याग कर एक दूसरे की भावनाओं का आदर करने मात्र से ही बहुत से संयुक्त परिवार टूटने से बच सकते हैं।

 

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