Wednesday, May 15, 2013

हम स्वभाव से ही तामसी होते जा रहे हैं..

यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत् ।
उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम् ॥ १० ॥ अध्याय १७

    अर्थात - खाने से तीन घंटे पूर्व पकाया गया, स्वादहीन, वियोजित एवं सड़ा, जूठा तथा अस्पृश्य वस्तुओं से युक्त भोजन उन लोगों को प्रिय होता है, जो तामसी होते हैं ।

    आहार का उद्देश्य आयु को बढ़ाना, मस्तिष्क को शुद्ध करना तथा शरीर को शक्ति पहुँचाना है, प्राचीन काल में विद्वान पुरुष ऐसा भोजन चुनते थे, जो स्वास्थ्य तथा आयु को बढ़ाने वाला हो, यथा दूध के व्यंजन, चीनी, चावल, गेंहूँ, फ़ल तथा तरकारियाँ । ये भोजन सतोगुणी व्यक्तियों को अत्यन्त प्रिय होते हैं। ये सारे भोजन स्वभाव से ही शुद्ध हैं ।

    आजकल हम दोपहर का टिफ़िन ले जाते हैं, जो कि वाकई तीन घंटे से ज्यादा हमें रखना पड़ता है और वह बासी हो गया होता है, सब्जी का रस सूख गया होता है, दाल बासी हो गई होती है । अब हम स्वभाव से ही तामसी होते जा रहे हैं, कहने को भले ही मजबूरी हो परंतु सत्य तो यही है।

    हमारा जीवन जीने का स्तर अब तामसी हो चला है, जहाँ हमें अपना समय चुनने की आजादी नहीं है और वैसे ही बच्चों को भी हम आदत डाल रहे हैं, जैसे बच्चों को सुबह आठ बजे स्कूल जाना होता है और उनका भोजन का समय १२ बजे दोपहर का होता है तो वे कम से कम ४-५ घंटे  बासी खाना खाते हैं, यह बचपन से ही तामसी प्रवृत्ति की और धकेलने की कवायद है। बच्चों को स्कूल में ही ताजा खाना पका पकाया दिया जाना चाहिये। जिस प्रकार पूर्व में आश्रम में शिष्यों को ताजा आहार मिलता था।

    अगर हमारे पुरातन ग्रंथों में कोई बात लिखी गई है तो उसके पीछे जरूर कोई ना कोई वैज्ञानिक मत है, बस जरूरत है हमें समझने की ।

Sunday, May 12, 2013

गीता के श्लोक की बातें सरल हैं, परंतु व्यवहार में बहुत कठिन

स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः ।
प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ ॥ २७ ॥
यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः ।
विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः ॥ २८ ॥

अर्थात समस्त इन्द्रियविषयों को बाहर करके, दृष्टि को भौंहों के मध्य में केन्द्रित करके, प्राण तथा अपान वायु को नथुनों के भीतर रोककर और इस तरह मन, इन्द्रियों तथा बुद्धि को वश में करके जो मोक्ष को लक्ष्य बनाता है वह योगी इच्छा, भय तथा क्रोध से रहित हो जाता है। जो निरन्तर इस अवस्था में रहता है, वह अवश्य ही मुक्त है।

    आज यह श्लोक सुन रहा था और इस पर ध्यान कर रहा था, मनन करने के दौरान यही समझ में आया, हैं तो ये दो ही श्लोक परंतु जीवन का सार हैं, व्यक्ति अपने जीवन में पता नहीं किस किस के पीछे भागता रहता है, मोह में गृसित रहता है, किसी को डराता है, किसी से डरता है जबकि उसे पता नहीं है कि सभी प्राणी मात्र कृष्ण की इच्छा से इस लोक में भ्रमण कर रहे हैं।

    यहाँ इस श्लोक की हरेक चीज इतनी कठिन है, पहले कहा गया इन्द्रियविषयों को बाहर करें, और आज की दुनिया में सारे कार्य इन्द्रियविषयों में लिप्त हो कर ही होते हैं, हर पल इन्द्रियसुख में ही बीत रहा है, यहाँ इन्द्रियों पर विजय की बात कही गई है, इन्द्रियों के लिये जो सुख ढूँढ रहे हैं, वह निकाल कर फ़ेंक दें, त्यक्त दें, त्याग दें।

    दूसरा कहा गया है भौंहों के मध्य में केन्द्रित करके, आजकल आँखें स्थिर करना बहुत कठिन कार्य हो गया है, केन्द्रित कोई नहीं हो पाता, हमेशा आँखें सुख ही तलाशती रहती हैं, यूँ कह लें कि आँखों को लत लग गई है तो यह भी गलत नहीं होगा, संकल्प नहीं रह गया है, हम आजकल अपने आप से ही सबसे ज्यादा झूठ बोलते हैं ।

    तीसरी बात कही गई है, प्राण और अपान वायु को नथुनों के भीतर रोककर – आजकल मानव अगर दो मिनिट भी वायु को नथुनों के भीतर रोक ले तो उसकी जान पर बन आती है, स्वच्छ वायु के लिये तो तरस गये हैं, प्रदूषण अंदर लेने की इतनी बुरी आदत हो गई है, जो कि हम खुद नहीं लेते, यह न चाहते हुए भी हमारे अंदर वायु के रूप में धकेला जाता है।

    चौथी बात कही गई है मन, इन्द्रियों तथा बुद्धि को वश में करके – मन तो हमेशा अपने सात घोड़ों के साथ पता नहीं कहाँ कहाँ घूमता रहता है, इन्द्रियाँ भी मन के इन घोड़ों के साथ साथ व्यक्त होती रहती हैं और बुद्धि का विनाश हो गया है, हमेशा भौतिक जगत के बारे में ही सोचते रहते हैं, मन, इन्द्रियों तथा बुद्धि को वश में करना अब कोई साधारण बात नहीं रही, इसीलिये पता नहीं कितनी धर्म की दुकानें, आश्रम यह सब सिखा रहे हैं, यह खुद से करने वाला अभ्यास है, जब श्रीकृष्ण भगवान खुद ही बता रहे हैं तो किसी और धर्म की दुकान में जाने की कोई आवश्यकता ही नहीं रह जाती है, गीता जी के अध्याय पाँच यही तो सिखाया गया है, हाँ कठिन अवश्य है, पर अगर मन में श्रद्धा हो और अटल विश्वास हो तो यह कठिन भी नहीं है।

    यहाँ कहा गया है कि मन, इन्द्रियों तथा बुद्धि को वश में करके जो मोक्ष को लक्ष्य बनाता है वह योगी इच्छा, भय तथा क्रोध से रहित हो जाता है, जो निरन्तर इस अवस्था में रहता है, वह अवश्य ही मुक्त है। हमारा तो मन बुद्धि यह सोचकर ही अकुला रही है कि अगर मानव इस अवस्था में पहुँच जाये तो उसके आनंद की कल्पना कम से कम इस लोक का मनुष्य तो नहीं कर सकता, हाँ हमारे यहाँ सब उसे शायद पागल जरूर कहेंगे।

Friday, May 10, 2013

बलगम या कफ़ खतरनाक भी हो सकता है, बता रहे हैं बेटेलाल

    हम बेटेलाल के साथ खेल रहे थे और अच्छी बात यह थी कि बेटेलाल कैरम में हमसे जीत रहे थे, तभी हमें थोड़ी खाँसी उठी, मुँह में बलगम था,  हम बलगम थूकने के लिये  उठे तो बेटेलाल बोले “डैडी, आज हार रहे हो, तो बीच में ही उठकर जा रहे हो”, हमने कहा “अरे नहीं, अभी दो मिनिट में आ रहे हैं, बलगम थूककर” बेटेलाल बोले “अच्छा डैडी!! जल्दी से आओ आज तो देखो मैं कैरम जीतकर ही दिखाऊँगा”, तब तक हम वाशबेसिन पर जाकर बलगम थूक चुके थे और गला खंखार रहे थे।

    जब तक वापिस आये तो देखा बेटेलाल लेपटॉप खोलकर गूगल में बलगम याने कि how cough is made in body.. और बोले “डैडी देखो अभी हम पता लगाते हैं कि ये कफ़ कैसे होता है और इसका क्या इलाज है”, हम भी कुर्सी खिसकाकर बेटेलाल के पास बैठ गये।

    अब हमें बेटेलाल ने बताया कि बलगम को Sputum or Cough कहते हैं और ये गले में नहीं होता यह फ़ेफ़ड़े के बहुत अंदर से आता है, यह एक प्रकार का लिजलिजा पदार्थ होता है और जब बहुत तेजी से हम फ़ेफ़ड़े से साँस निकालते हुए खाँसते हैं तब बलगम बाहर आता है और कई बार बलगम सामान्य खाँसी में भी बाहर आ जाता है, हमें बलगम को उसी समय थूक देना चाहिये, बलगम को वापिस अंदर नहीं लेना चाहिये और ना ही बलगम को कहीं भी किसी भी कोने में लगा देना चाहिये जो कि साधारणत: हम भारतीय लोग करते हैं, इससे किसी दूसरे को भी संक्रमण होने की पूरी संभावना होती है।

    जब हम मंजन करते हैं और नहाते हैं उस समय हम अपने फ़ेफ़डों पर जोर देते हैं और रक्तसंचार बढ़ने से अधिकतर बलगम उसी समय बाहर आता है । और डैडी अगर बलगम में खून दिखाई देता है या मंजन करते हुए मसूड़ों से भी खून दिखाई देता है  या सामान्य रंग से कुछ अलग रंग अगर बलगम का है, या उसमें पस भी दिखाई देता है तो हमें अनदेखा नहीं करना चाहिये और एकदम डॉक्टर अंकल को दिखाना चाहिये क्योंकि ये बीमारियों की प्रारंभिक अवस्था के लक्षण होते हैं, जैसे फ़ेफ़ड़े का कैंसर, अस्थमा, ब्रोंकाइटिस इत्यादि । अगर जल्दी ही अपनी जाँच करवा लें तो इन बीमारियों का इलाज करवा सकते हैं और ठीक हुआ जा सकता है।

    प्रदूषण और किसी के संपर्क में आने से भी यह कफ़ बलगम आ सकता है, तो जितना संभव हो सके उतना किसी भी ऐसे व्यक्ति के संपर्क में आने से बचें जो इन रोगों से ग्रस्त हो । कफ़ के लिये हम कफ़ सायरप पी लेते हैं जिससे ये बेक्टीरिया खत्म हो जाते हैं और हम ठीक हो जाते हैं । और डैडी पता है जब मुझे कफ़ हुआ था और डॉक्टर अंकल ने दवाई दी थी तो मेरा कफ़ मुँह से नहीं निकला था, मेरा कफ़ पॉटी के रास्ते निकल जाता था, वैसे ही कई बार दवाईयों के लेने पर बड़ों का कफ़ भी निकल जाता है।

    डैडी सबको पता होना चाहिये कि अगर त्रिफ़ला रोज लो तो ये पेट के रोग पास आयेंगे ही नहीं सारे रोग अपने आप ही दूर हो जायेंगे, बस पेट ठीक रखना चाहिये और डैडी बाजार का त्रिफ़ला मत खाओ क्योंकि उसमें हरड़, बहेड़ा और आँवले की समान मात्रा होती है, मम्मी कहती है कि त्रिफ़ला याने कि तीन फ़ल के गुण और उसकी मात्राएँ होती हैं हरड़ एक भाग, बहेड़ा दो भाग और आँवला तीन भाग और घर पर बना त्रिफ़ला बेस्ट होता है, इस बार मैंने भी त्रिफ़ला बनवाया था क्योंकि त्रिफ़ला चार महीने से ज्यादा ठीक नहीं होता ।

    चलो डैडी अब कफ़ बलगम पर मैंने आपको बहुत कुछ समझा दिया है अब वापिस कैरम पर, वहीं से अपना खेल शुरू होगा, आज तो मैं ही जीतूँगा, आज मेरा लक अच्छा चल रहा है।

    यह पोस्ट इंडिब्लॉगर की कोलगेट प्रतियोगिता The Moral of the Story is..! के लिये लिखी गई है,  ज्यादा जानकारी के लिये My Health Speak Blog पर देख सकते हैं।

Thursday, May 09, 2013

चाँद पूर्ण रूप में

चाँद जब रोटी सा गोल होता है,

पूर्ण श्वेत, अपने पूर्ण रूप में,

उसकी आभा और निखर आती है,

मिलते तो रोज हैं छत पर,

पर देखना तुम्हें केवल इसी दिन होता है,

काश की चाँद हर हफ़्ते पूर्ण हो,

महीने में एक बार तुम्हें देखना,

फ़िर दो पखवाड़े उसी सुरमई तस्वीर को,

सीने से चिपकाकर सोता हूँ,

तुम्हारी यादों में रहता हूँ,

तुम्हारे सपने बुनता हूँ,

तुमसे मिलने के लिये बेताब रहता हूँ,

कभी ऐसा लगता है चाँद,

तुम जल्दी आ जाते हो,

पर एक बात कहूँ,

अब मैं बहुत बैचेनी से इंतजार करता हूँ,

तुम मेरी जिंदगी का हिस्सा जो बन चुके हो..

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